राजनीति

क्या ममता बनर्जी का राजनीतिक ड्रामा चुनाव में मददगार साबित होगा!


रामस्वरूप रावतसरे


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आने के बीच तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने भारत के चुनाव आयोग  के मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव रखा है। ममता बनर्जी के इस कदम के लिए कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य सहयोगी दलों का समर्थन भी मिला है। इन दलों ने मिलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी की है। इस दिशा में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में पेश किए जाने वाले नोटिस के लिए 120 सांसदों और राज्यसभा में दिए जाने वाले नोटिस के लिए 60 सांसदों के हस्ताक्षर भी जुटा लिए हैं।


जानकारों के अनुसार पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले यह कदम क्यों उठाया गया? और क्या विपक्षी दलों खासतौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस को यह नहीं पता कि यह ‘महाभियोग प्रस्ताव’ किसी ठोस नतीजे तक शायद ही पहुँचेगा? आखिर एक दिन पहले ही ओम बिरला को हटाने की विपक्ष की कोशिश नाकाम हो चुकी है। दरअसल, इसे ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है जो अक्सर राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमती है। कई विश्लेषकों का मानना है कि जब भी ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर में घिरती हुई महसूस करती हैं या उनकी महत्वाकांक्षी राजनीति में ठहराव आता है, तब वह किसी बड़े सार्वजनिक मुद्दे या राजनीतिक नाटक के जरिए फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश करती हैं।


दरअसल, सड़क पर संघर्ष, आक्रामक विरोध प्रदर्शन और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक नाटक उनकी राजनीति की पहचान माने जाते हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर से जुड़े विवादों को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। इन आंदोलनों के दौरान ममता बनर्जी स्थानीय बंगालियों को यह समझाने में सफल रहीं कि इन परियोजनाओं से होने वाला आर्थिक विकास उनके हित में नहीं है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मुद्दों पर लगातार जनता को अपने पक्ष में मोड़ते हुए ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुँचने में सफलता हासिल की।
जानकारों की माने तो पहले के चुनावों के मुकाबले इस बार ममता को पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व जन-विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जो मध्यमवर्गीय बंगाली कभी मासिक आर्थिक सहायता योजनाओं के लिए उनकी तारीफ करते थे, वही अब उनकी सरकार की कार्यक्षमता पर सवाल उठाने लगे हैं। राज्य में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण की राजनीति और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालात कठिन होते देख ममता बनर्जी एक बार फिर अपनी पुरानी रणनीति राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन पर निर्भर होती दिख रही हैं। इस बार आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर आम लोगों की आशंकाओं और अज्ञानता को मुद्दा बनाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस एक अभियान चला रही है जिसके जरिए बंगालियों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि चुनाव आयोग एक ‘बाहरी ताकत’ है, जो उनके मतदान अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही एक समानांतर रणनीति के तहत ममता बनर्जी को ‘बांग्लार मेये’ (बंगाल की बेटी) के रूप में पेश किया जा रहा है, जो कथित बाहरी ताकतों के खिलाफ स्थानीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं।


दरअसल, 2026 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले का राजनीतिक माहौल काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। इसी संदर्भ में चुनाव आयोग, इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर लगातार राजनीतिक हमला और रणनीतिक अभियान चलाया जा रहा है।


पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया है, पार्टी नेतृत्व से लेकर जमीनी स्तर तक। इसका कारण भी स्पष्ट है। ईसीआई ने इस प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से 58,20,899 नाम हटा दिए जिनमें मृत्यु, स्थान परिवर्तन, अनुपस्थिति और डुप्लिकेशन जैसे कारण शामिल बताए गए।


इसके साथ ही लगभग 60 लाख ‘संदिग्ध मतदाताओं’ की सूची भी तैयार की गई है, जिनकी स्थिति पर अब न्यायिक अधिकारियों द्वारा फैसला किया जा रहा है। इससे ममता बनर्जी की सरकार के लिए राजनीतिक मुश्किलें खड़ी होना स्वाभाविक माना जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि पहले के वर्षों में बांग्लादेश के नागरिकों के लिए पश्चिम बंगाल में रहना और मतदान करना अपेक्षाकृत आसान था। यहाँ तक कि कुछ मामलों में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को ‘इमाम भत्ता’ जैसी योजनाओं का लाभ मिलने और चुनाव में सरकार के पक्ष में वोट देने के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। ऐसे आरोपों के बीच एसआईआर प्रक्रिया को इन योजनाओं पर रोक लगाने वाला कदम माना जा रहा है। इसी वजह से ज्ञानेश कुमार अचानक तृणमूल कॉन्ग्रेस के निशाने पर आ गए हैं। मामला केवल एसआईआर तक सीमित नहीं है।
हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने घोषणा की कि पश्चिम बंगाल के सभी मतदान केंद्रों पर 100 प्रतिषत वेबकास्टिंग की जाएगी। इससे चुनाव प्रक्रिया की निगरानी कड़ी हो जाएगी और बूथ कब्जाने या वोटबॉक्स में गड़बड़ी की संभावनाएँ कम हो सकती हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “चुनाव प्रक्रिया के दौरान हर मतदान कर्मी से पूर्ण निष्पक्षता अपेक्षित होगी और किसी भी तरह की हिंसा को सहन नहीं किया जाएगा।”


राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक संभावित चुनावी गड़बड़ियों पर अचानक लगाम लगने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस ने ईसीआई और इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक अभियान शुरू कर दिया। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करते हुए 6 मार्च को एस्पलेनैड में धरना देने का ऐलान किया। यह धरना मतदाता सूची से अवैध नाम हटाने के विरोध में आयोजित किया गया था।
जानकारों के अनुसार करीब 114 घंटे तक चले इस धरने के बाद ममता बनर्जी ने इसे समाप्त करते हुए इसे सफल करार दिया। हालाँकि जब यह स्पष्ट हो गया कि इस आंदोलन का एसआईआर प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा है तो इसके बाद एक नया राजनीतिक मुद्दा खड़ा करने की कोशिश की गई मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग  लाने की माँग। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पहले से स्पष्ट था कि इसके सफल होने की संभावना बेहद कम है। हर बार की तरह इस बार भी ममता का चुनावी नाटक मतदाताओं को बरगलाने में कितना सहायक होगा, कहा नहीं जा सकता  लेकिन ममता बनर्जी सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।