विश्ववार्ता

खाड़ी युद्ध में किसके साथ खड़ा भारत

राजेश कुमार पासी

अमेरिका-इस्राएल का ईरान से युद्ध भयानक रूप ले चुका है। लगभग पूरा मध्य एशिया इसकी चपेट में आ गया है। अमेरिका जब ईरान पर हमला करने की धमकी दे रहा था, तब ईरान ने कहा था कि अगर उस पर हमला हुआ तो वो हर उस जगह हमला करेगा, जहां से उस पर हमला होगा। उसका स्पष्ट इशारा अरब देशों की तरफ था, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। अरब देशों को लगा कि अगर अमेरिका ने उनके देशों के अपने एयर बेस से ईरान पर हमले किये तो वो बेमतलब इस युद्ध में फंस जाएंगे। ईरान की मिसाइल पावर से भयभीत अरब देशों ने अमेरिका को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने से रोक दिया। अमेरिका ने इस्राएल और अपने एयरक्राफ्ट कैरियर का इस्तेमाल करके ईरान पर हमला किया था, लेकिन जवाब में ईरान ने अरब देशों के अमेरिकी अड्डो पर हमला कर दिया। ईरान का हमला अमेरिकी अड्डों तक सीमित रहता, तो भी अरब देशों को ज्यादा परेशानी नहीं होती, लेकिन अब ईरान अरब देशों के नागरिक और आर्थिक ठिकानों पर हमले कर रहा है। जहां एक तरफ यूएई का आर्थिक स्रोत दुबई उसके निशाने पर है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब की आर्थिक रीढ़ अरामको को बर्बाद कर रहा है। कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान पर भी ईरान हमले कर रहा है। देखा जाए तो अमेरिका को अपने अड्डे इस्तेमाल करने से रोकना ही अरब देशों को भारी पड़ गया है। अरब देशों की इस सोच के कारण अमेरिका उनकी सुरक्षा नहीं कर पा रहा है। उन्होंने अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने दिया, इसके बावजूद ईरान ने उनको निशाना बनाया है। समस्या यह है कि ये देश अपनी सुरक्षा करने के काबिल नहीं हैं, ये अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर हैं। इनकी यही निर्भरता आज इन पर भारी पड़ रही है। ईरान इन देशों पर मिसाइलों की बारिश कर रहा है और ये रोक भी नहीं पा रहे हैं। ये पूरी तरह से अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भर हैं, लेकिन ईरान के हमले के सामने ये सिस्टम फेल हो गया है। ईरान एक बार में इतनी मिसाइलें मारता है कि उनको रोक पाना सम्भव नहीं होता। देखा जाए तो अरब देश अपनी बर्बादी देख रहे हैं, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहे हैं। समस्या यह है कि ईरान ने अमेरिकी अड्डों की ऐसी हालत कर दी है कि अब इन देशों की सुरक्षा के लिए इन अड्डों का इस्तेमाल भी करना मुश्किल होगा। 

               एक तरफ इतना भयानक युद्ध चल रहा है, तो दूसरी तरफ भारत में अलग तरह की राजनीति चल रही है। विपक्षी दल बार-बार सरकार से पूछ रहे हैं कि इस युद्ध में वो किसके पक्ष में खड़ी हुई है। ईरानी नेता खामनेई की मौत पर सरकार द्वारा ईरान से संवेदना प्रकट करने के लिए कहा जा रहा है। विपक्षी दल दबाव बना रहे हैं कि सरकार खामनेई की हत्या के लिए अमेरिका और इजराइल की निंदा करे। प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति का एक बड़ा सच है कि वो कभी भी जल्दबाजी में नहीं होते। वो हर मामले में सोच-समझकर ही कदम आगे बढ़ाते हैं। घरेलू राजनीति में उनका यही रवैया है कि वो समय आने पर ही जवाब देते हैं। वैश्विक राजनीति में तो सारी दुनिया देख रही है कि वो हर मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। वो सही वक्त आने पर ही बोलते हैं, अन्यथा चुप रहते हैं। टैरिफ के मुद्दे पर डोनाल्ड ट्रंप के दर्जनों बयानों के बाद भी उन्होंने चुप्पी बनाये रखी । ऐसे ही डोनाल्ड ट्रंप के ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने वाले बयान पर भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। उनकी यही चुप्पी उनके दुश्मनों को परेशान कर देती है। मोदी ने न तो ईरान पर हमले पर कोई बयान दिया है और न ही ईरानी नेता की हत्या पर उनका कोई बयान आया है। वैसे भी देखा जाए तो खामनेई किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, इसलिए उनकी मौत पर कोई बयान देना जरूरी नहीं है। राजनीति में कहा जाता है कि कई बार कुछ नहीं बोलना भी बहुत कुछ बोलना होता है, मोदी इस कला में माहिर हैं । विपक्ष की सारी सोच और राजनीतिक मुस्लिम तुष्टिकरण का शिकार है । विपक्ष खामनेई की मौत पर इसलिए शोर मचा रहा है, क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में शिया मुस्लिम रहते हैं। शिया मुसलमान खामनेई को अपना धर्मगुरु मानते हैं और उनके साथ उनकी भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। खामनेई की हत्या पर सारी दुनिया के शिया मुसलमान बहुत दुखी और परेशान हैं। इसके विरोध में वो पूरी दुनिया में प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत का विपक्ष चाहता है कि उनकी भावनाओं को समझते हुए भारत ईरान के साथ खड़ा हो जाये। 

               मोदी जब सत्ता में आये थे, तो उन्होंने घोषणा की थी कि उनकी नीति केवल ‘इंडिया फर्स्ट’ होगी। उन्होंने कहा था कि वो केवल भारत के हितों को देखकर ही फैसला लेंगे। ईरान और इस्राएल दोनों ही भारत के मित्र देश हैं, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर है। ईरान के साथ भारत का लेनदेन का रिश्ता रहा है, जबकि इजराइल के साथ हमारे रणनीतिक संबंध हैं। बात अगर सिर्फ ईरान और इजराइल की होती तो भारत शायद ईरान के पक्ष में खड़ा हो सकता था, क्योंकि हमला इजराइल द्वारा किया गया है। भारत किसी भी देश पर हमले के खिलाफ है और सारे मुद्दे बातचीत से हल करने का समर्थक है । इस युद्ध में अमेरिका भी शामिल है, इसलिए भारत ईरान के साथ नहीं जा सकता, लेकिन अपना विरोध जता सकता था। समस्या यह है कि ये युद्ध ऐसा रूप ले चुका है कि ईरान का पक्ष लेना देश के हितों से समझौता करना होगा। सवाल यह है कि भारत का हित कहां है। ईरान ने लगभग सभी अरब देशों पर हमला कर दिया है और अरब देशों के साथ भारत के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हित इतनी गहराई से जुड़े हुए हैं कि अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। अब ये युद्ध इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच नहीं रह गया है, ये अरब देशों का युद्ध बन गया है। अरब देशों में भारत के लगभग एक करोड़ लोग रहते हैं । भारत को  उनकी चिंता करनी चाहिए या ईरान से दोस्ती के नाम पर उनके रोजगार और सुरक्षा को खतरे में डाल देना चाहिए। आप विचार करें कि देश का हित किसमें है,एक प्रधानमंत्री होने के नाते मोदी जी को किसके पक्ष में खड़े होना चाहिए। इस्लामिक संगठन ओआईसी में 56 देश हैं, कोई भी ईरान के समर्थन में नहीं आया है । ईरान के साथ भारत का व्यापार सिर्फ दो बिलियन डॉलर का है और दुसरे पक्ष के साथ 400 बिलियन डॉलर का है । ऐसे में भारत को किसके साथ खड़ा होना चाहिए, इसका जवाब स्पष्ट हो जाता है। ईरान में सिर्फ दस हजार भारतीय रहते हैं, क्या सरकार दस हजार लोगों के लिए एक करोड़ लोगों के हितों की बलि चढ़ा दे। चीन और रूस ईरान के सबसे बड़े दोस्त हैं, ईरान ने चीन को सस्ता तेल और रूस को हथियार दिये हैं ।  उन्होंने निंदा करने के अलावा ईरान के लिए क्या किया है।

              मोदी अपनी इंडिया फर्स्ट की नीति का त्याग करके, क्या ईरान के लिए अमेरिका, इस्राएल, यूरोपीय देशों और अरब देशों के खिलाफ खड़े हो जाएं। इस देश का विपक्ष भारत की बर्बादी चाहता है, ताकि सरकार को घेरा जा सके। गलत फैसले लेने के लिए मजबूर किया जाए और फिर परिणामों के लिए सरकार को दोष दिया जाए ।  जो लोग ईरान को भारत का दोस्त बता रहे हैं, ये उनकी अपनी सोच है।  लेकिन जब भी पाकिस्तान का मामला आया है, उसने हमारे खिलाफ जाकर पाकिस्तान का साथ दिया है। युद्ध के समय उसने पाकिस्तान को अपनी सीमा से सेना हटाने की सुविधा दी है,  ताकि वो पूरी सेना भारत के खिलाफ युद्ध में झोंक सके । ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया है।  ईरान ने अपने ही हज़ारो लोगों की हत्या कर दी है और हज़ारो को जेल में डाला हुआ है। कई आतंकवादी संगठन खड़े किए हुए हैं, जो मासूम लोगों की हत्याएं करते हैं । एक क्रूर तानाशाह के खात्मे के लिए भारत को क्यों अफसोस जाहिर करना चाहिए। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल चाहते हैं कि शिया मुसलमानों की खामनेई के प्रति भावनाओं को देखते हुए भारत को ईरान के साथ खड़े होना चाहिए। ये वही लोग हैं जो बंगलादेशी हिंदुओं की हत्याओं पर चुप्पी साध कर बैठे हुए थे। कश्मीर घाटी हिंदुओ से खाली कर दी गई, किसी की भावनाएं नहीं भड़की। इनका मतलब यह है कि शियाओं की भावनाओं को देखते हुए भारत पूरी दुनिया से दुश्मनी मोल ले ले और अपनी बर्बादी के रास्ते पर चल पड़े। मोदी जी ने बहरीन, यूएई और सऊदी अरब से बात करके अपना पक्ष बिना बोले ही बता दिया है। उन्होंने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से भी बात की है।  आज हर देश अपने हितों को देखकर ही फैसले लेता है, भारत का हित अमेरिका, इजराइल और अरब देशों से जुड़ा हुआ है। ईरान पर हमले का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन अरब देशों पर हमले का समर्थन कैसे किया जा सकता है। ईरान बेहद आक्रामक होकर अरब देशों पर हमले कर रहा है, ऐसे में भारत का उनके साथ खड़े होना जरूरी है । भारत ने किसी का पक्ष नहीं चुना है, भारत ने अपना हित चुना है, जो कि हर देश का अधिकार है । 

राजेश कुमार पासी