कविता

नारी : एक करुण पुकार

सदियों से मानव की कमजोरी
नारी को समझा गया हर बार,
विजय चिन्ह समझ लूट लिया
जैसे कोई युद्ध का उपहार।

कभी अपनों की बेरुखी झेली,
कभी दुश्मनों की तलवार,
युद्धभूमि की आग में जलकर
सहती रही अस्मिता पर प्रहार।

आज बदल गया रूप समय का,
पर चाल वही, व्यवहार वही,
क्षद्म प्रेम का जाल बिछाकर
भटकाया जाता बार-बार।

अब जागे समाज, बढ़े चेतना,
पहचाने चेहरे भेड़ियों के यार,
शिक्षा, साहस और सजगता से
टूटेगा छल का हर जाल।

जिस दिन नारी का मान सुरक्षित,
और होगा उसका सच्चा सत्कार,
तभी सच्चे अर्थों में जग में
नारी दिवस होगा साकार।

मुनीष भाटिया