हाँ तुम मुझे यूँ भूला ना पाओगे …………….

rafiरफ़ी साहब की पुण्य तिथि : 31 जुलाई …।

पूरी दुनिया के संगीत और सुरों के बेताज बादशाह, चीनी, मिश्री और शहद से भी मीठी, आकाश की उंचाई और सागर की गहराई को छूती हुई, दिल की गहराई से आवाज़ निकालने वाले सुरों के शंशाह मोहम्मद रफ़ी  साहब को हमसे बिछड़े हुए पुरे 33 वर्ष हो गए हैं . 31 जुलाई 1980 का वह काला  मनहूस दिन जब रफ़ी साहब इस नफरत की दुनिया को छोड़ कर प्यार की दुनिया में हमेशा हमेशा के लिए चले गए और रोता बिलखता छोड़ गए अपने करोडो प्रेमिओ को जो रफ़ी साहब के सुरीले गाने सुनकर झूम जाया करते थे. रफ़ी साहब आज भी अपने मधुर सुरीले गीतों की वजह से आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में जिन्दा है.  हर गायक की एक अलग पहचान थी .  जैसे किशोर कुमार रोमांटिक , मुकेश-तलत दर्द भरे, महेंदर कपूर भक्ति और देश प्रेम के गीतों के लिए जाने जाते थे लेकिन रफ़ी साहब एक ऐसे महान गायक थे जो हर फन में एक्सपर्ट थे. चाहे रोमांटिक गाना हो, दर्द भरा हो ,भक्ति ,देश भक्ति, कव्वाली, उछल कूद  कोई भी गाना हो बड़ी सहजता से गा लेते थे  और उनकी आवाज़ हर कलाकार पर फिट बैठती थी. कोई लूला लंगड़ा , अँधा -लाचार हर जगह उनकी आवाज़ फिट हो जाती थी बाकि कोई और गायक ऐसा नहीं कर सकता था.  आज पुराणी राहों से कोई मुझे अव्वाज़ न दे (दिलीप कुमार विकलांग रोल में ) गरीबो की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा तुम एक पैसा दोगे  वो दस लाख देगा , औलाद वालो फूलो फ्लो बूढ़े गरीब की ये  दुआ है…… जब जब बहार आय और फूल मुस्कराय … रहा गर्दिशों में हर दम … बहारो फूल बरसाओ …  बाबुल की दुआएं लेती जा … आज भी सबकी आंखें नम  कर देता है. जब तक संसार चलेगा  बेटियो की शादिया होती रहेंगी और ये गाना तब तक अमर रहेगा . इस दर्द भरे गाने का आज तक कोई भी गाना विकल्प नहीं बन पाया .   उनका गया हुआ कोई भी गीत तो ऐसा नहीं जो कहें कि ये गाना बेकार है

राजेश खन्ना किशोर  की आवाज की मुरीद थे लेकिन जब किशोर हाथ खड़े कर देते थे तो रफ़ी साहब को बुलाया जाता था ” अकेले हैं चले आओ कहाँ …. यूँ ही तुम मझसे बात करती हो …।  ये रेशमी जुल्फें ये शरबती आंखें ……., छुप गए तारे नज़ारे हो क्या बात हो गई ……., ये जो चिलमन है दुश्मन है हमारी …। हाथी मेरे साथी का गाना ” नफरत की दुनिया को छोड़ के …. राजेश की जिद थी की किशोरे दा इस गाने को गायेंगे लेकिन कई दिन के रियाज़ के बावजूद किशोर उस गाने गाने को नहीं गा पाए तो हार कर रफ़ी साहब को बुलाया गया उन्होंने एक घंटे में इस गाने की रेकार्डिंग करके दे दी . ये थे रफ़ी साहब  जो गाना कोई नहीं गा सकता था वो गाना रफ़ी साहब बड़ी सहजता से गा लेते थे। रोमांटिक गानों में रफ़ी साहब का जबाब नहीं था  जैसे   में जाट यमला पगला दीवाना …। हो मेरी महबूबा …… चाहे कोई मुझे जंगली कहे…।  आने से उसके आये बहार ….  हो फिरकी वाली ……।  कहाँ तक गिनवाऊँ . उनका जितने गाने सुनो मन भरता ही नहीं . रफ़ी साहब ने अपने जीवन में तीस हज़ार से भी ज्यादा गाने गए होंगे .

में रफ़ी साहब  का बचपन से ही इतना फेन था कि मैने अपनी शादी भी 31 जुलाई को करवाई . 31 जुलाई को मेरी मेरिज एनिवर्सरी भी होती है .  रफ़ी साहब जितने  अच्छे और महान गायक थे उतने ही अच्छे और महान इंसान भी थे . कल 31 जुलाई है आओ सभी मिलकर रफ़ी साहब को श्रधान्जली दें और उन्हें याद करें . रफ़ी साहब जैसा गायक कई सदियो के बाद पैदा होता है लेकिन जहाँ तक में समझता हूँ जब तक इस दुनिया का वजूद है रफ़ी साहब का विकल्प तो कोई हो ही नहीं सकता . में रफ़ी साहब को  कोटि कोटि नमन करता हूँ ।

चन्द्र प्रकाश शर्मा

2 COMMENTS

  1. रफ़ी साहब ने `चाइना टाउन’ और `गीत’ की तेलुगु रीमेक फ़िल्मों में एन. टी. रामाराव के लिए गाने गाये थे। एक अन्य तेलुगु फ़िल्म में श्री एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम के साथ गाया उनका गाना “यूनानी हकीम हूँ, ईरान से आया हूँ, बीमारी जैसी हो, वैसी दवा लाया हूँ” भी यादगार है। साठ के दशक में बनी तेलुगु फ़िल्म `भक्त रामदास’ में संत कबीर के लिए हिंदी में गाये उनके गीत – “कहो खातिर से…”, “नाम राम से ज्यादा भाई!”, “दिल को हमारे चैन नहीं है, देखे बिना राम कैसे जाएँ”, “काहे का रोना-धोना है, जब तक हमको जीना है, होके रहेगा जो होना है” अविस्मरणीय हैं। कम लोग जानते हैं कि रफ़ी साहब की स्मृति में प्रति वर्ष असम राज्य में संगीत-प्रेमियों द्वारा एक भव्य समारोह आयोजित किया जाता है। इस अमर गायक को नमन और श्रद्धांजलि।

  2. रफ़ी साहब का एक पुराना प्रशंसक आज(३१ जुलाई को) रफ़ी साहब को उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि अर्पण करता है..

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