संजीव कुमार सिन्‍हा
2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

परिचर्चा: ‘नक्‍सलवाद’ के बारे में आपका क्‍या कहना है…

एक तरफ दिल्ली में 7 फरवरी, 2010 को आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं, ‘नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ वहीं दूसरी ओर, 4 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के नक्सलवाद प्रभावित इलाकों-लालगढ़ और मिदनापुर के दौरे पर गए हमारे गृहमंत्री पी. चिदंबरम माओवाद विरोधी अभियान में सेना को शामिल किए जाने की मांग को ठुकरा देते हैं और कहते हैं, ‘हमने माओवादियों के सामने वार्ता का ताजा प्रस्ताव रखा है।’ और इस दौरे के महज दो दिन बाद 06 अप्रैल, 2010 को नक्सली छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बर्बर हमले कर सीआरपीएफ के 74 जवानों को घेर कर मार डालते हैं। वास्तव में नक्सलियों ने लोकतांत्रिक भारत के अस्तित्व को चुनौती दी है।

नक्सली आतंकवाद की भयानक तस्वीर:

• 2009 के आंकड़ों के अनुसार नक्सलवाद देश के 20 राज्यों की 220 जिलों में फैल चुका हैं।

• पिछले तीन साल (2007-08 तथा 2009) में देश में नक्सली हिंसा के कारण 1405 लोग मारे गए जबकि 754 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए।

• भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के मुताबिक देश में 20,000 नक्सली काम कर रहे हैं।

• लगभग 10,000 सशस्त्र नक्सली कैडर बुरी तरह प्रेरित और प्रशिक्षित हैं।

• आज देश में 56 नक्सल गुट मौजूद हैं।

• करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर इलाका नक्सलियों के कब्जे में हैं।

• नक्सली करीब 1400 करोड़ रुपए हर साल रंगदारी के जरिए वसूलते हैं।

• नक्सली भारतीय राज्य को सशस्त्र विद्रोह के जरिए वर्ष 2050 तक उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

नक्सलियों को नेस्तनाबूत करने का साहस गृहमंत्री को दिखाना चाहिए तो वो अच्छी अंग्रेजी में पिलपिला बयान देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। सवाल ये है कि आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा? कब तक गरीब, आदिवासियों, किसानों की लाशें ढेर होती रहेंगी? कब तक हमारे जवान नालायक नेताओं की वजह से नक्सली-आतंक के शिकार होते रहेंगे? कब जागेगी हमारी सरकार और कब जागेंगे हम? आख़िर कब?

पिछले चार दशकों से हमारा देश नक्सली आतंकवाद का दंश झेल रहा है। नक्सली आतंक से उपजे हालात ने आज देशवासियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। नक्सलियों के साथ समझौती करनेवाली कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के शासन में उनके हौंसले बुलंद हैं। वे सुरक्षा बलों और निर्दोष लोगों के खून से न जाने कौन सी क्रांति की इबारत लिख रहे हैं? स्कूल भवनों, रेल पटरियों, सड़कों, पुलों, स्वास्थ्य केन्द्रों को बमों से उड़ाकर न जाने किस तरह के विकास का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं।

25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में हुए भूमि विवाद में जमींदार और किसानों के बीच संघर्ष हुआ। बंगाल पुलिस ने 11 किसानों को मौत के घाट उतार दिया। यहीं से नक्सलवाद की चिंगारी भड़की। माकपा से अलग हुए चारू मजूमदार व कानू सान्याल ने इस असंतोष का नेतृत्व किया।

21 सितंबर 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर के विलय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ। माओवादियों का सैनिक संगठन ‘पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) है।’

माओवादियों से प्रभावित क्षेत्र को ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता है। यह ‘रेड कॉरिडोर’ आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार से होते हुए नेपाल के माओवादी ठिकानों को जोड़ता है। नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है। ये ऐसे जंगलवासी हैं जो सदियों से शोषण का शिकार हैं।

नक्सली समस्या भारतीय शासन व्यवस्था की विफलता की निशानी है। आज भी आजादी के 62 साल बाद बहुसंख्यक आबादी को पीने का साफ पानी नसीब नहीं है। बेरोजगारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अशिक्षा के चलते लोगों का जीवन अंधकारमय है। भूख व कुपोषण से मौतें हो रही है। जानलेवा कर्ज है। ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं। नक्सलवादी इसी स्थिति का लाभ उठाकर अपना संकीर्ण स्वार्थ साधते हैं। वे लोगों को जनता के राज का सपना दिखाकर उन्हें अपने साथ जोड़ लेते हैं।

अब युवा माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर क्रांतिकारी नहीं बनते। माओवादियों ने अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए बेरोजगार युवाओं को गुमराह करना शुरू कर दिया है। माओवादियों ने उनसे जुड़ने वाले हर युवा को 3 हजार रूपए प्रतिमाह तनख्वाह तथा रंगदारी से उगाही गई रकम में से भी कमीशन देने की बात कही है। इस लालच में फंस कर माओवादियों से जुड़ रहे युवाओं को लेकर गृहमंत्रालय ने चिंता जताई है।

दूसरी ओर, सर्वहारा के शासन का सपना देखनेवाले नक्सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्य बरामद नहीं होते। कुछ दिनों पहले एक नक्सली Bangetudi शिविर में छापे के दौरान पुलिस ने ब्लू फिल्म की सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्योद्धाटन हुआ कि बड़ी तेजी से नक्सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। संगठन में शामिल युवती चाहकर भी इसके खिलाफ न आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है। वास्तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है।

पिछले दिनों केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने मानवाधिकार विभाग के सम्मेलन में भरोसा दिलाया कि देश के माओवाद प्रभावित इलाकों को अगले तीन साल में नक्सलियों के चंगुल से मुक्त करा लिया जाएगा। गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) में एक जनसमूह को संबोधित करते हुए 06 मार्च 2010 को कहा कि वर्ष 2050 तक नक्सली भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। पिल्लई ने स्वीकार किया कि नक्सलवाद प्रभावित राज्यों को नक्सलियों को कुचलने की स्थिति में आने में अभी सात से 10 वर्ष लगेंगे।

केन्‍द्र सरकार नक्सली हिंसा को रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है। इसी के चलते नक्सली हिंसा में लगातार इजाफा होता जा रहा है। नक्सलवाद के खात्मे के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत हैं, जिसका संप्रग सरकार में अभाव दिखता है। कभी सरकार नक्सलवाद को आतंकवाद की श्रेणी में रखती है तो कभी बातचीत के लिए टेबल पर बुलाती हैं। सरकार का यह ढुलमुल रवैया बेहद चिंताजनक हैं।

नक्सलवाद का सिद्धान्त है ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’ नक्सलवादी ‘वर्ग शत्रुओं’ का कत्लेआम कर क्रांति लाना चाहते हैं। उनका भारतीय लोकतंत्र मे विश्वास नहीं है। वे चुनावों का बहिष्कार करते हैं। वे हिंसा के माध्यम से सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करना चाहते हैं।

नक्सलवाद के पक्ष में तर्क गिनाने वाले उनके समर्थक दंडकारण्य का उदाहरण देते हैं, जहां आदिवासियों का बड़े पैमाने पर शोषण हुआ। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य क्षेत्र में नक्सलियों ने तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी बढ़वाने के लिए अभियान चलाया। शराबबंदी को लेकर महिलाओं को लामबंद किया। नक्सल आंदोलन के चलते आदिवासियों ने हजारों एकड़ वनभूमि पर कब्जा कर लिया। नक्सलवादियों का कहना है कि उन पर पूंजीपतियों, पुलिसकर्मियों, अधिकारियों की हत्या का जो आरोप लगता है वह आत्मरक्षा में उठाया गया कदम है। उनकी हिंसा ‘टारगेटेड वाइलेंस’ है।

प्रवक्‍ता डॉट कॉम का मानना है नक्सलवाद का सामाजिक परिवर्तन से  कोई लेना-देना नहीं है, वस्तुत: यह एक विशुद्ध आतंकवाद है, जिसका लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता कब्जाना है। नक्सलवाद मानवता का दुश्मन है। यह भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा है। यह सिरफिरे लोगों का गिरोह है जो जनता व जवान के खून से भारत की धरती को बस लाल करना जानते हैं। सच में ये रक्तपिपासु हैं। ये राष्ट्रद्रोही हैं।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए नक्‍सली हिंसा का रास्‍ता छोडे। वे चुनावों में भाग लेकर अपने विचारों की श्रेष्‍ठता साबित करें। वहीं केन्‍द्र सरकार हिंसक माओवादियों से बातचीत का स्‍यापा छोडे और उस पर सीधे प्रहार करें। आज जिस तरीके से देशभर में नक्सली हमले बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए केन्द्र और राज्य में समन्वय स्‍थापित करे। पुलिस संख्या बल में इजाफा हो। सुरक्षा बलों को बेहतर प्रशिक्षण मिले। अत्याधुनिक हथियार मिले। वास्तव में अब सख्त कार्रवाई का वक्त आ गया है। इसके साथ ही आम जनता को भी एकजुट होकर नक्सली आतंकवाद के खात्मे के लिए जन-अभियान चलाना चाहिए।

49 thoughts on “परिचर्चा: ‘नक्‍सलवाद’ के बारे में आपका क्‍या कहना है…

  1. गुंजेश गौतम झा"

    ( “नक्सलियों का अंत जरूरी है।” )
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    “हर बार की चुनावों की तरह इस बार फिर नक्सलियों ने चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी अनास्था को दर्शाने के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी वे बाज नहीं आ रहें हैं। छत्तीसगढ़ और बिहार में बीते 5-6 दिनों में हुई नक्सल हिंसा इसका प्रमाण है, जिसमें दर्जनों सुरक्षाकर्मी तथा लोगों की जानें गई तथा दर्जनों लोग घायल हुए। लेकिन सब घटनाओं के बावजूद भी न तो मतदान रूका और न ही मतदाता। चुनाव दर चुनाव यह जाहिर होता जा रहा है कि जनता लोकतांत्रिक चुनाव पद्धति में यकीन रखती है, न कि नक्सलियों के फरमान में।”
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    “नक्सलियों के फरमान का जो थोड़ा बहुत असर होता है, वह सिर्फ डर के कारण होता है। भय का राज कायम रखने के लिए नक्सली हिंसा का सहारा लेते हैं। पूर्व के विधानसभा चुनावों के बाद अब लोकसभा चुनावों में भागीदारी निभाकर बस्तर के लोगों ने साफ संदेश दे दिया है कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही अपनी समस्याओं का समाधान तलाश सकते हैं, बंदूकों से कोई हल नहीं निकाला जा सकता।”
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    ” नक्सलियों को शिकायत सरकार से है। बार-बार के हमले से वे यही दिखाना चाहते हैं कि उनके निशाने पर सरकारी कर्मचारी, सुरक्षाबल के जवान रहते हैं, लेकिन जिस तरीके से वे आम जनता को भी निशाना बनाते हैं, उससे साफ नजर आता है कि उनके पास न कोई विचारधारा है, न ही नैतिकता। कुछ अरसा पहले नक्सलियों ने यात्री बस पर हमला किया था। इस बार एंबुलेंस को निशाना बनाया। नक्सली शायद युद्ध , आतंकवाद ऐसे तमाम भयावह शब्दों से भी भयानक होते जा रहे हैं। पौराणिक कथाओं में उल्लिखित उन असुरो की तरह जिन्हें अपनी क्षुधा शांत करने के लिए रोजाना निरीह इंसानों के रूप में खुराक चाहिए।”
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    ” दलित-वंचित के नाम पर पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से जो हिंसक आंदोलन प्रारंभ हुआ था, आज फिरौती और अपहरण का दूसरा नाम है। एक अनुमान के अनुसार नक्सली साल में अठारह सौ करोड़ की उगाही करते है। विदेशी आकाओं से प्राप्त धन संसाधन और प्रशिक्षण के बल पर भारतीय सत्ता अधिष्ठान को उखाड़ फैकना नक्सलियों का वास्तविक लक्ष्य है। नक्सलियों ने सन् 2050 तक सत्ता पर कब्जा कर लेने का दावा भी किया है। इस तरह के आंदोलन कंबोडिया, रोमानिया, वियतनाम, आदि जिन देशों में हुए, वहाँ लोगों को अंततः कंगाली ही हाथ लगी। माओ और पोल पॉट ने लाखो लोगों की लाशें गिराकर खुशहाली लाने का छलावा दिया था, वह कालांतर में आत्मघाती साबित हुआ। नक्सली क्या इसी अराजकता की पुनरावृत्ति चाहते हैं? नक्सल समस्या को सामाजिक, आर्थिक पहलू से जोड़कर इसका निवारण करने के पैरोकार वस्तुतः हिंसा के इन पुजारियों के परोक्ष समर्थन ही हैं।”
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    “सुदूर आदिवासी अंचलो में प्रशासनिक अमले की दखलंदाजी को प्रारंभिक नीति-नियंताओं ने इसीलिए सीमित रखने की कोशिश की ताकि उनकी विशिष्ट पहचान और संस्कृति अक्षुण्ण बनी रह सके, किन्तु इससे वे क्षेत्र मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित रह गए और इसी शून्य का फायदा उठाकर इन क्षेत्रों में सफलतापूर्व अलगाववादी भावना विकसित की गई। उन राष्ट्र-विरोधी ताकतों को देश में प्रचलित विकृत-सेकुलरवाद के कारण खूब प्रोत्साहन मिला। इस कुत्सित साजिश का राष्ट्रवादी शक्तियों ने विरोध किया तो उन पर सामाजिक खाई पैदा करने का आरोप लगाया गया।”
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    “सुदूर इलाकों के आदिवासियों ने मुख्यधारा में शामिल कर उनमें स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा जगाने की कोशिशों को हर संभव तरीके से कुंद करने का पूरा प्रयास किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुषंगी ईकाई-वनवासी कल्याण आश्रम जैसे राष्ट्रवादी संगठनों ने जब वनवासियों के कल्याण की योजनाएँ चलाई तो आरोप लगाया गया कि ब्राह्मणवादी शक्तियाँ आदिवासियों की पहचान मिटाने का काम कर रही हैं। चर्च ने अपने मतांतरण अभियान के लिए इस दुष्प्रचार का हर तरह से पोषण किया। देश के कई इलाकों में माओवादी-नक्सली और चर्च के बीच घालमेल अकारण नहीं है। इस साजिश को पहचानने की आवश्यकता है।”
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    ” नक्सलवाद वस्तुतः भारतीय व्यवस्था के प्रति बगावत है। इस अघोषित युद्ध का सामना दृढ़-इच्छाशक्ति के द्वारा ही हो सकती है और इसके लिए राजनैतिक मतभेदों से ऊपर उठने की आवश्यकता है।”
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    “सबसे पहले सुरक्षा विशेषज्ञों को इस मामले में स्वतंत्र रणनीति बनाने की छूट देनी चाहिए और भारतीय सत्ता अधिष्ठान को पूरे संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। जो क्षेत्र नक्सल मुक्त हो जाएं, उन क्षेत्रों में युद्ध स्तर पर सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा जैसे विकास कार्यों के प्रकल्प चलाने चाहिए और आदिवासियों की विशिष्ट पहचान को अक्षुण्ण रख उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए। तभी नक्सल समस्या का समाधान संभव है।”
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    “गुंजेश गौतम झा”
    “राजनीति विज्ञान विभाग”
    “काशी हिंदू विश्वविद्यालय”
    संपर्क- 9026028080

  2. डॉ. राजेश कपूरडा.राजेश कपूर

    नक्सलवाद के बारे में लिखे इस लेख और उस पर आई अधिकांश टिप्पणियों से नहीं लगता कि हम लोगों को समस्या की सही जानकारी है. ‘रामेंद्र सिंघ भदौरिया’ जो कह रहे हैं, वह सही है. केंद्र सरकार देश के हालात जिस तरह से बिगाड रही है, उन हालत में हम सब के पास शस्त्र उठाने , आतंकवादी बनने के इलावा शायद ही और कोई विकल्प बचे. वनवासियों, निर्धनों की जमीनें, आजीविका के साधन जबरन छीन कर सरकार विशाल कंपनियों के हवाले कर रही है. ऐसे भूख से बिलखते परिवारों को मरने-मारने के इलावा और कोई विकप्ल नजर नहीं आता. कम्पनियों के हाथों में बिका मीडिया सच को कभी सामने नहीं लाता. विदेशि अमेरीकन और चीनी ताकतें इन हालात का भरपूर दुरुपयोग कर रही हैं.
    * जमीनों, रोजगार से वंचित निर्धनों की विडम्बना यह है कि यदि वे अपने अस्तित्व की रक्शा के लिये हथियार नहीं उठाते तो वे भूख से ( ३००० रु मासिक भी न मिले तो ) मर जायेंगे, और अगर वे हथियार उठाते हैं तो सरकार की गोली से मरेंगे. वे जैसे भी मरें ; दोनो हालात में सरकार और कम्पनियों के उद्देश्य की पूर्ती होती है. दोनो हालात में जमीनों से उनकी बेदखली होती है, जमीने खाली होती हैं . सच तो यह है कि ये सरकार व कार्पोरेशनें मिल कर किसी न किसी प्रकार इन्हें मारना ही चाहती है. इस बात पर विश्वास न हो तो ”depopulation Conspiracy in India ” गूगल सर्च में देख लें. शायद ही चंद लोगों को पता हो कि भारत की आधी आबादी को समाप्त करने के लिये अनेक प्रयास चल रहे हैं .
    * खनिज सम्पदा के भू-भागों में सरकार का तरीका यह है कि रोजगार, जमीनें छीन कर, अत्याचार कर के पहले उन्हें आतंकवादी बनने पर मजबूर करो, फिर मीडिया के सहयोग से खूब बदनाम करो और उसके बाद गोली मर दो. बिना पैसा दिये अधिकांश जमीनें खालि हो जायेंगी. अन्त में कारपोरेशनों के हवाले तो वह जमीन कर ही देनी है .
    * कुल जमा इस सारी समस्या के मूल में विशालकाय कार्पोरेशनें हैं. भारत सरकार उनके इशारे पर नाचते हुए, उनकी योजना से, उनके हित में सबकुछ कर रही है. बाकी सब तो भरमाने के नाटक हैं. नैक्स्लाईटर समस्या हल हुई तो सरकार अपने गुप्त एजेंडे की पुर्ती नहीं कर सकेगी. अतः उसे समस्या को और विकट, और भयावह बनाना है. जन-मन में उनके विरु्द्ध इतना विष भर देना है कि हजारों नैक्सलाईटरों को गोली मार दें तो जनता कहे कि सरकार ने सही किया है. ठीक वैसे ही जैसे अमेरीका ने अफगानिस्तान में किया था.
    * शायद अनेकों को यह बात अजीब लगे कि नैक्सलाईटर इलाकों में इसाई चर्च और चीन समर्थक मिल कर काम कर रहे हैं. वास्तव में भारत को लूटने के लिये दोनो मिल गये हैं.
    * अतः नैक्स्लाईटर मरे या सुरक्शा बल के जवान, सरकार और कम्पनियों को इसकी लेश भर भी परवाह नहीं है. वे तो चाहते हैं कि अधिक से अधिक सुरक्शा बल के लोग मरें जिससे वे अधिक मात्रा में नैक्स्लाईटरों को मारने के लिये जन समर्थन प्राप्त कर सकें.
    * ये हालात हैं इस देश के और इस सरकार के. हमारी विडम्बना यह है कि सुरक्श बल का जवान मरे या कोई हालत के हाथ मजबूर नैक्स्लाइइटर ; मरती तो कोई भारत की संतान है.
    * जहां तक बात है महिलाओं की अस्मत लूतने की तो यह एक अलग मुद्दा है कि अमेरीका और उसके साथी देश किस प्रकार भारत की सेनओं, समाज और संगठनों में वासना से भरा साहित्य, सीडियां फैला रहे हैं. भारत के हर वर्ग को पतित, चरत्रहीन बनाना भी उनके एजेंडे में है. अतः इस मापदंड पर किसी संगठन या सेना को परखना प्रमाणिक या निर्णायक कसौटी नहीं हो सकता.

  3. DILIP TAYADE

    यहाँ लिखा सभी बाते एकदम झूटी है लेकिन जो लिखा वो एक सृफ्फ़ एक रुपये एक बाजु दिखा रहे है असलियत जो नाक्स्लियोने जो जंग छेड़ी दरसल एस देस के पूंजी पति साम्राजवादी के खिलाप है एस देश के पूंजी पति हमारे गणतंत्र का सहारा बने हुए नेते भी उनका साथ देने लगे उनका मकसद बस एस देश को बेच खाना है देखो कही भी देश तरक्खी के बहाने उन्हें बिजली पानी जमीं १००० रो एकड़ में दी जाती है लेकिन एस देश के गरीब जनता को न ठीक से साफ पानी मिलता ह न खाना न चाट के लिए १००० फिट जमी न लेकिन इनको बोहत कुछ मिल जाता एन पूंजी पति ओ को कर्ज भी माफ़ होते है आवर सरकारी खजाने से सहलात जो सब्सिडी के नाम से दी जाती एक तरफ किसानो , कर्जा माफ़ करने की घोषणा करती लेकिन इसका फायदा जमीन दरो को ही मिल रहा है जिनके महाराष्ट्र जैसे गन्ने के खेत के साखर कारखाने मालिक है इनको ही मिला है न आम किसानो को मिला है आवर देश के युवा को देखे आज उनकी हालत माँ बाप से बिचाद कर बहार पढाई या नोकरी करनी पढ़ रही जो हमरे परिवार दूर कर देती है ये पूंजी पति ओ के अस्पताल है शिक्षा घर कोलेज है हमरे लिए सरकारी अस्पताल ,न दवाई का ठिकाना न कर्मचारियोकी पगार स्कुल है तो दीवार इ नहीं पानी नही खेल कूद के मैदान नहीं इन्होने हर तरफ इन पूंजीपतियो ने हमारी सर्कार के बल चलने वाली सेना पुलिस मिलट्री का फायदा लेते है उसमे सर्कार झेड सुरक्षा देती है हमारे गरीब को मरने को कोई आया या हमारा घर जलाया तो क्या ये पुलिस वाले सर्कार सुरक्षा देगी नहीं ये सृफ्फ़ देश के नाम हमारी जरुरत को नहीं समजते अगर उनको देश के हित में करना है क्यों देश सरकारी अस्पताल स्कुल नोक्रिया बिजली पानी इनका व्यापारी कारन प्रवेट लेस किया निजी किया क्यों ये अब अंतराष्ट्रीय विध्त्यापिथ लेन की सोच रहे क्यों एस कारन नाक्साल्वाद बढ़ रहा हम युवा आज शराब खाने जैसे होटलों में कम कर रहे एन बड़े पैसे वालो के यहाँ जुटे सफ्फ कर रहे हम क्या बताये जो ऊपर लडकियों के शोषण के बारेमे लिखा है तो क्यों ब्यान्न्द्देट क्विन बनी बातो लडकियों पे अत्याचार करते ये है आवर नाम लाक्साल्वादी का लेते है वो तो श्रीफ हक़ के लिए लाध रहे जहा ६५ साल से आज़ादी मिली लेकिन आज भी गरीब के बेटी की इजत सरे आम लुट रहे ये पूंजी पति के समर्थक आज हमारी बहेने माँ आज पेट के लिए व्यश्या बनी है इसका जिम्मेदार कोण ?
    येही सरकार एस कारन नाक्साल्वादी गणतंत्र के चुनाव को नहीं मानती ये गलत है लेकिन आम आदमी करे तो या ये पूंजी पति पैसा देकर गरिबोस रोटी के नाम लेकर उनसे वोट हासिल करते है ओउर जित जाते अब आप कहोगे लोगोने वोट देना नहीं चाहिए पैसे लेकर लेकिन ये भूक मरी की हालत पैदाही नहीं होती तो क्या लोग पैसा लेते इस कारन गरीब लोग अपने पेट के लिय व्यश्या या देहा बेचती है तो क्या ये आपना वोट नहीं बेच सकते इस कारन भूक मरी हमारी सबसे बड़ी समस्या है पहेले भूक मिटाओ तो ये समस्या नहीं आएगी बेरोजगारी मिटाओ भी की बात है हमारी कुछ भेने एक मेडिकल परीक्षा के केंद्र पकड़ी गई जो उतर पत्र चुराने का आरोप था होगा सही लेकिन क्यों उन लडकियों ने ये कदम उठाया कभी जाना नहीं भूक पड़े लिखे न होने के कारन कोई नोकरी भी नहीं तो क्या जिस्म बेचने से अचा एक कदम चाहे कुछ गलत हो लेकिन भूक कुछ भी कराती ह कभी भूका रह के देखो मई भी कई बार भूक लगने पर चोरी की होटल से नाश्ता करता हूँ लेकिन पैसे नहीं देता क्योकि पैसे न हो तो क्या करू एक बार मैंने अपने रिश्तेदार क घर में चोरी क्यों की मेरे माँ बाप गरीब बीमार थे मई क्या करता क्यों ये सब जनता के मन में गलत बताना नाक्सालो का मई समर्थन नहीं करता लेकिन उनके का शोषण का झुटा लिखा है उसका विरोद करता हु देश के खाती र मर मिटने वालो में से है वो लोग
    मांगने से भिक मिलती है अधिकार नहीं
    अधिकार को पाना हो तो चिन्ना पड़ेगा
    जिंदगी अपने दम पे जी जाती है ओउरो के कंधे पर तो जनाजे निकल ते है
    अगर नाक्सालोकी ये चालवल गलत है ऊपर दी गई पंक्तिया गलत है जो हमारे क्रांति करी साथियों ने कही है आज़ादी दिलाने के लिए
    हा एक ओउर एक बात अगर अज़ादी वक्त हमारे क्रांति करी लोग हतियार न उठाठे तो क्यों होता ?
    पहेले पूंजी पति हटाओ बुख को मिटाओ पिने को साफ पानी हर युवा को नोकरी हर पढने की लिए बेहतर स्कुल मोफत हो अस्पताल में दवाई हर लोगो को बराबर जीने का हक़ येही दो नाक्साल्वाद अपने आप खत्म होगा मेरा नाम दिलीप तायडे है अगर सर्कार में पुलिस में दम है तो अगर साचा इन्सान हो जो किसी पर जुर्म न किया कोई गलत कम न किया हो वाही मुझे लिखे चोरो को सावधानी 9623330726

    1. Paresh

      अगर आप पूंजीपति को हटाने की बात करते हो तो नोकरी कहांसे लाओगे .

  4. Imra Khan

    नाक्सेल्वादी क्या चाहते है सबसे पहले सरकार ये जानने की कोशिश करे. और जो भी बातें हो लिखित में होनी चाहिए अगर सरकार उनकी माअंगो को जानती है तो उसने अभीतक कोई ठोस निर्णय क्यों नहीं लिया या तो अपनी सरकार गलत है य नाक्सेल्वादियों की मांग गलत है अपने अधिकारों के लिए लड़ने वालों को देशद्रोह कहना गलत होगा
    और देश के नौजवानों से ये कहना चाहेंगे की अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की संपत्ति और अपने देश की जान माल को नुकसान न पहुंचाए!

    1. DILIP TAYADE

      DOST APKE BATO SE MAI SAHMAT HAMRE DESH HAR YUVA AAPI JAISI SOCH RAKHTE HAI TO UNKA PAHELE NAM JATI DHARM RAJNITI KAA SAHARA DEKHTE

      AGAR VO NICHE DIYE GAYE BATO SE MILA TO USE NAXALIST KAHETE HAI

      1 } DHARM {MUSLIM]
      2} BACK WORD CLASS
      3 COMUNIST

      TO HO GAYA NAXALWADI ATANGAVADI AM JANTA KA PRABAHAV HAI LEKINA SARKARV KE DHORNO KE KARNA JANTA JUT TI NAHI MAI
      MAI DOST EK AIYF KA PRESIDENT HO JO BHAGAT SHING NE 1926 ME BANAE THI

  5. sunil landge

    yeh sahi baat hai ki inke sath jyadati hui hai or sarkar ne bhi inhe andekha karne ki koshish ki hai. kaha jata hai ki prem se paththar bhi pighal jata hai to insan kounsi badi chij hai. bus jarurat hai pehal karne ki samasya yeh hai ki pehal karega koun jaahir si baat hai wo log sarkar se naraj hai to pehal hame hi karna hogi. sarkar developed areas ko or develop karne me lagi hai sarkar ko un areas me development karna chahiye jaha log berojgaar hai majburi me hatiyaar utha rahe hai yadi sarkar unke bachcho ko shiksha or unhe rojgaar uplabdha karaye to bahut kuch ho sakta hai. jab sarkar KASAAB per karodo kharcha kar sakti hai to ye bhi to hamare bhai hi hai kya inko sahi raaste per laane ke liye thoda kharcha nahi kar sakti inke liye thoda development, shiksha or rojgaar per kharcha nahi kar sakti yadi sarkar gramino ke liye yojnaye banakar uska pura laabh un tak pahuchaye to log banduk kyo uthayenge kahi na kahi kuch galat hua hai jiske karan ye aag lagi hai or hame ise bujhana chahiye lekin rajnitik fayade ke liye rajneta keval apni rotiya sekne me lage rehte hai koi jiye ya mare us se unhe kpi fark nahi padta ” DANEWARA GHTNA” iska sabut hai ki sarkar in logo per dhyan nahi deti or samasya hone per POICE ko aage kar deti hai or ve police wale marey jaaten hai jo nirdosh hai jinka koi kasur tak nahi hai. kasur to sarkar ka hai jo in logo per dhyan nahi de rahi hai ye log sarkar se khush nahi hai, sarkar se chhide hue hai sarkar ne inke liye kuch nahi kiya aisa ye mante hai or kaafi had tak ye sahi bhi hai sarkar abhiyan chalati hai ki gaav gaav tak shiksha pahuche lekin kabhi ye dekha hai ki kai gaav aise hai jaha logo ke paas rojgaar nahi hai unke bachcho ke liye shiksha ke sadhan nahi hai aisi sthiti me ye log naxalio ke sath mil jaate hai jo unhe tumse achchi suvidhaye de rahi hai ve iska parinam nahi jante lekin apne bachcho.ki parwarish or roji roti ke liye ye kadam uthate hai. sarkar ko inke liye kuch karna chahiye taaki kam se kam naye log in sangathno me na jude. “SAVE RURALS DESTROY NAXALWAD”

  6. SIPAHI

    एक विचारधारा के रूप में पैदा हुआ नाक्साल्वाद क्या अज वास्तव में एक समस्या नहीं है?एक वास्तविक समस्या…आतंरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी समस्या…..अगर आपकी बात मन व्भी ली जाये की यह शोषण के विरुद्ध लड़ाई है तो आप बदले में क्या आप हत्याओं के समर्थक हैं…बिना उसके क्या अपनी बात नहीं कही जा सकती?या फिर क्या हत्याओ के अधर पर आपकी बात सुन ली जाएगी?जन समर्थन के लिए वास्तव में आपको लोगो के दिलो में जगह बनानी पड़ेगी…समस्याओं को जन जन तक पंहुचाना पड़ेगा…न की अपनी ही नकारात्मक छवि प्रस्तुत करें..

    ”यह जैसी है वैसी बचालो रे दुनियां …..

  7. himawant

    1. नक्सलीयो का संजाल किसी विदेशी सरकार के धन और बुद्धि से चलता है.
    2. चर्च, नक्सलियो और सोनिया के निर्देशक एक ही है.
    3. नेपाल मे हिन्दु राजा को हटाने और माओवादीयो को सत्ता मे लाने मे भारत सरकार (यु.पी.ए) ने मदत किया था. उनके द्वारा ऐसी विदेश नीति क्यो अपनाया इस सवाल के जवाब मे कई उत्तर छुपे है.

  8. om prakash shukla

    डॉ. अमेडकर के २५जनवरी १९५० के संविधान सभा में दिए गए अंतिम और महत्व्पुर्ड भाषण को गौर से पढ़ने की आवश्यकता है जिसमे डॉ.अम्बेडकर ने चेतावनी भरा वक्तव्य दिया था की /कल हम अपने देश में एक व्यक्ति एक मूल्य को मान्यता दे रहे होगे ,वही सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारड हम एक व्यक्ति एक मूल्य को इंकार केर रहे होगे,जीतनी जल्दी जिंदगी के इन अन्तेर्विरोधो को समाप्त करना होगा नहीं तो वंचितों और हसी के लोगो द्वारा लोकतंत्र के इस ढाचे को उखड फेकेगे जिसे इस विधान सभा ने इतनी मेहनत और बलिदानों से बनाया है/ क्या इसके बाद भी जो कुछ हो रहा है वह होना ही है इसका एक मात्र समाधान सामाजिक,आर्थिक और शोषद मुक्त राज्य बनाना होगा और दूसरा कोई समाधान हो ही नहीं सकता क्योकि नाक्सस्ल्वादी कोई गुंडे लुटेरे नहीं है उनमे काफी पढ़े लिखे और शोषद के विरुध्ध इन्हें समर्थन देना वाला बुध्जिवियो का समर्थन और सहयोग है ये हमारे ही बीच के लोग है जो रोजी,रोटी,स्वस्थ,शिक्चा से बंचितो का बहुत बड़ा समर्थन इनके साथ है नहीं तो यह आन्दोलन इतने दिनों तक कैसे चलता रहा ओलोग जिस तरह की बहस चला केर एक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को मात्र हिंसा अहिंसा की बहस में उलझा केर मूल मुद्दों से ध्यान हटाने की साजिश हो रही है.सोचने की बात है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ गोलिओ से मरने वालो का होता है उन बेसहारो का कोई मानवाधिकार नहीं जो बिना रोटी और दावा,दारू के अभाव में घिसते हुए जिन्दा रहते मौत भोगने को मजबूर है.क्या कभी यह विचार किया गया कि भारत सर्कार के ग्रामिद विकास मंत्रालय के अनुसार आजादी के बाद ४०%आदिवासियो का विस्थापन हुआ है.कभी बाध के नाम पैर तो कभी किसी विकास के नाम पैर जो आकडे मौत के दिए जा रहे है उनका कोई आधार है कि बेगुनाहों का किस तरह narsanghar किया जा रहा है क्या कभी किसी begunah ke mare jane kii koi khaber ya jach hui aakhi sarvochch nyayalay ne bhi fatkar lagate sarkar se pucha ki kis adesh se goli mar di ja rahi hai.ek apradhi soharabuddin ke incounter per asman ser per udhane wala media kabhi yah sawal kyo nahi uthata ki ager begunah mare ja rahe hai unaki nyayik jach ho ya yahi chalega ki na khata na bahi jise suracha balo ne mara naxsalvadi wahi.yaha ke suracha balo ka hal yah hai ki rashtrapati ke suracha gaurd samuhik balatkar karte hai,hawalato me balatkar hota hai,kya un biihad jangalo me noujawan beto ke samabe ma ka samuhik balatkar,salwa judum ke nam per adivasio ko bhagane ke liye 500 gawo ko ujadna,jalana aur jaberdasti yatana siviro me ek tarah se kaid karna jise sevochch nyayaly ne bhi asamvadhanik bataya,sahi hai.Misra me kya ho raha hai,vase budhdhrahit logo ke samajh ke bahar hai ki viyatnam se le ker afganistan,irak tak me ameriki mahashakti ko bhagne ka rasta nahi mil raha hai.maovadio per takat se par pane ka sapna dekhana hi gunah hai yah bat carporate ke dalal vakil aur grih mantri ke samajh me apni aoukat aur bhavisy samajh me aya hai isi liye batchit ki peshash ker rahe hai,kyoki unhe lag gaya ki is bar adivasio ko majboot takat mil gayi hai aur ek taraf samvedanheen sarkar ke liye matr duty bajane ke liye adesh ka paln karne kii badhyta me lad rahe hai to dusari taraf adivasi aur dalito ka tabka jo hashiye per hai we apne astitv ki ladai lad rahe hai kyoki unhe malum hai ki ager ham harte hai to hamari bahu betia jismfarosi ya jhadu pocha ker begari karne ko badhy ho jaegi.

  9. Er. Pramendra singh dhaka

    Nakslwad tab tak jinda rhega jab tak bhrstachar jinda h. Kyo ki is se hi log dukhi hokar bhatk te ha. Yaha nyay bhi milte milte anyay ban jata h.

  10. sunil patel

    बिलकुल सही कह रही है की नक्सलवाद विशुद्ध आतंकवाद / राष्ट्र द्रोह है.
    सरकार इमानदारी से चाहे तो कुछ ही समय में पूर्ण रूप से ख़त्म कर सकती है. किन्तु वोट कहा से मिलेंगे. कहते है लातो के भूत बातो से नहीं भागते है. जब पोलिसे डंडे मारती है तो कुत्ते भी इंसानों का जुर्म क़ुबूल कर लेते है. जरुरत है ठोस निर्णय की और आदिवासिओं को उनके हक़ देने की.

  11. bhagat singh

    aprial se ye bahas thahar si gai hain.lagbhag sab logo ke vichar ek se hain.yadi koi alag bat kahta hain to aap akhlak ji ko unka musalman hona yad dilidete hain,vo bhi pankaj jha jaise varisth dwara.kamal hain akhlak ji ne to bahut kam kaha parso hi arundhiti roy ne to saf saf kaha ki ve naxalvad ke shshatr sanghrsh ks samrthan karti hain,ac ve bhi musalman na hone ke karn bharose ke laik hain.sari samsya aap logo ki samjh me hain,aapko musalman hone ke karan aadmi bhrosa laik nahi dikhta aur lal salam to apki najar main jail jane ka apradh rakhta hain.pankaj ji hamare hi desh me teen sarkare lal salam ki virasat par hi tiki hain.ye naxal to bahut kam khtarnak hain kayo ki jinneetiyo ko yah badalna chahte hain vo badalna hi chahiye chahe ahinsa se ho ya ya kisi aur tarike se.mana ki bhari sena aur hawai hamle se ye naxal khatam hi jayene,leki un prshno ka kaya hoga jo inhone hi nahi balki desh me har samajik sarokar rakhne wale ko pareshan karta hain.un jal jangal jamin khanij ko bachane ka kaya hoga jo sarkare korporet ke sath mil kar sena aur forse ko unke lathet ke rup main istemal kar rahi hain.ye red coridor nahi balki karakr coridor hain.yahi vo ladai hain jo aadiwasiyo ne shueu ki hain,aaj tak unki ladai me sath dene ke kiye koi rajnetik dal sath nahi aaya.kisne roka tha unke jiwan ki ladai me sahayta karne ko.
    bahas iski nahi hain ki naxal khatam honge ya vo jyada hinsak hain ya green hunt ki karyvahi bahas ye honi chahiye ki corporet ki loot ko kaise roka jaye.raigarh,jashpur.sarguja aur janjgeer me kon is loot ko kon sahaj bana raha hain,sarkar hi na,vahake log kaya jindal ki manmani ko rok paye,lekin bastar main tata aur essr apna kam shuru nahi kar pa rahe hain to ise kaya kahenge.

  12. amit dwivedi

    dear sir we need to find out the reason of this naxalism, if there is every thing goning smoothly for the naxlai then there is some reason behined it. what r the reasons for that & how it will grown soon. As per my knowladge naxalwad is started from westbangal in some 1970. some said that there is nassacity of war against this but nowadays we r going to superpower in economy so if there is such kind of war ( grahyudh) then we lost more money & it will send us back 10 to 5 years.
    every movement is generated due to some kind of thougts & ideas so need to work on that basics & try to move them back to main stream of democracy but on which we need a very honest approach towards them because these circumtances too many other power who try to break our countary will support them so fristly break the supply line of that sources & as many as talk processes we can make will better & the voice for this comes for this will come all parts of the countary.
    one more very important thing is proper co-ordination between the stats & central goverments they need to take the full responsbility of it very seriously rather then making fool on this issue.

  13. om prakash shukla

    नाक्स्सल्वाद की समस्या को इतनी आसानी से नहीं हल किया सकता है जब तक हम इस बात पैर विचार नहीं करेगे की ३० सालो से चली आ रही नाक्स्सल समस्या आखिर क्यों त्धर तीन,चार वेर्शो में इतने विकराल रूप में हमारे सम्मुख खासी हो जाएगी.कुछ तो नया हो ही रहा है जो इन्हें खास पानी दे रहा है.आखिर व्यवस्था में एकाएक क्या हो गया की अज एक मुखबर तक प्रशासन को मिलना मुश्किल हो गया नहीं तो संत्र्वाडा में इतना बड़ा नर्संघर हो गया और प्रशासन को खबर तक नहीं हुई आखिर क्यों हम अप जिस स्कूल,स्प्तल इत्यासी स्वर विकास की बात करते है तो उन निरीह आदिवासियो को विस्वास नहीं होता.निशे ही सर्कार की नीयत में खोट है विकास के लिए खदानों और विजली परियोजनाओ तथा औद्योगिकारद हेतु इन अबिकसित जन्ग्लोकी उपयोगिता होने पैर ही एकाएक ६२ सालो के बाद इन अदिवसिओको मर-पीटकर उन्हें विक्सित करना जरुरिलग रहा है,ऐसा प्रतीत होता हैकि सारा हिंदुस्तान विक्सित हो चूका अब खली यही इलाका बचा है जिसकी जिमेदारी प्रसिद्ध कारपोरेट वक्र्र्ल तथा एनरान कम्पनु के हिमायती और वेदान्त जैसे कुख्यात कंपनी को मनमोहन सिंह द्वारा सुओपी गयी है आज सारा मीडिया एकतरफा तरीके से सर्कार के प्रवक्ता को तरह व्यव्हार केर रहा है क्या सभी अद्प्वासी अक्स्सल्वादी है?उनकी एकभी ज्यातती की खबरे आ रही है.अमेरिका ने अफगानिस्तान या इराक में अतंकवादियो के संहार की खबरे दुनिया के सामने रखने को बाध्य महसूस किया लेकिन हमारे महँ लोकतंत्र में जो मर दपय गया नाक्सस्ल्वादी है और जो इसके खिलाफ आवाज उठाये वह भी देशद्रोही है.इस सोच को लेकर हम अक्स्सल्वाद को और मजबूत केर रहे है.हमारे जवान भी उसी गर्त्ब वेर्ग से आते है जो नुओकारी के मजबूती के चलते अपने वेर्ग्के लोगोकोमारते है.अगेर इसी तरह स्वार्थ के aise bhode pradarshan के चलते kahi हमारे anushasit surakcha bal इन asivasio पैर goli chalane से onkar केर से.

  14. h.c.pandey

    there is no use repeating all the above stories which more or less convey the real gist of the problem. I am convinced that nothing substantial will come up with the present govt. approach unless it is changed drastically making it more people-centric and inclusive. The tribal and rural india is to be involved and consulted at the stage of policy formulation as against the present air-conditioned -centric policy approach. The only positive signal which has emerged from 76 para-military men killing and passionately written article by Arundhati Roy in the Outlook magazine, is that govt. seems more proactive towards the real problems of the tribal india.
    h.c.pandey

  15. Dr. Anal Kant Jha

    Naxalism is reflection of failure of government policies. Any face of violence is unacceptable in our society because we are peace loving people. But who is responsible ? Why do we allow the disease to attain the zenith of annhilation? Every disease has a cure sooner or later all we need is to deleve deeper in to the cause of the problem. Mediocritic governence and chauvinstic and snobby bureaucracy has brought the problem to this juncture. A country where corrupt leaders are worshipped and bureaucrats are considered clones of Lord MacCalley, no problem can be permanently solved unless intellactuals, scientists, technocrats, professionals etc. are give their due and the chain of prosperity and progress reaches the billion odd poor masses of the nation perticularly the tribals.
    Naxalism can be eliminated permanently by strenghthening both our foreign and interior policies. The funding sources of naxals(whether internal or external) are to be identified and eliminated. The sympatheisers,supporters and abettors are to be thrashed and their hide outs are to be located and destroyed. It requires joint operation of different affected state governments provided they have moral courage and political will to do so.

  16. om prakash shukla

    Naxsalvadio se morcha lene se pahale hame yah janana awayac hona chahiye ki koe adami naxsalvad banata kyo hai.akhirkisi kyamajburi hoti haiki wah hathiya uthaleta hai aur vastvicta ko najarandaj ker ke ham samasyaka saralikarad ker dete hai.loctantrame kisiko bhi apna pach rakhne se roka nahi jana chahiye.Naxsalvad hamare yaha 40 sal se hai,lekin kya wajah haiki ekaek we itane khatarnak ho gaye ki videshi atankvadio se bade khatara ho gaye ki bagar kisi prasichad aur radneet ke suracha balo ko marane ke liye janglo me hak diya gaya.pahali bat to yah hai ki maovadi tatha naxsalvadi do alag vichar hai tatha uname bahut matbhed hai.dusari chij yah bhi dhyan me rakhana chahie ki Chiena ne 1978 se videsho me apne andolan ko samartjhan dene ki neetio me pariwartan kiya hai.Yah bhi dhyan me rakhana chahie kiloktantrame sabhi ko apne tarike se virodh karane ka adhikar hai.Kya hamare yaha nastiko ko rahane ka adhikar nahi ye naxsalvadi bhi hamare aoke beech ke log hai jo vyavstha se naraj ho ker hathiya utha liye hai.loktantra me jab shantipurd tarike se bat nahi suni jayegi to kya tarika bachata hai.naxsalvadi ek vichar hai aur use kanun vyavastha ka mamla batana khud ko dhokha dena hai.hamara media aur neta naxsalvadio ko chor dakat ghosit ker rahe hai jabki yah bat vastvikata se bahut dur hai.bagar kisisaman vichar ke itana bada hathiyar band sanghatan khada kerna sambhav hi nahi hai.Netalog jab jaruri samajhate hai to inlogo ka samarthan chunaw jitane ke liyeletehai. Abhi jo naxsalvadio ki samasya iitani biral rup le li hai usame adivasio ka shoshad to salo se prashasan,aur mahajano suracha balo dwara hua hai.Raman singh to lagabhag 4sal se Tata,Bidala,Mittal vagarah ke liye jangal jaha adivasi hajaro sal se rahate aye hai unhe jaberjasi bhaane ki vajah se vikaral rup liya hai.Vaise to ye log kafi dino se adivasio ko galband ker unake hito kiladayi lad rahe the aur bahut kuch unake hito ke kiya jo kam sarakar ko karana chahiye usaki upecha karati rahi yah 21vi sadi hai ab adivasi bhi itane jagruk to hohi gaye hai ki apne shosako ki shinakht ker sake. Akhir sayuct rashtra ki kameti ne bhi kaha ki ajadi ke bad 40% adivasio ka visthapan hua hai ,akhir vikas ki keemat inhi logo ko kyo chukani padati hai.1949 me Damodar Ghati Ke Mathan Dam ke udghatan ke samay tatkalin pradhan mantri Jawahr lLal Neharu ne ise vikas ka mandir kaha tha lekin sharm ki bat hai ki usake muawaje ka mamla aj bhi vicharadhin hai.Yahi aur isi tarah ki upecha ke chaltr naxsalvadio ko khad pani milata hai aur we adivasip ya upechi tatha banchito me unaka adhar majboot hota hai.Jab tak in sari bato ko dhyan me rakh ker aur vastav me jamin per kuch ker ke hi is samasya ka mukabala kiya ja sakata hai. Ap chilate rahiye lokatsa\atr ko le ker leki in nirih logo ke liye loktantra ka tab tak koi matalab nahi hai jab tak unhe ye na mahsus ho ki hamra bhi khyal karne wala koi jai.,yaha to pulice aur jangal vibhag ke karmchari hi loktantra ko apne thegeper liye ghum rahe hai,ap khud dekhe kya yahi loktantra ka matlab haiki Irak Aur Afganistan me bhi Amerika ne patrakaro ko yudh chetro me jane diya aur hum dunia ka sabase bade loktantra ka dam bharane wale aj tak janta ko yah nahi janne diye ki vastav me waha ho kya raha hai. Dantewada ki ghatana ke bad inke neta ne Andhra oradesh me media ko bataya ki is ghatanake pahale as pas ke 8 gawo ka surve kiya aur usme sakafdo adivasio ki mahilawoke sath balatkarli pusti hui.yah soch lena chahiye ki hinsako hinsa se nahi dabaya ja sakata is se samasya suljhane ke bajay aur ulajhati chali jayegi.Chidumbrum ji to carporate vakil hai tatha mantri banane ke turat pahle paryavrad ke kiye aur dhokhadadi me puri dunia me kukhyat Vedanta ke bord of govarners me rahe hai aur apna vyactigat agenda lagu ker rahe hai inlogo ne adivasio ke jangal jaminko gupt samjhota ker ke deshi vidrshi co. ke hawale ker chuke aur ab we log apni vyctigat agenda desh ke liye nahi apne vafadari sabit karne ki kosis ker rahe hai. isi liyeprashasan ko janta koa koi samartan nahi mil raha hai nahi to uah sambhaw hi nahi tha ki 1000 naxsalvadi aye aur 74 jawano ki hatya ker unaka hathiyar lut ker chal de.

  17. लोकेन्द्र सिंह राजपूतlokendra

    tit for tat……….
    अगर अभी कठोर कदम नहीं उठाये इस बीमारी के खात्मे के लिए तो यह और बदती ही जाएगी…. क्योकि ये लोग बड़े चालक है… भूखे और गरीब लोगों को निशाना बनाना इन्हें बखूबी आता है….
    नक्सलवाद को जड़ से ख़त्म करो..

  18. ASIM

    बड़ा दुःख होता है जब हम किसी वाकये को तिल का ताड़ बना कर उस पर चर्चा करते है और कुछ दिनों बाद उसे भुला कर नए वाकये के बारे मैं चर्चा करना आरम्भ कर देते है. ये ठीक वैसा ही है जैसे कोई बच्चा पुराने खिलौने से खेलते- खेलते उब जाता है फिर उसे फेंक कर नए खिलौने से खेलने लगता है. ठीक ऐसा ही दंतेवाडा विषय भी है. एक खिलौना मात्र. हम इस विषय पर एक दुसरे के बाल खिंच रहें है. दूसरा विषय आते ही हम भी इसे भुला देंगे. जैसे अन्य विषयों को भुला चुके हैं. मैंने एक फिल्म देखी उसमे हीरो कहता है विलेन से कि मारने वाले को मरने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.
    मेरा प्रश्न ये है कि CRPF के जवान दांतेवडा में क्या पार्टी मनाने गए थे नहीं वे नक्सलियों को मरने ही गए थे. आप इस बात से सहमत हो न हो ये सच है. ये भी सही है कि वे अपनी ड्यूटी कर रहे थे. अगर मारने गए थे तो मर गए इस बात पर इतना हो हल्ला करना कैसा. दूसरी तरफ ये भी सच है कि जवान बेकसूर थे. मगर सवाल ये उठता है कि अगर जवान बेक़सूर थे तो कसूरवार कौन है?
    नक्सली?
    हमें ये भी सोचना होगा कि जवान शहीद हुए है या फिर उनका कत्ल हुआ है.
    क्या अगर एक भाई दुसरे भाई को मार दे तो क्या हम ये कहेंगे कि भाई शहीद हो गया या ये कहेंगे कि भाई ने भाई कि हत्या कर दी?
    विषय वस्तु से न भटकते हुए मेरा प्रश्न ये है कि आखिर हत्यारा कौन है?
    आप मेरी इस बात से तो सहमत जरूर होंगे कि जवानों कि हत्या हुई है.
    आज जरूरत है जैसा चाणक्य ने किया था वैसा ही करने कि. चाणक्य ने कांटे को जड़ से खोद कर उसमे मठठा डाल दिया था कि फिर से वो कांटे कि झाडी पनप ना सके.
    निसंदेह आज नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने कि जरूरत है. मगर सवाल ये है कि चाणक्य बनेगा कौन. उस माहोल में जहाँ फुट डालो और राज करो हावी है राजनैतिक दलों कि सोच पर.
    अंत में सिर्फ इतना ही कि जरूरत है राजनैतिक इक्छा शक्ति कि जो सरकार के पास नहीं है. जब तक ये इक्छा शक्ति नहीं होगी तब तक हमारे भाई मरते रहेंगे चाहे वो जवान हो या फिर नक्सली.

  19. THAKUR TARA SINGH CHAUHAN

    I feel that the people of these areas are being exploited since a long time by everyone who are getting chances.They have fed up with the atrocities which are being committed by everyone with them.It is their compulsion to react in this way.If their rights are procted and oppurtunities are ensured in the development of the nation, only then the situation can be normalised and those who have and are doing wrong with them must be punished by the law.

  20. usha verma

    सारी जनता तैयार है तनमन धन से सबकुछ करने के लिए लेकिन उन्हें ईमानदार नेता चाहिए।जो पैसा दिया जाएगा वह उन्हीं ज़रूरतमंद लोगों को मिलेगा इस पर किसी को विश्वास नहीं है।जब जब बैक़सूर सज़ा पाता है,विद्रोह की चिंगारी फैलती है।सरकार किसी भी विद्रोह को दबा नहीं सकती वह और उभर कर सामने आएगा।यदि खाना कपड़ा दवा मिले तो जोखिम उठा कर बंदूक ले कर कौन जंगल जंगल भटकना चाहेगा।सरकार बेसिक चीज़ों के दाम कर दे और लोगों को ज़िंदा रहने के लिए परिस्थितियां बनाए तो सब कुछ सुधर सकता है।

  21. संपादक, सृजनगाथा

    सुकमा के चिंतलनार जंगल में जो जवान (6 अप्रैल, 2010) बर्बरतापूर्वक मारे गये – शोषक नहीं थे, बुर्जुआ नहीं थे, पूँजीवादी नहीं थे । जिन दरिंदे नक्सलियों ने उन्हें पीठ पीछे से वार किया, उनसे भी उनकी कोई जाति दुश्मनी नहीं थे । जानलेवा संकट की संपूर्ण संभावना के बाद भी जानबूझकर सीआरपीएफ की नौकरी में थे । ताकि देश में शांति और अमनचैन की निरंतरता बनी रहे । ताकि ख़ुशहाली का वातावरण बना रहे । ताकि आम आदमी अपनी गणतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सके । उन्होंने बंदूक और बारूद की नौकरी का वरण इसलिए भी किया था ताकि उनके ग़रीब माँ-बाप की माली हालत सुधर सके । घर बैठी जवान बहनों के हाथों मेंहदी रच सके । रतौंदी से ग्रस्त बीमार बूढ़ी दादी का ईलाज हो सके । पूरे परिवार को दो वक़्त की रोटी नसीब हो सके। ये जवान कुछ दिन पहले तक जाने कहाँ-कहाँ किस किस आपदा से जूझ रहे थे पर कुछ दिन से वे आदिवासी जनता को आततायी माओवादियों से मुक्त करने के लिए बस्तर के जंगल-नदी-पहाड़ में भटकते-भटकते दिन-रात एक किये हुए थे । सच यही है कि अब इन 76 जवानों की केवल लाशें ही उनके घरों को लौटेगीं । वे कभी अपने गाँव नहीं लौट पायेंगे । और साबित हो चुका सबसे बड़ा सच अब यही है कि वे सारे के सारे हमारे प्रदेश के आदिवासी अंचलों में खो चुकी खुशहाली को बहाल करने के लिए कटिबद्ध थे। फिर भी, हम हैं कि, खून से लथपथ जवानों के चेहरे और उनके परिजनों के दुख पर आदतन मसखरी कर रहे हैं ।

    यह हमारी कैसी संवेदना है कि इस महाहमले को भी स्थानीय मुद्दा मानकर व्यक्तिगत कुंठाओं के शिकार होकर तंत्र की मीनमेख निकाल रहे हैं। नागरिक सुरक्षा तंत्र से जुड़ी सुनी-सुनायी बातों पर चुटकियाँ लेकर उनके हौसलों को खंरोचने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं । कोई कहता कि राज्य और नागरिक सुरक्षा तंत्र के प्रमुख को इस्तीफ़ा दे दिया जाना चाहिए । कोई कहता है कि चुनी हुई सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू हो जाना चाहिए । जैसे उन्होंने ही इस महाहत्या की साजिश रची हो । जैसे उनकी किसी निजी चूक से इस कायराना वारदात का अवसर नक्सलियों को मिल गया हो । कोई नहीं कहता – प्रजातंत्र के इन हत्यारों से स्थायी रूप से निपटने के लिए उसे क्या त्याग करना चाहिए ? क्या संकल्प लेना चाहिए ? यह जागरूक नागरिक होने की भूमिका से बचकर औरों को कीचड़ उछालने जैसा हरक़त नहीं तो और क्या है ? यह अनपढ़ प्रादेशिक चेतना का प्रमाण नहीं तो और क्या है ? इधऱ पड़ोस में 76 जवान बेटे मारे जाते हैं और उधर बुद्धिजीवी किताबी दुनिया में सिर खपाये रात गुज़ार देते हैं । शर्म की बात है कि देश भर बारह महीनों जनअधिकारों की दुहाई देकर व्यवस्था के परखच्चे उड़ा देनवाले तमाम जनवादी संस्थाएँ और उनके मठाधीश भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर घुसेड कर कहीं दुबक गये हैं । शायद इसलिए कि मरनेवाले पुलिस या अर्धसैनिक सेवा से थे और जैसे ये जन नहीं होते किसी देश के । पढ़े लिखे, वकील और न्यायप्रिय लोग इस घटना के टीव्ही फुटेज़ देखने को ही अपना परम कर्तव्य मान लेते हैं । उद्योगपति, व्यापारी, अफ़सर, चिकित्सक, अध्यापक, इंजीनियर आदि नक्सली वारदात की दुखदायी सूचना का दर्द ठड़ी बीयर्स के गिलास टकराकर मिटा देते हैं । सारी दुनिया को अपने सिर पर उठा लेनेवाले मानवाधिकारवादी ऐसे मौक़े पर तो गायब ही हो जाते हैं । किसी की आँखों में आँसू नहीं छलकता । देश की सुरक्षा के लिए जान पर खेल जानेवाले शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए हम एक मौमबत्ती भी जुटाना उचित नहीं समझते। शायद इसलिए कि मारे जाने वाले शहरी नहीं है । शायद ऐसा होता तो हममें से कुछ शहरी आयोजक 9-11 की तरह राजधानी के लोगों को जोड़कर श्रद्धांजलि देने से पहले फोटोग्राफर को ज़रूर याद कर लेते । मरा तो गाँव का बेटा है ना । क्या इतने अंसवेदन हो गये हैं हम ? कहीं हम मृतक के भूगोल के हिसाब से अपनी सहानुभुति तय तो नहीं करने लगे हैं ? हममें से कोई प्रश्न नहीं करता – आख़िर इन कायराने हमलों से डेमोक्रेसी को बचाने में वह क्या योगदान दे सकता है ? क्या सारी कुर्बानी नौकरी पेशा वाले जवान ही देंगे ? क्या सारे समाज को सुरक्षित रखने की अंतिम भूमिका पुलिस, सेना और पैरामिलेट्री फोर्स का ही है ? यदि हम ऐसा सोचते हैं तो हम तदर्थवादी सोच के शिकार हो चुके हैं । हम असरकारी लोग अपने घरों में बैठे-बैठे कोला-कोला की चुस्की लेते रहें और सरकारी सिपाही हमारे दुश्मनों से लड़ते-लड़ते अपनी जान गँवाता रहे ? क्या हम अपने नागरिक बोध से पल्ला झाड़ चुके हैं ? दंतेवाड़ा का हमला, सिर्फ़ हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हतोत्साहित करने का संकेत नहीं, यह समूची भारतीयता, व्यवस्था और नागरिकता पर हमला है । यह हमला छत्तीसगढ़ के नक्सलविरोधी अभियानों को चुनौती नहीं, सिर्फ़ छत्तीसगढ़ की चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस देश को नेस्तनाबूद करने नापाक इरादों का परिणाम है । यह नक्सलियों का सिपाहियों से मुठभेड़ नहीं, माओवाद का जनतंत्र से मुठभेड है ।

    ऐसे संकटकालीन समय में होना तो यह चाहिए कि लोग अपने एसी रूम छोड़कर निकल पड़ते । हर किसी के चेहरे पर हिंसावादियों के ख़िलाफ़ एक आक्रोश होता, और छाती तनी हुई और गलियों में ख़ूनी इरादों से लड़ने का संकल्प गूँज उठता । हर कोई एक दिन की कमाई का कुछ अंश ऐसे शहीद जवान के परिजनों के लिए स्वेच्छा से भेजने को लालायित हो उठता । हर जवान के सीने में नक्सलवादियों के द्वारा जनता, जनआस्था, जनतंत्र के विरूद्ध झेड़े गये युद्ध के विरूद्ध एक नैतिक गुस्सा फूट पड़ता । और यह गुस्सा तब तक नहीं थमता जब तक ऐसे विध्वंसक तत्वों से छत्तीसगढ़ सहित सारे नक्सली प्रभावित जनपदें मुक्त नहीं हो जाते । आख़िर ऐसा क्यों नहीं होता है ? क्या अब हमारा समाज अब ऐसा नहीं रहा ? क्या हम सारे के सारे माओवादी और नक्सलवादियों से सहमत हैं । क्या प्रजातांत्रिक संवेदना का अंत हो चुका है हमारे देश-समाज से । क्या हम ऐसे नागरिक हैं, जिसकी संवेदना पथरा गई है ?

    1. bhoopen

      aadiwasi kaha hai ……?desh rastrawd sahadat akhandata hai lekin aadiwasi kahi nahi ……………………….. matlab garib ki joru sabki lugai………hai na sahab……..?

  22. Dr. Anal Kant Jha

    Naxalism is reflection of failure of government policies. Any face of violence is unacceptable in our society because we are peace loving people. But who is responsible ? Why do we allow the disease to attain the zenith of annhilation? Every disease has a cure sooner or later all we need to deleve deeper in to the cause of the problem. Mediocritic governence and chauvinstic and snobby bureaucracy has brought the problem to this juncture. A country where corrupt leaders are worshipped and bureaucrats are considered clones of Lord MacCalley, no problem can be permanently solved unless intellactuals, scientists, technocrats, professionals are give their due and the chain of properity and progress reaches the billion odd poor masses of the nation.

  23. Rajesh

    We have to find the root cause of Naxalite. The tribal people are hungry mostly of them not eat two times proper.
    If some body give money and misguide them , they shall easily go with them. The main cause is poorness.
    The leader go to that place during vote . After result nobody go to that place.
    Many of money expand in IPL (There is no limit ) and such other thing.But govt. dont think about that peaple.

    First govt.have to think how there life will be improve and closely monitor.

  24. suresh pandey

    मेरे पास सिर्फ हताशा और निराशा है, इस सिस्टम से कहीं भी न्याय की उम्मीद नहीं दिखती, बताएं मैं क्या करूँ ? खुदकुशी कर लूँ तो लोग कायर कहेंगे, हाँ, किसी को मार कर मरूं तो हो सकता है कि बहादुर माना जाऊं. जो सिस्टम दो से तीन हज़ार रूपए की नौकरी नहीं दे सकता, उसे क्या हक है कहीं से भी तीन हज़ार रूपए मिलने से रोकने का? यह सवाल मुझसे कुछ साल पहले उस इलाके के एक युवा ने किया था जो आज रेड कारीडोर का हिस्सा है? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था, आज भी नहीं है. हो सकता है कि आप जैसे बौद्धिक लोगों की कलम से यह मिल जाय जो नक्सलियों के बारे में यह सनसनीखेज जानकारी जरुर दे देती है कि —सर्वहारा के शासन का सपना देखनेवाले नक्सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्य बरामद नहीं होते। किसी शिविर में छापे के दौरान पुलिस ने ब्लू फिल्म की सीडी, यूस्ड -उन्युस्द कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्योद्धाटन हुआ कि बड़ी तेजी से नक्सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। संगठन में शामिल युवती चाहकर भी इसके खिलाफ न आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है। —वास्तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है। गजब –क्या जानकारी है – चलिए इसे थोडा सा अपडेट कर लीजिये. पुलिस -पेरामिलिट्री फोर्स के जवानों ने सिर्फ चंदौली -मिर्ज़ापुर व सोनभद्र जैसे जिले में ही २००४-०५ में दो दर्जन से ज्यादा गरीब महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बना लिया था. सूची लम्बी हो सकती है, जितना आगे चलियेगा. यहाँ मेरा मकसद नक्सलियों का महिमा मंडन करना नहीं है, सिर्फ इतना भर आग्रह है कि तथ्यों को सतही ढंग से ना रखा जाये.

  25. Mithilesh Rai

    naxalite are the anime of hole country. they are not civilized and their way is not right. they fights against own people. they are doing unhuminity activities and they are not forgiven by Government. who are in the favor of them they did not lost their family members. once ask by the family members who sacrifice their life in the incident of dantewada. think by their view and after then give suggestions.

  26. Murari gupta

    Do Maoists exploit people including women and children?

    Naxals forcibly recruit and train children for combat. At least 300 children were trained in the dense forests of Dhanbad and Giridih in Jharkhand under a crash course in the use of small arms.Similar reports also come from Andhra Pradesh and Chhattisgarh .
    Amnesty International noted that the erstwhile PWG had recruited children between the ages of eight and 15 “believing that they could train children more effectively than women to resist police interrogation”.

    Yes, it is a fact that Naxals have created specialized units consisting of minors. The children are more prone to brain wash than grown-ups and that is the primary reason why minors are targeted.
    We were sexually exploited by comrades: Maoist women
    Maoists who shout from the roof-top for taking up the cause of the poor are reported to have sexually exploited their women cadres.
    Girls between 14 and 18 years of age were abducted by the Maoists at gun-point from interior tribal villages and forced to have sex with them.
    Two arrested hardcore Naxalites, Geeta Murmu and Anju Murmu, said they were also sexually exploited in the rebel camps.”Twice I had to undergo abortion. On protest, I was told to keep shut or else I would be shot dead,” said Geeta,

    Geeta gave graphic details of how they (a group of 200 woman Naxalites) were exploited in the dense forest areas of Belhar, “Some time back, my sister Anju Murmu too joined the naxal group. One night, she was on duty manning the borders of Banka and Jamui forest, when another Naxalite Battu gagged and raped her.
    Q.4-Naxals say they do not kill / humiliate civilians. A Big Lie!
    Cases of Cannibalism, burning up people including children, slitting throats like jihadis, beheading, shooting people dead, bombing trains to kill people, humiliating teachers all are incidents which prove that innocents are tortured and killed by the Naxals.
    Read about such incidents on our blog. Click here
    Answer 4- They kill, torture, behead, burn to death villagers who do not cooperate or who are informers according to them. So any one who raises a voice against them will be killed? Also See the casualties table above and read on:

  27. om prakash shukla

    nacsalvad ek rajnetic aur samajic samasya hai aur ise usi najriye se dekhana chahiye.Chidumbrum aur Manmohan ki jodi to Multinational ke liye is samsyako kanun vyavstha kamudda bana ker pesh ker rahe hai,Isse paristhitiya aur jatil honi tay hai.kyoki kendr ia satta ki ladai khanij aur anya adyogic samrajya ke liye hai. un logo ka is chetra ke vikas se kuch lena dena nahi hai.Akhir Narvada ke visthapito ka kya hua aur unake taraf se loktantric ladai ladane wali MegApATEKER DUNIA ME CHAHE JITANA PRATISTHA PA LE HAMARI SARKAR KE LIYE AVANCHIT HI BANI RAHEGI.AUR APLOG BAT SE MAMLA SULJHANE KI BAT KARATE HAI.AP KHUD HI DEKH LIJIYE KI SAGAR SAROWAR BADH NIRMAD ME KYA HUA.SARVOCHCH NYAYALAY KE ADESHO KO BHO DHATA BATA DIYA GAYA.aKHIR JANTA VISWAS KARE BHI TO KIS ADHAR PER.KAHA JATA HAI KI LOKTANTRA HAI,LEKIN KYA VASTAV ME YAHA SABHI EK BARABER HAI,KYA OPRATION gREEN HUNT ME EK BHI NIRDOSH KO NAHI MARA GAYA HAI,KYA KISI KE LIYE JACH BATHAI GAI.YA UHI POLICE NE LIKH DIYA NAXLVADI AUR PRASHASAN NE MAN LIYA.KYA YAHI LOKTANTRA HAI.mAF KIJIYEGA AGER YAHI LOKTANTRA HAI KI CHAHE JISE GOLI MAR DO AUR KAH DO KI NAXLVADI HAI,TO MAI BHI IS LOKTANTRA KO MANNE KO TAYAR NAHI.iS TARAH KE JYATATIO SE LOKTANTRA MAJBOT NAHI HOTA HAI,YAH TO NAXLVADIO KO PADA KARANE KI VYAVSTHA HAI.

  28. S. Vishvesh

    साड़ी लड़ाई शोषण के खिलाफ है, हमारी व्यवस्था ने हमें शोषण के खिलाफ न बोलने का आदि बना दिया है. शोषण होता रहेगा तो अस्तित्व ख़तम हो जायेगा. अस्तित्व बचाना है तो संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं है. शिक्षित लोग शांतिपूर्ण संघर्ष करते हैं जबकि अशिक्षित लोग हिंसा अपनाते हैं.
    गलती सरकार की ही है विकास के नाम पर कई माइनिंग कम्पनियां आदिवासिओं के घर मई घुस गयी जबकि पहले आदिवासिओं की शिक्षा पर धयान देना था. क्रमिक विकास को अपनाया जाना चाहिए. विकास के नाम पर आदिवासिओं को घर से भागनेवाले नक्सली हैं या उनको खदेड़ने वाले नक्सली हैं. क्या हमारे देश मैं इतने बुद्धिमान लोग भी नहीं की इस समस्या का हल निकाल सके.

  29. पंकज झापंकज झा.

    इस परिचर्चा में मैं भी बाद में भागीदार होना चाहूंगा लेकिन अभी केवल मै अख़लाक़ से संबोधित हूँ……! काफी दिनों बाद आपको देख कर अच्छा लगा था अख़लाक़ …लेकिन ऐसा बकवास करते हुए आपको देखेंगे यह सोचा नहीं था कभी….शर्म आ रही है मुझे कि आपने नक्सलियों को सलाम पहुचाने का दुस्साहस किया है….वास्तव में इतने अरसे बाद लेकिन बहुत गलत मौके पर मिलना हुआ आपसे…सही में शर्मिन्दा हूँ मै आपसे कि हम एक ही संस्थान से पढ़ें हैं….काश मै आपको नहीं जानता होता…..आप जैसे लोग यह शिकायत करते हैं कि देश में आप पर भरोसा नहीं किया जाता…लेकिन अफ़सोस अविश्वास का सामान आपके ऐसे ही शब्द मुहय्या करबाते हैं….घोर अपराध किया है आपने…..क़ानून के अनुसार तो आपको केवल उनको सलाम पहुचाने के लिए जेल में होना चाहिए था….शेम-शेम.
    पंकज झा. (जयराम दास)

  30. डॉ. मधुसूदनडॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    निर्णय लेनेवालेकी मानसिकता, उसकी दृढता, राष्ट्रनिष्ठा, देशभक्ति, और पक्ष स्वार्थसे, उपर उठकर निर्णय लेनेकी क्षमता काम करती है। सरदार पटेल, अटलजी —इ. जो राष्ट्र्भक्तिसे प्रेरित थे, और आजकलके शासक— जो स्विस बॅंक भरने के लिए उद्युक्त हैं; –जैसे तैसे शासनमें कुरसीओं से चिपके, कुरसीदासोंमें, ज़मिन अस्मानका अंतर है।
    समस्याओंके एक रोगकी भाँति ३ स्तर होते हैं। (१) प्रारंभमें समस्या सौम्य रूप धारण करती है। उस स्तरपर उसे सुलझाना सरल होता हैं। और यदि कोई अन्याय हो रहा हो, तो उसे स्वीकारते हुए हल की जा सकती है।और करना चाहिए। (२) दूसरे स्तरपर समस्या मध्यम तीव्रता धारण करती है। फिर भी कुशलता पूर्वक उसे सुलझाना संभव हो सकता है। (३) तीसरे स्तरपर समस्या गंभीर रूप धारण करती है। ऐसे समय, स्थानीय जन, जिन्हे प्रत्यक्ष जानकारी है, उनके परामर्शसे और किसीभी, राजनीतिसे प्रेरित ना होते हुए, राष्ट्रकी अखंडता को अबाधित रखते हुए, और देश हितमे, सही कूटनीति पूर्ण ( पक्ष स्वार्थ से परे) और आवश्यकतासे भी अधिक बल प्रयोग करकर समस्याको जड मूलसे उखाडे बिना कोई पर्याय बचता नहीं है।राष्ट्रकी अखंडता से कोई समझौता स्वीकार नहीं।अब मच्छरको हथोडेसे मारनेका समय आ चुका है। लौह पुरुष, सरदार पटेल की याद आ रही है। जिन्होने हैदराबादी निज़ामको एक रातमें ठिकाने लगाया था। और अनगिनत हिंदू महिलाओंकी लज्जा बचाई थी। कितनी आगजनीसे मराठवाडा को बचाया था। ऐसा कोई भारत माँ का लाल है?

  31. सुभाष चन्द्र कुशवाहा

    यह अराजकता है । हिंसा का यह रूप किसी भी तरह से गरीबों के पक्ष में नही जाता । मूल समस्या से यह भटकाव का रास्ता है । मरने वाले भी गरीबों के ही औलाद थे । समस्यायें हैं । उनका हल भी निकाला जाना चाहिए । पर ये कोई हल है ? यह तो जघन्य अपराध है । अंतत: इसका अंत इन तथाकथित माओवादियों की हत्या/ सफाये से ही होगा ।

  32. sarvodit

    yeh log kisi VIP ko kyon nahin apna shikar banate jinse inhe shikayat hai ?
    ya yeh log sirf sataye huye logon ko aur satane me vishwas rakhte hain ?
    inka antim lakshya kya hai ?
    kya yeh log swayam jaante hain ?
    shayad nahin ?

  33. सतीश कुमार आर. रावतसतीश आर. रावत

    नक्सलवाद कुछ भी हो पर उसका तरीका गलत है। नक्सली मानसिक बीमार होते हैं। उनका तरीका जंगल राज का है। ये लोग उद्देश्य हीन हैं, उन्हे पताही नहीं कि वह क्या है, कहां रहते हैं, वहां का तंत्र कैसा है। ये लोग अग्यान और अशिक्षित हैं, उन्हें कुछ लोग भङकाते, बहलाते हैं और सहायता करते हैं आतंक फैलाने के लिए। यह सब हम आप में से ही कुछ लोग हैं जो अपनी राजनीती की रोटी उनकी मुर्खता पूर्ण अमानुषी कृत्य पर सेकते हैं। वे लोग बिचारे गरीब, अशिक्षित और उद्देश्य हीन हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि वह कितने बडे गणतंत्र (भारत देश) के नागरिक हैं कि जहां पशुओं को भी स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार है, और वे तो मानव है कि जिनके बल पर उनका देश का शासन चलता है। वे जिन चीचों की मांग करते हैं वे चीचे उन्हें मांगने की आवश्यकता ही नहीं है। वे सभी उन्हीं की ही हैं। उन्हें सरकार तक न पहुचाने वाला उन्हीं को जो भङकाता या बहलाता है वही है। उन्हें वही शिक्षा और ग्यान से अनभिग्य रख रहा है। जो उसका जन्म सिद्ध और कानूनी अधिकार है।
    हम भारत के नागरिक हैं उसकी एकता और अखंडता को हमें बनाए रखना है, हमें अपनी राजनीति इसको खण्डित और विभाजित करनें नें नहीं बल्की उसके विकास में लगाना चाहिए। हमें अपने सभी निर्णय बुद्धिमानी, विवेकपूर्ण और शान्ति से करना चाहिए। हमें कभी किसी के भङकावे में नहीं आना चाहिए। जय हिन्द, जय भारत
    नक्सल वाद का मूल तो उसकी अग्यानता में छिपा है। जब तक उन्हें इसका भान नहीं होगा तब तक वे दूसरों के बहकावे में वे गैर मानुसी घटना को अंजाम देते रहेंगे।

    1. shuklaom

      संपादक महोदय आपके सारगर्भित लेख के लिए बधाई आपने अच्छा लिखा है की हमारे देश में ऐसा लोकतंत्र है जिसमे सभी को एक जैसे जीने की आजादी है इसी सम्बन्ध में मुझे धूमिल की यह पंक्ति ध्यान आती है
      यह जनता —-:/
      जनतंत्र में उसकी श्रध्दा /
      अटूट है.
      उसको समझा दिया गया है यहाँ,
      ऐसा जनतंत्र है जिसमे

      जिन्दा रहने के लिए,
      घोड़े और घास को .
      एक जैसी छूट है /
      कैसी विडम्बना है,
      कैसा झूठ है,
      दरअसल ओने यहाँ जनतंत्र
      एक ऐसा तमाशा है
      जिसकी जान
      मदारी की भाषा है |

  34. शैलेन्‍द्र कुमारshailendra kumar

    नक्सली आन्दोलन भटक नहीं गया ये भटके हुए लोगो का ही आन्दोलन है इससे और क्या उम्मीद की जा सकती है नक्सलियों को अगर लगता है की वो आदिवासियों के लिए संघर्ष कर रहे है और इस लड़ाई में आदिवासी उनके साथ है तो वो चुनाव क्यों नहीं लड़ते उस क्षेत्र के विकास के लिए लोकतान्त्रिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाते लोगो को मरने से विद्यालयों, अस्पतालों, रेल और बस साधनों पर हमला कर वो कौन से विकास में सहयोग कर रहे है ये इतने ही बड़े क्रांतिकारी है तो इन राजनेताओ पर हमले क्यों नहीं करते जो बड़ी बड़ी खदाने इन इलाको में है उनके मालिको, मैनेजरों पर हमले क्यों नहीं करते उन गरीब ग्रामीणों, आदिवासियों पर मुखबिर होने का आरोप लगा कर पूरे गाँव को मौत के हवाले कर देते है हो सकता है की उनमे कुछ लोगो ने मुखबिरी की हो लेकिन अगर वे उन्ही की लड़ाई लड़ रहे तो उन्हें समझाने के बजाय सभी को मौत की नीद सुला देना कौन सी क्रांति है और जवानों की मौत जवानों के पास शौर्य की कमी होना नहीं हमारी सरकारों की नपुंसकता का प्रमाण है अव्यवस्था में तो हम सभी जी रहे है तो क्या सभी हथियार उठा ले

  35. एम. अखलाक

    यदि हथियारबंद लड़ाई लड़ने के कारण नक्‍सली अपराधी हैं तो उनसे भी बड़ा अपराधी केन्‍द्र सरकार है, क्‍योंकि वह भी हथियार उठा चुका है। मेरा मानना है कि नक्‍सली समस्‍या एक राजनीतिक व सामाजिक मुद्दा है। इससे निबटने का माध्‍यम सिर्फ राजनीतिक हस्‍तक्षेप ही हो सकता है। केन्‍द्र सरकार के पास चूंकि कोई विजन नहीं है। सो, देश का तेजी से असमान विकास हो रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं की यह विकास अमेरिका परस्‍त है। केन्‍द्र अगर गांवों की गरीबी, बेरोजगारी दूर कर दे। गांवों का समान विकास कर दे तो नक्‍सली समस्‍या खुद खत्‍म हो जायेगी। नक्‍सली समुचित विकास ही तो चाहते हैं। जिन विदेशी कंपनियों के बीज के कारण खेत खलिहान बर्बाद हो रहे हैं और सरकारें मौन हैं ऐसे में किसान-मजदूर नक्‍सली नहीं बनेंगे तो क्‍या बनेंगे। आखिर किसानों के खेत प्रयोगशाला क्‍यों बने हुए हैं। आखिर अपनी सरकार विदेशी कंपनियों के एजेंट के रूप में क्‍यों काम कर रही है। समाज का एकांगी विकास क्‍यों हो रहा है। नक्‍सली पाकिस्‍तान से नहीं आये हैं। उनका मकसद भारत को बांटना नहीं है। वह भाजपा और कांग्रेस की तरह हिन्‍दु-मुसलमान को नहीं बांट रहे। उनकी लड़ाई वंचितों की लड़ाई है। उनका मकसद समुचित विकास और वंचितों की सत्‍ता में भागीदारी है। ऐसे लड़ाकों को हमें सलाम करना चाहिए। और देश बांटने की सियायत करने वाले नेताओं के खिलाफ हथियार उठाना ही चाहिए। गरीबों के दमन व शोषण के लिए जिस तेजी से सरकारें भूमंडलीकरण को लागू कर रही हैं ऐसे में हथियार उठाना ही इकलौता रास्‍ता बच गया है। नक्‍सलवाद की यह लड़ाई परवान चढ़ेगी क्‍योंकि यह जनता की लड़ाई है।

  36. p.c.rath

    मेहनत करने वालो को किसी नक्सलवादी का डर नहीं है.सरकार को वास्तव में इस समस्या को ख़त्म करना है तो पहले भूखे के लिए रोटी का बंदोबस्त करना जरूरी है.नक्सलवाद के खात्मे के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत हैं,नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है। ये ऐसे जंगलवासी हैं जो सदियों से शोषण का शिकार हैं।

    नक्सली समस्या भारतीय शासन व्यवस्था की विफलता की निशानी है। आज भी आजादी के 62 साल बाद बहुसंख्यक आबादी को पीने का साफ पानी नसीब नहीं है। बेरोजगारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अशिक्षा के चलते लोगों का जीवन अंधकारमय है। भूख व कुपोषण से मौतें हो रही है। जानलेवा कर्ज है। ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं।

  37. जगत मोहनjagat mohan

    iss ladai ke do chhor hai, ek vanvaasi chhetra mein jise naxali aatanki hathiyaar se ladh rahe hai, dusara chhor hai tathakathit maanavadikar vaadi jo shaharo mein kalam ke aadhar par padhe likhe varg ke man mein naxaliyon ke dwara ladhi ja rahi ladai ko jaayaj thaharaane ka prayaas kar rahe hai. Yeh varg sarkari halako mein bhi prabhav bana kar naxaliyon ke virudh chal rahi ladai ko kamjor karane ka prayaas kar raha hai. Kabhi vanvaasi chhetra mein jaane ka mauka mile to jaana chahiye, naxali shudh roop se satta par kabje ki ladai lad rahe hai, inhe koi matlab nahin hai vanvaasiyo ke vikas se, isame jo nexus bana hua hai usame NAXAL(man power) + ISI (arms provider) + CHURCH (money provider). Iss naxali ladai ko ladane ke liye bagair vote bank ki chinta kiye ladana hoga tabhi saphalata milegi

  38. purushottam kumar singh

    Mera manna hai ki prvakta ke mahan kalmkar jinhone bhi in pangtion ko likha hai, wo punjiwadi vavastha main reh kar mansik diwaliyepan ke sikar ho gayen hai. Naxalion ne bharat ki bhumi par jo raqtpat macha rakha hai use kanhi se bhi uchit nahi kaha ja sakta,lekin satta ke sirs par bhaitye log ya phir wo log jo 100 crore se bhi adhik bharatiye ke bhagyabidhata hai,aajadi ke itne baras badh bhi un ilakon main jevaan gujar karne ke liye buniyadi subhidhayen bhi mayyasar kiun nahi kar wa paye hain. Kalamkar mahoday se sadar anurodh hai ki un ilakon main ja kar dekhen phir likhen,warna is tarah ki lekhni ko punjibadi bahdugiri hi kaha jayega……………Mera niji taur par aap ko zalil karne ka irada nahi hai ,lekin un ilakon main kai opreations ke dauran jane ka mauka mila hai , aur usi anubhav ke adhar par saalah hai.

  39. Mohan Honap

    sabse pahle hume naksalvad ye shabd ka upyog band kar dena chahiye aur inhe deshdrohi shabd se sambodhit karna chahiye ..in deshdrohiyo ki sirf yek hi saja hai maout..

  40. बलराम अग्रवाल

    ‘दूसरी ओर, सर्वहारा के शासन का सपना देखनेवाले नक्सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्य बरामद नहीं होते। कुछ दिनों पहले एक नक्सली Bangetudi शिविर में छापे के दौरान पुलिस ने ब्लू फिल्म की सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिवर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्योद्धाटन हुआ कि बड़ी तेजी से नक्सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। संगठन में शामिल युवती चाहकर भी इसके खिलाफ न आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है। वास्तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है।’ ये बातें किसी पत्रकार की भाषा का आभास न कराकर नौकरशाह की भाषा जैसी लगती हैंजो समस्या को चरित्रहीनता से जोड़कर हवा में उड़ा देना चाहता है। भाई रामेन्द्र सिंह भदौरिया का कथन एकदम उचित लगता है। पुलिस विभाग हो या कोई अन्य नागरिक विभाग, आम कर्मचारी का दण्डस्वरूप स्थानान्तरण खतरनाक जगहों पर किया जाना किसी से छिपा नहीं है। ‘नक्सलवाद के खात्मे के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत हैं, जिसका संप्रग सरकार में अभाव दिखता है।’ जैसे डायलॉग भी प्रभावकारी नहीं कहे जा सकते, माफ करना।

  41. रा्मेन्द्र सिंह भदौरिया

    सभी लोगों का कहना है की नक्सलवादी केवल आसाम बिहार और बंगाल में है,लेकिन मुझे तो लग रहा है,की हर तीसरे घर में नक्सल वाली पैदा हो गया है,आज की महंगाई और बेरोजगारी से तंग आकर हर नवयुवक अपने को समाप्त कर लेना चाहता है वह रास्ता चाहे हिंसा का हो या ड्रग लेकर चित्त पड़े रहने का.हिंसा लूटमार डकैती चोरी छीना झपटी रंगदारी वसूलना एक ही क़ानून के अन्दर आजाते है,जब नवयुवक को पढ़ने लिखने के बाद भी कोइ काम नहीं मिलता है,तो वह चाहता की भूखो मरने से अच्छा है की कुछ करके मर जाओ,हर व्यक्ति शान से काम करने के बाद अपने परिवार की समूची जिम्मेदारियों के निभाने की कोशिश करता है,लेकिन जब कोइ रास्ता उसे नहीं दिखाई देता है तो वह केवल मार काट करने के अलावा और कुछ नहीं चाहता है,उसे केवल वह संतुष्टि चाहिए जो उसे जन्म लेने के बाद अधिकार के रूप में मिली है.जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्रों में यह भावना अधिक मिलेगी,मैंने भारत को घूम कर देखा है,असम में एक बांस के डंडे में एक मजदूर दो टोकरी रखकर दिन भर बजन ढोता है,शाम को उसे जो भी मजदूरी मिलती है उससे वह अपने परिवार के पेट को भरने के लिए चावल का तो बंदोबस्त कर लेता है लेकिन दाल का बंदोबस्त नहीं कर पाता है,खाली नमक मिर्च से कितने दिन चावल को खाया जा सकता है,उसी जगह जब वह सामान लेकर उन घरो में जाता है जहां दाल कचरा पात्र में फेंकी गयी होती है तो उसे भी अपने आदमी होने में और जिसके यहाँ दाल कचरा पात्र में फेंकी गयी होती है,कुछ तो फर्क नजर आ ही रहा होता है,यह फर्क अमीर और गरीब के बीच का भेद पैदा कर देता है,और यही भेद चोर डकैत ठग राहजनी करने वालो के साथ नक्सलवादियों को पैदा करता है,राजनीति से भी नक्सलवादियों को जोड़ कर काम चलाने वाली नीति पैदा की जाती है,इस समस्या को ख़त्म करने के लिए अगर राजनीति में जमा लोग कोइ उपाय करेंगे,तो जो धन कमा रहे है वे उनके शिकंजे में कैसे आयेंगे,अगर व्यवसाय करने वाला डरेगा नहीं तो उन्हें मोटी रकम चंदे के रूप में कहाँ से देगा,आज जो डर रहे है और चिल्ला रहे है वे केवल वही लोग है जिन्होंने राजनीति से सम्बंधित पार्टियों को चन्दा नहीं दिया है, और उन्हें लग रहा है की कल को कोइ राजनेता नक्सलवादियों के रूप में उनका खात्मा नहीं करवा दे.मेहनत करने वालो को किसी नक्सलवादी का डर नहीं है.सरकार को वास्तव में इस समस्या को ख़त्म करना है तो पहले भूखे के लिए रोटी का बंदोबस्त करना जरूरी है.

  42. विकास सैनी

    नक्सलियों के साथ बातचीत करना जवानों के बलिदान की खिल्ली उड़ाने के समान हैं। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की सोच पर तरस आता है। नक्‍सलियों को खत्‍म करना ही सरकार का उद्देश्‍य होना चाहिए।

  43. सुमित कर्णसुमित कुमार कर्ण

    आपका कहना सही है कि नक्सलवाद का सामाजिक परिवर्तन से कोई लेना-देना नहीं है, वस्तुत: यह एक विशुद्ध आतंकवाद है, जिसका लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता कब्जाना है। नक्सलवाद मानवता का दुश्मन है। यह भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा है। यह सिरफिरे लोगों का गिरोह है जो जनता व जवान के खून से भारत की धरती को बस लाल करना जानते हैं। सच में ये रक्तपिपासु हैं। ये राष्ट्रद्रोही हैं।

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