लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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एक बार अपनी गाड़ी के नीचे एक गिलहरी के दब कर मर जाने के बाद नेहरू की प्रतिक्रिया थी कि इस जैसा फुर्तीला जानवर इसलिए मृत्यु को प्राप्त हुआ क्योंकि वह ऐन गाडी के सामने आ जाने पर तय ही नहीं कर पाया कि उसको आखिर जाना किधर है. आज छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा जिले के मुकराना के घने जंगलों में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की 80 सदस्यीय 62 वीं बटालियन पर नक्सलियों द्वारा किये गए सबसे बड़े हमले में देश को अपने दर्ज़नों जवानों से हाथ धोना पड़ा है .तो अपने जांबाजों की शहादत एवं सरकारों की भूमिका पर वही कहानी याद आ रही है. वास्तव में आज के लोकतंत्र के कर्णधार-गण ऐसी ही गिलहरी हो गए हैं जिनको पता ही नहीं है कि आखिर जाना किधर है. निश्चित ही यह अवसर किसी भी तरह के आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है, ना ही मामला कांग्रेस और बीजेपी का है. मामला सीधे लोकतंत्र से जुड़ा हुआ है. सीधी सी बात ये है कि इस मामले में देश में कोई तीसरा विकल्प नहीं है. आप चाहें तो लोकतंत्र के पक्ष में दिखें या उसके खिलाफ. और उसके खिलाफ जाने वाले लोगों, संस्थाओं, नेपथ्य से संचालित हो रहे समूहों के साथ आखिर हमें कैसा सलुक करना चाहिए यह अगर हम एक बार तय कर लें तो ये कोई इतनी बड़ी लड़ाई नहीं है जिसमें विजय न पायी जा सके.

बिना किसी भी तरह के पूर्वाग्रह रखते हुए भी आप सोचें. क्या आपको ऐसा लग रहा है कि नक्सलियों के खिलाफ सरकारों के पास किसी भी तरह की कोई स्पष्ट नीति है? इतनी बड़ी विभीषिका, देश के अंदर चलने वाले वाले इतनी बड़ी लड़ाई, संगठित गिरोहों द्वारा लोकतंत्र के समक्ष उत्पन्न कर दी गयी इतनी बड़ी चुनौती के बाद भी क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें? मसले का हल बातचीत से हो, गोली से होगी, इलाके का विकास करने के बाद ही नक्सलियों का सफाया सम्भव है या नक्सलियों के सफाए के बाद हम विकास की बात सोचेंगे, इसमें सभी विकल्प या कोई एक विकल्प अपनाना ज़रूरी है? यह आतंकवाद है या विचार धारा की लड़ाई है, यह राज्य का मामला या केंद्र का, क़ानून व्यवस्था का है या राष्ट्रीय चुनौती इनमें से किसी भी बात पर अगर हम कोई सर्वसम्मत रुख नहीं अपना सकें तो फिर कैसे पार पा सकते हैं आप इस चुनौती से? सवाल केवल मज़बूत इच्छा शक्ति और बिना किसी भी तरह के राजनीतिक लाभ-हानि का विचार किये उस पर अमल का है.

ऊपर जितने तरह के विरोधाभासों या दुविधा की चर्चा की गयी है, अगर आप केन्द्रीय गृह मंत्री मंत्री के नक्सल मामले में दिए गए आज तक के सभी बयानों पर गौर फरमायें तो लगेगा कि वास्तव में अलग-अलग मौके पर उनके ऐसे बयानों से हमारा साबका पड़ता रहा है. तो बात इसी मौका परस्ती की है. अगर आप अपनी राजनीतिक स्थिति एवं सुविधाओं के अनुकूल ही चीज़ों को परिभाषित करने की बात करना चाहेंगे तो कैसे पार पा सकते हैं ऐसी विकराल समस्या से? चीजें आपकी सुविधा अनुसार तो बदलनी है नहीं. आप चिदंबरम जी के लालगढ़ में दिए बयान पर गौर कीजिये…वहाँ वो युद्ध के लिए तैयार नक्सलियों को बात-चीत के लिए ही आमंत्रित करने की कोशिश करते दिखे. जबकि इससे पहले किशन जी और उनके साथ फोन-फैक्स नंबर के आदान-प्रदान जैसा बचकाना मामला भी लोगों को देखने को मिला था. इसी तरह जहां मुख्यधारा के सभी विचारक-चिन्तक और राजनीतिक दल भी नक्सलियों को चोर-लुटेरों का गिरोह साबित करने में प्राण-पण से जुटे हो, यहाँ तक कि इस वाद के जन्मदाता कहे जाने वाले कानू सान्याल भी जिसको आतंकवाद कहने लगे थे. और हताश होकर जिन्होंने आत्महत्या तक कर ली हो वहाँ पर छत्तीसगढ़ का पुलिस अधिकारी किसी अन्य राज्य में जा कर नक्सलवाद को “विचारधारा” साबित करने पर तुल जाए, क्या अर्थ है इन बेतुकी बातों का?

जिन-जिन लोगों को यह लगता हो कि आतंकवाद का खात्मा बन्दूक से नहीं हो सकता उनके लिए हालिया श्रीलंका का या उससे पहले पंजाब के उदाहरण पर गौर करना चाहिए. अगर लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका की सरकार भी बात-चीत का राग ही अलापती रहती तो पीढ़ियों तक ऐसे ही असुरक्षित रहता वह देश भी. या अगर इंदिरा गांधी ने स्वर्ण-मंदिर में सेना न भेजी होती, पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह अपनी जान की कीमत पर भी अगर आतंकियों को कुचलने हेतु दृढप्रतिज्ञ नहीं होते तो शायद वह सरहदी राज्य आज भारत का हिस्सा ही नहीं रह गया होता. तो अब यह समय आ गया है कि देश नक्सल मामले को लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखें. बिना किसी भी तरह के दवाव में आये इसको कुचलने और केवल कुचलने की नीति पर ही कायम रहें. प्रजातंत्र के इस महाभारत में शिखंडी की भूमिका निभाने वाले कुछ कलमकारों, विदेशी दलाल/दलालियों की जम कर उपेक्षा और अगर ज़रूरत हो तो उनके हाथ तोड़ देने से भी बाज़ ना आने की इच्छा शक्ति दिखलाये. ऐसे लोगों के लिए जन-सुरक्षा कानून का इस्तेमाल और बाकियों के लिए गोली, इस नीति पर चलें तो यह ऐसी बड़ी समस्या नहीं है जिससे पार ना पाया जा सके. अगर रणनीतिक तौर पर सोचा जाय तो इस मामले के लिए अनुकूलतम् स्थिति भी है. यह काफी सालों के बाद पहला मौका है जब नक्सलियों के मौसेरे भाई वाम-पंथियों की केंद्र में कोई हैसियत नहीं रह गयी है. साथ ही बचे खुचे कम्मुनिस्ट खुद भी अब इन गिरोहों से मुक्ति चाहते हैं. तो इस मौके का इस्तेमाल कर लोकतंत्र की यमुना में नाग की तरह फन काढे इन लुटेरों को कुचलने में जी-जान से जुट जाए.

निश्चित ही अपने जवानों की शहादत पर खून के आंसू रोने का दिल कर रहा है. किसी भी देशभक्त के लिए इस मौके पर चुप रहना संभव नहीं. लेकिन यह शहादत और गौरव की बात होती अगर हमारे 75 जवानों के बदले 750 राक्षसों का सर कलम करने में हमें सफलता मिली होती. आइये हम इसको नक्सलियों की कायराना हरकत नहीं कहें. उन्होंने तो अपने तरीके से बड़ी सफलता हासिल की है. बस इस शहादत का सबसे बड़ा सम्मान यही हो सकता है कि सभी सरकारें मिल-जुल कर यह घोषित करें कि नक्सल मामले में सभी कंधे से कंधे मिला कर चलेंगे. भविष्य में इनसे किसी भी तरह से बातचीत की बात करके अपने जवानों की शहादत को कलंकित नहीं करेंगे. जवानों से दस गुना संख्या में नक्सलियों का सर प्राप्त किये बिना चैन से नहीं बैठेंगे. लोकतंत्र के विरुद्ध दुष्प्रचार करने वाले हाथ को भी तोड़ कर दम लेंगे. इन गिरोहों को कभी “अपने लोग” का संबोधन देने का पाप नहीं करेंगे. सीधे तौर पर नक्सलियों को अपना दुश्मन समझेंगे.

अगर अमृतसर की तरह से सेना का भी इस्तेमाल करना पड़े तो भी पीछे नहीं हटेंगे. लोकतंत्र पर आये इस संकट का पूरे दमदारी से सामना करने को तैयार रहेंगे चाहे इंदिरा-राजीव गाँधी की तरह बम से उड़ जाना पड़े या मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की तरह चीथड़े उड़ जाए. शहीद जवानों की एक मात्र श्रद्धांजलि देश के चप्पे-चप्पे पर लोकतंत्र की वापसी करके ही दी जा सकती है. आजादी के दीवाने सेनानियों की तरह ही दंतेवाडा में शहीद हुए जांबाजों को सदियों तक देश याद रखेगा. अमर रहे ये सेनानी और कायम रहे उनका गुणगान करने को ये कायनात और लोकतंत्र.

-पंकज झा

16 Responses to “आँख से आंसू नहीं शोले निकलने चाहिए”

  1. Mihir Jha

    This incident has shown how helpless our gov is…………………… Our CRPF jawan were killed like anything and we still don’t have any ACTION in place 🙁 Dr. Raman Singh is also equally responsible, a CM can’t be helpless in his own terrotiory. Mr. Chidambaram is second in command as far security matters are concerned for Chattisgarh………………….. India is a soft state and vill remain so………………… sadly v have such enemies who take full advantage of this………………….. May the soul of dead RIP…………………. May God give their family strength to fight the battle of life …………………… Everyone vill forget like v forgot how BDR (Bangladesh rifles) killed so many BSF people near Indo-Bangla border a decade ago…………….. Yes, I’m angry and vill remain so till all these Maoists are killed like animals……………………………………… Dhanywaad!

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  2. शैलेन्‍द्र कुमार

    shailendra kumar

    पुरुषोत्तम जी का दुःख मैं समझ सकता हूँ ये तो भारतीय संस्कृति का स्वभाव है की वे नक्सलियों का दुःख देख नहीं पाते और हम नक्सलियों से पीड़ित अन्य लोगो का नक्सली आन्दोलन भटक नहीं गया ये भटके हुए लोगो का ही आन्दोलन है इससे और क्या उम्मीद की जा सकती है नक्सलियों को अगर लगता है की वो आदिवासियों के लिए संघर्ष कर रहे है और इस लड़ाई में आदिवासी उनके साथ है तो वो चुनाव क्यों नहीं लड़ते उस क्षेत्र के विकास के लिए लोकतान्त्रिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाते लोगो को मरने से विद्यालयों, अस्पतालों, रेल और बस साधनों पर हमला कर वो कौन से विकास में सहयोग कर रहे है ये इतने ही बड़े क्रांतिकारी है तो इन राजनेताओ पर हमले क्यों नहीं करते जो बड़ी बड़ी खदाने इन इलाको में है उनके मालिको, मैनेजरों पर हमले क्यों नहीं करते उन गरीब ग्रामीणों, आदिवासियों पर मुखबिर होने का आरोप लगा कर पूरे गाँव को मौत के हवाले कर देते है हो सकता है की उनमे कुछ लोगो ने मुखबिरी की हो लेकिन अगर वे उन्ही की लड़ाई लड़ रहे तो उन्हें समझाने के बजाय सभी को मौत की नीद सुला देना कौन सी क्रांति है और जवानों की मौत जवानों के पास शौर्य की कमी होना नहीं हमारी सरकारों की नपुंसकता का प्रमाण है अव्यवस्था में तो हम सभी जी रहे है तो क्या सभी हथियार उठा ले

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  3. जगत मोहन

    jagat mohan

    iss ladai ke do chhor hai, ek vanvaasi chhetra mein jise naxali aatanki hathiyaar se ladh rahe hai, dusara chhor hai tathakathit maanavadikar vaadi jo shaharo mein kalam ke aadhar par padhe likhe varg ke man mein naxaliyon ke dwara ladhi ja rahi ladai ko jaayaj thaharaane ka prayaas kar rahe hai. Yeh varg sarkari halako mein bhi prabhav bana kar naxaliyon ke virudh chal rahi ladai ko kamjor karane ka prayaas kar raha hai. Kabhi vanvaasi chhetra mein jaane ka mauka mile to jaana chahiye, naxali shudh roop se satta par kabje ki ladai lad rahe hai, inhe koi matlab nahin hai vanvaasiyo ke vikas se, isame jo nexus bana hua hai usame NAXAL(man power) + ISI (arms provider) + CHURCH (money provider). Iss naxali ladai ko ladane ke liye bagair vote bank ki chinta kiye ladana hoga tabhi saphalata milegi

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  4. purushottam kumar singh

    Adarniye Pankaj Jha jee,
    Aap ka aalekh padh kar maan diwaron se saar patak patak kar paglon ki tarah chilane ka kar raha hai,lekin jis bhumi ne aap ko jaanm diya hai usi bhumi ne mujhe bhi paida kiya hai is liye dhariya abhi baki hai,aap jis patrika ke sampadak hain,aapke soch ko padh kar uske astar ko samjhna muskil nahi hai. Jahir hai aap naxalion ko ltte aur panjab ke halat se jor rahe hain ye aap jaisa samantiputra hi kar sakta hai.jin kalam karo ko sikhandi ki sangyan aap de rahe hai, jahir hai unhe bura nahi lage ga,kiun ki aap bhi usi zamat se hain jinke tan par Reebok ka tshirt aur Lee ki pant jaruri hota hai,subh ka break fast,dophar ka lunch aur night ka dinner aam baten hai. Aap ki pehli pangti hi Chaha Nehru se suru hai is liye aap ki sonch ko samajh na muskil nahi hai,waise meri ek salah hai likhna aur naxalbaad par likhne main fark hai,is liye thoda padha kijye likhne main sahi hoga.

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  5. kumud singh

    झा जी अपनेक इ आलेख अद्भुत अछि | अहाक अनुमति हुए त अहि आलेखक किछु हिस्सा समाद पर राखी साकेत छि |

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  6. RAJESH KUMAR

    पंकजजी आपने सही लिखा है / ये सब हमारी सरकार का दृढसंकल्प का आभाव है / ये ६० साल से अधिक देश पर राज्य करने वाला सरकार जिम्मेदार है /

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  7. ASIM

    दंतेवाडा कांड को पढ़ कर जैसे मन में आया कि काश मै सुपरमेन होता तो अभी के अभी जाकर सारे नक्सालियों को इस घटना का अंजाम दिखा देता. फिर ख्याल आया कि किस किस को मारूंगा. आज हमारे देश में अकाल मृत्यु कि घटनाये आम है. दर असल ये मृत्यु नहीं हत्याएं होती है जो सरकार द्वारा कि जाती. आप तो पत्रकारिता से जुड़े व्यक्ति है आप की नज़रों के सामने से भी भूख से मृत्यु, स्वस्थ सेवाओं के अभाव में मृत्यु, बेरोज़गारी से तंग आकर आत्महत्या जैसी ख़बरें तो गुजरती तो होंगी ही. इन हत्याओं का हल क्या गोली है आप के अनुसार लोक तंत्र कि हत्या करने वालों को गोली मार देनी चाहिए मेरा भी यही ख्याल है. करोरो टन अनाज गोदामों में सड़ रहा है, चूहे खा रहे हो और वित्त मंत्री का वक्तव्य हो कि हमारे पास खाने को पर्याप्त अनाज है मगर फिर भी लोग भूख से मर रहें हों. क्या ये लोकतंत्र की हत्या नहीं है.मै नक्सलवाद का कतई समर्थक नहीं हूँ, मै ऐसे किसी भी वाद का समर्थक नहीं हूँ जो हत्याओं का रास्ता दिखता हो. जब ही कोई भूख से मौत का समाचार पढने या देखे को मिलता है तो मेरे भी दिल में ठीक वैसे ही ख्याल आते है जैसा कि दंतेवाडा के बाद किसी भी इन्सान के दिल में आएगा.
    जरूरत है कि उनके ही हथियार से उनको मारा जाय. भूख, गरीबी एवं सरकारी उपेक्षाओं के कारण नक्सली भोलेभले आदिवासियों को अपने दल में शामिल कर पाने में सक्षम हो पा रहें है. तो साहब अगर गोली ही मारनी है तो भूख को मारो, गरीबी को मारो, उपेक्षाओं को मारो. नक्सली अपने आप ही मर जायेंगे.

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  8. मुहम्‍मद उमर कैरानवी

    यह आतंकवाद है, वाकई आजादी के दीवाने सेनानियों की तरह ही दंतेवाडा में शहीद हुए जांबाजों को सदियों तक देश याद रखेगा. अमर रहे ये सेनानी और कायम रहे उनका गुणगान करने को ये कायनात और लोकतंत्र.

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  9. chandramohan negi

    jha sahab aap ka lek padha .. dantewada mein saheed jawanow ko aap ki yeh sachhi shadhanjli hai ….

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  10. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    पंकज जी,

    जबसे घ्टना के बारे मे देखा-सुना मन खिन्न था, आपका आलेख पढ्कर मन थोडा हल्का हुआ. नक्सलियो ने अपना काम बखूबी किया है. अब सरकार और समाज को अपना काम करना है. आततायियो का वध ही एकमात्र उपाय है..अब इस लडाइ मे जाने और कितना नुकसान होगा पता नही लेकिन राज्य को अब आर या पार का निर्णय करना होगा.

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