डॉ. मनोज चतुर्वेदी
'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

फिल्‍म समीक्षा : अतिथि, तुम कब जाओगे – डॉ. मनोज चतुर्वेदी

आज जहाँ फिल्मों में मारधाड़, अश्लीलता तथा गानों की भरमार है वहीं, ‘अतिथि, तुम कब जाओगे’ इस बात पर विचार करने के लिए विवश करती है कि वो अतिथि कैसा है? जिसके बारे में नायक-नायिका उत्सुक तथा जिज्ञासु हैं। सिनेमा हॉल में जानेवाला दर्शक प्रवचन तथा भाषण सुनने के लिए नहीं जाता है। वो दिनभर की भागमभाग, तनाव दूर करने हेतु तथा मन बहलाने के लिए सिनेमा हॉलों में जाता है।

‘अतिथि, तुम कब जाओगे’ हास्य-व्यंग्य से ओत-प्रोत फिल्म है। पुनीत (अजय देवगन) तथा मुनमुन (कोंकणा सेन शर्मा) दोनों कामकाजी पति-पत्नी हैं तथा उनका पुत्र भी है। जब से संयुक्त परिवार का विघटन हुआ है। मनुष्य एकाकी परिवार में रहने के कारण कार्यों के बोझ से दबा हुआ है। उसे स्वयं में बातचीत करने का अवसर नहीं मिलता। पुनीत छोटे बेटे से बातचीत करने का वक्त नहीं निकाल पाता। इसी बीच लंबोदर वाजपेयी (परेश रावल) जो दूर का रिश्तेदार है। इन दोनों के बीच में आता है। पुनीत और मुनमुन ऐसा सोचते हैं कि दो-चार दिनों में अतिथि चला जायेगा। पर, यह तो जाना हीं नहीं चाहता। घर तथा पास-पड़ोस के लोग लंबोदर के क्रियाकलापों से हैरान-परेशान हैं। इसी बीच झटके से लंबोदर वाजपेयी ओझल हो जाता है। उसके कृत्यों से हैरान-परेशान पुनीत-मुनमुन तथा पड़ोसी पता लगाते हैं कि वह कहां गया।

नायक (अजय देवगन) तथा कोंकणा सेन (मुनमुन) का अभिनय ठीक-ठाक है। फिल्म में हास्य का पुट है। दर्शक पूरे समय हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते है। अश्विनी धीर ने धारावाहिक ‘ऑफिस-ऑफिस’ के बाद ‘अतिथि, तुम कब आओगे’ में अपने उत्कृष्ट निर्देशन का परिचय दिया है। कलाकार: अजय देवगन, कोंकणा सेन शर्मा, परेश रावल, संजय मिश्रा आदि। संगीत: प्रीतम निर्देशक: अश्विनी धीर

न घर के न घाट के

‘परदेसी बाबू’ फिल्म में राजेश खन्ना ठेठ गंवार तथा देहाती है। ग्रामीण परिवेश से शहर में आया नौजवना धीरे-धीरे शहरी बाबू बन जाता है। लेकिन उसकी आत्मा ‘एक भारतीय आत्मा’ ही रहती है। यदि हम कहें कि फिल्म ‘न घर के ना घाट के ग्रामीण पृष्ठ भूमि पर केंद्रित रिमेक हैं तो भी अतिश्योक्ति न होगी। यह फिल्म ग्रामीण पृष्ट भूमि पर तथा कथित समाज द्वारा व्यंग्य हीं है। फिल्म में निर्देशन का स्पष्ट प्रभाव डालने का प्रयास किया है। परंतु फिल्म दर्शकों को माचिस, रंग दे वसंती, विवाह, शोले तथा बागवान की तरह बांध नहीं पाती। ओमपुरी, परेश रावल और रवि किशन का गजब का अभिनय है लेकिन हिट हो नही पाती।

- लेखक, पत्रकार, समीक्षक, समाजसेवी तथा नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी संपादक हैं।

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