दिवस दिनेश गौड़
पेशे से अभियंता दिनेशजी देश व समाज की समस्‍याओं पर महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी करते रहते हैं।

प्रकृति ईश्वर ही तो है…

दिवस दिनेश गौड़

 

मित्रों अभी कुछ दिन पहले किसी ने मुझसे कहा कि भाई आज से मैं मंदिरों में भगवान की पूजा नहीं करूँगा, आज से मैं प्रकृति की पूजा करूँगा| मैंने कहा यह तो अच्छी बात है, प्रकृति ईश्वर ही तो है| किन्तु मंदिर में रखी पत्थर की मूरत भी तो प्रकृति है| क्या पत्थर प्रकृति की देन नहीं है? और फिर हम तो मानते हैं कि कण-कण में ईश्वर है, तो यह ईश्वर जब प्रकृति में है तो उस पत्थर में क्यों नहीं हो सकता?

 

आरम्भ में ही आपको बता देना चाहता हूँ कि आप यहाँ शीर्षक पढ़ कर अनुमान न लगाएं| मै यहाँ किसी धर्म, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय आदि की आलोचना नहीं करूँगा| क्योंकि मेरे देश की सभ्यता एवं संस्कारों ने मुझे ऐसा नहीं सिखाया| किन्तु अपनी संस्कृति का गुणगान अवश्य करूँगा जिस पर मुझे गर्व है| झूठ कहते हैं वे लोग जो किसी आस्था के उदय को अपनी आस्था के पतन का कारण मानते हैं| कोई एक सम्प्रदाय यदि आगे है तो हमारा सम्प्रदाय खतरे में है ऐसा कहना गलत है| हमारी आस्था का पतन हो रहा है यह कहना गलत है| तुम्हारी आस्था के पतन का कारण तुम स्वयं हो, हमारी आस्था के पतन का कारण हम स्वयं हैं| आस्था तुम्हारी है, फिर वह डिग कैसे सकती है और यदि तुम्हे अपनी आस्था में ही आस्था नहीं है, विशवास नहीं है तो इसमें हमारा क्या दोष? यदि आज तुम असुरक्षा का अनुभव कर रहे हो तो कारण बाहर नहीं भीतर है और यही पतन का कारण है| यदि तुम्हारी आस्था में कोई सत्य का आधार ही नहीं है तो उसका पतन हो जाना चाहिए| सत्य तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न मार्ग हो सकते हैं| हमारे मार्ग पर जो हमारे साथ नहीं उसके मार्ग को गलत कहना अनुचित है| सम्प्रदाय तो केवल मार्ग हैं, लक्ष्य नहीं| साधक और साध्य के मध्य में साधना है| साधना भी एक मार्ग ही है और यह भी भिन्न हो सकती है| अत: साधना व सम्प्रदायों की भिन्नता से हमारी संस्कृति में भेद नहीं हो सकता| और संस्कृति तो जीवन की पद्धति है जिसके हम अनुयायी हैं| जीवन में हमारी आस्था ही हमारी संस्कृति व हमारे संस्कार हैं| हम जियो और जीने दो में विश्वास रखते हैं| भारत भूमि में जन्म लेने वाले समस्त सम्प्रदायों के मार्ग भिन्न हो सकते हैं किन्तु संस्कृति एक ही है, एक ही होनी चाहिए|

भाग्यशाली हैं वे जिन्होंने इस धरा पर जन्म लिया| जहाँ स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग है| इन्ही शब्दों में देवता भी भारत भूमि की महिमा का गान करते हैं| पवित्रता त्याग व साहसियों की भूमि| ज्ञान-विज्ञान, कला-व्यापार व औषधियों से परिपूर्ण भूमि| हमारे पूर्वजों की कर्म भूमि| यही है मेरी भारत भूमि| भारत भूमि के इस इतिहास पर हम गर्व करते हैं परन्तु मै जानता हूँ कि कुछ मैकॉले मानस पुत्रों को हीन भावना का अनुभव भी होता है| समस्या उनकी है हमारी नहीं| हम हमारी माँ से प्रेम करते हैं, उस पर व उसके पुत्रों पर गर्व करते हैं| यदि तुम्हे शर्म आती है तो यह समस्या तुम्हारी है हमारी नहीं| चाहो तो इस भूमि का त्याग कर सकते हो| जिस माँ ने अपने वीर पुत्रों को खोया है वह माँ अपने इन नालायक पुत्रों के वियोग को भी सह लेगी|

धन्य है हमारी सनातन पद्धति जिसने हमें जीना सिखाया| फिर से कह देता हूँ कि सनातन केवल कोई धर्म नहीं अपितु जीवन जीने की पद्धति है| और अब तो सभी का ऐसा मानना है कि यही सर्वश्रेष्ठ पद्दति है, जिसने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया| जियो और जीने दो का नारा दिया| इसी विश्वास के साथ हम अपनी सनातन पद्धति में जीते रहे और कभी किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया| कभी किसी अन्य सम्प्रदाय को नष्ट करने की चे ष्टा नहीं की| कभी किसी देश के संवैधानिक मूल्यों का अतिक्रमण हमने नहीं किया| बस सबसे यही आशा की कि जिस प्रकार हम प्रेम से जी रहे हैं उसी प्रकार सभी जियें| किन्तु दुर्भाग्य ही था इस माँ का जो कुछ सम्प्रदायों ने हमारी सनातन पद्धति को नष्ट करने की चेष्टा की| हज़ार वर्षों से अधिक परतंत्र रहने के बाद भी हमारी सनातन पद्धति सुरक्षित है यही हमारी पद्धति की महानता है, यही हमारी संस्कृति की à ��हानता है| मुझे गर्व है मेरी संस्कृति पर|

मित्रों, मैं शीर्षक से भटका नहीं हूँ केवल भूमिका बाँध रहा हूँ|

अभी कुछ दिन पहले मैंने एक वीडियो देखा| इस वीडियो में डॉ. जाकिर नाईक से एक प्रश्न पूछा गया कि मुसलामानों को वंदेमातरम क्यों नहीं गाना चाहिए?

वीडियो का लिंक यहाँ है-http://www.youtube.com/watch?v=xh3rjYN2qe8

उत्तर में जाकिर नाईक का कहना है कि ”मुसलमानों को ही नहीं अपितु हिन्दुओं को भी वंदेमातरम नहीं गाना चाहिए| क्यों कि वंदेमातरम का अर्थ है कि मैं अपने घुटनों पर बैठ कर अपनी मातृभूमि को प्रणाम करता हूँ, उसे पूजता हूँ| जबकि हिन्दू उपनिषदों और वेदों में यह लिखा है कि भगवान् का कोई रूप नहीं है, कोई प्रतिमा नहीं है, कोई मूर्ति नहीं है| फिर भी यदि हिन्दू अपनी मातृभूमि को पूजते हैं तो वे अपने ही धर्म के विरुद्ध हैं| जबकि हम मुसलमान अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हैं, आदर करते हैं, और आवश्यकता पड़ने पर अपनी जान भी इसके लिए दे सकते हैं किन्तु इसकी पूजा नहीं कर सकते| क्योंकि यह धरती खुदा ने बनाई है और हम खुदा की पूजा करते हैं| हम रचयिता की पूजा करते हैं रचना की नहीं|”

कितना तरस आता है इनकी बुद्धि पर| मैं मानता हूँ कि अधिकतर भारतीय मुसलमान इस विषय पर डॉ. जाकिर नाईक से सहमत नहीं होंगे| कितनी छोटी सी बात है और वह भी इन्हें समझ नहीं आई| केवल शब्दों पर ध्यान देना गलत है उनके पीछे छिपी भावना का भी तो कुछ मूल्य है| ऐसा कह देना कि हिन्दू ही अपनी आस्था को गलत ठहरा रहे है झूठ है|

सनातन पद्धति कहती है कि ईश्वर माँ है| माँ का अर्थ केवल वह स्त्री नहीं जिसने हमें जन्म दिया है| माँ तो वह है जिससे हमारी उत्पत्ति हुई है| जिस स्त्री ने नौ मास मुझे अपनी कोख में रखा व उसके बाद असहनीय पीड़ा सहकर मुझे जन्म दिया वह स्त्री मेरी माँ है, जिस स्त्री ने मुझे पाला मेरी दाई, मेरी दादी, मेरी नानी, मेरी चाची, मेरी ताई, मेरी मासी, मेरी बुआ, मेरी मामी, मेरी बहन, मेरी भाभी ये सब मेरी माँ है, जिस पुरुष ने मुझे जन्म दिया वह पिता मेरी माँ है, मेरे गुरु, मेरे आचार्य, मेरे शिक्षक जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया वे सब मेरी माँ हैं, जिस मिट्टी में खेलते हुए मेरा बचपन बीता वह मिट्टी मेरी माँ है, जिन खेतों ने अपनी फसलों से मेरा पेट भरा वह भूमि मेरी माँ है, जिस नदी ने अपने जल से मेरी प्यास बुझाई वह नदी मेरी माँ है, जिस वायु में मै सांस ले रहा हूँ वह वायु मेरी माँ है, जिन औषधियों ने मेरी प्राण रक्षा की वे सब जड़ी बूटियाँ मेरी माँ हैं, जिस गाय का मैंने दूध पिया वह गाय मेरी माँ है, जिन पेड़ों के फल मैंने खाए, जिनकी छाँव में मैंने गर्मी से राहत पायी वे पेड़ मेरी माँ हैं, वे बादल जो मुझ पर जल वर्षा करते हैं वे बादल मेरी माँ है, वह पर्वत जो मेरे देश की सीमाओं की रक्षा कर रहा है वह पर्वत मेरी माँ है, यह आकाश जिसे मैंने ओढ़ रखा है वह भी मेरी माँ है, वह सूर्य जो मुझे शीत से बचाता है, अंधकार मिटाता है वह अग्नि मेरी माँ है, वह चन्द्रमा जो मुझ पर शीतल अमृत बरसाता है वह चंदा मामा मेरी माँ है, वह शिक्षा जिसे मैंने पढ़कर उन्नति की, वह विद्या मेरी माँ है, वह धन जिससे मैंने अपना भरण पोषण किया वह मेरी माँ है, आपकी माँ भी मेरी माँ है, वह सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, जीवन पद्धति, जीवन मूल्य जिनमे मेरा जीवन बीत रहा है ये सब मेरी माँ हैं| मेरे पूर्वज जिन्होंने मेरे कुल को जन्म दिया वे �¤ �ुरखे मेरी माँ हैं, वे शूरवीर जिन्होंने मेरी रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी वे सब मेरी माँ हैं| इन सबसे मेरी उत्पत्ति हुई है अत: ये सब मेरी माँ हैं| और मेरी सनातन पद्धति यह कहती है कि माँ ईश्वर के तुल्य ही है तो मैं मेरी माँ की पूजा क्यों न करूँ?

क्या प्रकृति ने हमें जन्म नहीं दिया? क्या हमारी मातृभूमि ने हमारा पालन पोषण नहीं किया? जब यह हमारी माँ है और हम मानते हैं कि हमारी माँ ईश्वर है तो हम उसकी पूजा क्यों न करे? सनातन पद्धति में माँ को ईश्वर के समकक्ष रखने के पीछे यह एक महत्वपूर्ण कारण है| तभी तो हम प्रकृति की पूजा करते हैं| हम माँ-बाप का सम्मान करते हैं, बड़े बुजुर्गों का आदर करते हैं यह हमारी उपासना ही तो है| हम मूर्ति पूजा करते हैं, हम पेड़ों की पूजा करते हैं, हम मिट्टी की पूजा करते हैं, हम खेतों की पूजा करते हैं, हम गायों की पूजा करते हैं, अन्य कई जीवों की पूजा करते हैं, हम नदियों, झरनों, पहाड़ों, फूलों की पूजा करते हैं, हम सूर्य की पूजा करते हैं, हम चन्द्रमा व तारों की पूजा करते हैं, हम आकाश व बादलों की पूजा करते हैं, हम ज्ञान व विद्या की पूजा करते हैं, हम धन की पूजा करते हैं, हम गाय के गोबर की भी पूजा करते है ं, हम जड़ीबूटियों की पूजा करते हैं, हम वायु की पूजा करते हैं, और भी बहुत उदाहरण हैं क्यों कि इन सबसे हमारी उत्पत्ति हुई है अत: हम इन सबकी पूजा करते हैं|

मित्रों मैं फिर याद दिला दूं, मैं किसी की आस्था को ठेस नहीं पहुंचा रहा| ईश्वर की परिभाषा तो सभी धर्म एक ही देते हैं| जैसे इस्लाम भी यही कहता है कि खुदा का कोई रूप नहीं, आकार नहीं, उसी प्रकार हम भी तो ईश्वर की यही परिभाषा देते हैं| फिर हिन्दू और मुसलमान अलग कैसे? ईसाइयत में भी परमेश्वर की यही परिभाषा है| गौतम बुद्ध व महावीर जैन ने भी यही परिभाषा दी है| तो फिर अलग धर्म की आवश्यकता ही क्या है| ऐ से तो राम धर्म, कृष्ण धर्म, हनुमान धर्म और पता नहीं क्या क्या धर्म बन जाते| क्या पता ५०० वर्षों बाद कोई गांधी धर्म ही बन जाए जो केवल महात्मा गांधी तक सीमित हो|

तो यह कह देना कि ”हम अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हैं, आदर करते हैं, और आवश्यकता पड़ने पर अपनी जान भी इसके लिए दे सकते हैं किन्तु इसकी पूजा नहीं कर सकते” यह कहाँ तह उचित है? जब प्रेम को भी ईश्वर का ही नाम दिया गया है तो उस प्रेम की पूजा क्यों नहीं कर सकते? मातृभूमि से प्रेम कर सकते हैं तो उसकी पूजा क्यों नहीं कर सकते?

जैसा कि ईश्वर की परिभाषा सभी धर्मों ने सामान ही दी है तो अंतर केवल इतना है कि उस ईश्वर को मानने वाले किसी एक अनुयायी का हमने अनुसरण आरम्भ कर दिया| ईसाईयों ने प्रभु येशु का अनुसरण किया, मुसलमानों ने पैगम्बर मोहम्मद का अनुसरण आरम्भ किया, जैन धर्म ने महावीर जैन का अनुसरण आरम्भ किया, बौद्ध धर्म ने गौतम बुद्ध का अनुसरण आरम्भ किया, किन्तु सनातनियों ने प्रत्येक महानता का अनुसरण आरम्भ किया| भगवान् राम, कृष्ण, हनुमान, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, साईं, गुरु नानक देव, गुरु गोविन्द सिंह, तथागत बुद्ध, महावीर जैन, प्रभु येशु, पैगम्बर मोहम्मद आदि इन सभी का अनुसरण किया| जी हाँ सभी का| सनातनी वही है जो किसी भी धर्म स्थल पर पूरी आस्था के साथ ईश्वर की उपासना करता है| फिर चाहे वह मंदिर हो, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, जैन या बौद्ध मंदिर हो सभी स्थानों पर ईश्वर तो एक ही है| क्यों कि यह तो कण कण में विराजमान है|

फिर मै केवल रचयिता की पूजा करूँ किन्तु रचना की नहीं यह कैसे संभव है? मै मेरी माँ से प्रेम करता हूँ, तो जाहिर है मेरी माँ से जुडी प्रत्येक वस्तु भी मुझे प्रिय है| मेरी माँ के हाथ का भोजन जो वह मुझे प्रेम से खिलाती है, वह मुझे प्रिय है, क्यों कि यह मेरी माँ की रचना है| मेरी माँ की वह लोरी जिसे गाकर वह मुझे सुलाती है वह भी मुझे प्रिय है, मेरी माँ की वह डांट जो मेरे द्वारा कोई गलती करने पर मुझे पड़ती है वह भी मुझे प्रिय है| मेरी माँ तो रचयिता है जबकि ये सब उसकी रचनाएं हैं अत: ये सब मुझे प्रिय हैं|

 

अंत में मै फिर से दोहराता हूँ कि मै किसी भी धर्म, वर्ण, जाति, सम्प्रदाय आदि का विरोधी नहीं हूँ| मै मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि सभी स्थानों पर जाना पसंद करता हूँ| मै भगवान् राम, पैगम्बर मोहम्मद, प्रभु येशु, गुरु नानक आदि सभी की उपासना करता हूँ| क्यों कि यही मेरी सनातन पद्धति ने मुझे सिखाया है| आशा करता हूँ कि सभी सम्प्रदायों के अनुयायी इसे समझेंगे| अमानवीय कृत चाहे वे किसी भी धर्म में होते हों, उनकी निंदा करनी ही चाहिए| फिर चाहे वह अन्य धर्म के अनुयाइयों को पीड़ा देना हो, उनसे घृणा करना हो, निर्दोष जीवों की हत्या हो या कुछ और यह स्वीकार करने योग्य नहीं है|

 

नोट: इसे कोई प्रवचन न समझें, यह मेरी सनातन पद्धति है|

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13 thoughts on “प्रकृति ईश्वर ही तो है…

  1. दिवस दिनेश गौड़Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय मधुसुदन जी…बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने इस लेख को इतनी बारीकी से पढ़ा व मेरा उत्साह वर्धन किया…आपने मेरे मनोभावों का बिलकुल सही सही आकलन किया है…मैं बता नहीं सकता कि लिखते समय मैं कितने उत्साह से भर गया था…एक ऊर्जा का अनुभव कर रहा था…इतना आनंद कि क्या बताऊँ…हमारा सनातन धर्म कुछ है ही ऐसा…
    आदरणीय राजेश गुप्ता जी मेरे उत्साह को बढाने के लिए आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद…

  2. डॉ. मधुसूदनडॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    सनातन सत्य को दीप्तिमान करने वाला यह निबंध सुगढ, सुगम, सुरस और सुंदर बन पाया है। गद्यकी सीमा लांघकर कई बार काव्य के प्रांत में स्वच्छंद विचरण करता प्रतीत होता है। लिखते समय भी, आप को उन्नत, अभिव्यक्ति के साथ, एक निर्मल, आनंद की – लहर मस्तिष्क में अनुभव हुयी होगी ही, ऐसा अनुमान करता हूं। नितांत सुंदर लेख। अभिनंदन, अभिनंदन अभिनंदन।
    आपको पढनेवाला यदि आप से संवादिता साध नहीं पाए, तो आप को समझ नहीं पाएगा। इसकी बहुत चिंता ना करें।

  3. Rajesh gupta

    अति उत्तम /साधारण सब्दो में व्यक्त करना बहुत मुस्किल होता है

  4. दिवस दिनेश गौड़Er. Diwas Dinesh Gaur

    भाई विनोद मौर्य जी मैं आपका धन्यवाद प्रकट करता हूँ कि आपने अपने विचारों को सम्पूर्ण विवरण के साथ प्रस्तुत किया| देखिये पहली बात तो यह है कि भगवान् को खोजने के लिए इधर उधर भटकने की आवश्यकता ही नहीं है, उसे आप अपने भीतर ही देख सकते हैं| देखिये भगवान् ने आपको जन्म दिया है, रहने के लिए यह धरती दी है, खाने के लिए यह फल, सब्जियां व अनाज आदि दिए हैं, पीने के लिए पानी व सांस लेने के लिए वायु…अब और क्या चाहिए? क्या पूरा जीवन वह हमारा हाथ पकड़ कर चलता रहे, हमें हर मुसीबतों से वही बचाए? क्या हमारा अपना कोई कर्म-धर्म नहीं है? कुछ तो हमें खुद को भी करना पड़ेगा| यह लड़ाई, अन्याय, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि यह सब भगवान् ने नहीं मनुष्य ने बनाया है| यदि मनुष्य यह सब न बना कर प्रेम पूर्वक जीता रहता तो क्या सब कुछ ठीक नहीं होता? अत: इसके लिए भगवान् को दोषी क्यों ठहराना| आप चाहते हैं कि भगवान् कदम कदम पर आपकी सभी मुश्किलों को ख़त्म करदे तो आपके अस्तित्व के होने का अर्थ ही क्या है? अत: किसी भी प्रकार के अन्याय में हमें ईश्वर से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह हमें पग पग पर बचाने आएगा| इसके लिए हमें स्वयं प्रयास करने होंगे| जब चिड़िया का बच्चा उड़ना सीख लेता है तो उसकी मान उसे अपने घोंसले से बाहर निकाल देती है ताकि वह आत्म निर्भर बन सके, अपना जीवन अपने दम पर फी सके|
    दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे नहीं पता कि आपको किसने यह कहानी सुनाई है| इस प्रकार की व इससे मिलती जुलती हज़ारों कहानियाँ इधर उधर मिल जाएंगी, कुछ तो बिलकुल इसके विपरीत होंगी| आप किस किस पर विश्वास करते रहेंगे? इस प्रकार की निराशाजनक बातों पर ध्यान न दें जो मनुष्य की अंतिम उम्मीद को भी नकार दे| सकारात्मक विचारों का अध्ययन करें|
    हज़ारों धर्म व जातियों का फंडा आपको समझाने की आवश्यकता मुझे नहीं है, आप स्वयं इसे समझ सकते हैं| मैं लेख में भी लिख चूका हूँ कि प्रत्येक धर्म ईश्वर की परिभाषा एक ही दे रहा है| विचार सबके अलग अलग हो सकते हैं इसमें कोई बुरी बात नहीं है| प्रत्येक व्यक्ति जीवन को अपने दृष्टिकोण से देखता है| मेरा भाई कुछ सोचता है और मई कुछ अलग तो यह हमारे बीच में मतभेद का कारण नहीं हो सकता|
    भगवान् और शैतान मनुष्य के भीतर हैं| जो जिसे जगा ले वो वही बन जाता है| राम ने अपने अन्दर के भगवान् को जगा लिया अत: आज हम भगवान् राम को पूजते हैं| रावण ने अपने अन्दर शैतान को जीवित किया अत हज़ारों वर्षों बाद भी वह अपमानित किया जा रहा है|
    अत: बंधू आप अपना विश्वास भगवान् में रखे तो आप सकारात्मक सोच को पाएंगे और आपके कर्म भी सकारात्मक होंगे| आपने तो लिख दिया कि यह दुनिया शैतान चला रहा है और भगवान् का इस पर कोई अधिकार ही नहीं है| ऐसा कह कर आपने एक गरीब की अंतिम उम्मीद को भी तोड़ दिया जो यह सोच रहा था कि एक दिन ईश्वर मेरी सहायता को आएँगे और यही विचार किये वह अपने कर्म कर रहा है| किन्तु जब उसे इस प्रकार का विश्वास होगा कि भगववान तो कुछ है ही नहीं यह दुनिया शैतान चला रहा है तो वह उम्मीद छोड़ देगा और अपनी लड़ाई में वह पाप और पुण्य की भी चिंता नहीं करेगा|
    अत: भगवान् का होना परम आवश्यक है| आप अपने मन के भीतर ईश्वर को जीवित रखें आपको परिणाम मिलेगा| शैतान के अस्तित्व को नकार दें शैतान ख़त्म हो जाएगा| जीवन तो आप पर निर्भर करता है. भगवान् या शैतान पर नहीं…

  5. Vinod morya

    Mere priy dost divas Dinesh gaur G apne mera lekh padha thank you so much Mai allahabad UP se hu mai bhi Hindu hu mujhe is baat ki khushi hai ki bhaagvan ko khojne vale Ho nahi to aaj ke daur me sab mauj masti se lagav rakhate hai
    Mai bhi bhaagvan ko khojne vala tha aur dil se khoj raha tha Aaj mujhe sachchai mil gayi hai Mai bahut khush hu lekin bahut mehnat karna pada ek din mai Mumbai powai me duty par baitha tha kuchh soch raha tha ek aadmi aaya mujhse bola mujhe aap se kuchh kahna hai Maine bola kaho tab usne is sansar aur dharm ki puri bat batai mughe kuchh bat par visvas hua kuchh par nahi tab usne kaha aap aisa mat sochana ki Mai apni marji se aaya hu mujhe mere prabhu ne bheja tab aaya,,,aur usne kaha agar apko sachchai janna chahte Ho to apne apko puri Tarah badalna Hoga maine kaha kuchh bhi karunga sachchai ke liye ,, tab usne kaha. Aap ko kisi se dosti karna hai to aap ko uske jaisa hona.padega
    Usi Tarah aap ko. Bhi bhaagvan ka gyan aur is sansar ka sach janne ke liye unke baare me Janna ya malum karna bahut jaruri hai uske bare janne ke liye bahut aasan hai
    usne kaha ek bap ka bete se jo rista hai vahi vahi manav jati ka bhaagvan ke sath bhi hai ek bap Jo apne bête se chahta hai vahi bhaagvan bhi hamse chahte hai usne mujhe bahut sari batein batai
    jaisa ki ek bura aadmi koi aisa kam karne ja raha hai jiski vajah se hajaro log ki maut Ho sakti hai ab bat a hai bhaagvan ko a baat pata hai to kyu kuchh nahi karte Q chup chap rahte hai aur hajaro maare jate hai us hajaro me kitne aachchhe log bhi hote hai
    aaj sansar me lakjo burai hai bahut si new bimari hamare samne aayi hai jiska koi elag nahi koi din rat ya to puri jindagi Pooja prathna kare to bhi bhaagvan nahi sunte Q ham log se O dur hai ,,,,, tab usne mujhe bataya is sansar par bhagvan ka koi hak nahi ki O kisi insan ki madat kare Qki is sansar par shaitan.ka rajy chal raha hai agar bhagvan kisi ki madat karna chahe to bhi nahi kar sakte agar O kisi ki madat karenge to shaitan ne Jo kalank ya to eljam bhagvan par lagaya tha bhagvan shart har jayenge
    ab eljam Kya tha sansar ki rachna ya to sristi puri hone ke bad bhagvan jab pahla joda nar nari banaya tab unko aashis di foolo falo bachche paida karo pure sansar bhar me phail jaao Maine tumko banaya hai Mai tumhare pita hu tum mere putra Ho aur hamari upasna karna,,aur ped ke phal tumhare khane ke liye hai lekin bageecha ke beech me Jo bhale bure gyan ka ped ka phal na khana nahi to tum jarur hi mar jaaoge lekin bhagvan ne unhe ajad marji ka Malik banaya taki insan apni marji se jindagi jiye khush rahe
    ab bhagvan ke parivar ke bare me jante hai unka parivar swarg dut se bana hai swarg bhagvan ka nivas sthan hai sabse pahle swarg bana fir dut banaye Gaye sab swarg dut ko bhi apni marji se jindagi jeene la taufa mila tha bhagvan ko pata hai aur hame bhi ek insan is tareeke se apni jindagi me khush rahega lekin aajadi milane par koi bhi bigad sakta hai a bat hame aur bhagvan ko bhi pata hai
    ab swargdut me ek ne yah eljam bhagvan par lagaya ki apne Jo insan ka joda nar nari banaye Ho jeene ka tareeka unhe diye Ho O sahi nahi hai is se sahi tareeka Mai janta hu bhagvan bhi Kya karte is lagaye hua eljam ko sabit karne ke liye bhagvan ne us dut se kaha thik hai agar apka tareeke par insan jati khush rahegi to thik hai ab tum mujhe sansar chala ke dikhaao
    Fir us dut ne sarp ka roop banaya aur nari ke pas Gaya use bahkane laga Kya bhagvan ne tumhe sab ped ke phal khane ke liye mana kiya hai tab aurat ne kaha nahi sab ped ka phal kha sakte hai lekin bageeche ke beech me Jo bhale bure ka gyan ka ped hai use mat khana nahi to mar jaaoge
    tab us dut ne kaha avasy hi na maroge balki tum bhagvan ke tuly Ho jaaoge is Tarah swargdut ne aurat ko bahkaya jhuth bolkar
    phir aurat ne bhale buru ke gyan ka ped ka phal dekha phal dekhne me sundar tha aurat ne do phal toda ek khud khayi ek pati ko di usne bhi khaya is Tarah nar aur nari ne bhagvan ka aagya Tod di aur maha pap kar baithe
    dut jisne kalank lagaya tha bhagvan se bagavat kiya aur unka virodhi yani shaitan ban baitha
    ab dhyan do phir bhagvan ne nar aur nari aur dut teeno ko shrap diya
    insan ko bole tu apni kamai ki roti se pet bharega
    aurat ko to apne pati ke aadhinta me rahegi aur tere garbh se Jo bachche paida honge peeda ya dard ke sath honge
    shaitan ko bole Mai tere aur aurat ke vans me bairata hogi aurat ka vans Teri sar kuckal déga

    Tab bhagvan insan se dur Ho Gaye aur dut. Yani shaitan is sansar ko chala raha hai
    Jo chahta hai man ki marji vahi karts hai Q ki pura sansar uske undar me hai aaj sansar me etni burai hai aap is baat par bahut gaur se socho bhagvan agar is sansar me hote to Kya itni burai hoti ab aap sochte honge sanatan dharm etne purane hai phir enka Kya mujhe bhi aisa hi lagta tha lekin ab nahi lagta
    ab socho aur DiMag ka estemal karo
    har dharm alag alag shikchha kyo deta
    har dharm ke guru ko dekho alag alag shikchha kyo batate hai
    agar bhagvan ne sab ko bheja hota to puri duniya ke. Guru ki ek jaisi Shikchha hoti
    har bat To Dinesh g Mai nahi likh sakta
    yahi vajah hai ki sansar me hajaro dharm hajaro jati jati ke log taki ham aapas me bair rakhe aur Bhagwan se dur Ho jaye jisne is bat par gaur kiya samajh Gaya samjho uski saty ka gyan Ho Gaya bas etni bat samjhne ke liye bade bade guru padhe likhe log bhi nahi samajh pate Qki
    Ab Kya kahu
    Sabko lagta hai insan Marega nahi to sansar kaise chalega aise log bhi hai Jo Bhagwan ki shakti ka andaja nahi aisi prithvi Nast karke banana ek din ka kam hai

    he mere priy Bhai log please meri bat par socho Qki ant ka samay nikat jab pura sansar Nast kar diya jayega

    (1) jaisa tum chahte Ho ki sab log tumhare sath achchhai kare tum bhi unke sath vaisa hi karo
    (2) sahi bhakt ya das vah hai Jo sansar se niskalnk rahe
    (3) sansar ke sab insan se prem karo
    (4) Jo apno apno se prem karta hai uska kuchh phal nahi Jo apne dusman se prem aur satane vale ke liye Bhai jankar bhagvan se prathna kare uske liye bahut bada pratiphal hai
    hamara lekh agar kisi ko bura lage maph karna Jo hamne apne bhagvan se sikha hai vahi likh diya

  6. Vinod morya

    Mere priy dost divas Dinesh gaur G apne mera lekh padha thank you so much Mai allahabad UP se hu mai bhi Hindu hu mujhe is baat ki khushi hai ki bhaagvan ko khojne vale Ho nahi to aaj ke daur me sab mauj masti se lagav rakhate hai
    Mai bhi bhaagvan ko khojne vala tha aur dil se khoj raha tha Aaj mujhe sachchai mil gayi hai Mai bahut khush hu lekin bahut mehnat karna pada ek din mai Mumbai powai me duty par baitha tha kuchh soch raha tha ek aadmi aaya mujhse bola mujhe aap se kuchh kahna hai Maine bola kaho tab usne is sansar aur dharm ki puri bat batai mughe kuchh bat par visvas hua kuchh par nahi tab usne kaha aap aisa mat sochana ki Mai apni marji se aaya hu mujhe mere prabhu ne bheja tab aaya,,,aur usne kaha agar apko sachchai janna chahte Ho to apne apko puri Tarah badalna Hoga maine kaha kuchh bhi karne ke liye sachchai ke liye

  7. दिवस दिनेश गौड़Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय डॉ. कपूर साहब आपने मेरी संवेदना एवं भावना को समझा यह जानकर बड़ी ख़ुशी हुई| इस उत्साह वर्धन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद…जितने स्वच्छ व सरल आपके विचार हैं उतने ही सुन्दर शब्दों में आपकी टिपण्णी पाकर मेरे लेख की शोभा बढ़ गयी…
    आदरणीय प्रेम सिल्ही जी आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद…आपकी टिप्पणी ने मेरे उत्साह और जोश को और अधिक बढ़ाया है…

  8. प्रेम सिल्ही

    बहुत सुन्दर विचार हैं| धर्म, जाति, और दूसरे सभी वाद-विवादों से ऊपर उठ यही है भारतीयता और जो भी भारत में आया कभी इस से अछूता नहीं रह पाया| “दो गज़ ज़मीं भी न मिली कुए यार में” अपनी महबूबा भारत के प्रति जफ़र का रंज ही तो था|

  9. डॉ. राजेश कपूरdr.rajesh kapoor

    दिवस जी आपका यह लेख अत्यंत भावपूर्ण, आपकी संवेदनशीलता व समझ के ऊंचे स्तर को दर्शाने वाला है. भारतीय संतों, मनीषियों के अनुसार करुणा और अहेतुक प्रेम ही इश्वर प्राप्ति का मार्ग है ; बल्कि प्रेम ही ईश्वर है. जिसके पास प्रेम की संपदा नहीं, जो प्रेम से भरा नहीं वह प्रभु से बहुत दूर है. हमारी संस्कृति का इतिहास और दर्शन बतलाता है कि प्रभु विद्वानों को कभी नहीं मिलते, केवल प्रेमियों को, समर्पण करने वालों को, दीवानों को मिलते है.
    – भारत कि पुन्य भूमि पर केवल विदुर,सुदामा, अर्जुन, मीरा, नानक, तुलसी, कबीर ही तो जन्म नहीं लेते ; रावन, कंस, जरासंघ, दुर्योधन भी तो जन्म लेते हैं न. अन्यथा महान पुरुषों का जन्म सार्थक कैसे होगा ? प्रभु की लीला कैसे चलेगी ? अतः भारत में अपने जन्म के सौभाग्य को सराहते हुए अपना कर्तव्य पालन करते चलेंगे, इसी में हमारा आनंद और जीवन कि सार्थकता है. करने-कराने वाले हम कौन ”होई सोई जो राम रची राखा”

  10. दिवस दिनेश गौड़Er. Diwas Dinesh Gaur

    शैलेन्द्र भाई उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद…आप इस सत्य को स्वीकार करते हैं यही तो आपकी व हमारी शक्ति है…
    अभिषेक भाई आपका भी धन्यवाद…मै जाकिर नाईक पर ध्यान ही नहीं देता, वह तो मेरे कार्य में मेरा साधन सिद्ध हुआ है| तभी तो मै यह कुछ लिख सका| आपकी इस बात से मै भी सहमत हूँ की वह अपने आस पास अपने अनुरूप वातावरण बना कर बात करता है जहाँ उसका विरोध करने वाला कोई नहीं होता और इसी प्रकार वह लोगों की वाहवाही लूटता है| आपने आर्य समाज की प्रतिनिधि सभा के विषय में जिक्र किया है, कृपया इसके वीडियो का कोई लिंक बता सकें तो कृपा होगी…
    विनोद मौर्य जी आपका भी धन्यवाद…आपको मेरा लिखा सही लगा यह जानकर प्रसन्नता हुई| किन्तु आपकी टिपण्णी का भावार्थ मै नहीं समझ पा रहा हूँ| क्या आप यह कहना चाह रहे हैं की धरती पर भगवान् है ही नहीं? यदि ऐसा होता तो इस धरती पर कुछ भी अच्छा नहीं होता| किन्तु इस कलियुग में भी बहुत कुछ अच्छा है| आपको बताना चाहूँगा की मै यहाँ भगवान् व शैतान पर चर्चा नहीं कर रहा, मै तो मेरी जीवन पद्धति की बात कर रहा हूँ| मेरी सनातन पद्धति तो सर्वधर्म समभाव का नारा देती है| अत: मुझे पूरा विश्वास है की मेरी सनातन पद्धति एक सकारात्मक सोच वाली है| इसलिए मै मानता हूँ की ईश्वर कण कण में विराजमान है|

  11. Vinod morya

    मेरे प्रिय दोस्त लेख सही है लेकिन संसार के कण कण में इस्वर नहीं उसका जगह
    स्वर्ग है आप एक बहुत बड़ी सच्चाई से बे खबर हो इस संसार को इस्वर नहीं बल्कि सैतान चला रहा है
    इस संसार का नियम उसी का बनाया हुआ है जाट पट उच् नीच बहुत से धर्म झूठे बनाया है Jo हमें भगवन से दूर ले जाने आपस में बैर रखने के लिए है संसार में उसने बहुत से झूठे धर्म Granth लिखवाया है लोगो को लगता भगवन ने लिख वाया है कैसे अगर भगवन ने सब धर्म के ग्रन्थ लिखवाते तो सब ग्रन्थ की शीकछा एक जैसी होती लेकिन हर धर्म में अलग ही मिलता है Maine हर धर्म का ग्रन्थ पढ़ा है
    सैतान बहुत बेरहम है ओ नहीं चाहता की इन्सान भागवान की Pooja करे धर्म के रस्ते पर चले
    जूठ खाना अगर किसी को दो नहीं खायेगा लेकिन वाही खाना कुत्ता के सामने फेक दो तो भी
    खलेगा उसी Tarah भागवान है सच्ची पूजा ही को स्वीकार करते है शैतान के बनाये हुए धर्म की रीती रिवाज से अगर कोई भी भागवान की पूजा करे तो उसकी पूजा bekar जाती है उसका फायदा शैतान उठता है लेकिन शैतान आया कहा से जानना बहुत जरुरी है क्या वजह थी जो भागवान ने शैतान को संसार चलने को दिया
    अगर इस बात पर विश्वास नहीं तो आप पर भागवान की आशिस नहीं है

  12. अभिषेक पुरोहितabhishek purohit

    आप उस मुर्ख जाकिर निक को छोड़े भाई साहब ऊ पर ध्यान न दे,वो डरपोक आदमी है उसकी हिम्मत नहीं हुयी थी आर्य समाज की प्रतिनिधि सभा से बहस करने की वो अपने श्री श्रीरविशंकर जी बहुत ही ज्यादा सरल है is liye वो समन्वय की बाते करते रहे ओउर वो लगातार हिन्दुओ को गलिय बकता रहा है उसको तो बहस में में ही हरा दू ,उसकी तकनीक बहुत ही बकवास है वो अपने अस पास मुल्लाओ को इकठ्ठा करता है ओउर उनके बिच बैठ कर हिन्दू या इसियो को गलिय बकता है स्वतंत्र होकर बहस नहीं कर सकता है is प्रकार अपने को बताता है जैसे सब धर्मो के बारे में use pata है jabaki sabhi udhran farji hote है ,sirf v sirf ishavshy upanishad ही paryapt है usake liye ………………………….

  13. शैलेन्‍द्र कुमारshailendra kumar

    दिवस जी आपने एक शानदार लेख लिखा है, आपने अपने मनोभावों को बहुत ही सुन्दर रूप दिया है साधुवाद

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