लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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लोकेन्द्र सिंह राजपूत

अक्सर कहा जाता है कि साधु-सन्यासियों को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए। उनका काम धर्म-अध्यात्म के प्रचार तक ही सीमित रहे तो ठीक है, राजनीति में उनके द्वारा अतिक्रमण अच्छा नहीं। इस तरह की चर्चा अक्सर किसी भगवाधारी साधु/साध्वी के राजनीति में आने पर या आने की आहट पर जोर पकड़ती है। साध्वी ऋतंभरा, साध्वी उमा भारती, योगी आदित्यनाथ आदि के राजनीति में भाग लेने पर नेताओं और कुछ विचारकों की ओर से अक्सर ये बातें कही जाती रही हैं। इसमें एक नाम और जुड़ा है स्वामी अग्निवेश का जो अन्य भगवाधारी साधुओं से जुदा हैं। हालांकि इनके राजनीति में दखल देने पर कभी किसी ने आपत्ति नहीं जताई। वैसे अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में ये अग्रणी भूमिका निभाते हैं, इस बात से कोई अनजान नहीं है। पूर्व में इन्होंने सक्रिय राजनीति में जमने का प्रयास किया जो विफल हो गया था।

अन्ना हजारे के अनशन से पहले से बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगा रखी है। उन्होंने कालाधन वापस लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोलने के लिए अलग से भारत स्वाभिमान मंच बनाया है। वे सार्वजनिक सभा और योग साधकों को संबोधित करते हुए कई बार कहते हैं यदि कालाधन देश में वापस नहीं लाया गया तो लोकसभा की हर सीट पर हम अपना उम्मीदवार खड़ा करेंगे। उसे संसद तक पहुंचाएंगे। फिर कालाधन वापस लाने के लिए कानून बनाएंगे। उनके इस उद्घोष से कुछ राजनीतिक पार्टियों और उनके बड़बोले नेताओं के पेट में दर्द होता है। इस पर वे बयानों की उल्टी करने लगते हैं। आल तू जलाल तू आई बला को टाल तू का जाप करने लगते हैं। ऐसे ही एक बयानवीर कांग्रेस नेता हैं दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा। वे अन्ना हजारे को तो चुनौती देते हैं यदि राजनीतिक सिस्टम में बदलाव लाने की इतनी ही इच्छा है तो आ जाओ चुनावी मैदान में। लेकिन, महाशय बाबा रामदेव को यह चुनौती देने से बचते हैं। वे बाबा को योग कराने और राजनीति से दूर रहने की ही सलाह देते हैं। चार-पांच दिन से दिग्गी खामोश हैं। सुना है कि वे खुद ही एक बड़े घोटाले में फंस गए हैं। उनके खिलाफ जांच एजेंसी के पास पुख्ता सबूत हैं।

खैर, अपुन तो अपने मूल विषय पर आते हैं। साधु-संतों को राजनीति में दखल देना चाहिए या नहीं? जब भी कोई यह मामला उछालता है कि भगवाधारियों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। तब मेरा सिर्फ एक ही सवाल होता है क्यों उन्हें राजनीति से दूर रहना चाहिए? इस सवाल का वाजिब जवाब मुझे किसी से नहीं मिलता। मेरा मानना है कि आमजन राजनीति को दूषित मानने लगे हैं। यही कारण है कि वे अच्छे लोगों को राजनीति में देखना नहीं चाहते। वहीं भ्रष्ट नेता इसलिए विरोध करते हैं, क्योंकि अगर अच्छे लोग राजनीति में आ गए तो उनकी पोल-पट्टी खुल जाएगी। उनकी छुट्टी हो जाएगी। राजनीति का उपयोग राज्य की सुख शांति के लिए हो इसके लिए आवश्यक है कि संत समाज (अच्छे लोग) प्रत्यक्ष राजनीति में आएं। चाहे वे साधु-संत ही क्यों न हो। वर्षों से परंपरा रही है राजा और राजनीति पर लगाम लगाने के लिए धार्मिक गुरु मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं। वे राजनीति में शामिल रहे। विश्व इतिहास बताता है कि इस व्यवस्था का पालन अनेक देशों की राज सत्ताएं भी करती थीं। भारत में इस परिपाटी का बखूबी पालन किया जाता रहा। चाहे भारत का स्वर्णकाल गुप्त काल रहा हो या मौर्य काल हो या फिर उससे भी पीछे के पन्ने पलट लें। आचार्य चाणक्य हालांकि साधु नहीं थे, लेकिन उनकी गिनती संत समाज में तो होती ही है। इन्हीं महान चाणक्य ने राजनीति के महाग्रंथ अर्थशास्त्र की रचना की। प्रत्यक्ष राजनीति करते हुए साधारण बालक चंद्रगुप्त को सम्राट चंद्रगुप्त बनवाया और अत्याचारी घनानंद को उसकी गति तक पहुंचाया। वे सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज व्यवस्था में महामात्य (प्रधानमंत्री) के पद पर जीवनपर्यंत तक बने रहे। छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास को भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

रावण के अत्याचार से दशों दिशाएं आतंकित थीं। ऐसी स्थिति में बड़े-बड़े शूरवीर राजा-महाराजा दुम दबाए बैठे थे। विश्वामित्र ने बालक राम को दशरथ से मांगा और अपने आश्रम में उदण्डता कर रहे राक्षसों का अंत करवाकर रावण को चुनौती दिलवाई। इसके लिए उन्होंने जो भी संभव प्रयास थे सब करे। यहां तक कि राम के पिता दशरथ की अनुमति लिए बिना राम का विवाह सीता से करवाया। महाभारत के कालखण्ड में तो कितने ही ऋषि पुरुषों ने राजपाठ से लेकर युद्ध के मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। महात्मा गांधी भी संत ही थे। उन्होंने भी राजनीति को अपना हथियार बनाया। उन्होंने विशेष रूप से कहा भी है कि ‘धर्म बिना राजनीति मृत प्राय है’। धर्म की लगाम राजनीति से खींच ली जाए तो यह राज और उसमें निवास करने वाले जन समुदाय के लिए घातक सिद्ध होती है। यह तो कुछेक उदाहरण हैं, जिनसे हम सब परिचित हैं। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

मेरा मानना है कि संत समाज का काम सिर्फ धर्म-आध्यात्म का प्रचार करना ही नहीं है। समाज ठीक रास्ते पर चले इसकी व्यवस्था करना भी उनकी जिम्मेदारी है। अगर इसके लिए उन्हें प्रत्यक्ष राजनीति में आना पड़े तो इसमें हर्ज ही क्या है? साधु-संतों को राजनीति में क्यों नहीं आना चाहिए? इसका ठीक-ठीक उत्तर मुझे अब तक नहीं मिला। यदि आप बता सकें तो आपका स्वागत है।

7 Responses to “संतों से परहेज क्यों?”

  1. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    संत कौन नहीं है या कौन है इसका कोई मानक है? लाल रंग का कपड़ा पहन के दाढ़ी बढ़ा लेना संत-परम्परा है? लोकतंत्र संततंत्र नहीं बनना चाहिए…..हालांकि राजनीति के शुद्धिकरण के लिए किसी रंग विशेष के चोलाधारी की जरूरत से ज्यादा समूची जनता के योगदान की जरूरत है……अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता……..संघी भी कहते हैं ”संघे शक्ति कल्युगे” अर्थात ”युनियन” में एकता में शक्ति है….. धर्म जाती की बंदिशों से ऊपर उठकर जो भी जनता-जनार्दन को गले लगाएगा…..वो किसी रंग का कपड़ा पहनता हो, संत हो या गृहस्त……अपने raajneetik prayojan में safal hoga…

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  2. लोकेन्द्र सिंह राजपूत

    lokendra singh

    डॉक्टर साहब, दिवस जी, अजीत जी और शैलेन्द्र जी… आपका धन्यवाद जो आप संतों को राजनीति में लाने के समर्थन में हैं। डॉक्टर साहब आपने सही कहा। यही कारण है कि सभी अपने-अपने काम से काम रख रहे हैं तभी तो ये परिस्थितियां बनी हैं।

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    लोकेन्द्र जी आप ये क्या अनर्थ कर रहे हैं? राजनीति में चोर, स्मगलर, माफिया, देश के दुश्मन, विदेशी एजेंट, हत्यारे; सब हो सकते हैं. साधू-संतों का क्या कम है यहाँ ? ये तो सारे किये-धरे पर पानी नहीं फेर देंगे. एक बाबा रामदेव ने ही नाक में दम कर रखा है. सारा हलवा-मांडा छिनता नज़र अ रहा है. न तो खुद खाते हैं और न हमें ( नेताओं को )खाने देते हैं. ऐसों के हाथ में सता चली गयी तो आज के सारे के सारे नेता तो जेल की हवा खा रहे होंगे. आज के भिखारी देश के शासक बन बैठेंगे. राजपूत जी इस विपदा को बढ़ाकर, समर्थन देकर मुसीबत को बढाईये मत. आपको क्या फर्क पड़ता है. करोड़ों, अरबों की लुट चल रही है. अब तो देश में ही इटली और स्विस बैंक खुल चुके हैं, हाथ के हाथ लूट का पैसा विदेशी बैंकों में पहुंचाने का पुख्ता प्रबंध कर दिया है. आप भी लूट की इस बहती गंगा में हाथ धो लीजिये, पर नेताओं के रास्ते का रोड़ा मत बनिए. जो भूखे मर रहे हैं वे आपके रिश्तेदार तो हैं नहीं. बंद करिए ये बेकार के लेख लिखना. क्यूँ ठीक है न ?

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  4. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    सत्ता जब तक अनासक्त बुधिजिवियों के पास होती है तब तक समग्र हित करति है जब वह द्स्युओ के कब्जे मे चलि जाये तो इस प्रकार क भर्श्टाचार पनपता है आज सत्ता के शिर्ष पर बैथे बहुत ज्यादा करप्ट है वो अनासक्त नही है……………….vo budhijivi hai raavan ke samaan atyachari hai………….

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  5. ajit bhosle

    सारे देशभक्त भारतीय भी यही चाहते हैं की बाबा रामदेव लोकसभा की हर सीट पर उम्मीदवार खडा करें,क्योंकि भाजपा को भी धर्मनिरपेक्षता नाम की ला-इलाज बीमारी हो गयी है और इस बीमारी के चलते उनसे देश-हित की उम्मीद करना मूर्खता से ज्यादा कुछ नहीं है,अभी एक दो दिन पहले एक अच्छा समाचार पढ़ा की यूरोप के अधिकतर देश इस बात पर सहमत हो गए हैं की देश के बहुसंख्यक लोगों का ख़याल पहले रखा जाए और अल्प संख्यकों को यथोचित लेकिन सीमित अधिकार ही दिए जायेंगे सच पूछो तो यह भेदभाव है लेकिन अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देकर अधिकतर देश कितनी ही अनचाही मुसीबतों से घिर गए हैं, दुनिया का सबसे सुखी कहा जानेवाला डेनमार्क तक परेशान हो चुका है, चाहे हिन्दू हूँ बोद्ध हो, मुस्लिम हों सभी धर्म किसी देश विशेष की मौलिक संस्क्रती में अतिक्रमण की चेष्टा अवश्य करते हैं (एक पारसी धर्म ही ऐसा है जो किसी के लिए भी आज तक परेशानी का सबब नहीं बना शायद दुनिया का सबसे सच्चा धर्म यही है लेकिन यह विलुप्तता की और है क्योंकि कलयुग में कदाचित अच्छी बांतों का कोई महत्त्व नहीं है)

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  6. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    बहुत सही प्रश्न पूछा है आपने लोकेन्द्र भाई…इसका उत्तर तो मैं नहीं दूंगा क्योंकि मैं भी यही चाहता हूँ कि संत राजनीति में हस्तक्षेप करें| यह तो इस देश की परंपरा रही है| स्वामी रामदेव भी कहते हैं कि “जब जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने अपने कर्तव्यों से मूंह मोड़ा है सन्यासी ने अपना धर्म निभाया है|” सन्यासी भी तो इसी देश का नागरिक है फिर वह इस देश की राजनीति से अलिप्त कैसे रह सकता है? चोरों, लुटेरों, हत्यारों को राजनीति में स्थान देने से इन भ्रष्ट राजनेताओं को कोई आपत्ति नहीं है तो संतों से क्यों है? प्राचीन काल से ही राजा अपने मंत्रिमंडल में शिक्षकों व आचार्यों को स्थान देते आये हैं ताकि वे नीति पूर्वक राजनीति करते रहें व प्रजा के कल्याण में इनकी सलाह मानते रहें|
    अब कोई कुछ कितना भी भौंकता रहे यह शुभ कार्य तो होकर ही रहेगा| संत इस देश के कल्याण के लिए व इन भ्रष्टों को इनका मार्ग दिखाने के लिए अपने संवैधानिक धर्म का निर्वाह करेंगे|
    प्रस्तुत आलेख के लिए आपका धन्यवाद…
    सादर
    दिवस…

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