ज्येष्ठ माह की दोपहरी

आर के रस्तोगी 

देख दोपहरी ज्येष्ठ की,गर्म हो गया गात |
झुलस रहे है सब पेड़ो के नये कोमल पात ||

छाया भी छाया मांग रही ,है बड़ी बैचेन |
छाया को छाया मिल जाये तब आये चैन ||

प्यासा पथिक पूछ रहा है कहाँ मिलेगा नीर |
एक पग चलना है मुश्किल हो रहा वह अधीर ||

सूख गये है सभी सरोवर,मांग रहे है सब जल |
कर रहे विनती वरुण देव से दे दो हम को जल ||

प्यासे पशु पक्षी ढूँढ रहे है मिल जाये उनको पानी |
चारो तरफ निगाहें दौड़ा रहे दिखाई दे कही पानी ||

दिन बडे हो गये है ,छोटी हो गयी है रात |
ऐसी छोटी रात में कैसे होगी पूरी बात ||

गर्म गर्म लू ऐसे चल रही,जैसे शोलो की बारात |
इस ज्येष्ठ माह की दोपहरी,में हो रहे है आघात

आर के रस्तोगी

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