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    Homeसाहित्‍यकविताढूंढते ही रह जाओगे

    ढूंढते ही रह जाओगे

    बातो में कुछ बाते,
    चीजों में कुछ चीजे,
    इक्कीसवीं सदी में,
    ढूंढते ही रह जाओगे।

    घरों में पुरानी खाट,
    तराजू के लिए बाट,
    स्कूलों में बोरी टाट,
    ठेलो पर अब चाट।
    ढूंढते ही रह जाओगे।।

    आंखो में अब पानी,
    कुएं का ताजा पानी।
    दादी की अब कहानी,
    राजा रानी की कहानी,
    ढूंढते ही रह जाओगे।।

    शादी में अब शहनाई,
    कुरते में अब तुरपाई।
    बड़ों की अब चतुराई,
    दूसरे के लिए भलाई।
    ढूंढते ही रह जाओगे।।

    घरों में अब मेहमान,
    बड़ों का अब सम्मान।
    संतो की अब वाणी,
    कर्ण सा अब दानी।
    ढूंढते ही रह जाओगे।।

    मरने पर चार कंधे
    लेजाने को कुछ बंदे।
    जलाने को लकड़ी,
    तेरहवीं में पगड़ी।
    ढूंढते ही रह जाओगे।।

    आर के रस्तोगी

    आर के रस्तोगी
    आर के रस्तोगी
    जन्म हिंडन नदी के किनारे बसे ग्राम सुराना जो कि गाज़ियाबाद जिले में है एक वैश्य परिवार में हुआ | इनकी शुरू की शिक्षा तीसरी कक्षा तक गोंव में हुई | बाद में डैकेती पड़ने के कारण इनका सारा परिवार मेरठ में आ गया वही पर इनकी शिक्षा पूरी हुई |प्रारम्भ से ही श्री रस्तोगी जी पढने लिखने में काफी होशियार ओर होनहार छात्र रहे और काव्य रचना करते रहे |आप डबल पोस्ट ग्रेजुएट (अर्थशास्त्र व कामर्स) में है तथा सी ए आई आई बी भी है जो बैंकिंग क्षेत्र में सबसे उच्चतम डिग्री है | हिंदी में विशेष रूचि रखते है ओर पिछले तीस वर्षो से लिख रहे है | ये व्यंगात्मक शैली में देश की परीस्थितियो पर कभी भी लिखने से नहीं चूकते | ये लन्दन भी रहे और वहाँ पर भी बैंको से सम्बंधित लेख लिखते रहे थे| आप भारतीय स्टेट बैंक से मुख्य प्रबन्धक पद से रिटायर हुए है | बैंक में भी हाउस मैगजीन के सम्पादक रहे और बैंक की बुक ऑफ़ इंस्ट्रक्शन का हिंदी में अनुवाद किया जो एक कठिन कार्य था| संपर्क : 9971006425

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