लेखक परिचय

डॉ केडी सिंह

डॉ केडी सिंह

झारखण्ड से अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रूचि के चलते एक सामाजिक संस्था केडी सिंह फाउंडेशन का निर्माण किया जो मुख्य रूप से महिलाओं के लिए, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। सामाजिक सेवा करने हेतु ही राजनीति में कदम रखा है।

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डॉ केडी सिंह

downloadपिछले साल दिसम्बर में पैरामेडिकल की छात्रा के साथ हुए नृशंस दुष्कर्म ने भारतीय समाज के हर एक वर्ग को झकझोर कर रख दिया था। इस वारदात ने देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। देश की बड़ी आबादी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, युवाओं और समाज के जागरुक वर्ग द्वारा बड़े पैमाने पर सड़कों पर प्रदर्शन किया गया। जिसने इससे जुड़े मुद्दों का जवाब खोजने के लिए सत्ता को मजबूर किया। दुष्कर्म के खिलाफ नया कानून लागू हुआ, लोगों ने बदलती तस्वीर को महसूस किया। जिसका परिणाम हम सबने देख रहे हैं। दुष्कर्म से जुड़ी घटनाओं को लोगों ने क्रूरता और हिंसा के रुप में लिया। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोगों ने दुष्कर्म को एक सामाजिक बुराई के तौर पर स्वीकार कर लिया है। ये इसे भाग्य से जोड़कर देखते हैं और इसके प्रति उदासीन पड़े हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बलात्कार एक सामाजिक बुराई है और पिछले साल लोगों द्वारा हुई सार्वजनिक प्रतिक्रिया और विरोध पूर्णरूपेण जायज है। हालांकि, हम अभी भी उस समाज का हिस्सा हैं, जहां आज भी हमारे राजनेताओं और धर्माधिकारियों के द्वारा अपने बयानों में कह दिया जाता है कि सारी कमी पीड़िता की है उसी के कन्धों पर दुष्कर्म की जिम्मेदारी मढ़ दी जाती है, यह कहकर कि अगर महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर कम कपड़ों में आना जाना जारी रखेगी तो उनके साथ ऐसी घटनाएं घटेंगी ही, तो क्या उन महिलाओं को दुष्कर्म जैसी घटना से नहीं गुजरना पड़ता, जो पूरी तरह से ढ़ंके हुए कपड़ों में रहती है? तर्कसंगत और आधुनिक सोच रखने वाले नागरिकों पर अगर नज़र डालें तो वह इस प्रकार की सोच और बयानों से सहमत नहीं दिखते।

पुरुष प्रधान समाज में, पुरुषों को ही निर्णय, निर्माता और परिवार के पालनकर्ता के रूप में देखा जाता है, वे ही अधिक आक्रामक और हठी के रूप में देखें जाते हैं। इसके अलावा महिलाएं जिनकी भूमिका घर की देखभाल करने की है, स्वाभाविक रूप से अधिक संकोची और निष्क्रिय मानी जाती हैं। इसके परिणामस्वरुप पुरुष वर्ग के बीच एक मानसिकता ने घर कर लिया है कि ‘असली मर्द’ ही सेक्स के हकदार हैं, संभोग को पुरुष विजय के तौर पर माना जाता है और पुरुषों इस मामले में अपने को स्वंच्छद समझता है। एंड्रिया डॉर्किन कहते हैं, “बलात्कार कोई ज्यादती, कोई विचलन, कोई दुर्घटना या कोई गलती नहीं है – यह तो संस्कृति में परिभाषित कामुकता का प्रतीक हैं.”

हमारे देश में चिंताजनक स्तर पर लैंगिक अनुपात में असमानता देखी जा रही है। 2012 की ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के अनुसार हमारे देश 105वें स्थान पर है। यह बढ़ता लैंगिक अंतर भी कहीं न कहीं दुष्कर्म की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है, इसके अलावा महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध- जैसे यौन शोषण, अपहरण, बलात्कार के लिए अपहरण, दहेज़ हत्या, पति और रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ना और क्रूरता के साथ कन्या भ्रूण हत्या भी इसी सूची मंं शामिल है।

आम लोगों की मानसिकता और विश्वास को बदलना संभवतः एक नीति निर्माता के लिए सबसे मुश्किल काम है परन्तु एक मुद्दे का सामना करना सम्भव है, सरकार को भी इस समस्या की जड़ों में जाकर इससे लड़ने के जरुरत है। इसके अलावा सरकार द्वारा सक्रिय रूप से लैंगिक अंतर को कम करने की दिशा में नीतियों को आगे बढ़ना चाहिए। लिंग संवेदीकरण कार्यक्रम (जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम) के रूप में सरकार के पास विभिन्न साधन उपलब्ध हैं जिसकी शुरुआत प्राथमिक विद्यालय से कि जा सकता है, आगे शिक्षक, माता-पिता और स्कूल प्रशासन को कार्यशालाओं, अभिनव अभियान, सामुदायिक जागरूकता के जरिए जोड़ा जा सकता है। आज यह आवश्यक हो गया है कि दुष्कर्म जैसी बुराई से लंबे समय तक लड़ा जाये, केवल दृढ विश्वास कर और सक्रिय अभियान के माध्यम से महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और अन्य अपराधों को खत्म किया जा सकता है। पर क्या सरकार लिंग और कामुकता के बारे में सामाजिक मान्यताओं में बदलाव करेगी?

बीते साल बड़े पैमाने पर जनता के क्रोध के बाद, अंततः भयभीत सरकार अपनी नींद से जागी और दुष्कर्म से जुड़े कानूनों में संशोधन किये गए। लेकिन इसके बाद भी देश में दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि केवल कठोर क़ानून बनाने मात्र से दुष्कर्मों को रोका नहीं जा सकता है। शक्ति संतुलन के सिद्धांत के लक्ष्यों को केवल तब ही प्राप्त किया जा सकता है जब न्यायिक प्रक्रिया सुचारू रुप से काम करे। सजा को 2 साल से बढाकर 7 साल करना जरुरी नहीं है, बल्कि अपराधियों को अपराध करने से रोकना जरुरी है। परन्तु हमारे देश में आसानी से आरोपियों को पकड़ा जाना और उन्हें सजा दिलाना आसान नहीं है, ढ़ेरों सामाजिक दबाव काम करते रहते हैं।

हमारे कानून प्रवर्तन विभागों को एक आमूल परिवर्तन और पुन: समीक्षा की आवश्यकता है। प्रगतिशील और बुनियादी सुविधाओं को विभागों में सही स्थान पर रखा जाना चाहिए। जिससे देश में त्वरित प्रतिक्रिया की समीक्षा कर उन्हें सुविधानुसार स्थापित किया जा सके। ये सुविधाएं केवल तकनीकी रूप से सक्षम नहीं होनी चाहिए, इन्हें भी ठीक प्रकार से समय समय पर निरीक्षण परिक्षण कर बेहतर बनाने की आवश्यकता है। जिससे नवीनता के साथ कुशलता भी आ सके। दिल्ली में हुए दुष्कर्म काण्ड के बाद महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर की शुरुआत की गई, किन्तु महिलाओं से जुड़े अन्य सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए।

हाल के दिनों में अन्य सभी अपराधों के अलावा, दुष्कर्म की घटनाएं हमारे देश में बढ़ती ही जा रही है। आतंकवाद के भय की तरह ही महिलाओं की एक बड़ी आबादी छेड़छाड़ के भय से ग्रस्त है। उन्हें अपने पर हमले होने की आशंका बनी रहती है। भारत में जहां महिलाएं पुरूष वर्चस्व के अधीन हैं, वहां दुष्कर्म जैसी सामाजिक बुराई का सफाया जरूरी है, जिससे एक सार्थक संदेश दिया जा सके, और लैंगिक मतभेद की अंत की शुरूआत हो।

2 Responses to “महिलाओं के लिए भयमुक्त समाज जरूरी”

  1. mahendra gupta

    जरूरत सामाजिक जागृति की है, केवल कानून से यह समस्या हल होने वाली नहीं.जब तक समाज ऐसेलोगों का बहिष्कार नहीं करेगा उन्हें शीघ्र सजा दे अदालतों से उसकी पुष्टि नहीं कराएगा तब तक यह बीमारी दूर होने वाली नहीं.महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं पुरुषों में हैवानियत इस कदर हावी हो गयी है कि उसे न किसी रिश्ते की गरिमा का ध्यान रहा है न लड़कियों की मासूमियत का.गांव शहर सभी इस बीमारी से त्रस्त हो गए है..यही सब कुछ चला तो, समाज का हाल क्या होगा,यह कल्पना मात्र से ही कंपकंपी होती है

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    जब वृक्ष जड से ही सड रहा है, तो केवल पत्तों को छाँटने-काटने से क्या होगा?
    किसी भी समाचार पत्र को खोलें, किसी भी विज्ञापन को देखें—–आपको संज्ञान हो जाएगा।
    जो पाप हमारे मस्तिष्क में बसा है, उसे वाणी या लेखन से छिपाने पर भी वह छिपेगा नहीं।
    मनसा-वाचा-कर्मणा —-शुद्धि,– यही राज मार्ग है।
    पुरखे जो बता गये हैं—वे मूरख नहीं थे।

    पर आँधी से बचने-बचाने के लिए बालकों पर अच्छे संस्कार करना ना भूले।
    आज ब्रह्मचर्याश्रम डाँवाडौल है। ग्रहस्थाश्रम जीवन के अंत तक चल रहा है।सामान्य व्यक्ति आज ग्रहस्थाश्रम में ही मरता है।
    यह होता इस लिए भी है, कि, जीवन में, आध्यात्मिकता नहीं है।
    सारी आध्यात्म रहित —जडवादी, भौतिकतावादी, शीघ्र-पूर्ति में रुचि रखनेवाली विचार धाराओं वाले देश भक्त अवश्य सोचें।
    कि, प्रगति का यह आपका रास्ता कहीं नर्क में तो जाता नहीं, ना?
    और क्या कहें?
    —–तरूण तेजपाल आज निस्तेजपाल हो गये?

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