लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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riots– विनोद बंसल 

मुजफ्फरनगर दंगे के बाद अब उच्चतम न्यायालय न सिर्फ़ दंगों की जांच करेगा बल्कि राहत एवं पुनर्वास कार्यो की निगरानी भी करेगा। मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक तनाव की हिंसक झड़पों के बाद उसके भीषण दंगे में तब्दील हो जाने के पीछे शासन और प्रशासन की सुस्ती या षडयत्रों के संकेत साफ दिख रहे हैं। यह सर्व विदित है कि क्षेत्र में बढती लव ज़िहाद प्रेरित छेड़छाड़ की घटना और फिर उसे लेकर दो हिन्दू युवकों की हत्या के मामले में पुलिस को सही ढंग से काम नहीं करने दिया गया। टेलीविजन चेनलों तथा अन्य प्रसार माध्यमों से पूरी दुनिया ने देखा कि किस प्रकार देश का सबसे बडा प्रदेश पिछले डेढ वर्ष में सबसे ज्यादा दंगों को झेलने वाला प्रदेश बना किन्तु वहां की सरकार में बैठे लोग अभी भी अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति और वोट बैंक के लालच से बाहर आने का नाम भी नहीं ले रहे हैं।

मुजफ्फरनगर दंगों की पृष्ठ भूमि में जाने से पता चलता है कि इतनी बडी घटना के पीछे हिन्दू छात्रा के साथ एक मुस्लिम युवक द्वारा की गई छेड-छाड की घटना मूल कारण है। यह छात्रा विद्यालय से घर लौट रही थी और छात्रा के भाई द्वारा उसका विरोध करने पर भी जब वह युवक नहीं माना तो उनमें आपस में कहा सुनी हो गई और मामला एक दूसरे के खून लेने पर उतर आया। छात्रा के दो घनिष्ठ संबंधियों को वीभत्स तरीके से सरे आम मौत के घाट उतारने के बावजूद भी जघन्य हत्यारों पर शिकंजा कसने के बजाय पुलिस-प्रशासन द्वारा उन्ही के परिजनों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज किए जाने से पूरे प्रकरण का सांप्रदायीकरण होना स्वाभाविक ही था। हद तो तब हो गई जब पुलिस ने मामला हाथ से निकलते देख हिम्मत कर कुछ दंगाईयों को गिरफ़्तार तो किया किन्तु लखनऊ से निर्देश आते ही उन्हें छोडना पडा। अब प्रारम्भ हुआ सांप्रदायिक ध्रुवी करण का खेल्। प्रशासनिक विफ़लता तथा मुस्लिम समुदाय के प्रति सरकार का अनुचित, असंवैधानिक व विघटनकारी चेहरा देख हिन्दू समुदाय ने अपनी बहू-बेटियों की रक्षार्थ पंचायत करने की ठानी। उसकी अनुमति तो सरकार ने नहीं दी किन्तु उसके एक दिन पहले शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय ने हजारों की संख्या में एकत्र होकर सरकार व हिन्दू समुदाय पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश जरूर कर डाली। अपने ऊपर बार बार प्रहार और सरकारी उदासीनता से आहत हिन्दू समाज को भी बहू-बेटियां बचाओ पंचायत करनी पडी। पूरी तरह शान्ति पूर्ण रूप से आयोजित इस पंचायत के बाद जब लोग अपने अपने घरों को लौट रहे थे तब पूर्व नियोजित ढंग से उन लोगों पर जान लेवा हमले किए गए। भारी संख्या में पुलिस, अर्ध सैनिक बलों व प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थित में दंगाईयों ने अपने करतव दिखाए और देखते ही देखते अनगिनत हिन्दू मौत के घाट उतार दिए गए।

हिन्दू बहिन बेटियों के साथ छेड-छाड या उत्पीडन की यह कोई अकेली, अचानक घटी या पहली घटना नहीं थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इस प्रकार की घटनाएं क्षेत्र में आम हो चली हैं। एक अध्ययन से पता चला है कि बडी मात्रा में मुस्लिम युवक हिन्दू युवतियों को स्कूल-कालेजों से छल पूर्वक प्यार का झांसा, जोर जबर्दस्ती या उन्हें मजबूर कर लव ज़िहाद के लिए ले जाते हैं। कुछ भ्रमित कर शादी भी करते हैं और उन्हें या तो ऐसी हालात में छोड देते हैं कि वह न तो उसके साथ रह सके और न ही अपने परिवार के साथ लौट सके। इसके अलावा अनेक युवतियों को लव ज़िहाद के चंगुल में बुरी तरह फ़ंसा देते है जिससे वह युवती और उसके पूरे परिवार का जीना दूभर हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि यदि लडकी की कोई बहिन या सहेली हो तो समझो अगली बारी उसकी भी है। ऐसी स्थिति में हिन्दू समाज आखिर कब तक अपने दर्द को सीने से लगा अपनी बहिन बेटियों की इज्जत लुटते देखता रहेगा। गत वर्ष दिए गए केरल उच्च न्यायालय के लव ज़िहाद संबन्धी निर्णय ने इसका एक भयाभय चित्रण पेश किया है जो समस्त सरकारी तंत्र, कानून बनाने व उसका पालन करने वालों के लिए एक चुनौती है।

घटना बडी थी और इसे समय रहते रोका जा सकता था, यह सभी जानते भी है और उसे मानते भी हैं। जिस तरह करीब-करीब सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ-साथ राज्य सरकार पर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं उन्हें देखते हुए इसकी संभावना कम है कि इस मामले की सही तरह से जांच हो सकेगी। कोई इस मामले की जांच सीबीआइ से चाह रहा है तो कोई विशेष जांच दल से। फिलहाल यह कहना कठिन है कि सुप्रीम कोर्ट उस याचिका के संदर्भ में किस नतीजे पर पहुंचेगा जिसमें यह कहा गया है कि मुजफ्फरनगर दंगे की जांच विशेष जांच दल से कराई जाए, लेकिन यह समय की मांग है कि जांच जिस भी स्तर पर हो उसकी निगरानी अवश्य की जाए। मौजूदा स्थिति में न्यायपालिका के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसी संस्था नजर नहीं आ रही है जिस पर यह भरोसा किया जा सके कि वह निगरानी का काम सही तरह से कर सकेगी।

गनीमत यह है कि न्यायपालिका अभी भी भरोसेमंद और अन्याय के खिलाफ उम्मीद की किरण के रूप में है। किन्तु वहीं दूसरी ओर  यह बात उतनी ही खराब भी है कि न्यायपालिका और विशेष रूप से शीर्ष अदालत को अब बहुत सारे छोटे छोटे ऐसे मामलों में भी हस्तक्षेप करना पड़ता है जिन्हें आसानी से कार्यपालिका द्वारा सुलझा लेना चाहिए। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बड़े घपले-घोटालों के साथ-साथ हिंसा के गंभीर मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए भी उसे दखल देने के लिए आगे आना पड़ता है। हाल ही में उसे किश्तवाड़ की हिंसा पर दखल देना पड़ा। इसके पहले कुछ राज्यों में पुलिसिया जुल्म की घटनाओं का संज्ञान लेना पड़ा था। उसे जब-तब शिक्षा, सेहत, पर्यावरण और यहां तक कि आर्थिक और राजनीतिक मामलों में भी संज्ञान लेना पड़ता है। इन बातों से तो यही स्पष्ट होता है कि हमारे लोकतंत्र के अन्य स्तंभ और संस्थाएं लगातार कमजोर होती चली जा रही हैं?  इतना सब कुछ करने के बाद भी राजनीतिक दलों और यहां तक कि केंद्र और राज्य सरकारों को जब भी मौका मिलता है वे न्यायपालिका की लोक कल्याणकारी सक्रियता को उसकी अति सक्रियता करार देकर आपत्ति जताने का कोई मौका नहीं छोड़तीं।

मुजफ़्फ़रनगर की घटना ने अनेक मूलभूत प्रश्न देश के सामने छोडे हैं जिन पर तुरत कार्यवाही की आवश्यकता है:

1। लव ज़िहाद को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करते हुए इसके विरुद्ध कडी कार्यवाही की व्यवस्था हो।

2। जो दंगाई पुलिस ने लखनऊ से फ़ोन आने पर छोड दिए थे उन सभी को अबिलंब गिरफ़्तार कर कडी सजा दिलाई जाए।

3। जिस राज नेता या प्रशासनिक अधिकारी के कहने पर पुलिस को दंगाईयों के विरुद्ध कार्यवाही से रोका गया, उसे भी गिरफ़्तार कर दंगाईयों से भी कडी सजा दिलाई जाए जिससे भविष्य में कोई कानून के रक्षकों को भक्षक बनाने की जुर्रत न कर सके।

4। चुनावों में जाति या धर्माधारित आंकडों के प्रकाशन या प्रसारण तथा राज नेताओं द्वारा इसके प्रयोग पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगे जिससे कोई भी राजनेता देश की भोली भाली जनता को जाति या धर्म के आधार पर न बांट सके।

5। दंगों का सच जनता के समक्ष रखने वाले पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण/निलम्बन/सस्पेंशन को निरस्त कर उन नेताओं को गिरफ़्तार किया जाए जो दंगे रोकने में नाकाम रहे।

6। न्यायपालिका की बेवजह आलोचना करने की बजाय सरकारें अपने-अपने दायित्वों को पूरा करें और न्यायपालिका के विभिन्न दिशा निर्देशों पर अमल करें।

7। यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुलिस सुधारों के संदर्भ में दिए गए निर्देशों पर अमल किया जाता तो शायद मुजफ्फरनगर में जो अनर्थ हुआ उससे बचा जा सकता था।

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