लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

कम उम्र में ही घरेलू झंझटों में उलझ जाने के कारण मैं अधिक पढ़ नहीं सका, इसलिए मैं डी.एन.ए का अर्थ दीनानाथ अग्रवाल या दयानंद ‘अलबेला’ ही समझता था; पर पिछले दिनों अखबार में पढ़ा कि वैज्ञानिकों ने आलू के डी.एन.ए की खोज कर ली है।

मुझे बहुत गुस्सा आया। क्या जरूरत थी बेचारे आलू के पीछे पड़ने की ? शरद पवार के दौर में ले-देकर वही तो गरीबों के लिए एक सब्जी बची है, उसका भी डी.एन.ए निकाल दिया। जैसे मेंढक को एक तश्तरी में लिटाकर चीरफाड़ करते हैं, जरूर इन निर्दयी वैज्ञानिकों ने आलू के साथ भी ऐसा ही दुर्व्यवहार किया होगा। आज नहीं तो कल, भगवान उन्हें इसकी सजा जरूर देगा। मेरा बस चले, तो उन्हें हल में बैल की जगह जोत दूं; पर क्या करूं, मेरा बस तो अपने घर में भी नहीं चलता।

पर इससे मेरे मन में डी.एन.ए के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी। अतः मैंने इस बारे में अपने विद्वान मित्र शर्मा जी से पूछा।

शर्मा जी ने बताया कि किसी व्यक्ति या वस्तु की आंतरिक संरचना को डी.एन.ए कहते हैं। इसस उसके कई पीढ़ियों के इतिहास-भूगोल की जानकारी मिल जाती है। आज विज्ञान इतना उन्नत हो गया है कि मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी, घासफूस और फल-सब्जियों तक का डी.एन.ए पता लग सकता है। इससे पुश्तैनी रोगों का पता लग जाता है, जिससे उसका निदान भी आसानी से ढूंढा जा सकता है।

इससे मेरे खुराफाती मन में एक विचार आया कि क्यों न हम प्रधानमंत्री के डी.एन.ए की खोज करें। इससे पता लग जाएगा कि हर दिन नाक कटने के बाद भी वे कुर्सी से क्यों चिपके हैं और दस जनपथ से संकेत मिलते ही वे फाइल पर आंख बंद कर हस्ताक्षर क्यों कर देते हैं ?

शर्मा जी को यह विचार नहीं जंचा। उन्होंने कठिन की बजाय सरल काम करने का सुझाव दिया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद हमने अपने नगराध्यक्ष वर्मा जी का डी.एन.ए खोजने का निश्चय किया।

अगले दिन हम सुबह ही वर्मा जी के घर जा पहुंचे। वहां बड़ी भीड़ थी। प्रायः सबके हाथ में कुछ कागज भी थे। किसी को गली की समस्या थी तो किसी को खम्बे की। किसी को नौकरी चाहिए थी, तो किसी को दुकान। वर्मा जी सबसे बड़ी चतुराई से निबट रहे थे। कभी वे गरम हो जाते, तो कभी नरम। कभी किसी के साथ वे अंदर जाकर गुपचुप बात करते, तो किसी को सबके सामने हड़काने लगते। शर्मा जी से उन्होंने चाय का आग्रह किया; पर मुझे पानी तक को नहीं पूछा। उनको बार-बार रंग बदलता देख मैं समझ गया कि जरूर इनके डी.एन.ए में गिरगिट के कुछ अंश हैं।

अगले दिन एक सार्वजनिक सभा थी। वर्मा जी उसमें भाषण देते हुए अपने विरोधियों के विरुद्ध जिस तरह दहाड़ रहे थे, उससे यह पुष्टि हुई कि इनके डी.एन.ए में शेर की कुछ मिलावट है।

दूसरे दिन वर्मा जी को सांसद महोदय ने बुला लिया। उनसे मिलने के लिए वर्मा जी बिल्कुल बगुले की तरह एकाग्र होकर खड़े रहे। यों तो वर्मा जी प्रायः जोर से बोलते हैं; पर उनके सामने वे जैसे घिघिया रहे थे, उससे मुझे उस मरियल कुत्ते की याद आई, जो अपने से मजबूत कुत्ते को देखकर दुम दबाकर कूं-कूं करने लगता है। मैंने अपने कागजों में यह महत्वपूर्ण तथ्य भी लिख लिया।

एक दिन वर्मा जी को एक विद्यालय में पुरस्कार वितरण के लिए जाना था। वहां छात्रों के बीच उन्होंने देशभक्ति की जैसी लच्छेदार बातें की, उससे मैं हैरान रह गया। शर्मा जी ने बताया कि बचपन में ये कुछ दिन ‘भारत माता की जय’ वालों के संपर्क में रहे हैं। उनके डी.एन.ए में ये लक्षण वहीं की देन हैं।

रविवार को वर्मा जी ने कुछ ठेकेदारों को बुला रखा था। उनसे वे नगर में होने वाले कार्य और उसमें अपनी कमीशन के संबंध में जिस चालाकी से बात कर रहे थे, उसे देखकर मुझे विश्वास हो गया कि इनके किसी पूर्वज का संबंध लोमड़ी से भी रहा है।

इस डी.एन.ए की साधना से हमें पता लगा कि वर्मा जी में कई पशु और पक्षियों के ही नहीं, तो चूहे, खटमल और दीमक तक के अंश हैं। कभी उनका व्यवहार सीधी गाय की तरह होता, तो कभी मरखने बैल जैसा। एक बार मैंने उन्हें अपने ही घर में पिछले दरवाजे से घुसते और दीवार फांद कर बाहर निकलते देखा। आप समझ ही गये होंगे कि उनके खानदान में कोई चोर जरूर रहा होगा।

पिछले पन्द्रह दिन से हम नेता जी के पीछे लगे थे। उनके डी.एन.ए के चक्कर में हमारा कचूमर निकल रहा था। न जाने किसने उन्हें हमारे इस शोध के बारे में बता दिया था। इसलिए अब वे हमें देखते ही गाली बकने लगते थे। एक दिन उन्होंने अपने चौकीदार से हमें पिटवा भी दिया। उस दिन हम दोनों का धैर्य जवाब दे गया। गुस्से में आकर मैंने सब कागज जला दिये। मैं समझ गया कि डी.एन.ए का अर्थ दीनानाथ अग्रवाल या दयानंद ‘अलबेला’ ही ठीक है। कोई आप से पूछे, तो आप भी यही बताएं। इसी में आपका भला है।

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