कर्ण को भाग्य से भोग नहीं दुर्योग मिला

—विनय कुमार विनायक
भाग्य से भोग नहीं मिलता
योग्य ही योग यत्न से भोग पाता
योग्य संयोग से उपलब्धि नहीं पाता
योग्य योग्यता से ही सफल होता

योग्य कभी संदेह नहीं करता
योग्य सुयोग वियोग से परे होता
योग्य सर्वदा साबित करता योग्यता
योग्य योग क्षेम भी नहीं मानता

योग्य बनने के लिए चाहिए योगी
सहयोगी योगेश्वर सारथी कृष्ण जैसा
योग्य बनने के लिए चाहिए भक्ति
संदेहग्रस्त कभी योग्य हो नहीं सकता

योग्यता शक्ति नहीं युक्ति से आती
योग्यता आशक्ति नहीं आस्था से आती
योग्यता अहंकार नहीं सुमति से आती
योग्यता सद्बुद्धि से सफलता दिलाती

कर्ण व अर्जुन थे एक ही मां की संतति
दोनों में डीएनए जीन जेनेटिक्स एक ही
महात्वाकांक्षा शक्ति किसी में कम नहीं
मगर योग्यता परिस्थिति से बदल गई थी

अर्जुन समर्पित था सचेत सारथी के प्रति
कर्ण के साथ थी एक अनिश्चय की स्थिति
कर्ण को ज्ञात था अपने लक्ष्य का उधेड़बुन
मैत्री व भातृप्रेम के बीच एक सका नहीं चुन

विजय के लिए चाहिए समेकित उद्यम
पराजय के लिए काफी है एक खंडित मन
योग्यता के लिए जरूरी है निर्णय निर्द्वंद्व
योग्यता आती नहीं जब उद्भ्रांत हो अंतर्मन

कर्ण अनीति का पक्षधर बन चुका था
कर्ण निज शत्रु का सहोदर होना सुन चुका था
कर्ण को ज्ञात था उनकी जीत होगी घुटन
कर्ण ने जाना उनकी जय होगी भाई का मरण

कर्ण को भाग्य से भोग नहीं दुर्योग मिला
कर्ण को प्रतिद्वंदी भाई ही संयोग से मिला
कर्ण की योग्यता भाई अर्जुन से कम नहीं
अर्जुन ने भाई को मारा ये दुर्भाग्य कम नहीं!
—विनय कुमार विनायक

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