पर्यावरण राजनीति

बर्फ़ और गर्मी के बीच मुक़ाबला तय: जलवायु संकट के साये में 2026 विंटर ओलंपिक

फ़रवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेज़ो में विंटर ओलंपिक की शुरुआत होगी, तब खेल सिर्फ एथलीटों के बीच नहीं होगा। मुकाबला होगा बर्फ और बढ़ती गर्मी के बीच। ताज़ा वैज्ञानिक विश्लेषण साफ़ संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब विंटर ओलंपिक जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक प्रतियोगिताओं की बुनियाद को भी चुनौती देने लगा है।

कॉर्टीना द’आम्पेज़ो, जिसने 1956 में भी विंटर ओलंपिक की मेज़बानी की थी, आज वैसा ठंडा नहीं रहा। बीते करीब 70 सालों में यहाँ फरवरी का औसत तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। पहले जहां फरवरी में औसत तापमान करीब माइनस 7 डिग्री सेल्सियस रहता था, अब वह शून्य के आसपास पहुँच गया है। नतीजा यह कि बर्फ़ की मोटाई भी घट रही है। शोध बताते हैं कि 1970 के दशक से 2019 तक यहाँ औसत बर्फ़ की गहराई करीब 15 सेंटीमीटर कम हो चुकी है।

हालात ऐसे हैं कि 2026 के खेलों के लिए इटली को 30 लाख क्यूबिक यार्ड से ज़्यादा कृत्रिम बर्फ़ तैयार करनी पड़ेगी। यानी ऊँचे आल्प्स में होने के बावजूद प्राकृतिक बर्फ़ पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह स्थिति सिर्फ आयोजन की लागत नहीं बढ़ाती, बल्कि खेलों की निष्पक्षता और खिलाड़ियों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है। जब तापमान पर्याप्त ठंडा न हो, तो बर्फ़ जम नहीं पाती, सतह गीली और असमान हो जाती है और चोट का ख़तरा बढ़ जाता है।

यह संकट सिर्फ इटली तक सीमित नहीं है। 1950 के बाद जिन 19 शहरों ने विंटर ओलंपिक की मेज़बानी की है, वे सभी आज पहले से ज़्यादा गर्म हो चुके हैं। औसतन इनमें तापमान 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। विंटर पैरालंपिक की तस्वीर और भी चिंताजनक है। ये खेल आमतौर पर मार्च में होते हैं, जब मौसम और गर्म होता है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया के सिर्फ एक चौथाई संभावित मेज़बान शहर ही ऐसे रह जाएंगे, जहां पैरालंपिक के लिए भरोसेमंद बर्फ़ और तापमान मिल सके।

एक हालिया अध्ययन बताता है कि अगर मौजूदा उत्सर्जन रुझान जारी रहे, तो सदी के अंत तक विंटर पैरालंपिक जैसे आउटडोर खेल लगभग नामुमकिन हो सकते हैं। पहले जहां 90 प्रतिशत से ज़्यादा संभावित मेज़बान शहर सुरक्षित माने जाते थे, वहीं आने वाले दशकों में यह संख्या तेज़ी से घटेगी।

इस बदलते मौसम का असर खिलाड़ियों की तैयारी पर भी दिखने लगा है। स्नोबोर्डिंग और स्कीइंग जैसे खेलों के एथलीट अब “बर्फ़ की तलाश” में एक जगह से दूसरी जगह भटकने को मजबूर हैं। अमेरिका और यूरोप में स्की सीज़न पहले ही छोटा हो चुका है। कई अंतरराष्ट्रीय स्की प्रतियोगिताएँ हाल के वर्षों में सिर्फ इसलिए रद्द करनी पड़ीं क्योंकि बर्फ़ नहीं थी या तापमान बहुत ज़्यादा था।

आयोजक संस्थाएँ टिकाऊ खेलों की बात ज़रूर कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का दावा है कि 2030 से ओलंपिक खेल “क्लाइमेट पॉज़िटिव” होंगे। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि अगर वैश्विक तापमान यूँ ही बढ़ता रहा, तो सिर्फ़ बेहतर प्रबंधन से समस्या हल नहीं होगी।

2026 के विंटर ओलंपिक एक तरह से चेतावनी हैं। यह सिर्फ़ खेलों का आयोजन नहीं, बल्कि इस सवाल का आईना हैं कि क्या हम जलवायु संकट को समय रहते गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं। अगर धरती गरमाती रही, तो आने वाले वर्षों में शायद विंटर ओलंपिक का मतलब ही बदल जाए। बर्फ़ पर होने वाले खेल, बिना बर्फ़ के।