विकास के नाम पर पर्यावरण की उपेक्षा क्यों?

Posted On by & filed under पर्यावरण

-ललित गर्ग- ‘सबका साथ, सबका विकास’ वर्तमान सरकार का नारा है, यह नारा जितना लुभावना है उतना ही भ्रामक एवं विडम्बनापूर्ण भी है। यह सही है कि आम आदमी की जरूरतें चरम अवस्था में पहुंच चुकी हैं। हम उन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकास की कीमत पर्यावरण के विनाश से चुकाने जा रहे… Read more »

बेलगाम ध्वनि प्रदूषण:नियंत्रण ज़रूरी

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

निर्मल रानी हमारे देश में आम जनता स्वतंत्रता को कुछ अपने ही तरीके से परिभाषित करने में लगी रहती है। आज़ादी का अर्थ पराधीनता से छुटकारा और मानसिक,सामाजिक तथा राजनैतिक स्वतंत्रता के बजाए कुछ इस तरह समझा जाता है गोया हम इस कद्र आज़ाद हैं कि जब और जहां चाहें जो चाहें वह कर सकते… Read more »

अम्लीय प्रदूषण से दूषित होती नदियां

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

प्रमोद भार्गव जल संपदा की दृष्टि से भारत की गिनती दुनियां ऐसे देशों में है, जहां बड़ी तादात में आबादी होने के बावजूद  उसी अनुपात में विपुल जल के भंडार अमूल्य धरोहर के रूप में उपलव्ध हैं। जल के जिन अजस्त्र स्त्रोतों को हमारे पूर्वजों व मनीषियों ने पवित्रता और शुद्धता के पर्याय मानते हुये… Read more »

धुंध का समाधान – गोवंश आधारित खेती

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

इन दिनों दिल्ली और पूरा उत्तर भारत धुंध से परेशान है। प्रशासन ने कई जगह छोटे बच्चों के स्कूल बंद करा दिये हैं। सांस तथा फेफड़े के मरीजों को विशेष सावधानी रखने तथा अधिकाधिक तरल पदार्थ लेने को कहा जा रहा है। सुबह टहलने वालों को भी कुछ दिन घर ही रहने की सलाह दी… Read more »

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का जिम्मेदार कौन  ? 

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

प्रभुनाथ शुक्ल दिल्ली की आबोहवा दमघोंटू हो चुकी है। सांस लेना भी मुश्किल हो चला है। हमारे लिए यह कितनी बड़ी बिडंबना है। जहरीली होती दिल्ली हमारे लिए बड़ा खतरा बन गई है। पर्यावरण की चिंता किए बगैर विकास का सिद्धांत मुश्किल में डाल रहा है। यह पूरी मानव सभ्यता के लिए चिंता का विषय… Read more »

धरा को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं आदिवासी

Posted On by & filed under पर्यावरण, समाज, सार्थक पहल

विगत 100 वर्षों में विकास की सबसे ज्यादा कीमत किसी ने चुकाई है तो वे आदिवासी हैं। किसी को उसके घर से विस्थापित कर दिया जाए, उसकी आजीविका के जरिये छीन लिए जाएं और उसकी पहचान बदल कर इस धर्म या उस धर्म की बना दी जाए तो उससे दुर्भाग्यशाली भला और कौन होगा? आदिवासी… Read more »

3 फीसद जमीन,  17 फीसद जन 

Posted On by & filed under पर्यावरण, समाज

हेमेन्द्र क्षीरसागर बेलगाम बढती आबादी एक विश्वव्यापी समस्या हैं, खासतौर पर अविकसीत और विकासशील देशों के लिए यह और भी अधिक गंभीर हैं। विशेषतः भारत में वृद्धि और विकास को हानि पहॅंुचाते हुए तीव्र गति से बढती जनसंख्या परेशानी का सबक बन चुकी हैं। उधेड़बून में हम 1.30 अरब हो चुके हैं। इतर हमारे पास… Read more »

वृक्षारोपण: एक पौधा, दस हाथ

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

कवायद में मध्यप्रदेश सरकार ने नर्मदा बेसिन में 6 करोड 67 लाख पौधे रोपकर दुनिया को पर्यावरण बचाने का शानदार संदेश दिया। प्रदेश में 2 जुलाई 2017 की तारिख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। बेमिसाल, दुनिया भर में अब तक एक ही दिन में इतनी बडी संख्या में पौधे रोपने का रिकाॅर्ड कहीं नहीं बना। बना तो सिर्फ और सिर्फ मध्यप्रदेश की सरजमीं पर, फलीभूत सूबे का दूसरी बार नाम गिनीज विश्व रिकाॅर्ड में शुमार हो गया। लिहाजा, सदी के इस सबसे बडे महा वृक्षारोपण प्रकल्प की चहुंओर प्रषंसा हो रही है। बेहतर उक्त एक दिवसीय पौधे रोपण के बाद भी जुलाई-अगस्त में प्रदेश के 51 जिलों में करीबन 8 करोड पौधे लगाए जाने की योजना है।

वृक्षों में जीव विषयक ऋषि दयानन्द के विचार

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

                स्वामी दयानन्द जी इस प्रसंग में आगे लिखते हैं कि वृक्ष आदि के बीजों को जब पृथिवी में बोते हैं तब अंकुर ऊपर आता है और मूल नीचे जाता (रहता) है। जो उन (वृक्षों) को नेत्रेन्द्रिय न होता तो (वह) ऊपर-नीचे को कैसे देखता? इस काम से निश्चित जाना जाता है कि नेत्रेन्द्रिय जड़ वृक्षादिकों में भी हैं। बहुत (प्रकार की) लता होती हैं, जो वृक्ष और भित्ती के ऊपर चढ़ जाती हैं, जो (उनमें) नेत्रेन्द्रिय न होता तो उसको (वृक्ष और भित्ति को) कैसे देखता तथा स्पर्शेन्द्रिय तो वे (जैन) भी मानते हैं। जीभ इन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं क्योंकि मधुर जल से बाग आदि में जितने वृक्ष होते हैं, उनमें खारा जल देने से सूख जाते हैं। जीभ इन्द्रिय न होता तो खारे वा मीठे का स्वाद (वह वृक्ष) कैसे जानते? श्रोत्रेन्द्रिय भी वृक्षादिकों में हैं, क्योंकि जैसे कोई मनुष्य सोता हो, उसको अत्यन्त शब्द (तेज आवाज, शोर वा धमाका आदि) करने से सुन लेता है तथा तोफ आदिक शब्द से भी वृक्षों में कम्प होता है, जो श्रोत्रेन्द्रिय न होता, तो कम्प क्यों होता क्योंकि अकस्मात् भयंकर शब्द के सुनने से मनुष्य, पशु, पक्षी अधिक कम्प जाते हैं, वैसे वृक्षादिक भी कम्प जाते हैं। जो वह कहें कि वायु के कम्प से वृक्ष में चेष्टा हो जाती है, अच्छा तो मनुष्यादिकों को भी वायु की चेष्टा से शब्द सुन पड़ता है, इससे वृक्षादिकों में भी क्षोत्रेन्द्रिय है।

मौसम विभाग की चेतावनी : बादलों के बरसने की घट रही है क्षमता

Posted On by & filed under पर्यावरण, विविधा

वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।  महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है।