डॉ घनश्याम बादल
सत्ता में लंबे समय तक बने रहना एक उपलब्धि हो सकता है लेकिन सत्ता के शिखर पर टिके रहना अलग बात है। नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को 76 वर्ष पूरे कर 77वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। उनके राजनीतिक जीवन को देखें तो यह भारतीय राजनीति के एक लंबे अध्याय को पढ़ने जैसा है। गुजरात से दिल्ली तक और फिर दिल्ली से दुनिया तक पहुंचे मोदी ने कूटनीति और राजनीति में जैसे जगह बनाई है, वैसे ही आलोचनाएं और बहस भी खड़ी की हैं।
2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से 2014 में प्रधानमंत्री बनने और 2019 में पहले से अधिक बहुमत के साथ लौटना, 2024 में बहुमत घटना लेकिन मोदी का ही तीसरी बार भी प्रधानमंत्री बनना भारतीय राजनीति की एक लंबी कहानी है।
2024 से सत्ता का गणित सहयोगियों पर निर्भर है, फिर भी नेतृत्व का केंद्र वही ‘नरेंद्र’ हैं जो पहले थे और जैसे पहले थे। यही मोदी की राजनीतिक शक्ति है और यही उनकेसामने भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती भी बननी है।
2024 के बाद मोदी के तीसरे कार्यकाल ने कई कठिन मोड़ देखे। अप्रैल 2025 का पहलगाम आतंकी हमला, जिसमें 26 लोगों की जान गई, सरकार के सामने सुरक्षा और राष्ट्रीय मनोबल की बड़ी चुनौती बनकर आया। उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर ने भारत-पाक संबंधों को सैन्य टकराव के नए दौर में पहुंचाया। सरकार ने इसे आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई बताया, जबकि विपक्ष ने सैन्य कार्रवाई के बाद युद्धविराम की परिस्थितियों और उसके राजनीतिक प्रबंधन पर सवाल उठाए। यहीं मोदी की राजनीति का दूसरा पहलू सामने आता है। संकट को राजनीतिक संदेश में बदलना उन्हें बखूबी आता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और भारत की जवाबदेही के सवाल को उन्होंने घरेलू राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। अभी ब्रिक्स घोषणा में चीन समेत सदस्य देशों द्वारा पहलगाम हमले की स्पष्ट निंदा कराया जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया है तो इसका श्रेय नरेंद्र मोदी के खाते में जाना स्वाभाविक है।
लेकिन राजनीति में हर उपलब्धि के साथ एक प्रतिप्रश्न भी चलता है। यदि पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर मोदी सरकार के लिए सुरक्षा और कूटनीति की परीक्षा थे तो रोजगार, महंगाई, असमानता और युवाओं की आकांक्षाएं आर्थिक परीक्षा बनी हुई हैं। सरकार विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी उपलब्धियों में गिनाती है, लेकिन आलोचक पूछते हैं कि इन उपलब्धियों का लाभ रोजगार और आय के स्तर पर कितनी समानता से पहुंचा। मोदी की बड़ी विशेषता रही है आलोचना को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की क्षमता। विपक्ष जितना उन्हें घेरता है, वे उतनी ही तेजी से अपना सीधा संवाद जनता तक ले जाते हैं। उनकी रेडियो, सोशल मीडिया, चुनावी सभाएं और लाभार्थी-केंद्रित राजनीति ने प्रधानमंत्री पद को भी एक राजनीतिक ब्रांड में बदल दिया है। 2024 चुनाव परिणाम मोदी के लिए चेतावनी था लेकिन उसके बाद की घटनाओं ने यह भी दिखाया कि मोदी ने इस झटके के बाद भ राजनीतिक जादूगरी कायम रखी । मोदी की खास बात है कि वह घटनाओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना जानते हैं . 2026 के ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात इसका एक उदाहरण है उन्होंने मतभेदों के बीच सीमा पर शांति, व्यापार और संवाद आगे बढ़ाने की बात आगे की। जबकि चीन के साथ व्यापार घाटा, सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास अभी समाप्त नहीं हुए हैं। भारत की अध्यक्षता में आयोजित सम्मेलन में सदस्य व सहयोगी देशों के बीच घोषणा पर सहमति बनी। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान, वैश्विक शासन में सुधार और ग्लोबल साउथ की आवाज जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया गया। मोदी के लिए यह विदेश नीति की उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि एक ही मंच पर चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब और अन्य परस्पर भिन्न हितों वाले देश मौजूद थे। भारत ने इन मतभेदों के बीच सहमति का रास्ता निकाला। मगर आत्ममुग्ध होने की गुंजाइश कम है। मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत है कि वे आलोचकों को भी अपने इर्द-गिर्द राजनीति करने के लिए मजबूर कर देते हैं। वे जिन मुद्दों पर बोलते हैं, विपक्ष अक्सर उन्हीं मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया तय करता है। लेकिन आलोचकों का आरोप भी जायज है कि नरेंद्र मोदी के दौर में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है, संस्थाओं की स्वायत्तता, मीडिया की स्वतंत्रता और असहमति के लिए जगह जैसे प्रश्न गंभीर हुए हैं। समर्थक इसके विपरीत इसे निर्णायक नेतृत्व और स्थिर शासन की आवश्यकता बताते हैं। दोनों पक्षों के बीच यह बहस मोदी की राजनीतिक विरासत का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल उठने लगा है कि मोदी के बाद कौन? भाजपा और देश में नेता अनेक हैं, मगर मोदी जैसी अखिल भारतीय पहचान, चुनावी अपील और व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ वाला दूसरा चेहरा फिलहाल दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसा नेता पैदा नहीं हो सकता। राजनीति कभी रिक्त नहीं रहती। लेकिन यह ज़रूर बताता है कि 76 वर्ष की उम्र में भी मोदी ने अपनी अपरिहयर्ता बनाए रखी है नरेंद्र मोदी के सामने अगली चुनौती केवल अगला चुनाव नहीं है, अपनी उपलब्धियों को संस्थागत विरासत में बदलना है। आर्थिक विकास को रोजगार में, वैश्विक प्रतिष्ठा को ठोस रणनीतिक लाभ में, राष्ट्रीय सुरक्षा को दीर्घकालीन शांति में और राजनीतिक वर्चस्व को ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलना होगा जिसमें उनके बाद भी व्यवस्था उतनी ही प्रभावी ढंग से चल सके। नरेंद्र मोदी के मूल्यांकन का अंतिम फैसला तो इतिहास ही करेगा। बेशक, उन्होंने भारतीय राजनीति को बदला है, पर विवाद इस बात पर है कि यह बदलाव कितना स्थायी, कितना समावेशी और कितना संस्थागत साबित होगा।
76 की उम्र में मोदी के सामने अब सवाल सत्ता हासिल करने का नहीं, सत्ता के बाद की अपनी विरासत तय करने का है। शिखर पर पहुंचना कठिन होता है, लेकिन शिखर से उतरते समय पीछे क्या दिखाई देता है,इतिहास अंततः इसी से किसी नेता की ऊंचाई नापता है और अभी तो नरेंद्र मोदी का कद काफी बड़ा दिखाई देता है बाकी उनके असली कद, पद और हद का फैसला तो आने वाला समय ही करेगा।
डॉ घनश्याम बादल