मौसम अपना – अपना …!

-तारकेश कुमार ओझा-

vyangya
इस गलतफहमी में आप कतई न पड़ें कि मैं किसी समाजवादी आंदोलन का सिपाही हूं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे अपनी खटारा साइकिल से मोह बचपन से ही है। उम्र गुजर गई लेकिन आज न तो साइकिल से एक पायदान ऊपर उठ कर बाइक तक पहुंचने की अपनी हैसियत बना पाया और न इसकी कोई विशेष इच्छा ही हुई। हां एक स्थिति में किसी कार का मालिक बनने की इच्छा शुरू से मेरे मन में जोर मारती रही है। वह बरसात के दिनों में। आप किसी जरूरी कार्य से कहीं जा रहे हैं, और इस बीच मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश से पूरी तरह भींगते हुए मजबूरन किसी पेड़ या स्थायी – अस्थायी छत के नीचे खड़े होकर हम  बारिश खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं। उधर आकाश में गर्जन – तर्जन और जोर पकड़ रही है। आप मन ही मन कूढ़ रहे हैं और इस बीच कोई आपके सामने से कार की स्टीरियो पर गाने सुनता हुआ सर्र से निकल जाए तो सीने में जलन होती ही है। ऐसा अपने साथ बचपन से होता आया है। इस परिस्थिति में यह सोचते हुए कई दशक गुजर गए कि बाइक तो नहीं लेकिन औकात हुई तो कभी कार जरूर खरीदूंगा। ताकि कम से कम  बारिश के दिनों में जिल्लतों से बच सकूं। लेकिन अपने देश के मामले में यही कहा जा सकता है कि नसीब अपना – अपना। नसीब के खेल का यह दर्शन हर क्षेत्र में सटीक बैठता है। अब अपने वकील साहबों को ही ले लीजिए। पिछले दो महीनों से जारी गर्मी के कहर ने समाज के हर वर्ग को बिना किसी भेद के जलाया। लेकिन वकील साहबों की अदा देखिए कि कर दी सीज वर्क की घोषणा कि भैया इस गर्मी में अपन से काम नहीं होगा। हम अदालत आएंगे, बैठ कर गप्पे भी मारेंगे लेकिन किसी काम को हाथ नहीं लगाएंगे। गांव – कस्बों से लेकर महानगरों तक में यह सिलसिला लंबा चला। जिस पर उच्च न्यायालयों ने नाराजगी भी जताई। अब गर्मी से परेशान होकर सीज वर्क के मामले में भी नसीब अपना – अपना वाला फार्मूला लागू होता है।किसी के लिए हर मौसम मजा तो किसी के लिए सजा है।सामान्य तबके को गर्मी , बरसात और सर्दी सभी रुलाती है। लेकिन  औकात हो तो आदमी चिलचिलाती धूप में कृत्रिम जलाशयों में पूरे दिन नहाने का मजा ले सकता है। सुनते हैं कि अपने देश में ही एेसे – एेसे ट्रेवल एजेंट हैं जो बारिश के दिनों में पहाड़ी  झरने के नीचे   स्नान के आनंद की व्यवस्था पैकेज पर करते हैं। भैया गर्मी और लू किसी भाती है। लेकिन कितने हैं जो कह सकें कि जब तक मौसम सुहाना नहीं हो जाता, वे काम को हाथ भी नहीं लगाएंगे। यह जानते हुए भी इस बेरहम मौसम में काम पर निकलना एक जुआ भी साबित हो सकता है … अधिसंख्य को अपनी डयूटी पूरी करनी ही पड़ती है। अब स्कूलों का हाल लीजिए।  ओड़िशा  एक बेहद गर्म राज्य है। लिहाजा वहां सरकार स्कूलों में दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां घोषित करती है। दूसरे राज्यों में सवा से डेढ़ महीने की छुट्टियां रहती है। दशहरा – दीपावली के दौरान भी स्कूलों से लेकर सरकारी दफ्तरों यहां तक कि अदालतों  में भी यही नजारा देखने को मिलता है। लेकिन समाज में ऐसे भी तो लोग हैं जिन्हें किसी भी मौसम में अव्वल छुट्टियां तो मिलती नहीं और यदि किसी उपाय से मिल भी जाए तो औकात ऐसी नहीं कि इसका उपभोग कर सकें। ऐसे में हम जैसे साइकिल घसीटों को तो वे चाचा घासीराम आदर्श लगते हैं। जो पकी उम्र में साइकिल उठा कर कभी भी किसी के भी यहां धावा बोल देते थे। कोई मौसम का हवाला देते हुए इस जोखिम की ओर इशारा करता तो चाचा फट उसे डपट लेते कि आज आया हूं तो कह रहे हो गर्मी है , कल बारिश होने लगे तो इसकी दुहाई दोगे और ठंडी में सर्दी की तो आखिर आदमी जीएगा कब।  चाचा की इन दलीलों के आगे हर कोई निरुत्तर हो जाता। अब समाज का संपन्न और ताकतवर तबका भले ही हर वोकेशन का लुत्फ ले , लेकिन छुट्टियों व आराम के मामले में  हमें तो अपने चाचा ही आइडियल नजर आते हैं।

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तारकेश कुमार ओझा
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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