विश्वगुरू के रूप में भारत-53

Posted On by & filed under विविधा

राकेश कुमार आर्य दासता से मुक्ति का दिया भारत ने विश्व को संदेश भारत ने अपना स्वाधीनता संग्राम उसी दिन से आरंभ कर दिया था जिस दिन से उसकी स्वतंत्रता का अपहत्र्ता पहला विदेशी आक्रांता यहां आया था। इस विषय पर हम अपनी सुप्रसिद्घ पुस्तक श्रंखला ‘भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास’ के… Read more »

 रोहिंग्याओं के प्रति न्यायालय का उदार रुख ?

Posted On by & filed under विविधा

प्रमोद भार्गव किसी भी पीड़ित समुदाय के प्रति उदारता मानवीय धर्म है, लेकिन जब अवैध रूप से देश में घुसकर आए समुदाय के प्रति राष्ट्रीय सुरक्षा एंजेसियां सुरक्षा को लेकर खतरा बता रही हों, तो ऐसी उदारता देश के लिए भविष्य में घातक साबित हो सकती है ? रोहिंग्या घुसपैठिए बनाम शरणार्थियों के सवाल अपनी… Read more »

पत्रकार पण्डित दीनदयाल जी ने दिया नया दर्शन 

Posted On by & filed under राजनीति

दीनदयाल जी ने अपने राजनीतिक लेखों में एक नया वाद पैदा किया जिसे समन्वयवाद नाम दिया। राजनीतिक लिप्सा के आकांक्षी लोगों के लिए उन्होंने लिखा कि शिखर पर बैठने की इच्छा सबकी होती है मगर मंदिर के शिखर पर तो कौए भी बैठते हैं? हमें तो उस नींव का पत्थर बनने की आकांक्षा करनी चाहिए… Read more »

सत्र और क्षेत्र से नदारद सांसद!

Posted On by & filed under राजनीति

देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका हर किसी को मुनासिब नहीं होता है वे नसीब वाले होते है जिन्हें ये अवसर मिलता है। वह भी देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक प्रतिनिधि संस्था संसद का, अभिभूत  सौभाग्य तो सिर्फ और सिर्फ 130 करोड के देश में 545 लोकसभा सांसदों को जन-गण ने दिया है। यह सोच कर… Read more »

विश्वगुरू के रूप में भारत-52

Posted On by & filed under विविधा

राकेश कुमार आर्य  दूध को जब तक आप बिना पानी मिलाये बेच रहे हैं, तब तक वह व्यवहार है, पर जब उसमें पानी की मिलावट की जाने लगे और अधिकतम लाभ कमाकर लोगों का जीवन नष्ट करने के लिए बनावटी दूध भी मिलावटी करके बेचा जाने लगे तब वह शुद्घ व्यापार हो जाता है।… Read more »

विश्वगुरू के रूप में भारत-51

Posted On by & filed under विविधा

राकेश कुमार आर्य   (16) रैक्ण-वैध या लब्धव्य राशियों में से जो संशयित राशि है, अर्थात जिसकी प्राप्ति की आशा पर संशय है व रैक्ण कही जाती है। (17) द्रविण-उपार्जित राशि में से जो लाभराशि हमारे व्यक्तिगत कार्य के लिए है-उसे द्रविण कहा जाता है। (18) राध:-द्रविण में से जो भाग बचकर अपनी निधि… Read more »

विश्व खाद्य दिवस पर चर्चा में भुखमरी

Posted On by & filed under विविधा

यह कम दुर्भाग्यजनक नहीं है कि अपने देश में व्याप्त भुखमरी पर चर्चा करने के लिए हमें ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों की आवश्यकता होती है। और जब यह चर्चा हो भी रही है तो इसका स्वरूप निम्न स्तरीय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह गया है। श्री राहुल गाँधी एवं श्रीमती स्मृति ईरानी के बीच… Read more »

‘वेबलेंथ’ का खेल

Posted On by & filed under कविता

भावों के विशाल पर्वत पर, उगती खिलती आकाश बेल चढ़ती- कुछ हकीकतें और कुछ आस्‍था, का मेल होती है मित्रता। तय परिधियों के अरण्‍य में ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती मन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल होती है मित्रता। स्‍त्री- पुरुष, पुरुष -स्‍त्री, स्‍त्री-स्‍त्री, पुरुष- पुरुष, के सारे विभेद नापती, अविश्‍वास से… Read more »

बनारस और प्रधानमन्त्री मोदी

Posted On by & filed under विविधा

मैं बनारस में रहता हूं। मेरी शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई है और अपनी नौकरी के उत्तरार्ध के १८ वर्ष मैंने यहीं व्यतीत किए हैं। एक लंबे समय से मैं बनारस से जुड़ा हूं। मेरे छात्र जीवन में बनारस जैसा था आज भी लगभग वैसा ही है; बस एक परिवर्तन को छोड़कर। पहले सड़क पर हम… Read more »

पटाखों पर रोक का व्यावहारिक पक्ष

Posted On by & filed under विविधा

प्रमोद भार्गव सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस साल दीपावली के ऐन मौके पर पटाखों की बिक्री पर जो पाबंदी लगाई है, उससे तमाम लोग सांस लेने में राहत महसूस कर सकते हैं, लेकिन इसका दूसरा व्यावहारिक पक्ष यह भी है कि कई व्यापारियों से लेकर पटाखा उत्पादक निर्माताओं को आजीविका… Read more »