पंकज जायसवाल
यदि हम स्वयं से एक प्रश्न पूछें यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और आज का चीन तकनीकी रूप से इतने विकसित कैसे बने? तो इसका उत्तर केवल पूंजी, संसाधन या प्राकृतिक संपदा नहीं है। इसकी जड़ भौतिक विज्ञान और उससे विकसित एप्लाइड साइंस, इंजीनियरिंग तथा विनिर्माण में निहित है। अठारहवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति ने पूरी दुनिया की दिशा बदल दी। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मशीनों का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ। उत्पादन की गति बढ़ी, लागत घटी और उत्पाद आम लोगों तक पहुँचने लगे। इस परिवर्तन के पीछे केवल मशीनें नहीं थीं बल्कि भौतिकी के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने की क्षमता थी।
न्यूटन के गति के नियम हों, माइकल फैराडे का विद्युत-चुंबकत्व हो, जेम्स वाट का स्टीम इंजन हो, राइट बंधुओं का विमान, कार्ल बेंज की ऑटोमोबाइल, अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का टेलीफोन, थॉमस एडिसन की व्यावहारिक विद्युत प्रकाश व्यवस्था, या बाद में टिम बर्नर्स-ली द्वारा विकसित वर्ल्ड वाइड वेब इन सभी ने मानव जीवन को अधिक सरल, तेज़ और उत्पादक बनाया। इन आविष्कारों ने केवल नई तकनीक नहीं दी, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्थाओं को बदल दिया। यही कारण है कि विकसित देशों ने विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शोध, उद्योग, विश्वविद्यालय, पेटेंट और उद्यमिता को एक साथ जोड़ा। परिणामस्वरूप वहाँ प्रत्येक नई खोज एक व्यवसाय बनी, प्रत्येक व्यवसाय एक उद्योग बना और प्रत्येक उद्योग लाखों लोगों के लिए रोजगार लेकर आया।
आज भी यदि हम विश्व की अग्रणी तकनीकों पर नज़र डालें जेट इंजन, टरबाइन, इलेक्ट्रिक मोटर, सेमीकंडक्टर, मेडिकल उपकरण, रोबोटिक्स, औद्योगिक मशीनें, उच्च दक्षता वाली ऊर्जा प्रणालियाँ तो इनके पीछे मूल आधार भौतिकी ही है। अंतर केवल इतना है कि इन देशों ने विज्ञान को प्रयोगशाला से निकालकर बाज़ार तक पहुँचाया।
मुझे अपने व्यावसायिक जीवन में ऐसे कई उदाहरण देखने का अवसर मिला है। फ्रांस की एक कंपनी ने लो-पावर वाइड एरिया नेटवर्क (LPWAN) आधारित आईओटी समाधान विकसित किया। तकनीक अत्यंत सरल थी लेकिन उसका प्रभाव असाधारण था। प्रत्येक डिवाइस में अलग-अलग सिम लगाने के स्थान पर केवल एक केंद्रीय गेटवे को नेटवर्क से जोड़ा गया, जबकि आसपास के हजारों उपकरण उससे कम ऊर्जा में जुड़े रहे। परिणाम यह हुआ कि बैटरी वर्षों तक चलने लगी और पूरे समाधान की लागत भी काफी कम हो गई। यह किसी जटिल रॉकेट विज्ञान का परिणाम नहीं था बल्कि भौतिकी और इंजीनियरिंग के व्यावहारिक उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण था। इस साधारण-से नवाचार ने कंपनी को वैश्विक स्तर पर अत्यधिक मूल्यवान व्यावसायिक समाधान प्रदान करने में सक्षम बना दिया।
इसी प्रकार मैंने यूरोप की एक कंपनी को देखा जिसने साधारण जेसीबी जैसी मशीन के आधार पर विमान की ऊँचाई और संरचना के अनुरूप एक विशेष सफाई प्रणाली विकसित कर दी। उपयुक्त ब्रश, नियंत्रित यांत्रिक गति और विशेष रासायनिक घोल के संयोजन से उसने ड्राई एयरक्राफ्ट वॉशिंग का समाधान तैयार किया। तकनीकी दृष्टि से यह कोई अत्यधिक जटिल नवाचार नहीं था। लगभग इसी प्रकार की मशीनें भारत के कई औद्योगिक संयंत्रों में लगभग 10 लाख रुपये की लागत पर उपयोग में लाई जाती हैं किंतु विमानन उद्योग की आवश्यकता के अनुरूप कुछ इंजीनियरिंग परिवर्तन, सुरक्षा मानकों और डिज़ाइन सुधारों के बाद उसी अवधारणा को करोड़ों रुपये मूल्य के विशेषीकृत उत्पाद के रूप में वैश्विक बाज़ार में स्थापित कर दिया गया। अंतर केवल तकनीक का नहीं था बल्कि नवाचार को उत्पाद, ब्रांड और व्यवसाय में बदलने की क्षमता का था।
ऐसे ही डेनमार्क की एक कंपनी ने सामान्य व्हीलचेयर में केवल नेविगेशन, सेंसर और डिजिटल इंटरफेस जोड़कर उसे स्मार्ट व्हीलचेयर में बदल दिया। नवाचार बड़ा नहीं था, लेकिन उपयोगिता इतनी अधिक थी कि वही उत्पाद लाखों रुपये में बिकने लगा।
इन उदाहरणों का उद्देश्य केवल यह बताना है कि नवाचार हमेशा अत्यधिक जटिल नहीं होता। कई बार साधारण समस्याओं का सरल वैज्ञानिक समाधान ही सबसे बड़ा उद्योग बन जाता है। दुर्भाग्य से भारत में ऐसी अनेक अवधारणाओं को हम अक्सर “जुगाड़” कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि विकसित देश उसी विचार को वैज्ञानिक परीक्षण, डिज़ाइन, इंजीनियरिंग, पेटेंट और ब्रांडिंग के माध्यम से वैश्विक उत्पाद में बदल देते हैं। वास्तव में “जुगाड़” और “इनोवेशन” के बीच का अंतर केवल इंजीनियरिंग परिष्कार (Engineering Refinement) और व्यावसायिक क्रियान्वयन (Commercialisation) का है।
भारत प्रतिभा की कमी से नहीं जूझ रहा। हमारे इंजीनियर, वैज्ञानिक और विद्यार्थी विश्वभर में अपनी क्षमता सिद्ध कर चुके हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम डिस्कवरी से अधिक प्रोडक्ट डेवलपमेंट ,रिसर्च से अधिक व्यावसायीकरण, और आईडिया से अधिक बौद्धिक सम्पदा पर ध्यान दें।
आज भारत सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा निर्माण, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तकनीक और उन्नत विनिर्माण की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यदि इसी गति से विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और उद्योगों में एप्लाइड फिजिक्स, डिज़ाइन इंजीनियरिंग और अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जाए तो भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि तकनीक का निर्माता बन सकता है।
सरकार को भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ-साथ एप्लाइड फिजिक्स, डीप-टेक इनोवेशन, प्रोडक्ट इंजीनियरिंग और तकनीक के व्यावसायीकरण के लिए मिशन मोड में कार्य करना चाहिए। प्रत्येक राज्य में विश्वस्तरीय प्रोटोटाइप लैब, परीक्षण केंद्र, पेटेंट सहायता केंद्र और उद्योग-विश्वविद्यालय सहयोग मंच स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि प्रयोगशाला में जन्म लेने वाला विचार सीधे उद्योग तक पहुँच सके। साथ ही, देशभर में उभर रहे स्थानीय नवाचारों और तथाकथित “जुगाड़” समाधानों की पहचान कर उनका वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए। यदि उनमें वैश्विक उपयोगिता की संभावना हो, तो उन्हें डिज़ाइन, परीक्षण, पेटेंट, वित्तपोषण और “गो-टू-मार्केट” सहायता प्रदान करने के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय इकोसिस्टम विकसित किया जाना चाहिए।
भारत वह भूमि है जिसने मानव सभ्यता को शून्य, धातु विज्ञान, खगोल विज्ञान और गणित जैसी अमूल्य विरासत दी है। यदि हम उसी वैज्ञानिक परंपरा को आधुनिक भौतिकी, इंजीनियरिंग, डिज़ाइन और नवाचार से जोड़ दें तो “विकसित भारत” केवल एक सपना नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों की वास्तविकता बन जाएगा।
आज आवश्यकता केवल वैज्ञानिक सोच को सम्मान देने की नहीं, बल्कि उसे प्रयोगशाला से उद्योग और उद्योग से वैश्विक बाज़ार तक पहुँचाने की है। किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसके वैज्ञानिक मस्तिष्क, तकनीकी नवाचार और उत्पाद निर्माण की क्षमता से निर्मित होती है। यदि भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो हमें केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक और उत्पाद का सृजनकर्ता बनना होगा। विकसित भारत का मार्ग अंततः प्रयोगशाला से होकर उद्योग और फिर विश्व बाज़ार तक जाता है