समाज स्वास्थ्य स्‍वास्‍थ्‍य-योग

एक अंक का डॉक्टर

गजेन्द्र सिंह

लोकनीति विश्लेषक

2026 में तेलंगाना की नीट पीजी  राज्य कोटा काउंसलिंग ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक न्याय की मंशा और प्रवेश प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए। काउंसलिंग रिकॉर्ड बताते हैं कि 800 अंकों की परीक्षा में केवल 1 से 99 अंक प्राप्त करने वाले 20 अभ्यर्थियों को विभिन्न स्नातकोत्तर  पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिल गया। इनमें से 12 अभ्यर्थियों को देश के प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों उस्मानिया मेडिकल कॉलेज, हैदराबाद; गांधी मेडिकल कॉलेज, सिकंदराबाद; काकतीय मेडिकल कॉलेज, वारंगल; तथा सरकारी मेडिकल कॉलेज, सिद्दीपेट में सीटें आवंटित हुईं। यह केवल प्रवेश सूची का एक आंकड़ा नहीं है बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता, आरक्षण नीति के प्रतिकूल प्रभाव, रोगी सुरक्षा और भारत की प्रवेश नीति की मूल अवधारणा को चुनौती देता है। इन प्रवेशों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या केवल सीटें भरना पर्याप्त है, या चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम शैक्षणिक क्षमता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

सबसे अधिक चर्चा उस मामले की हुई, जिसमें अनुसूचित जनजाति  श्रेणी के एक अभ्यर्थी, जिसने 800 में से मात्र 1 अंक प्राप्त किया था, ऑल इंडिया रैंक लगभग 2,29,981, उसे एम.एस. ऑर्थोपेडिक्स जैसी अत्यंत प्रतिष्ठित शल्य चिकित्सा शाखा में प्रवेश मिला। इसी प्रकार 12 अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी को एमडी फॉरेंसिक मेडिसिन, 24 अंक प्राप्त करने वाले को एमडी पैथोलॉजी, 32 अंक प्राप्त करने वाले को एमडी पैथोलॉजी, 43 अंक प्राप्त करने वाले को एमडी रेस्पिरेटरी मेडिसिन, 59 अंक प्राप्त करने वाले को एमडी रेडियोडायग्नोसिस, 60, 91 अंकों पर एम.एस. ऑर्थोपेडिक्स, 93 और 99 अंकों पर एम.एस. जनरल सर्जरी, 91 और 94 अंकों पर एम.एस. प्रसूति एवं स्त्री रोग, 80 अंकों पर एमडी पीडियाट्रिक्स, तथा 65 और 84 अंकों पर एम.एस. ईएनटी  जैसी महत्वपूर्ण विशेषज्ञता वाली सीटें आवंटित की गईं। यदि ये आधिकारिक काउंसलिंग आँकड़े और मीडिया रिपोर्टें सही हैं तो यह केवल प्रवेश प्रक्रिया का विषय नहीं रह जाता बल्कि यह चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम गुणवत्ता मानकों, रोगियों की सुरक्षा और भारत की भावी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा गंभीर सार्वजनिक नीति का प्रश्न बन जाता है।

आज सार्वजनिक विमर्श में अक्सर यह भ्रम पैदा कर दिया जाता है कि मेरिट और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी हैं। वास्तव में ऐसा नहीं है। सामाजिक न्याय का उद्देश्य अवसरों की समानता स्थापित करना है जबकि मेरिट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन क्षेत्रों में मानव जीवन, राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक हित दांव पर हो, वहाँ सर्वोत्तम योग्यता उपलब्ध हो। बहुत कम लोग जानते हैं कि शिक्षा में आरक्षण का वर्तमान संवैधानिक आधार मूल संविधान का हिस्सा नहीं था। 1951 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ मद्रास बनाम चंपकम दोरैराजन मामले में कहा कि केवल जाति के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश देना संविधान के मूल प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। इसके बाद संसद ने प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा अनुच्छेद 15(4) जोड़ा, जिससे राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार मिला। अर्थात शिक्षा में आरक्षण संविधान के मूल अधिकारों का नहीं राजनीती का परिणाम है।

लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व अत्यंत आवश्यक है। संसद, विधानसभाओं, पंचायतों, नौकरशाही और सार्वजनिक संस्थाओं में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी लोकतांत्रिक वैधता को मजबूत बनाती है। किन्तु चिकित्सा, विमानन, परमाणु विज्ञान और रक्षा जैसे क्षेत्रों में समाज का पहला अधिकार सुरक्षित और सक्षम पेशेवरों पर होता है। रोगी यह नहीं पूछता कि चिकित्सक किस जाति का है। वह केवल यह चाहता है कि चिकित्सक योग्य हो।

डॉ. भीमराव आंबेडकर सामाजिक न्याय के सबसे बड़े समर्थकों में थे किन्तु वे दक्षता  के भी उतने ही प्रबल पक्षधर थे। इसी कारण संविधान में अनुच्छेद 335 जोड़ा गया, जिसमें स्पष्ट कहा गया “अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावों का ध्यान रखा जाएगा परन्तु प्रशासन की दक्षता बनाए रखना भी आवश्यक होगा।” यह प्रावधान केवल सरकारी सेवाओं तक सीमित नहीं बल्कि संविधान की व्यापक भावना को भी व्यक्त करता है कि सामाजिक न्याय और संस्थागत गुणवत्ता का संतुलन बना रहना चाहिए। भारतीय न्यायपालिका ने भी अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि आरक्षण का उद्देश्य मानकों को समाप्त करना नहीं, बल्कि अवसर उपलब्ध कराना है।     इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आरक्षण समान अवसर प्राप्त करने का साधन है, न कि दक्षता की पूर्ण उपेक्षा का आधार। प्रदीप जैन बनाम भारत संघ (1984) में न्यायालय ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और राष्ट्रीय हित को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। डॉ. प्रीति श्रीवास्तव बनाम मध्यप्रदेश राज्य (1999) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि विशेषज्ञ चिकित्सकों की क्षमता सीधे रोगियों के जीवन को प्रभावित करती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च चिकित्सा शिक्षा में शैक्षणिक मानकों से अत्यधिक समझौता उचित नहीं होगा। इन निर्णयों का सार यही है कि सामाजिक न्याय आवश्यक है, परन्तु चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता का न्यूनतम स्तर भी अनिवार्य है।

आज चिकित्सा शिक्षा में आरक्षण केवल एक चरण तक सीमित नहीं है। एक व्यक्ति को एमबीबीएस में प्रवेश से लेकर स्नातकोत्तर, सुपर स्पेशियलिटी, सरकारी नियुक्तियों तथा पदोन्नति तक विभिन्न स्तरों पर आरक्षण का लाभ मिलता है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं, बल्कि वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक स्तर पर समान प्रकार की रियायतें देना ही सामाजिक न्याय है, या फिर किसी चरण के बाद समान प्रतिस्पर्धा और उत्कृष्टता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ? विशेष रूप से चिकित्सा जैसे क्षेत्र में, जहाँ किसी चिकित्सक की योग्यता सीधे मानव जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है ?

इस समस्या का समाधान अधिक संतुलित, वैज्ञानिक और न्यायसंगत बनाना है। इसके लिए आवश्यक है कि सभी श्रेणियों के अभ्यर्थियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित न्यूनतम योग्यता मानक  अनिवार्य किया जाए। आरक्षण का लाभ केवल उन अभ्यर्थियों को मिले जिन्होंने यह न्यूनतम योग्यता प्राप्त कर ली हो। यदि किसी वर्ष किसी आरक्षित श्रेणी में पर्याप्त पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध न हों, तो शेष सीटें मेरिट के आधार पर भरी जानी चाहिए, ताकि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और समाज का हित दोनों सुरक्षित रह सकें। साथ ही, सामाजिक न्याय का वास्तविक स्वरूप प्रवेश परीक्षाओं में कट-ऑफ लगातार कम करने में नहीं, बल्कि स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षण, छात्रवृत्ति, कोचिंग, मेंटरशिप और समान अवसर उपलब्ध कराने में दिखाई देना चाहिए। जब प्रारंभिक स्तर पर शैक्षिक असमानताओं को दूर किया जाएगा, तब सामाजिक न्याय भी अधिक प्रभावी होगा और उत्कृष्टता भी अक्षुण्ण रहेगी। भारतीय संविधान सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता दोनों का दस्तावेज़ है। एक राष्ट्र के रूप में हमें ऐसे डॉक्टर चाहिए जो जाति आधारित व्यवस्था का प्रतिनिधत्व करने की बजाय  उस न्यूनतम ज्ञान, कौशल और व्यावसायिक दक्षता से युक्त हो जिस पर किसी नागरिक का जीवन निश्चिंत होकर भरोसा कर सके। जब प्रश्न मानव जीवन का हो, तब उत्कृष्टता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व, नैतिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है।