एक तराशा मां ने हीरा

बोल उठी – बलिदानी की,
एक समाधि बोल उठी।
बड़े प्रेम से बलिदानी की,
सारी बातें – बोल उठी ।।

एक तराशा मां ने हीरा,
किया देश को अर्पित।
आओ बैठो, बातें कर लो ,
कर लो पुष्प समर्पित ।।

वरमाला नहीं पड़ी गले में ,
पड़ी थी रस्सी फांसी की ।
चूमा बड़े प्रेम से उसको,
जब शत्रु ने फांसी दी ।।

अर्पित सर्वस्व किया देश को,
चाह की थाली खाली थी।
रहे सुरक्षित देश सदा ही,
बस यही कामना पाली थी।।

बलिदानों की धरती है ये,
स्थल है बलिदानी का ।
समाधि नहीं राष्ट्र चेतना,
नाम उचित वरदानी का।।

जाग उठो – अब सीना तानो ,
माता तुम्हें पुकार रही ।
शत्रु सम्मुख खड़ा आपके ,
भारत मां ललकार रही।।

सोच वही है, वेश वही है,
कुछ चेहरे बदले दिखते हैं।
रुप नया है दानवता का ,
सब पहचाने से लगते हैं।।

नीति वही – रणनीति वही,
हथियार वही हैं हाथों में।
घात लगाकर करते हमला,
करते सारा काम इशारों में।।

छलिया, छद्मी, पाखंडी सब,
आज भी उनके साथ खड़े।
इतिहास पुराना दोहराने को,
सभी विधर्मी साथ खड़े।।

गिद्धों की भांति रहे उतरते,
पुरा काल में दानव।
रीति वही आज भी जारी,
बढ़ते जा रहे देश में दानव।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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राकेश कुमार आर्य
उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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