23 जनवरी : राष्ट्रीय बालिका दिवस
बाबूलाल नागा
भारत में विकास और समानता की चर्चा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक उसमें बालिकाओं की स्थिति का ईमानदार मूल्यांकन न हो। 23 जनवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय बालिका दिवस इसी मूल्यांकन और आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। यह दिन केवल औपचारिक आयोजन या शुभकामनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, सरकार और परिवार—तीनों की जिम्मेदारियों को रेखांकित करता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसकी बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और अवसरों से आंकी जाती है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और लैंगिक भेदभाव जैसी सामाजिक समस्याओं पर गंभीर संवाद स्थापित करना रहा है। आजादी के सात दशक बाद भी देश के कई हिस्सों में बालिकाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और निर्णय लेने के अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि योजनाओं और नीतियों के बावजूद सामाजिक सोच में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं आ पाया।
भारतीय समाज में बालिकाओं को लेकर ऐतिहासिक रूप से दोहरी मानसिकता रही है। एक ओर देवी स्वरूप में पूजन तो दूसरी ओर जन्म से ही भेदभाव। बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या और शिक्षा से वंचित रखना जैसी कुप्रथाएं लंबे समय तक बालिकाओं के भविष्य पर भारी पड़ीं। हालांकि समय के साथ कानून बने, जागरूकता बढ़ी और कई सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले, लेकिन ग्रामीण और वंचित तबकों में आज भी यह समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं।
शिक्षा को बालिका सशक्तिकरण की सबसे मजबूत आधारशिला माना जाता है। शिक्षित बालिका न केवल आत्मनिर्भर बनती है, बल्कि परिवार और समाज को भी आगे ले जाती है। इसी सोच के तहत केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी योजनाएं शुरू की गईं। इन योजनाओं से नामांकन दर में सुधार तो हुआ है, लेकिन स्कूल छोड़ने की समस्या, डिजिटल संसाधनों की कमी और सुरक्षित वातावरण का अभाव आज भी चिंता का विषय बना हुआ है।
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में भी बालिकाओं की स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। कुपोषण, एनीमिया और किशोरावस्था से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं आज भी बड़ी चुनौती हैं। पर्याप्त पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच, स्वच्छता और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिए बिना सशक्तिकरण की कल्पना अधूरी है। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यह याद दिलाता है कि योजनाओं की सफलता तभी मानी जाएगी जब उनका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़ी बालिका तक पहुंचे।
बालिकाओं की सुरक्षा आज के समय का सबसे संवेदनशील विषय बन चुका है। घरेलू हिंसा, यौन शोषण, साइबर अपराध और सार्वजनिक स्थलों पर असुरक्षा जैसी घटनाएं समाज के लिए गंभीर चेतावनी हैं। कानूनों के साथ-साथ सामाजिक सोच में बदलाव और संवेदनशीलता की आवश्यकता है। सुरक्षित वातावरण केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि परिवार, विद्यालय और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसके बावजूद, यह भी सच है कि आज की बालिकाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। विज्ञान, खेल, कला, प्रशासन और उद्यमिता में उनकी बढ़ती भागीदारी यह साबित करती है कि अवसर मिलने पर वे किसी से पीछे नहीं हैं। अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर खेल मैदान तक, बालिकाएं देश का नाम रोशन कर रही हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।
बालिकाओं के हित में बनाए गए कानून और नीतियां तभी प्रभावी हो सकती हैं, जब समाज उनका ईमानदारी से पालन करे। बाल विवाह निषेध अधिनियम, पॉक्सो अधिनियम और शिक्षा का अधिकार जैसे कानून मजबूत आधार प्रदान करते हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन और सामाजिक स्वीकार्यता समान रूप से जरूरी है। मीडिया की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है, जो सकारात्मक उदाहरणों को सामने लाकर सामाजिक सोच को दिशा दे सकता है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस का असली उद्देश्य केवल एक दिन मनाना नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास करना है। यह दिन हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि हर बालिका को सुरक्षित बचपन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक भविष्य मिले। जब एक बालिका सशक्त होती है, तो पूरा समाज मजबूत होता है।
23 जनवरी पर यही संदेश उभरकर सामने आता है कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति हैं। आवश्यकता है उन्हें बराबरी का अवसर देने की, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ कह सकें—मैं सुरक्षित हूं, शिक्षित हूं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए स्वतंत्र हूं।
बाबूलाल नागा