आज के आधुनिक दौर में, जहां भौतिक सुख-सुविधाओं की भरमार है, वहीं पारिवारिक जीवन में तनाव और क्लेश भी तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। यह विडंबना ही है कि पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों से लेकर साधारण परिवारों तक, हर जगह रिश्तों में खटास देखने को मिल रही है। सास-बहू के बीच तकरार, देवरानी-जेठानी के विवाद, भाई-भाई में मनमुटाव और यहां तक कि पति-पत्नी के बीच भी बढ़ता तनाव, समाज की एक गंभीर समस्या बन चुका है।
यदि इन परिस्थितियों का गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो कई मामलों में एक सामान्य कारण सामने आता है—माँ और बेटी के बीच लगातार होने वाली बातचीत। आधुनिक तकनीक ने संवाद को सरल जरूर बना दिया है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी बढ़ा है। कई बार देखा गया है कि बेटी अपने ससुराल की छोटी-छोटी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर अपनी माँ से साझा करती है। वहीं माँ, ममता और मोह में आकर, बिना परिस्थिति को समझे, बेटी का पक्ष लेते हुए उसे ऐसी सलाह दे बैठती है जो उसके वैवाहिक जीवन में और अधिक तनाव पैदा कर देती है।
यहां पर माँ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। एक समझदार माँ वही है जो बेटी की हर बात पर आंख मूंदकर समर्थन न करे, बल्कि उसे संयम, धैर्य और समझदारी से काम लेने की सीख दे। यदि बेटी को हर छोटी बात पर प्रतिक्रिया देने की बजाय सहनशीलता और संवाद की कला सिखाई जाए, तो कई विवाद शुरुआत में ही समाप्त हो सकते हैं।
अक्सर यह भी देखा गया है कि कुछ माताएं अपनी बेटी को यह एहसास दिलाती रहती हैं कि उसका मायका ही उसका असली सहारा है। जबकि भारतीय संस्कृति में विवाह के बाद ससुराल को ही लड़की का वास्तविक घर माना गया है। विवाह के समय सात फेरों के साथ जो वचन लिए जाते हैं, उनमें पति-पत्नी के साथ-साथ दोनों परिवारों के सम्मान और समर्पण की भावना निहित होती है। यही कारण है कि पहले बेटियों को विदा करते समय उन्हें यह शिक्षा दी जाती थी कि अब उनका नया घर ही उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस परंपरागत शिक्षा को आधुनिक संदर्भ में पुनः जीवित किया जाए। इसका अर्थ यह नहीं है कि बेटी को अपने अधिकारों से वंचित किया जाए, बल्कि उसे संतुलन बनाना सिखाया जाए। उसे यह समझाया जाए कि हर घर में छोटी-मोटी समस्याएं होती हैं, जिन्हें समझदारी से सुलझाया जा सकता है।
माँ यदि अपनी बेटी को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करे, तो वही बेटी अपने घर को स्वर्ग बना सकती है। इसके विपरीत, यदि उसे हर बात पर विरोध करना और रिश्तों में कमियां ढूंढना सिखाया जाए, तो वह अनजाने में अपने ही घर में कलह का कारण बन सकती है।
समाज में बढ़ते पारिवारिक तनाव को कम करने के लिए जरूरी है कि माताएं अपनी भूमिका को समझें। वे केवल बेटी की हमदर्द न बनें, बल्कि उसकी मार्गदर्शक बनें। सही और गलत का फर्क समझाते हुए, उसे ऐसे संस्कार दें जो उसके जीवन को सुखमय बना सकें।
अंततः यह कहा जा सकता है कि एक समझदार माँ ही अपनी बेटी के वैवाहिक जीवन की सच्ची नींव रखती है। यदि वह सही दिशा दिखाए, तो बेटी अपने परिवार को प्रेम, सम्मान और सामंजस्य के धागों में पिरो सकती है। आज के तनावपूर्ण माहौल में यही सोच और संस्कार हमारे समाज को एक बार फिर से मजबूत और खुशहाल बना सकते हैं।
-सुरेश गोयल धूप वाला