राजनीति

छात्र हितों में ‘एबीवीपी’ का योगदान सराहनीय 

स्थापना 9 जुलाई 1949

डा.रमेश ठाकुर

 
‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ भारत का प्रमुख छात्र संगठन है जिसकी स्थापना 9 जुलाई 1949 को हुई थी। संगठन आज अपनी स्थापना का 77 वां संस्करण मना रहा है। यह ऐसी छात्र इकाई  है जो भारत के विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के कल्याण से संबंधित तमाम गतिविधियों और उपलब्धियों से भरी है। पूरे भारत में संगठन की सैकड़ों शाखाएं फैली हैं, मुख्यालय मुम्बई (महाराष्ट्र) में हैं। संगठन के पहले नेशनल प्रेसिडेंट प्रो.ओम प्रकाश बहल बनें थे। आजादी के दो वर्ष उपरांत बने इस संगठन की पाठशाला से निकले अनगिनत नेताओं ने राष्ट्रीय फलक की राजनीति में अपनी आमद दर्ज करवाकर सफलता का परचम लहराया है। सामाजिक कार्यकर्ता बलराज मधोक की पहल पर जून-1948 में इस संगठन की नींव मात्र 25 बंदों की अगुवाई में रखी थी जिसमें 15 अध्ययनरत छात्र शामिल थे। संगठन का औपचारिक तौर पर पंजीकरण दिसंबर 1949 में हुआ था। तब से लेकर आज तक छात्रों से संबंधित समस्याओं का निवारण करवाने में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सदैव अग्रणी भूमिका निभाता आया है।  


एबीवीपी का नारा ‘ज्ञान, शील और एकता’ जैसे प्रेरक शब्दों से लबरेज है। उन्हीं आदर्शों पर यह छात्र इकाई पिछले 77 वर्षों से निस्वार्थ चलती आई है। हालांकि, वर्ष-1980 में एक और नारा जुड़ा था। ‘छात्र शक्ति- राष्ट्र शक्ति’ यानी छात्र ही भारत का भविष्य और शक्तियां हैं। अखिल भारतीय विधार्थी परिषद् से अनुमानित करीब 55 से 60 लाख छा़त्र जुड़े हैं इसलिए इस संगठन को विश्व का सर्वाधिक विशाल छात्र संगठन माना जाता है जिसने आरंभ से ही छात्रों के शैक्षिक उत्थान और राष्ट्र निर्माण के लिए निस्वार्थ कार्य किया है। संगठन छात्रों में नेतृत्व क्षमता, राष्ट्र निर्माण का भाव और समाज सेवा की अलख जगाता है। एबीवीपी विभिन्न विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और स्कूलों में सालाना कार्यशालाएं आयोजित करता है जिससे छात्रों के भीतर देशभक्ति, व्यक्तिगत विकास और सामाजिक जन चेतना-सरोकार की भावनाओं को विकसित करने के अलावा छात्र हितों के लिए आवाज उठाने का मंचीय माहौल प्रदान करता है। एबीवीपी ने विभिन्न आंदोलनों में भी अपनी भागीदारी निभाई है। १९७० के दशक में संगठन ने भ्रष्टाचार और सरकारी निष्क्रियता जैसे निम्न मध्यम वर्गों से संबंधित मुद्दों को तेजी से उठाया था। जिसकी चर्चाएं राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार तक होती रही थी। बिहार आंदोलन में एबीवीपी ने महत्ती भूमिका निभाई थी।

 
शिक्षण संस्थाओं में जहां कहीं भी छात्रों को शोषण होता है वहां ये संगठन पहुंचकर समस्याओं को सुलझाने व बुनियादी मुद्दों को सुलझाने में सक्रिय भूमिका निभाता है। इसके अलावा एबीवीपी पदाधिकारी युवाओं-छात्रों को समाज के प्रति जागरूक करने के लिए रक्तदान शिविर, पर्यावरण संरक्षण और कुदरती आपदाओं के वक्त राहत-बचाव कार्यों में सेवा करने की शिक्षा भी देता है। इसके लिए एबीवीपी की इकाई समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं जिनमें छात्रों को भारतीय संस्कति से रूबरू करवाने और राष्टृीय एकता का भाव जगाने में मदद करती है। ऐसी गतिविधियों को देखकर अभिभावक भी अपने बच्चों को एबीवीपी के कार्यक्रमों से जुड़ने की सलाह देकर भेजते हैं। सार्वजनिक वार्ता, सेवाभाव वाली गतिविधियां, दीपोत्सव, वृक्षारोपण अभियान, स्वच्छता वाले मूवमेंट, छात्र संवाद, करियर परामर्श सत्र, छात्र पार्लियामेंट, निंबध प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक धरोहर कार्यक्रम जैसे तमाम विषयों पर अखिल भारतीय छात्र परिषद् के सेमिनार होते रहते हैं। अखिल भारतीय छात्र परिषद् द्वारा आयोजित सेमिनारों से जुड़कर छात्र ना सिर्फ अपने बौद्धिक समझ मजबूत करते हैं बल्कि व्यक्तित्व निर्माण को भी मजबूत करते है। यही कारण है कि पूरे विश्व में एबीवीपी के सराहनीय कार्यों को देखकर सराहना होती है।

एबीवीपी लगातार अपना सेवा का विस्तार करता जा रहा है। देखा-देखी पड़ोसी देशों में भी एबीवीपी की नकल पर छात्र संगठन बने हैं। भारत में जब आपातकाल लगा तो उसमें भी ये छात्र संगठन शामिल हुआ। वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह भी एबीवीपी से आए हैं. उनकी राजनैतिक वैचारिक यात्रा यहीं से शुरू हुई थी। एक वक्त एबीवीपी की कार्यशैली मात्र दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विश्विद्यालय, गुजरात विश्वविद्यालय और गुवाहाटी यूनिवर्सिटी तक ही सीमित हुआ करती थी लेकिन 1985 के बाद विभिन्न राज्यों में शाखाएं स्थापित होने के बाद विशालकाय संगठन उभरा। आज इस संगठन की चर्चाएं ग्लोबल मंचों पर होती हैं। 

वैश्विक मंचों की जब भी चर्चाएं होती हैं तो कुछ छात्र संगठन ऐसे रहे हैं जिन्हें आज भी याद किया जाता है। जैसे 17 ब्रिस्टो प्लेस स्थित ‘टेविओट रो हाउस’ दुनिया का सबसे पुराना छात्र संगठन है। वह संगठन एडिनबर्ग विश्वविधायल का हिस्सा रहा था जिसे सिडनी के महान वास्तुकार ‘मिशेल माइच’ ने साल-1889 में स्थापित किया था। हालांकि, छात्र कल्याण और उनके हितों में निरंतर कार्य करके ‘अखिल भारतीय छात्र परिषद्’ ने उस संगठन को भी पीछे छोड़ दिया है। एबीवीपी का राजनैतिक संबंध भी है उसे आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी से जोड़ा जाता है पर, गौर से आंकलन करें तो संगठन की कार्यशैली राजनैतिक कतई नहीं दिखती है। एबीवीपी के मुकाबले कांग्रेस से वास्ता रखने वाला ‘एनएसयूआई’ भी छात्रहितों में कार्यरत है। इन दोनों के अलावा भारत में सबसे पुराने छात्र संगठन की बात करें तो ‘आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन’ यानी ‘एआईएसएफ’ है जिसकी स्थापना 12 अगस्त 1936 में हुई थी। संगठन का पहला उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू और अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने किया था लेकिन धरातल पर यह संगठन अब एकदम निष्क्रिय है। छात्र संगठनों का मूल मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रों का प्रतिनिधित्व करना मात्र होता है। छात्रों के हितों में आवाज उठाना और उनकी समस्याओं को शिक्षण संस्थाओं के साथ मिलकर सुलझाने को एबीवीपी अपना पहला धर्म समझता है। यशवंत राव केलकर, दत्तोपंत ठेंगड़ी, मनमोहन वैध, सुनील अंबेडकर, बलराज मधोक जैसे कुछ नाम हैं जिनको एबीवीपी का वास्तविक निर्माता माना जाता है। इन्होंने छात्र अधिकारों की लड़ाई में अपना संपूर्ण जीवन खपा दिया।


डा.रमेश ठाकुर