जयंती वैशाख शुक्ल पंचमी (दिनांक 21 अप्रैल)
राकेश सैन
जब आध्यात्मिक अंधकार मानवता को घेर लेता है और धर्म के शाश्वत सिद्धांत विलुप्त होने के कगार पर होते हैं, तब परम चेतना ब्रह्माण्डीय व्यवस्था को पुनस्र्थापित करने के लिए मानव रूप धारण करती है। ये दिव्य अवतार विशिष्ट रूपों और उद्देश्यों के साथ प्रकट होते हैं, जो अपने समय के आध्यात्मिक संकटों को दूर करने के लिए विशिष्ट रूप से उपयुक्त होते हैं। श्री आदि शंकराचार्य इन प्रकाशमान व्यक्तियों में भगवान शिव के अवतार के रूप में विराजमान हैं, जिनका बारह शताब्दी पूर्व प्रकट होना भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य को रूपांतरित करने, वेदांत के गहन ज्ञान को पुनर्जीवित करने और विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का कारण बना। यह सर्वमान्य है कि यदि आज सनातन धर्म फलता-फूलता है और हमें इसके आध्यात्मिक खजानों का लाभ उठाने का अवसर देता है, तो यह मुख्य रूप से श्री शंकराचार्य के दिव्य हस्तक्षेप और अथक परिश्रम के कारण ही संभव है। उनकी विरासत विश्व भर के साधकों के लिए मार्ग को प्रकाशित करती रहती है, और शाश्वत ज्ञान की जीवंत परंपरा की नींव के रूप में कार्य करती है।
श्री आदिगुरु शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत के केरल प्रदेश के कालड़ी (कालटी/कालादि) नामक ग्राम में हुआ ऐसा माना जाता है। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभाशाली थे। उन्होंने अपनी मातृभाषा के साथ-साथ वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य शास्त्रीय विषयों का अध्ययन अल्पायु में ही प्रारंभ कर दिया। उनके पिता का देहांत बचपन में ही हो गया, जिसके बाद उनकी माता ने उनका उपनयन संस्कार कराकर उन्हें गुरुकुल में विधिवत् शिक्षा हेतु भेजा। वहाँ उन्होंने वेद-शास्त्र, वेदांग, दर्शन आदि का गहन अध्ययन किया और शीघ्र ही अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त की।
वे अत्यंत कम आयु में ही उच्च कोटि के विद्वान और आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे।
आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथों में उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखे गए भाष्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भाष्यकार के रूप में उनका स्थान भारतीय दर्शन के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी व्याख्या-शैली तार्किक, गूढ़ और अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। उनके ग्रंथ केवल दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन ही नहीं करते, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को सुदृढ़ रूप से स्थापित किया और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को एक नवीन दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके विचारों में समन्वय, एकत्व और सार्वभौमिकता का संदेश निहित है। इसी कारण वे केवल एक दार्शनिक ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक के रूप में जगद्गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
आदि शंकराचार्य ने ‘अद्वैत वेदांत’ का सिद्धांत दिया, जिसका मूल भाव है- ‘ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव और ब्रह्म एक हैं।’ इस सिद्धांत ने यह स्पष्ट किया कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश है, जिससे मानव मात्र की एकता का संदेश मिलता है।
एकता और अखंडता और वैदिक धर्म की प्रतिष्ठापना
शंकराचार्य के जीवन का प्रधान लक्ष्य वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा तथा प्रचार था। उन्होंने अपने प्रखर व्यक्तित्व के बल पर इन समस्त अवैदिक अथवा अर्धवैदिक तथा नास्तिक सिद्धान्तों को जन सामान्य में अलोकप्रिय बना दिया और उनकी नि:सारता प्रमाणित कर दी तथा वेद-प्रतिपाद्य अद्वैतमत का विपुल सृजन कर वैदिक धर्म को लोकप्रिय बना दिया। यही कारण है कि उन्हें साक्षात् भगवान शिव का अवतार मानता गया है। अपनी विलक्षण दार्शनिक प्रतिभा के द्वारा शंकराचार्य ने एक ऐसे दार्शनिक सिद्धान्त की स्थापना की है जो न एकदम भौतिकवाद है, न कोरा कर्मवाद और न शुष्क ज्ञानवाद।
उनका अद्वैतवाद भक्ति, कर्म और ज्ञान, स्थूल और सूक्ष्म का समन्वयभूत सिद्धान्त है। वैदिक ग्रंथ दुरुह तथा क्लिष्ट संस्कृत प्रधान होने के कारण जनसामान्य के लिए उपेक्षित बने हुए थे। आचार्य शंकर ने उपनिषदों की विशदव्याख्या कर जिस साहित्य की सृजना की वह भारतीय चिरन्तन संस्कृति की अमूल्यनिधि है। ब्रह्मसूत्र और गीता पर उन्होंने अपने सुबोध भाष्यों का प्रणयन किया।
वेदान्त-दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन का उनका प्रयास सर्वप्रथम तथा सर्वोत्तम है।
आज जिन रामानुज आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तों की तुलना शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धान्तों से की जाती है उनको भी भाष्य रचना की प्रेरणा आचार्य शंकर से प्राप्त हुई है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन परम्परा के मूल प्रवर्तक हैं।
साधारण लोगों के लिए उन्होंने प्रकरण ग्रन्थों की रचना कर अपने सिद्धान्त को बोधगम्य भाषा में सरल, सरस श्लोकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। इतना ही नहीं, वेदान्त शास्त्र के सिद्धान्तों के विपुल प्रचार की अभिलाषा से उन्होने अपने भाष्य ग्रन्थों पर वृत्ति तथा वार्तिक लिखने के लिए विद्वानों को प्रोत्साहित किया। शिष्यों के हृदय में उनकी प्रेरणा प्रभावशालिनी सिद्ध हुई। उन लोगों ने आचार्य से प्रेरणा ग्रहण कर जिस विपुल ग्रन्थ राशि का अद्वैत-प्रतिपादन के लिए प्रणयन किया है, उसकी रचना की प्रेरणा का मूलस्रोत आचार्य के ग्रन्थों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रकार अद्वैत साहित्य को जन्म देकर शंकर ने ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि जिससे समग्र देश की जनता उनके द्वारा प्रचारित धर्म का मर्म समझे और कोई भी अद्वैत तत्त्व के उपदेश से वंचित न रह जाय। अत: शंकराचार्य न केवल एक महान् नेता है बल्कि वह जन भावनाओं को अधिगृहीत करते हुए प्रतीत होते हैं।
धर्म-संस्थापन कार्य को स्थायी बनाने के लिए शंकर ने सन्यासियों को संघबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अपनी शिक्षा-दीक्षा, उपासना तथा निवृत्ति के कारण सन्यासी समाज ही भलीभाँति उपदेशक हो सकता है। आचार्य ने इसीलिए उसे संघबद्ध करने का सफल प्रयास किया। वस्तुत: विरक्त पुरुष ही धर्म का सच्चा उपदेश दे सकता है तथा अपना जीवन वैदिक धर्म के अभ्युदय एवं विकास में लगा सकता है।
शंकर ने इस विरक्त सन्यासी वर्ग को एकत्र कर एक संघ के रूप में संगठित कर वैदिक धर्म के भविष्यगत कल्याण के लिए महान् कार्य किया। सन्यासी संघ की स्थापना राष्ट्र एवं धर्म के हित में शंकर का अत्यन्त गौरवशाली कार्य है।
चार मठों की स्थापना
आचार्य शंकराचार्य ने भारतवर्ष की धार्मिक व्यवस्था को अक्षुण्य बनाये रखने के लिये प्रख्यात तीर्थ-स्थानों में मठों की स्थापना की। चारों धाम के पास आचार्य ने चार विख्यात मठों की स्थापना की। इनमें गोवर्धनमठ भारत के पूर्वी भाग में जगन्नाथ पुरी में प्रतिष्ठापित है। ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के पास उत्तर में स्थित है। शारदामठ काठियावाड में द्वारिकापुरी में है। श्रृंगेरीमठ मैसूर में दक्षिण भारत में है।
उसी दक्षिण भारत में सप्तमोक्षपुरियों में अन्यतम श्रीकाच्ची में भी मठ प्रतिष्ठापित है तथा तुङ्गभद्रा के तीर में कुडलि मठ स्थित है। इसी तरह अन्यान्य स्थानों में भी कई मठ स्थापित हैं। इन पीठो के अधिपतियों का मुख्य कत्र्तव्य अंतर्भुक्त प्रान्तों के निवासियों को धर्मोपदेश करना तथा वैदिक मार्ग के ऊपर सुचारु रूप से चलने की व्यवस्था करना था। प्रत्येक मठ का कार्यक्षेत्र पृथक-पृथक रखा गया था, परन्तु पारस्परिक सहयोग खूब था। मठ के अध्यक्षों का आज भी यह प्रधान कार्य है। अपने क्षेत्र के अंतर्गत वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों में धर्म की प्रतिष्ठा को दृढ़ रखना तथा तदनुकूल उपदेश देना, ये अध्यक्ष आचार्य शंकर के प्रतिनिधि रूप हैं। इसी कारण ये भी शंकराचार्य कहलाते हैं। मठों की स्थापना के अनन्तर आचार्य ने अपने चारों पट्ट-शिष्यो को इनका अध्यक्ष नियुक्त किया, यह सर्वसम्मत बात है। आदिगुरु शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा आदि शंकराचार्य को भारतीय संस्कृति में ‘एकता के देवदूत’ के रूप में देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने विचारों, यात्राओं और कार्यों के माध्यम से पूरे भारत को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। आचार्य ने भारतवर्ष में सर्वत्र अद्वैत मत के प्रचार करने का संकल्प लिया
और सम्पूर्ण भारत-भ्रमण किया विरोधियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें परास्त लिया एवं सर्वत्र अद्वैत वेदांत की वैजयंती फहराई।
आचार्य शंकर के साथ उनके भक्त शिष्यों की एक वृहत मंडली थी। साथ ही साथ वैदिक धर्म के परम हितेषी राजा सुधन्वा भी आकस्मिक आपत्तियों से बचाने के लिए इस मंडली के साथ थे। इस प्रकार यह मंडली भारतवर्ष के प्रधान तीर्थ तथा धर्म क्षेत्र में जाती, विरोधियों की युक्तियों को आचार्य खंडन करते और अपने अद्वैत मत में दीक्षित करते। आचार्य शंकर का यह तीर्थ भ्रमण दिग्विजय के नाम से प्रख्यात है। शंकर के चरितग्रंथों में इसी का विशेष रूप से वर्णन रहता था। इसीलिए वे शंकर दिग्विजय के नाम से प्रख्यात होते आए हैं।
राकेश सैन