जगमोहन की किताब ‘कश्मीर दहकते अंगारे’ के पन्ने रंगे पड़े हैं राहुल के पिता के क्रूर व्यवहार से
अर्जुन शर्मा
क्या गांधी परिवार के दिमागी तवाजन में सत्ता से फारिग होकर छटपटाहट व हड़बड़ाहट का कोई पुराना रोग है, इस सवाल का सटीक जवाब तो गांधी परिवार के दिमाग के विशेषज्ञ डाक्टर ही दे सकते हैं पर इतिहास बताता है कि ऐसी कोई न कोई गड़बड़ी तो जरूर रही है।
थल सेना के पूर्व जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की (अप्रकाशित) किताब फोर स्टार आफ डैस्टिनी में लिखित चार लाईनों को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण को बाईपास करके पढ़ने की जिद व उससे भी बड़ी बात उसमें सरकार का सेना प्रमुख को मौके पर अपना विवेक इस्तेमाल की दी गई खुली छूट को भी अपने शब्दों व प्रसंग सहित व्याख्या में पेश करने की छटपटाहट दिखाते राहुल गांधी को सारे देश ने देखा है।
हमने महाभारत में जिस प्रकार राजसभा तमाम समझदारों द्वारा दुर्योधन को ये समझाते देखा कि इंद्रप्रस्थ के स्थान पर पांच गांव की मांग बेहद व उसी के पक्ष का खरा सौदा है पर जैसे वो असभ्य योद्धा सुई की नोक के बराबर भूमि भी न देने की जिद पर अड़ कर राजसभा की सारी मन मर्यादा को धूल धुसरित करता रहा, लगभग वैसे ही जिद्दी बालक जैसा व्यवहार कांग्रेस के अधेड़ होते युवा युवराज का हाल भारत की संसद में दिखाई पड़ा। अपनी थोथी जिद के कारण पहले दिन किताब का प्री. प्रिंटेड लिंक लाकर किताब पर छपे किसी विश्लेषण का हवाला देता देता युवराज दूसरे दिन संसद परिसर में बाकायदा छपी दिखने वाली किताब भी उठा लाया। रक्षा मंत्रालय ने पिछले एक साल से इस किताब की रिलीज को मंजूरी नहीं दी है. बताया जा रहा है कि सेना के नियमों और पेंशन कानूनों के चलते इस किताब के प्रकाशन पर कानूनी पेंच फंसा हुआ है और इन हालात में वो छपी हुई किताबें राहुल गांधी कहां से ले आए जिनके बारे में प्रकाशक पैंग्ईन तक ने पुलिस को बयान दिया है कि उनकी तरफ से किताब का प्रकाशन ही नहीं हुआ। हो सकता है कल को ये इल्जाम भी युवराज प्रधानमंत्री के सर लगा दे कि किताबें उन्हें मोदी साहिब ने ही उपलब्ध करवाई हैं क्योंकि प्रधानमंत्री के नीचे किसी पर आरोप लगाना भी तो युवराज अपनी हत्तक ही मानते हैं।
बहरहाल बात शुरु की थी गांधी परिवार द्वारा सत्ता से फारिग किये जाने पर इन लोगों पर पड़ने वाले दिमागी प्रभाव के बारे में तो जहां राहुल के चाचा संजय गांधी द्वारा रोल्स – रॉयस कंपनी में अप्रेंटिसशिप भी पूरी न करने के बावजूद जिस प्रकार भारत में मारूति कार बनाने के नाम पर की गई जिद ने जितना रायता फैलाया, उस पर तो कई किताबें लिखी हुई हैं जिस सनक को उनकी मौत के कई साल बाद भारत सरकार के प्रोफेशनल्स को वो काम अंजाम तक पहुंचाना पड़ा।
खैर, बात हो रही थी राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी जी की। वे 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में उपजी सहानुभूति लहर पर सवार होकर नेहरू जी के भी बड़ी प्रचंड जीत के कंधे पर सवाल होकर देश के प्रधानमंत्री बने व 1989 में उनके ही डिप्टी रहे वीपी सिंह ने राजीव पर लगे बोफोर्स के कथित दाग के चलते उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। ये कथा उसके ठीक चार महीने बाद की है। घटना घटी कश्मीर में व उसका विवरण आपको जगमोहन जी की किताब कश्मीर दहकते अंगारे के पन्ने 313 से 324 तक फैला हुआ मिलेगा।
पृष्ठभूमि-
कश्मीर के विस्फोटक हालात में जब वहां शासन-प्रशासन-न्यायपालिका व कार्यपालिका लगभग पंगु हो चुकी थी। कश्मीरी पंडितों को 99 फीसदी तक कश्मीर से खदेड़ा जा चुका था। 20 जनवरी 1990 को श्री जगमोहन को केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बना कर भेजा था। जगमोहन के नाम की घोषणा होते ही मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्लाह की सरकार ने अपनी जान छुड़वाते हुए सरकार से त्यागपत्र देकर राज्यपाल को एक प्रकार से निहत्था कर दिया था। प्रदेश की सरकारी मशीनरी हाथ पैर समेटे घर बैठ गई थी। वहां पाकिस्तान का अघोषित शासन था। राज्यपाल को समय न देते हुए सीमा पार से प्रोग्राम आ चुका था। 26 जनवरी शुक्रवार यानी जुम्मे का दिन था। उस दिन आजादी दिवस पर कोई रोक-टोक होने की गुंजायश न थी, सो प्रोग्राम था कि 26 जनवरी की आड़ में जुम्मे की दोपहर की नमाज पर हजरतबल में कम से कम दस लाख लोगों को शहर-कस्बों, धार्मिक स्थलों से अनाऊंसमेंट करके इक्ट्ठा करके वहां धार्मिक तरीके से नमाज अता की जाए व साथ ही आजादी की घोषणा कर दी जाए व तुरंत आजाद कश्मीर यानी इस्लामी गणराज्य का झंडा फहरा दिया जाए। अपने पुलिस वाले हथियार नहीं उठाएंगें। इवैंट कवर करने के लिए विदेश तक से फोटो पत्रकारों का जमावड़ा पहले ही श्रीनगर में लग चुका था, तैयारियां पूरी थी। यदि झंडा फहराए जाने के बाद भीड़ बेकाबू हो भी जाए तो लाखों लोगों पर कितनी फौज चढ़ाई जा सकेगी। वहां गोली चली तो हजारों मरेंगे, कई ब्लू स्टार हो जाएंगे व सारा इल्जाम भारत सरकार के सर लगा कर दुनिया भर में बदनाम कर दिया जाएगा। आतंकवाद व डीप स्टेट का ईको सिस्टम पूरी तरह मुस्तैद था। ये योजना बेहद गुप्त रखी गई थी।
परंतु जगमोहन ने बतौर राज्यपाल एक जोखिम उठाया। 25 जनवरी दोपहर से शहर में सख्ती से कर्फयू लागू किया गया। 26 जनवरी को पत्ता भी नहीं हिलने दिया। आतंकियों से लेकर पाकिस्तान की सारी योजना धरी की धरी रह गई। उनके पास सारी तैयारियां थी पर जिस जनता को आगे करके सारा कांड करना था, वो घरों से निकल ही नहीं पाई तमाम उकसावों के बावजूद। देश को तोड़ने की सबसे बड़ी कोशिश विफल हो चुकी थी। इतने संवेदनशील हालात थे।
जगमोहन जी की किताब के पन्नों से
सर्वदलीय परामर्शदात्री समिति का दौरा
7 मार्च, 1990 को प्रधानमंत्री निवास पर हुई बैठक में निश्चय किया गया कि अगले ही दिन कुछ मंत्रियों समेत सभी राजनीतिक दलों का एक प्रतिनिधि मण्डल श्रीनगर का दौरा करेगा। यह निश्चय करने वालों ने यह नहीं सोचा कि यह समय दौरे के उपयुक्त नहीं था। उन्हें वास्तविकता का इतना भी ज्ञान नहीं था कि इतनी अल्पकालीन सूचना पर राज्य प्रशासन इतने अति विशिष्ट व्यक्तियों की त्रुटि रहित सुरक्षा का प्रबन्ध कैसे कर सकेगा ।
लगभग आधी रात के समय केन्द्रीय गृह सचिव शिरोमणि शर्मा ने टेलीफोन पर मुझसे सम्पर्क किया। उन्होंने मुझे बताया कि एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल कल प्रातःकाल विशेष विमान से श्रीनगर आ रहा है। उनकी सुरक्षा और आवास की व्यवस्था कर दी जाये। उन्हें यह मालूम नहीं था कि इस प्रतिनिधि मण्डल में कौन-कौन आ रहा हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में हुई मीटिंग अभी कुछ ही देर पहले समाप्त हुई है और इस दल के दौरे के बारे में बड़ी जल्दी में निर्णय लिया गया है। गृह सचिव ने यह बात बहुत ही क्षमायाचना पूर्ण ढंग से कही। उनकी स्थिति को मैं समझता था। ऐसा प्रतीत होता था कि उसे स्वयं इस निर्णय और श्रीनगर जाने के समय के औचित्य में सन्देह था परन्तु उन्होंने उक्त निर्णय लेने वालों को बुद्धिमान भी नहीं कहा।
मैं इस बात से आश्चर्यचकित था कि कितनी कठिन स्थिति के सम्बन्ध में उनका यह दृष्टिकोण कितना दिखावटी और छिछला था। वे इस दौरे से क्या लाभ होने की सोच रहे थे ? ऐसा निश्चय करने से पूर्व राज्यपाल, उसके सलाहकारों, पुलिस महानिदेशक या केन्द्रीय अथवा राज्य गुप्तचर विभाग से परामर्श क्यों नहीं कर लिया गया ? विस्फोटक मामलों में यदि इन लोगों के विचार नहीं जानने थे, तो भी इतने सारे संगठनों के लोगों को लाने की क्या आवश्यकता थी ? यदि इस दौरे को एक दो दिन आगे पीछे रखा जाता तो क्या हानि हो जाती ? इस दौरे की इस जल्दी से क्या लाभ होने वाला था और इसके कारण पैदा होने गली अव्यवस्था क्या उपयुक्त थी ? दुर्भाग्य से सारी बातें इनसे उलट थीं। इससे परा प्रशासन और सुरक्षा सम्बन्धी तन्त्र गड़बड़ा ही नहीं गया, इससे दीर्घ व अल्प कालीन समस्याएं और बढ़ीं ।
इसके लिए प्रबन्धकों को आधी रात के समय उठाया गया,
वाहनों और चालकों की सर्दियों की आधी रात में तलाश आरंभ हुई, अगली सुबह जिन स्थानों पर छापे मारने थे, उन्हें छोड़ कर सुरक्षाधिकारियों को नये काम सोपे गये। हवाई अड्डे से सैण्टोर होटल का मार्ग सुरक्षित नहीं था- इस पर गोली अथवा हथगोलों से हमले का खतरा था। और कुछ नहीं तो भी भीड़ के इकट्ठा होने और रास्ता रोके जाने की सम्भावना थी जिस पर बल प्रयोग करना पड़ता तो इस बात का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय तौर पर भारी प्रचार होता ।
रात के तीसरे पहर शिरोमणि शर्मा ने फिर फोन किया और बताया कि सम्भवतः राजीव गांधी भी इस दल में आ रहे हैं पर इस समय तक गृह सचिव को यह पता नहीं था कि कौन और कितने व्यक्ति आ रहे हैं। प्रातःकाल हवाई अड्डे पर अप्रत्याशित रूप से लम्बा चौड़ा प्रतिनिधि मण्डल पहुंचा। इसमें उप-प्रधानमन्त्री देवीलाल के अतिरिक्त दो मन्त्री- रेल मन्त्री जार्ज फर्नाडीज और कानून मन्त्री दिनेश गोस्वामी भी थे। दूसरे विमान में बहुत से पत्रकारों और दूरदर्शन का दल भी आ पहुंचा। जब ये लोग सेन्टोर होटल जा रहे थे तो मेरे सलाहकार वेद मरवाह ने इस दल के लोगों के सम्बन्ध में मुझे वायरलेस से सूचना दी। मैं फौरन ही देवीलाल तथा अन्य लोगों से मिलने होटल गया ।
इन लोगों के श्रीनगर पहुंचने की सूचना शहर में तेजी से फैल गई। वस्तुतः कुछ लोगों को इस सम्बन्ध में सूचना रात को ही मिल गई थी। नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं ने अपने कुछ मित्रों को फोन पर सूचना दे दी थी। वे दिन भर समिति के सामने कुछ गुटों को लाकर राज्यपाल प्रशासन को परेशानी में डालने की योजनाएं बना रहे थे. वे अधिक से अधिक अड़चनें और अपने को ‘जुल्मशुदा’ लोगों का मसीहा दिखाने और मनगढ़न्त दोषारोपणों का स्वांग रचने की योजनाएं बना रहे थे।
जिस बात का मुझे डर था, वही हुआ। सारा श्रीनगर शहर मस्जिदों में लगाये गये लाउड स्पीकरों पर लगाये जाने वाले उत्तेजनात्मक नारों से गूंज उठा । लोगों को जबरदस्ती घरों से बाहर निकल कर यह कहने को मजबूर किया गया कि “भारतीय कुत्तो, वापस जाओ।” तनाव बढ़ा और कानून तथा व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई। व्यापक हिंसा भड़कने का खतरा पैदा हो गया। सख्ती से कर्फ्यू लागू करना पड़ा । कुछ मन्त्री और दल के सदस्य जनता के प्रतिनिधि मण्डलों से मिलना चाहते थे, कुछ नगर में जाकर स्थिति देखना चाहते थे। इस अनिश्चय ने मुझे और परेशान कर दिया।
मैंने उप-प्रधानमन्त्री को सुझाव दिया कि राज्यपाल से समिति के सभी सदस्यों को राज्य की स्थिति, विशेष रूप से राजनीति स्थिति की जानकारी देने को न कहा जाये। अच्छा यह होगा कि मैं आपको तथा मन्त्रियों को स्थिति की जानकारी दूं। उसके बाद आप लोग अन्य सदस्यों से बात कर लें परन्तु कोई निश्चय नहीं हो पाया और इसी अनिश्चय की स्थिति में मुझे कांफ्रैंस वाले कमरे में ले जाया गया ।
जिस तरह की यह मीटिंग थी और जिस प्रकार के विषय पर उसमें विचार होना था, उसे देखते हुए उपस्थिति काफी अधिक थी। कांग्रेस (इ) के सदस्यों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी। इसमें राजीव गांधी के अतिरिक्त शिवशंकर, एम० एल० फोतेदार, गुलाम नबी आजाद और मणिशंकर अय्यर भी थे। नेशनल कांफ्रेंस के सांसद पी० एल० हाण्डू और मुहम्मद शफी बट भी थे। स्पष्ट था कि वे कांग्रेस (इ) की बात में बात मिलाने वाले थे। दोनों के विचार समान थे । फारूख अब्दुल्ला नहीं आये। मैं समझता हूं कि यह उनकी स्वभावगत विशिष्टता थी कि वह कोई ऐसी बात करेंगे और काम करेंगे जो सबसे अलग हो। मुझे पता चला कि वह दिल्ली हवाई अड्डे पर आये थे पर दल के साथ नहीं आये। सांसद सैफुद्दीन सोज श्रीनगर आये थे पर वह अलग चले गये थे । अनुमानतः वह और फर्नांडीज किसी अन्य योजना पर काम कर रहे थे। वातावरण अनिश्चय के कारण धूमिल और बोझिल था और असम्बद्ध बातों का जोर था ।
दिसम्बर, 1987 के अनुभव के बाद मुझे उन मानव मूल्यों के प्रति अनास्था पैदा हो गई थी जिनसे राजीव गांधी का निर्माण हुआ था। उनका दुराग्रही स्वभाव और सुरक्षा के नियमों के प्रति उपेक्षा के साथ-साथ वायुसेना, नागरिक उड्डयन विभाग, सीमा सड़क संगठन और स्थानीय पुलिस अधिकारियों के प्रति उनका उपेक्षापूर्ण रवैया प्रकट हो चुका था। मैं हैरान था कि क्या भारत जैसे महान देश के प्रधानमन्त्री में यही बातें होनी चाहिए ! इस बात ने मुझे कई दिन बेचैन रखा था। और 8 मार्च, 1990 को उन्होने सैन्टोर होटल में जिस तरह का व्यवहार किया, उससे मुझे और भी धक्का लगा कि क्या देश का पूर्व प्रधानमन्त्री इतने गैर जिम्मेदाराना ढंग से व्यवहार कर सकता है और इस तरह की हरकते कर सकता है। इनसे उनके और देश तथा उन जैसे विचारों तथा मूल्यों वाले लोगों का अनुमान किया जा सकता है जो उस समय के प्रमुख थे।
राजीव की मंशा पूरी न हो सकी
उस मीटिंग में क्या हुआ, इसे जानने के लिए उन पत्रकारों की रिपोर्ट पढ़ने से ज्यादा सही स्थिति मालूम होगी। ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ ने लिखा था : “गुरुवार को इस काफिले में जो उच्चस्तरीय प्रतिनिधि मण्डल आया था, उसमें तीखे आरोपों-प्रत्यारोपों के कारण लोगों से मिलकर घाटी की स्थिति पर विचार करने का ध्येय ही समाप्त हो गया। सबसे पहले पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी और भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवन्त सिंह में भयंकर वाक-युद्ध हुआ । इसके भड़कने का कारण यह था कि राजीव गांधी बार-बार राज्यपाल के विरुद्ध अपमानजनक बातें कहते रहे। उसके बाद राजीव गांधी और जगमोहन में वाकयुद्ध और कहासुनी हुई। राजीव गांधी ने होटल के कांफ्रेंस हाल में घुसते ही राज्यपाल के विरुद्ध अपमानजनक बातें कहनी आरम्भ कर दी थीं। उन्होंने राज्यपाल से कहा कि मैं कुछ लोगों से मिलना चाहता हूं, अतः मुझे शहर से लाने का प्रबन्ध किया जाये। वह एक बात पर खास ध्यान दिलाना चाहते थे । उन्होंने कहा – “स्थानीय पत्रकार दिखाई नहीं दे रहे हैं। जगमोहन जी, क्या काश्मीर में अखबार नहीं छपते ?” इस समय मुहम्मद शफी बट अपनी जगह से ही चिल्लाये : “गवर्नर ने सब कुछ बन्द कर दिया है।”
प्रायः शान्त रहने वाले जसवन्त सिंह अपने को संभाल न पाये और चिल्लाते हुए से राजीव गांधी से बोले- “आप हमें समाचार-पत्रों के बारे में सीख दोगे ? चाहते हो तो खुद जाकर अखबार वालों से बात क्यों नहीं कर लेते ।”
इतने पर भी राजीव गांधी चुप नहीं रहे और उन्होंने इस बात पर आपत्ति उठा दी कि उप-प्रधानमन्त्री देवीलाल को राज्यपाल के बाईं ओर बिठा कर शिष्टाचार का उल्लंघन किया है जबकि उन्हें राज्यपाल के दाईं ओर बिठाना चाहिए था । गांधी: कम-से-कम उप-प्रधानमन्त्री के प्रति उचित शिष्टता तो दिखानी ही चाहिए थी। यह राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न है।”
जसवंत सिह- अनेक संस्थाओं को हानि पहुंचाने के बाद अब आपको राष्ट्र के सम्मान की चिन्ता है? आपको राष्ट्र के सम्मान की बात नहीं करनी चाहिए।”
मैं इस बात पर आपत्ति करता हूं कि उप-प्रधानमन्त्री को गलत तरफ बिठाया गया हैं। इतना ही नहीं, राज्यपाल ह्वाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए नहीं गये। वह मेरे उप प्रधानमन्त्री हैं, वह राष्ट्र के उप प्रधानमन्त्री हैं।”
जगमोहन ने स्पष्टीकरण दिया कि विमान के हवाई अड्डे पर आने तक उन्हें ही मालूम ही नहीं था कि शिष्टमण्डल में कौन-कौन हैं। उन्होंने कहा- “जब मुझे पता चला कि उप प्रधानमन्त्री भी आये हैं”, गांधी ने बीच में ही टोकते हुए कहा – “आपके सलाहकार वेद मरवाहा ने मुझे हवाई अड्डे पर बताया था कि बाई जहाज के विमान तल पर उतरने से तीन मिनट पहले आपको सूचना दे दी थी कि उप-प्रधानमन्त्री भी आ रहे हैं।” वेद मरवाहा वहीं पर थे। उन्होंने कहा – “मैंने यह कहा था कि उप-प्रधानमन्त्री के आने की सूचना मुझे नहीं है, इसलिए राज्यपाल यहां नहीं हैं।”
इस जगह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सांसद विप्लवदास गुप्त ने टोकते हुए कहा “यहां पत्रकारों की मौजूदगी में हमें इस तरह की बहस में नहीं पड़ना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण और कायदे-कानून के बाहर है।” बहरहाल राज्यपाल को इस तरह की बात गुप्त रखनी चाहिए थी। इस पर पत्रकारों को हाल से बाहर जाने को कहा गया। बन्द् कमरे में फिर नोक-झोंक हुई। विश्वास किया जाता है कि श्री गांधी ने राज्यपाल से कहा- जब मैं प्रधानमंत्री था उस समय भी आप राज्यपाल थे। उस समय आपने धारा 370 के सम्बन्ध में जो कुछ कहा था, क्या मैं उस रहस्य का उद्घाटन कर दूं ?” जगमोहन: “आपने उस समय जो कुछ कहा था, उसे भी मैं यहां बता सकता है।” राजीव गांधी ने उसके बाद पत्रकारों को बताया कि जगमोहन जो कुछ कर रहे है, वह एक खतरनाक रास्ता है। कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी ने अपनी राय प्रकट करते हुए कहा था कि कोई भी सदस्य गुप्त बैठक के सम्बन्ध में पत्रकारों के सामने रहस्योद्घाटन नहीं कर सकता। इस मामले पर राज्यपाल भी अप्रसन्न थे . उन्होंने कहा था- “जो बातें मैंने बताई थीं, वे केवल प्रतिनिधि मण्डल के लिए थीं। कुछ अन्य पत्रों की टिप्पणियां भी इसी प्रकार की थीं।
ट्रिब्यून ने लिखा, “राजीव गांधी तथा नेशनल कांफ्रेंस के प्रतिनिधि बातचीत में अपने साथियों पर हावी होने का प्रयत्न करते रहे जबकि कुछ पत्रकारों ने अपने कर्फ्यू पास राजीव गांधी को देकर शहर में जाकर लोगों से मिलने की बात कही तो उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जबकि कुछ ही मिनट पहले वह बात पर असंतोष प्रकट कर रहे थे कि उन्हें लोगों से मिलने का अवसर नहीं जा रहा है !”
स्थानीय दैनिक पत्र काश्मीर टाइम्स ने लिखा था- ‘असली मुसीबत उस समय आरम्भ हुई जब राज्यपाल जगमोहन ने काश्मीर के सम्बन्ध में नेताओं को जानकारी देना प्रारम्भ किया। श्री गांधी ने आरोप लगाया कि जगमोहन ने उप-प्रधानमंत्री देवीलाल से शिष्टाचार-व्यवहार नहीं किया। उन्होंने क्रुद्ध होते हुए कहा था कि यह राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न है।”
इससे उत्तेजित होकर जसवन्त सिंह ने कहा था कि राष्ट्र के सम्मान के बारे में सब लोग आपके विचारों को जानते हैं। जब श्री गांधी ने यह कहा कि बात रिकार्ड करवाना चाहता हूं कि उप प्रधानमंत्री के प्रति शिष्टाचार का पालन नहीं किया गया है। तब जसवन्त सिंह ने पलट कर उसका जवाब दिया था, इस समय शिष्टाचार की बात को भूलकर अति महत्त्वपूर्ण कार्य, जिसके लिए यहाँ आये हैं, पर विचार करना चाहिए और अपना समय इन छोटे-मोटे विवादों में नष्ट करने की आवश्यकता नहीं ।”
क्या अब भी किसी को कोई शक है कि सत्ता से बाहर होते ही ये गांधी क्यों बौरा जाते हैं।
अर्जुन शर्मा