डॉ. शैलेश शुक्ला
समय की संवेदनशील सरिता में जब संवाद, सूचना और संप्रेषण की शक्ति नई तकनीकों के साथ संलग्न होती है, तब लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों प्रभावित होती हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रवेश चुनावी अभियानों में उसी प्रकार हुआ है, जैसे कभी रेडियो, फिर टेलीविजन और उसके बाद सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार को परिवर्तित किया था किंतु इस बार परिवर्तन केवल माध्यम का नहीं बल्कि मनोविज्ञान, मतनिर्माण और मतदाताओं के विश्वास का भी है। यही कारण है कि यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या एआई चुनावी अभियानों में लोकतंत्र को सशक्त कर रहा है या उसे संकट की ओर ले जा रहा है।
यदि इस विषय को प्रमाणिक और समकालीन तथ्यों के आधार पर समझें, तो स्पष्ट होता है कि एआई चुनावी प्रक्रिया में दोहरे प्रभाव के साथ उपस्थित है—एक ओर यह संवाद को सरल, सुलभ और व्यापक बना रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भ्रम, भ्रामकता और मनोवैज्ञानिक हेरफेर का माध्यम भी बन रहा है। वर्ष 2025-26 के वैश्विक चुनावी परिदृश्य के विश्लेषण में यह पाया गया कि विभिन्न देशों—जैसे बांग्लादेश, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और ताइवान—में एआई का उपयोग मतदाताओं को भ्रमित करने, उम्मीदवारों की छवि बिगाड़ने और कृत्रिम प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए किया गया। यह तथ्य इस बात का स्पष्ट संकेत है कि एआई अब चुनावी रणनीति का सक्रिय उपकरण बन चुका है।
एआई का पहला और सकारात्मक पक्ष है “संचार का सशक्तिकरण”। आज राजनीतिक दल एआई के माध्यम से मतदाताओं तक अधिक सटीक और व्यक्तिगत संदेश पहुँचा पा रहे हैं। जनरेटिव एआई के उपयोग से भाषण, घोषणापत्र, वीडियो और डिजिटल सामग्री तेजी से तैयार की जा रही है, जिससे छोटे दलों और सीमित संसाधनों वाले उम्मीदवारों को भी प्रतिस्पर्धा में अवसर मिल रहा है। फ्रांस के स्थानीय चुनावों 2026 में यह देखा गया कि एआई ने छोटे उम्मीदवारों को भी प्रभावी प्रचार करने का अवसर दिया, जिससे लोकतंत्र में भागीदारी का दायरा बढ़ा। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि यह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को अधिक समावेशी बनाती है।
इसके अतिरिक्त, एआई डेटा विश्लेषण के माध्यम से मतदाताओं की प्राथमिकताओं को समझने में भी सहायता करता है। इससे नीति निर्माण अधिक लक्षित और प्रभावी हो सकता है। उदाहरण के लिए, विभिन्न शोधों में यह बताया गया है कि एआई आधारित विश्लेषण चुनावी रणनीति को अधिक वैज्ञानिक और डेटा-आधारित बनाता है, जिससे राजनीतिक दल जनता की वास्तविक समस्याओं को समझने में सक्षम होते हैं। यह लोकतंत्र की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
परंतु जहाँ अवसर हैं, वहीं खतरे भी अत्यंत गहरे हैं। एआई का सबसे गंभीर खतरा है “भ्रामक सूचना और दुष्प्रचार का प्रसार”। विश्व आर्थिक मंच और यूनेस्को जैसे संस्थानों ने यह चेतावनी दी है कि एआई द्वारा निर्मित सिंथेटिक मीडिया ने सत्य और असत्य के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। वर्ष 2023 में लगभग 5 लाख डीपफेक वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए, और 2025 तक इनके 80 लाख तक पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया गया। यह वृद्धि केवल संख्या में नहीं, बल्कि प्रभाव में भी दिखाई दे रही है।
चुनावी संदर्भ में यह खतरा और अधिक गंभीर हो जाता है। बांग्लादेश के 2026 के आम चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने लगभग 86,000 एआई-जनित भ्रामक सामग्री के मामलों की पहचान की, जिनमें हजारों सामग्री हिंसक और भड़काऊ थी। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि एआई आधारित दुष्प्रचार लोकतंत्र की स्थिरता को सीधे प्रभावित कर सकता है।
डीपफेक तकनीक इस खतरे का सबसे तीव्र रूप है। एआई द्वारा तैयार नकली वीडियो और ऑडियो मतदाताओं को भ्रमित कर सकते हैं और उम्मीदवारों की छवि को नुकसान पहुँचा सकते हैं। अनेक विश्लेषणों में यह पाया गया है कि डीपफेक सामग्री इतनी यथार्थवादी होती है कि आम नागरिक के लिए उसे पहचानना कठिन होता है। इससे मतदाताओं की निर्णय क्षमता प्रभावित होती है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।
इसके साथ ही “लक्षित मनोवैज्ञानिक हेरफेर” का खतरा भी बढ़ गया है। एआई के माध्यम से मतदाताओं के व्यवहार, पसंद और भावनाओं का विश्लेषण करके उन्हें विशेष प्रकार के संदेश भेजे जाते हैं। यह प्रक्रिया मतदाताओं की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि वे अनजाने में ऐसे प्रभावों के अधीन हो जाते हैं, जो उनकी सोच को दिशा देते हैं। इस प्रकार एआई लोकतंत्र में “स्वतंत्र निर्णय” की अवधारणा को चुनौती देता है।
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। देश में 800 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता और 400 मिलियन से अधिक व्हाट्सएप उपयोगकर्ता हैं, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में उल्लेख किया गया है। इतनी विशाल डिजिटल आबादी में यदि एआई आधारित दुष्प्रचार फैलता है, तो उसका प्रभाव व्यापक और तीव्र हो सकता है। इसी कारण भारत में चुनाव आयोग और सरकार ने एआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें चुनाव के दौरान डीपफेक सामग्री को 3 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश शामिल है।
वैश्विक स्तर पर भी यह चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 75 प्रतिशत से अधिक लोग मानते हैं कि एआई चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। यह विश्वास ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वास की व्यवस्था भी है।
साइबर युद्ध और विदेशी हस्तक्षेप के संदर्भ में भी एआई का उपयोग बढ़ रहा है। मोल्दोवा के चुनावों में एआई आधारित दुष्प्रचार अभियानों का उपयोग विदेशी प्रभाव के लिए किया गया, जहाँ हजारों फर्जी अकाउंट और चैनल बनाकर मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। यह उदाहरण दर्शाता है कि एआई केवल आंतरिक राजनीति ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संघर्ष का भी उपकरण बन सकता है।
फिर भी, यह कहना उचित नहीं होगा कि एआई केवल खतरा है। यह लोकतंत्र के लिए अवसर भी प्रस्तुत करता है। यदि इसका उपयोग पारदर्शिता, सूचना की उपलब्धता और मतदाता शिक्षा के लिए किया जाए, तो यह लोकतंत्र को सशक्त बना सकता है। उदाहरण के लिए, एआई आधारित चैटबॉट्स मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया, उम्मीदवारों और नीतियों के बारे में जानकारी प्रदान कर सकते हैं, जिससे उनकी जागरूकता बढ़ सकती है।
समस्या का मूल प्रश्न “प्रयोग” नहीं, बल्कि “दुरुपयोग” है। एआई एक तटस्थ तकनीक है, जिसका प्रभाव उसके उपयोग पर निर्भर करता है। यदि इसे नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ उपयोग किया जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए वरदान बन सकता है; अन्यथा यह भ्रम, विभाजन और अविश्वास का कारण बन सकता है।
इस संदर्भ में समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। सबसे पहले, सशक्त और स्पष्ट नियामक ढाँचा आवश्यक है, जो एआई आधारित दुष्प्रचार और डीपफेक पर नियंत्रण स्थापित करे। दूसरा, तकनीकी स्तर पर ऐसे उपकरण विकसित किए जाने चाहिए, जो कृत्रिम सामग्री की पहचान कर सकें। तीसरा, समाज में डिजिटल साक्षरता और जागरूकता को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि नागरिक स्वयं भ्रामक सामग्री को पहचान सकें।
अंततः यह कहा जा सकता है कि एआई चुनावी अभियानों में एक “द्विधारी तलवार” के समान है। यह लोकतंत्र को सशक्त भी कर सकता है और उसे कमजोर भी। यह अवसर भी है और खतरा भी। इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसे किस दिशा में ले जाते हैं—नैतिकता के साथ या बिना नैतिकता के। समय की सशक्त सीख यही है कि लोकतंत्र केवल तकनीक से नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक और मूल्य से चलता है। यदि एआई इन मूल्यों के साथ समन्वय स्थापित कर सके, तो यह लोकतंत्र के उत्कर्ष का माध्यम बनेगा; अन्यथा यह उसके लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
डॉ. शैलेश शुक्ला