समाज आखिर शादी क्यों नहीं करना चाहती लड़कियां? June 8, 2026 / June 8, 2026 | Leave a Comment सबसे बड़ा कारण है शिक्षा और आत्मनिर्भरता। आज लड़कियाँ पढ़-लिख रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हैं। पहले आर्थिक सुरक्षा के लिए शादी को जरूरी माना जाता था, लेकिन अब बहुत सी लड़कियाँ खुद अपनी जिम्मेदारी उठा सकती हैं। इसलिए वे केवल समाज के दबाव में शादी नहीं करना चाहतीं। Read more » शादी क्यों नहीं करना चाहती लड़कियां
समाज पर्यावरण और घरेलू अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए साइकिल को बढ़ावा देने की आवश्यकता June 5, 2026 / June 5, 2026 | Leave a Comment साइकिल केवल एक साधारण परिवहन साधन नहीं है बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक बचत, स्वास्थ्य संवर्धन और राष्ट्रीय विकास का एक शक्तिशाली माध्यम है। दुर्भाग्यवश आधुनिकता की चमक में साइकिल का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया। जो साइकिल कभी आम नागरिकों की पहचान हुआ करती थी Read more » The need to promote cycling for both the environment and the domestic economy
समाज सामने आ रहे हैं लिव-इन रिलेशनशिप के दुष्परिणाम June 2, 2026 / June 2, 2026 | Leave a Comment लिव-इन रिलेशनशिप का मूल विचार यह है कि दो वयस्क बिना विवाह के एक साथ पति-पत्नी की तरह रहें और अपने संबंध को आगे बढ़ाने या परखने का अवसर प्राप्त करें। इसके समर्थक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और आधुनिक जीवन का हिस्सा मानते हैं। Read more » The ill effects of live-in relationships are coming to the fore. लिव-इन रिलेशनशिप के दुष्परिणाम
व्यंग्य हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ May 29, 2026 / May 29, 2026 | Leave a Comment री दुकान कोई व्यापारिक साम्राज्य नहीं, रोजमर्रा की साँस लेने की मशीन है। यहाँ साबुन भी बिकता है, बिस्कुट भी, बच्चों की टॉफी भी और मेरी नींद भी। ग्राहक आते हैं, सामान लेते हैं, मुस्कुराते हैं, चले जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद जो बचता है, वह है बिजली का बिल, जीएसटी का डर, बाजार का दबाव और ऑनलाइन बिक्री का भूत Read more » छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच
महिला-जगत मीडिया लेख हिंदी पत्रकारिता में महिलाएं : 200 साल बाद भी अधूरी यात्रा May 29, 2026 / May 29, 2026 | Leave a Comment आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का उत्सव मनाते हैं, तो यह पूछना जरूरी है: क्या महिलाओं के लिए यह उत्सव मनाने का समय है या फिर यह आत्ममंथन का क्षण है? Read more » Women in Hindi journalism: A journey incomplete even after 200 years हिंदी पत्रकारिता में महिलाएं
पर्यावरण लेख तपती धरती, तड़पता जीवन और तंत्र की तंद्रा : बिगड़ता पर्यावरण संतुलन और अस्तित्व का संकट May 25, 2026 / May 25, 2026 | Leave a Comment आज भारत का सामान्य नागरिक यह महसूस करने लगा है कि मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। बचपन की गर्मियां और आज की गर्मियों में जमीन-आसमान का अंतर है। कभी मई-जून की दोपहरें भी इतनी भयावह नहीं लगती थीं। गांवों में पेड़ों की छांव, मिट्टी की नमी Read more » Scorching earth Suffering Lives the System's Sleepiness: Deteriorating Environmental Balance and an Existential Crisis तड़पता जीवन तड़पता जीवन और तंत्र की तंद्रा तपती धरती बिगड़ता पर्यावरण संतुलन
व्यंग्य हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ May 22, 2026 / May 22, 2026 | Leave a Comment कॉकरोच अँधेरे में पनपता है। सरकारी बाबू अस्पष्टता में। जितना कम स्पष्ट नियम होगा, उतनी अधिक हमारी शक्ति होगी। यदि नियम सरल हो जाएँ तो जनता सीधे काम करवा लेगी। फिर हमारा महत्व कहाँ रहेगा? इसलिए व्यवस्था को इतना जटिल बना दो कि आदमी जन्म प्रमाणपत्र बनवाते-बनवाते दर्शनशास्त्री हो जाए। Read more » सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच
राजनीति सत्ता में सादगी : संयमित सांसदों एवं विधायकों से समृद्ध लोकतंत्र की स्वर्णिम संहिता May 19, 2026 / May 19, 2026 | Leave a Comment संयमित सांसदों एवं विधायकों से समृद्ध लोकतंत्र Read more » Government expenditure on public representatives संयमित सांसदों एवं विधायकों से समृद्ध लोकतंत्र
लेख समाज कृत्रिम क्रांति के कालखंड में संस्कृति, संवेदना और सनातन ज्ञान की संगति May 18, 2026 / May 18, 2026 | Leave a Comment भारतीय ज्ञान परंपरा का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह है कि उसने ज्ञान को कभी भी नैतिकता से अलग नहीं माना। आधुनिक तकनीकी व्यवस्था में ज्ञान का अर्थ प्रायः सूचना और नियंत्रण की क्षमता तक सीमित हो गया है, जबकि भारतीय दृष्टि में ज्ञान वह है जो मनुष्य को विवेक, संयम और लोककल्याण की ओर ले जाए। Read more » कृत्रिम क्रांति
राजनीति वादों की वाणी, विश्वास का विध्वंस : घोषणा पत्र की राजनीति पर लोकतांत्रिक लगाम May 15, 2026 / May 15, 2026 | Leave a Comment आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनावी घोषणा पत्रों को कानूनी और नैतिक जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। यदि कोई राजनीतिक दल या उसका नेतृत्व अपने प्रमुख चुनावी वादों को बिना उचित कारण पूरा नहीं करता, तो उसके विरुद्ध कठोर राजनीतिक कार्रवाई होनी चाहिए। इस विषय पर यह विचार Read more » a Destruction of Trust: A Democratic Restraint on Manifesto Politics A Word of Promises Democratic Restraint on Manifesto Politics घोषणा पत्र की राजनीति
व्यंग्य “हम ही हैं राष्ट्र, हमसे ही है राष्ट्र” May 14, 2026 / May 14, 2026 | Leave a Comment प्रशिक्षण के समय हमें सिखाया गया कि “आप राष्ट्र की रीढ़ हैं।” मैंने इस वाक्य को बहुत गंभीरता से लिया। फिर मैंने सोचा कि जब पूरी व्यवस्था मेरी पीठ पर टिकी है, तो थोड़ा भार व्यवस्था को भी उठाना चाहिए—जैसे मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे फार्महाउस और मेरे निवेश। Read more » “हम ही हैं राष्ट्र हमसे ही है राष्ट्र
लेख सादगी से सशक्त राष्ट्र की ओर May 14, 2026 / May 14, 2026 | Leave a Comment पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि सरकारी आयोजनों, प्रचार अभियानों, विशाल रैलियों, विदेशी दौरों, भव्य स्वागत समारोहों और अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्थाओं पर अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। Read more » सशक्त राष्ट्र