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समाज क्या कृत्रिम मेधा मानव के नियंत्रण से बाहर निकल जाएगी? September 7, 2026 / September 7, 2026 | Leave a Comment कृत्रिम मेधा मानव के नियंत्रण से बाहर Read more » Will artificial intelligence go out of human control? कृत्रिम मेधा मानव के नियंत्रण से बाहर
लेख कृत्रिम मेधा के युग में उच्च शिक्षा में समयानुकूल परिवर्तन की आवश्यकता September 2, 2026 / September 2, 2026 | Leave a Comment कृत्रिम मेधा के युग में उच्च शिक्षा में समयानुकूल परिवर्तन Read more » The Need for Timely Changes in Higher Education in the Era of Artificial Intelligence कृत्रिम मेधा के युग में उच्च शिक्षा में समयानुकूल परिवर्तन
समाज मोबाइल फोन : साल, दो साल का साथी, फिर बनता बहुआयामी बर्बादी August 31, 2026 / August 31, 2026 | Leave a Comment आप तीस-चालीस हजार का फोन लाते हैं, पहले साल वह मक्खन जैसा चलता है, दूसरे साल भी ठीक रहता है, पर दूसरे साल के आखिर में ही संकेत मिलने लगते हैं। Read more » Mobile Phone: A companion for a year or two मोबाइल फोन
समाज कृत्रिम मेधा (AI) के खतरों से सावधानी जरूरी August 18, 2026 / August 18, 2026 | Leave a Comment कृत्रिम मेधा के खतरों से सावधानी जरूरी Read more » AI कृत्रिम मेधा के खतरों से सावधानी जरूरी
विश्ववार्ता अवैध प्रवासी बनेंगे यूरोप के महाविनाश का कारण? August 1, 2026 / August 1, 2026 | Leave a Comment अवैध प्रवासी बनेंगे यूरोप के महाविनाश का कारण Read more » अवैध प्रवासी बनेंगे यूरोप के महाविनाश का कारण
समाज गाड़ी खरीदने के बजाय किराये की गाड़ी के प्रयोग के बहुआयामी लाभ July 31, 2026 / July 31, 2026 | Leave a Comment गाड़ी खरीदने के बजाय किराये की गाड़ी के प्रयोग Read more » गाड़ी खरीदने के बजाय किराये की गाड़ी के प्रयोग
राजनीति क्या शाकाहारियों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं? July 2, 2026 / July 2, 2026 | Leave a Comment – डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यह स्वतंत्रता व्यक्तिगत गरिमा और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है किंतु किसी भी अधिकार की सीमा वहीं तक होती है, जहाँ से दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का हनन प्रारंभ होता है। यदि किसी व्यक्ति की भोजन संबंधी स्वतंत्रता के कारण दूसरे व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई हो, उसे उल्टी, घबराहट, एलर्जी या गंभीर असुविधा का सामना करना पड़े, तो यह केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नागरिक सुविधा और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का विषय बन जाता है। हाल ही में अभिनेता पंकज त्रिपाठी द्वारा साझा की गई एक फेसबुक पोस्ट ने इसी संवेदनशील प्रश्न को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। उन्होंने विमान यात्रा के दौरान अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि आसपास बैठे यात्रियों द्वारा खोले गए मांसाहारी भोजन की तीव्र गंध के कारण उन्हें और उनके भाई को पूरी यात्रा रुमाल से मुंह ढककर बितानी पड़ी। यह घटना किसी एक व्यक्ति का अनुभव भर नहीं है। देश और दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं जिन्हें कुछ प्रकार के भोजन, तीव्र गंध, मसालों या अन्य सुगंधों से वास्तविक शारीरिक परेशानी होती है। ऐसे अनुभव यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि क्या सार्वजनिक परिवहन और अन्य साझा स्थानों में सभी नागरिकों के लिए समान रूप से सहज वातावरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं है? यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह बहस शाकाहार और मांसाहार के बीच श्रेष्ठता सिद्ध करने की नहीं है। भारत सहित विश्व के अनेक समाजों में दोनों प्रकार की भोजन परंपराएं लंबे समय से साथ-साथ अस्तित्व में हैं। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीवनशैली और भोजन संबंधी पसंद रखने की स्वतंत्रता देता है। किंतु वही संविधान प्रत्येक नागरिक के जीवन, स्वास्थ्य, गरिमा और सुरक्षित वातावरण के अधिकार की भी रक्षा करता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कौन क्या खाए, बल्कि यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए जिससे किसी की स्वतंत्रता दूसरे के लिए असहनीय कष्ट का कारण न बने। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सार्वजनिक स्थानों पर व्यवहार संबंधी अनेक नियम पहले से लागू हैं। विमान, रेल, बस, अस्पताल, पुस्तकालय और न्यायालय जैसे स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध है क्योंकि उसका धुआं दूसरों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। कई देशों और संस्थानों में अत्यधिक तीव्र परफ्यूम या सुगंधित उत्पादों के उपयोग को भी हतोत्साहित किया जाता है क्योंकि कुछ लोगों को उनसे एलर्जी या सांस संबंधी समस्या हो सकती है। यदि धुएं और तीव्र रासायनिक गंध के संदर्भ में ऐसी संवेदनशीलता स्वीकार की जा सकती है, तो तीव्र गंध वाले भोजन के संबंध में भी व्यावहारिक और संतुलित दिशानिर्देशों पर विचार करना असंगत नहीं कहा जा सकता। भारत में करोड़ों लोग जन्म से या अपनी व्यक्तिगत आस्था, स्वास्थ्य अथवा जीवनशैली के कारण शाकाहारी हैं। अनेक लोगों को मांसाहारी भोजन की गंध से मतली, उल्टी, सिरदर्द या बेचैनी महसूस होती है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों को दूध, मूंगफली, समुद्री भोजन अथवा अन्य खाद्य पदार्थों से गंभीर एलर्जी होती है। आधुनिक सार्वजनिक नीति का उद्देश्य किसी एक वर्ग की पसंद को दूसरे पर थोपना नहीं, बल्कि ऐसे साझा मानदंड विकसित करना होना चाहिए जिनसे सभी नागरिकों को न्यूनतम असुविधा के साथ सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करने का अवसर मिले। विशेष रूप से विमान यात्रा जैसे बंद वातावरण में यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। विमान के केबिन में यात्री कई घंटों तक सीमित स्थान में साथ रहते हैं। वहां सीट बदलना हमेशा संभव नहीं होता और बाहर निकलने का भी कोई विकल्प नहीं होता। यदि किसी यात्री को किसी तीव्र गंध से गंभीर असुविधा हो रही हो, तो उसके पास स्थिति सहने के अतिरिक्त बहुत कम विकल्प बचते हैं। यही कारण है कि विमान कंपनियों को केवल भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित न रहकर यात्रियों की विविध आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रशासन और विमानन नियामकों के लिए अब समय आ गया है कि वे इस विषय पर व्यापक विमर्श प्रारंभ करें। सबसे पहले, टिकट बुकिंग के समय यात्रियों को भोजन संबंधी प्राथमिकता दर्ज करने का विकल्प दिया जा सकता है। यदि पर्याप्त संख्या में यात्री चाहें तो सीमित स्तर पर ऐसे बैठने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है जिसमें समान भोजन प्राथमिकता वाले यात्रियों को यथासंभव एक साथ बैठाने का प्रयास किया जाए। यह व्यवस्था अनिवार्य नहीं बल्कि विकल्प आधारित हो सकती है। दूसरा, अत्यधिक तीव्र गंध वाले बाहरी भोजन को विमान के भीतर खोलने या उपभोग करने के संबंध में स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जा सकते हैं। जैसे सुरक्षा कारणों से अनेक वस्तुओं पर पहले से प्रतिबंध या नियंत्रण है, उसी प्रकार अत्यधिक गंध फैलाने वाले खाद्य पदार्थों के लिए भी व्यावहारिक मानक निर्धारित किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी भोजन पर प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि साझा वातावरण को अधिक आरामदायक बनाना होगा। तीसरा, विमान कंपनियां ऐसे पैकेजिंग मानकों को अपनाने पर विचार कर सकती हैं जिनसे भोजन की गंध कम से कम बाहर फैले। आधुनिक खाद्य पैकेजिंग तकनीक इस दिशा में काफी विकसित हो चुकी है। यदि एयरलाइन स्वयं भोजन उपलब्ध करा रही है, तो ऐसे व्यंजन और पैकेजिंग को प्राथमिकता दी जा सकती है जिनकी गंध अपेक्षाकृत नियंत्रित रहे। चौथा, विमानों, वातानुकूलित रेल डिब्बों और लंबी दूरी की बसों में वायु परिसंचरण तथा एयर फिल्ट्रेशन प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि तकनीकी स्तर पर गंध और वायु गुणवत्ता में सुधार संभव है तो इसका लाभ सभी यात्रियों को मिलेगा, चाहे वे शाकाहारी हों या मांसाहारी। पांचवां, यात्रियों के लिए एक सरल शिकायत और समाधान प्रणाली विकसित की जानी चाहिए। यदि किसी यात्री को किसी तीव्र गंध से वास्तविक परेशानी हो रही है, तो प्रशिक्षित केबिन क्रू स्थिति का शांतिपूर्ण समाधान खोजने का प्रयास कर सके। कभी-कभी केवल सीट परिवर्तन या भोजन के समय में थोड़े समन्वय से भी समस्या का समाधान हो सकता है। इसी प्रकार रेलवे, मेट्रो, सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, प्रतीक्षालयों और अन्य सार्वजनिक परिसरों में भी ऐसे आचार-निर्देश विकसित किए जा सकते हैं जो सभी नागरिकों के लिए सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करें। अनेक अस्पताल पहले से ही कुछ क्षेत्रों में बाहरी भोजन लाने पर प्रतिबंध लगाते हैं। इसी प्रकार संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों पर तीव्र गंध वाले भोजन के संबंध में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त नियम बनाए जा सकते हैं। यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस विषय को सामाजिक टकराव का रूप न दिया जाए। भारत विविधताओं का देश है। यहां भोजन की परंपराएं क्षेत्र, संस्कृति, धर्म, जलवायु और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं। इसलिए किसी भी नीति का उद्देश्य किसी समुदाय या भोजन पद्धति को लक्ष्य बनाना नहीं होना चाहिए। बल्कि नीति का आधार केवल सार्वजनिक सुविधा, स्वास्थ्य और पारस्परिक सम्मान होना चाहिए। जिस प्रकार कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर तेज आवाज में संगीत बजाने, धूम्रपान करने या दूसरों को असुविधा पहुंचाने का अधिकार नहीं रखता, उसी प्रकार हर नागरिक को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसकी व्यक्तिगत गतिविधियां अनावश्यक रूप से दूसरों के लिए कष्टदायक न बनें। न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहां से दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता आरंभ होती है। यदि एक यात्री अपनी पसंद का भोजन कर सकता है, तो दूसरे यात्री को भी ऐसी वायु में यात्रा करने का अधिकार है जिसमें वह बिना घुटन, मतली या असहनीय असुविधा के सांस ले सके। इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना ही सुशासन का वास्तविक उद्देश्य है। समय आ गया है कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय, रेलवे, परिवहन विभाग, उपभोक्ता अधिकार संस्थाएं, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, एयरलाइंस और नागरिक समाज मिलकर इस विषय पर गंभीर विचार करें। वैज्ञानिक अध्ययन, यात्रियों के अनुभव और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के आधार पर ऐसे दिशानिर्देश तैयार किए जाएं जो किसी की भोजन स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से सीमित किए बिना साझा सार्वजनिक स्थानों को अधिक स्वस्थ, स्वच्छ और आरामदायक बना सकें। अंततः यह प्रश्न केवल शाकाहारियों का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के सम्मान और सुविधा का है। जिस समाज में हम दूसरों की सुविधा का ध्यान रखते हैं, वहीं वास्तविक सभ्यता विकसित होती है। यदि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी नीतियां बनाई जाती हैं जो सभी की संवेदनाओं, स्वास्थ्य और अधिकारों का संतुलित सम्मान करें, तो न केवल यात्राएं अधिक सुखद होंगी, बल्कि हमारा लोकतंत्र भी अधिक संवेदनशील और समावेशी बनेगा। वास्तव में किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की पहचान केवल अधिकार देने से नहीं, बल्कि विभिन्न अधिकारों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करने की क्षमता से होती है। – डॉ. शैलेश शुक्ला Read more »
राजनीति सूचना का अधिकार : स्वप्रेरित प्रकटीकरण से लोकतंत्र होगा अधिक पारदर्शी June 29, 2026 / June 29, 2026 | Leave a Comment आज देश में प्रतिवर्ष लाखों आरटीआई आवेदन दायर किए जाते हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे प्रश्नों की होती है जिनका उत्तर किसी भी आधुनिक, पारदर्शी और उत्तरदायी सरकार Read more » सूचना का अधिकार
लेख डिग्री से दक्षता की दिशा : शिक्षा संस्थानों में स्वाभिमानी स्वावलंबन का शुभारंभ June 28, 2026 / June 28, 2026 | Leave a Comment शिक्षा संस्थानों में स्वाभिमानी स्वावलंबन का शुभारंभ Read more » शिक्षा संस्थानों में स्वाभिमानी स्वावलंबन का शुभारंभ
समाज आखिर शादी क्यों नहीं करना चाहती लड़कियां? June 8, 2026 / June 8, 2026 | Leave a Comment सबसे बड़ा कारण है शिक्षा और आत्मनिर्भरता। आज लड़कियाँ पढ़-लिख रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हैं। पहले आर्थिक सुरक्षा के लिए शादी को जरूरी माना जाता था, लेकिन अब बहुत सी लड़कियाँ खुद अपनी जिम्मेदारी उठा सकती हैं। इसलिए वे केवल समाज के दबाव में शादी नहीं करना चाहतीं। Read more » शादी क्यों नहीं करना चाहती लड़कियां
समाज पर्यावरण और घरेलू अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए साइकिल को बढ़ावा देने की आवश्यकता June 5, 2026 / June 5, 2026 | Leave a Comment साइकिल केवल एक साधारण परिवहन साधन नहीं है बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक बचत, स्वास्थ्य संवर्धन और राष्ट्रीय विकास का एक शक्तिशाली माध्यम है। दुर्भाग्यवश आधुनिकता की चमक में साइकिल का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया। जो साइकिल कभी आम नागरिकों की पहचान हुआ करती थी Read more » The need to promote cycling for both the environment and the domestic economy