अस्थिरता ही नेपाल की पहचान

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

हमारा पड़ौसी देश नेपाल भारत के बड़े-बड़े प्रांतों से भी छोटा है लेकिन उसकी हालत यह है कि वहां हर साल एक नया प्रधानमंत्री आ जाता है। कोई भी प्रधानमंत्री साल दो साल से ज्यादा चलता ही नहीं है। पिछले दो प्रधानमंत्री तो एक-एक साल भी नहीं टिके। अब शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने हैं। माओवादी पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने प्रधानमंत्री पद से अभी-अभी इस्तीफा दिया है। नेपाली कांग्रेस के देउबा पहले भी तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। नेपाल में प्रधानमंत्री का बनना और हटना हमारी नगरपालिका के अध्यक्षों-जैसा हो गया है। नेपाली राजनीति की अस्थिरता का हाल कुछ ऐसा है, जैसा हमने दुनिया में कहीं और नहीं देखा है। वहां संविधान सभा बनी, वह चार साल तक चली और संविधान नहीं बना पाई। उसे भंग करना पड़ा। 2015 में किसी तरह संविधान बन गया। अब दो—ढाई साल होने को हैं लेकिन वह अभी तक सबको स्वीकार नहीं हो पाया है। नेपाल के तराईवासी हिंदी भाषी मधेसी लोग अपने अलग प्रांत मांग रहे हैं, उनकी जनसंख्या के अनुपात में वे सरकारी नौकरियों और सेना में आरक्षण मांग रहे हैं और राजकाज में हिंदी का इस्तेमाल भी वे चाहते हैं। मधेसियों के कई संगठनों ने मिलकर अब एक मजबूत मोर्चा बना लिया है। उसका दबाव इतना जोरदार है कि देउबा ने प्रांत न. 2 का चुनाव 18 सितंबर तक आगे बढ़ा दिया है। यह मधेसी प्रांत है। मधेसी आंदोलन इतना तेज है कि वह देउबा की नाक में दम किए दे रहा है। यदि 21 जनवरी 2018 तक देउबा 481 स्थानीय निकायों, सात प्रांतों और संसद के चुनाव नहीं करवा पाए तो यह नया संविधान भी दिवंगत हो जाएगा। कितना दुर्भाग्य है कि भारत के दो पड़ौसी देशों, नेपाल और अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता ही उनकी पहचान बन गई है। दोनों देशों में जब तक बादशाही राज था, स्थिरता बनी रही।

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