सबका साथ मगर कैसे ?

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modiमोदी जी का नारा है, :”सबका साथ, सबका विकास”.ऐसा महसूस हो रहा है कि सबके विकास की योजनाएं तो बन रही हैं लेकिन सबको साथ लेकर चलने के प्रयासों में कहीं न कहीं कोई कमी है.भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए जो अध्यादेश लाया गया है उसका जिस प्रकार से विरोधियों द्वारा ही नहीं बल्कि सहयोगी दलों द्वारा भी साथ न देने कि बातें कही जा रही हैं उनसे यही पता चलता है कि अध्यादेश लाने से पूर्व सबको विश्वास में लेने का प्रयास नहीं किया गया.यहाँ तक कि संघ परिवार के भी कुछ वर्गों में इस बारे में रिजर्वेशन्स हैं.जिससे पता चलता है कि इस बारे में संघ परिवार को भी संभवतः विश्वास में नहीं लिया गया है.
यह सही है कि विकास की किसी भी योजना को पूरा करने के लिए भूमि तो चाहिए ही.चाहे वो सौर ऊर्जा हो, नाभिकीय ऊर्जा हो, स्मार्ट सिटी योजना हो, रेलवे के विस्तार की योजना हो, सबके लिए अच्छे स्कूल की आवश्यकता हो, अच्छे अस्पतालों की बात हो, डिजिटल विस्तार की योजना हो, युवाओं को कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण की योजना हो कोई भी योजना बिना भूमि के सिरे नहीं चढ़ सकती है.और अगर ये योजनाएं सिरे चढ़ गयीं तो देश के काया कल्प को कोई नहीं रोक सकेगा.देश दुनिया का सिरमौर बन जायेगा.और अगर ऐसा हो गया तो देश के दुश्मनों और मोदीजी के राजनीतिक विरोधियों का तो खेल ही ख़त्म हो जायेगा.अतः बुनियादी आवश्यकता अर्थात भूमि अर्जन को ही रोक देंगे तो सारा खेल बिगड़ जायेगा ऐसा मान कर सारे मोदी विरोधी और देश विरोधी तत्व एकजुट होकर इस संशोधन का विरोध कर रहे हैं.
मेरे विचार में मोदी जी की सरकार की और से देश की सभी ग्राम पंचायतों के प्रमुखों को इस आशय का एक खुला पत्र भेजना चाहिए कि वो अपने ग्राम या उसके आसपास विकास चाहते हैं या नहीं? खेती को उद्योग से जोड़ना चाहते हैं या नहीं? अच्छे स्कूल चाहते हैं या नहीं? कौशल विकास केंद्र चाहते हैं या नहीं? सुरक्षा से जुड़े उद्योगों की स्थापना चाहते हैं या नहीं?स्थानीय रूप से उद्योग स्थापित होने पर उनमे ग्राम के युवाओं को रोज़गार मिले ऐसा चाहते हैं या नहीं?अपने ग्राम के बेघर लोगों को घर मिले ऐसा चाहते हैं या नहीं?अपने ग्राम के किसानों की आय में पूरक आय के रूप में कुछ कुटीर, छोटे उद्योग लगें ऐसा चाहते हैं या नहीं?इसी प्रकार के कुछ विषयों पर ग्राम प्रधानों से उनके ग्राम के लोगों के हस्ताक्षर युक्त उत्तर मंगाया जाये.ये एक प्रकार का जनमत संग्रह हो जायेगा और किसानों के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकानें चलाने वाले स्वयंभू ठेकेदारों का भी भंडाफोड़ हो जायेगा.
सबका साथ का नारा सार्थक करने के लिए भाजपा संगठन के लोगों को भी आम लोगों के बीच जाकर उन्हें मुद्दों के बारे में बताना चाहिए.इसके लिए स्वयं को भी मुद्दों से जुड़े सभी पहलुओं की जानकारी होनी चाहिए और पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी प्रशिक्षित करना चाहिए.लेकिन आज कल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के स्थान पर अपनी अपनी लॉबियाँ खड़ी करने पर ज्यादा जोर होने लगा है.कार्यकर्ताओं के शिक्षण प्रशिक्षण के स्थान पर कार्यकर्ताओं के सम्मलेन होने लगे हैं जिनमे केवल एक दुसरे की टांग खिंचाई होती है.अलग-२ विषयों पर वो विरोधियों, अपने समर्थकों और आम जनता को सही जानकारी दे सकें इस निमित्त उनका गहन प्रशिक्षण होना जरूरी है.और इन प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेना अनिवार्य होना चाहिए.तभी पार्टी सही मायने में केडर बेस्ड पार्टी बन पायेगी.

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