प्रमोद भार्गव
राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पाठ्य पुस्तकों में धर्म, इतिहास और प्राचीन भारतीय विज्ञान व ज्ञान परंपरा से संबंधित यदि कोई पाठ जोड़ा जाता है, तो वह अक्सर विवाद का कारण बनता है। यहाँ तक कि लोकसभा में हंगामा होता है और बदली गई पाठों वाली पुस्तकें जलाई जाती हैं। लेकिन अब एनसीईआरटी ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में एक नया पाठ जोड़कर ‘आ बैल मुझे मार’ कहावत को चरितार्थ कर किया है। इस पाठ के जरिए अब विद्यालयों में विद्यार्थियों को कम उम्र से ही न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के साथ-साथ वास्तविक चुनौतियों से भी परिचित कराया जाएगा। इसमें मुकदमों का बोझ एवं न्यायाधीशों की कमी पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की अदालतों में खूब भ्रष्टाचार है। कुछ समय पहले ही एक न्यायाधीश के निवास पर करोड़ों रुपए मिलने के बाद उन पर महाभियोग चलाने की बात भी उठी थी, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में है। शायद इसीलिए इस पाठ में जबावदेही के साथ महाभियोग प्रक्रिया का भी ज्ञान दिया गया है। लेकिन क्या इससे भी बदतर स्थिति कार्यपालिका और विधायिका में नहीं है? यदि इस पाठ में संविधान के इन स्तंभों को भी जोड़ दिया जाता तो शायद यह पहल निर्विवादित रहती। लेकिन ऐसा न करके एनसीईआरटी में बेवजह एक नए विवाद को आमंत्रित कर दिया है। हालांकि वकीलों द्वारा आपत्ति जताए जाने और सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में लिए जाने के बाद इस पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। न्यायपालिका ने इसे न्यायपालिका को सुनियोजित ढंग से बदनाम करने की साजिश माना है।
न्यायालयों में पर्याप्त भ्रष्टाचार है, लेकिन बिना किसी साक्ष्य के उस पर बात करना उचित नहीं है। जहां तक न्यायालयों में लंबित मुकदमों और न्यायाधीशों की कमी की बात है तो अदालतें स्वयं ही आंकड़े प्रस्तुत करती रहती हैं। इन कमियों को सामने लाना न्यायपालिका की पारदर्शिता को दर्शाता है। लेकिन लगभग यही स्थिति देश की राजस्व न्यायालयों में भी है, जिन्हें आधारित नायाब तहसील, तहसील, एसडीएम, जिलाधिकारी और आयुक्त न्यायालय करती हैं। ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ अध्याय में उल्लेखित है कि ‘न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो उनके न्यायालय के भीतर और बाहर दोनों प्रकार के आचरण को नियंत्रित करती है।’ पुस्तक में यह भी दर्ज है कि कई स्तरों पर भ्रष्टाचार के अनुभव देखने में आते हैं, जिससे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों की न्याय तक पहुंचने की उम्मीद प्रभावित होती है। परंतु यहां सवाल उठता है कि राजस्व न्यायालयों में यह स्थिति और भी ज्यादा खराब है। इनमें तो भूमि स्वामी का नाम बदल दिया जाता है। जब मामला सामने आता है तो उसे कंप्यूटर की भूल बता दिया जाता है। विधायिका में तो कई सांसद और विधायक सदन में सवाल पूछने की रिश्वत लेते हुए समाचार चैनलों द्वारा रंगे हाथ पकड़े गए हैं। ऐसे में यदि कार्यपालिका और विधायिका को भी इस पाठ में सम्मिलित कर दिया जाता तो विद्यार्थियों को यह पता चलता कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ भ्रष्टाचार से किस हद तक प्रभावित हो रहे हैं।
इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल को मीडिया मंच एक्स पर कहने का मौका मिल गया कि इस पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े भाग की आलोचना की गई है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब न्यायपालिका पर चर्चा की जा रही है, तो कार्यपालिका और विधायिका में समान रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार पर बात क्यों नहीं की गई? उन्होंने यहां तक कहा कि पुस्तक में राजनेताओं, मंत्रियों, लोक सेवकों और जांच एजेंसियों में कथित भ्रष्टाचार पर कोई चर्चा नहीं की गई है।
हमारे संविधान में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों और क्षेत्राधिकार के विभाजन की संवैधानिक व्यवस्था है। अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते समय ये संस्थाएं लक्ष्मण रेखा की मर्यादा को ध्यान में रखें तो न्यायालयों में बोझ घटने की उम्मीद बढ़ जाएगी। आज न्यायपालिका में मुकदमों का ढेर लगा है, उसके लिए जिम्मेदार प्रमुख प्राधिकरणों द्वारा अपना काम ठीक से नहीं किया जाना है। इसलिए सबसे बड़ी मुकदमेबाज राज्य सरकारें हैं। न्यायालयों में 66 प्रतिशत मामले राजस्व विभाग से संबंधित हैं। राजस्व न्यायालय एक तो भूमि संबंधी प्रकारणों का निराकरण नहीं करती हैं, दूसरे न्यायालय निराकरण कर भी देती हैं तो उस पर वर्षों अमल नहीं होता है। नतीजतन अवमानना के मुकदमों का बढ़ना भी एक नई श्रेणी बना रहा है। अदालत का आदेश होने के बावजूद उसका क्रियान्वयन नहीं करना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। तहसीलदार यदि भूमि के नामांतरण और बंटवारे समय पर कर दें तो किसान अदालत क्यों जाएगा? यदि नगर निगम, नगरपालिकाएं और ग्राम पंचायत ठीक से अपना काम करें तो नागरिक न्यायालय का रुख क्यों करेगा? यदि राजस्व विभाग परियोजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण विधि-सम्भव करें तो लोग अदालत के दरवाजे पर दस्तक क्यों देंगे? गौरतलब है कि जब राजस्व विभाग के अधिकारी भी संवैधानिक पदाधिकारी हैं, तो फिर वे अपने कर्तव्य का पालन अपने क्षेत्राधिकार में क्यों नहीं करते? वास्तव में इन तीनों स्तंभों को समन्वय के साथ दायित्व पालन करते हुए राष्ट्र की लोकतांत्रिक नींव मजबूत बनाए रखने की जरूरत है। अतः यदि पाठ में तीनों स्तंभों की कमजोरियों को शामिल किया जाता तो विद्यार्थियों को सम्यक और व्यापक ज्ञान प्राप्त होता।
अदालतों में मुकदमों की संख्या बढ़ाने में राज्य सरकारें निश्चित रूप से जिम्मेदार हैं। वेतन बढ़ोतरी को लेकर अनेक मामले ऊपर की अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें से अनेक तो ऐसे प्रकरण हैं, जिनमें सरकारें आदर्श व पारदर्शी नियोक्ता की शर्तें पूरी नहीं करतीं हैं। नतीजतन जो वास्तविक हकदार हैं, उन्हें अदालत की शरण में जाना पड़ता है। कई कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद भी बकाए के भुगतान के लिए अदालतों में जाते हैं। जबकि इन मामलों को कार्यपालिका अपने स्तर पर निपटा सकती है। हालांकि कर्मचारियों से जुड़े मामलों का सीधा संबंध विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ाने से नहीं है, लेकिन अदालतों में प्रकरणों की संख्या और काम का बोझ बढ़ाने का काम तो ये मामले करते ही हैं।
इसी तरह पंचायत पदाधिकारियों और राजस्व मामलों का निराकरण राजस्व न्यायालयों में न होने के कारण न्यायालयों में प्रकरणों की संख्या बढ़ रही है। जीवन बीमा, दुर्घटना बीमा और बिजली बिलों का विभाग स्तर पर नहीं निपटना भी अदालतों पर बोझ बढ़ा रहे हैं। कई प्रांतों के भू-राजस्व कानून विसंगतिपूर्ण हैं। इनमें नाजायज कब्जे को वैध ठहराने के उपाय हैं। जबकि जिस व्यक्ति के पास दस्तावेजी साक्ष्य हैं, वह भटकता रहता है। इन विसंगतिपूर्ण धाराओं का विलोपन करके अवैध कब्जों से संबंधित मामलों से निजात पाई जा सकती है। लेकिन नौकरशाही ऐसे कानूनों का वजूद बनाए रखना चाहती है, क्योंकि इनके बने रहने पर ही इनका रौब-रुतबा और पौ-बारह सुनिश्चित हैं।
अलबत्ता आज भी ब्रिटिश परंपरा के अनुसार अनेक न्यायाधीश ग्रीष्म ऋतु में छुट्टियों पर चले जाते हैं। सरकारी नौकरियों में जब से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान हुआ है, तब से हर विभाग में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। इन महिलाओं को 26 माह के प्रसूति अवकाश के साथ दो बच्चों की 18 साल की उम्र तक के लिए दो वर्षीय ‘बाल सुरक्षा अवकाश’ भी दिया जाता है। अदालत से लेकर अन्य सरकारी विभागों में मामलों के लंबित होने में ये अवकाश एक बड़ा कारण बन रहे हैं। इधर कुछ समय से लोगों के मन में यह भ्रम भी पैठ कर गया है कि न्यायपालिका से डंडा चलवाकर विधायिका और कार्यपालिका से छोटे से छोटा काम भी कराया जा सकता है। इस कारण न्यायालयों में जनहित याचिकाएं बढ़ रही हैं, जो न्यायालय के बुनियादी कामों को प्रभावित कर रही हैं। जबकि प्रदूषण, यातायात, पर्यावरण और पानी जैसे मुद्दों पर अदालतों के दखल के बावजूद इन क्षेत्रों में बेहतर स्थिति नहीं बनी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा निर्मित हो जाने से बौद्धिक योग्यता और पद प्रतिष्ठा की एक नई संस्कृति पनपी है। यदि कोई युवक या युवती सिविल जज बन जाता है, तो वे सिविल जज से ही शादी करने लग जाते हैं। शादी के बाद दंपति की अलग-अलग जगह पदस्थापना इन्हें मिलने में रुकावट बनती है, अतः ये लोग किसी न किसी बहाने छुट्टी लेकर एक-दूसरे से मिलने चले जाते हैं। ये नई संस्कृति अदालतों में काम का बोझ बढ़ाने का नया कारण बन गई है। अतः इस तरह के बिंदु नए पाठ में शामिल कर दिए जाते तो विद्यार्थियों को अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार और मुकदमों की बढ़ती संख्या की व्यापक जानकारी मिलती।