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अमायरा प्रकरण : स्कूलों में बुलिंग की अनदेखी बच्चों के लिए बन रही जानलेवा


ज्ञान चंद पाटनी

नवंबर की शुरुआत में राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक स्कूल में चौथी कक्षा की  एक छात्रा अमायरा ने स्कूल की चौथी मंजिल से कूद कर जान दे दी थी। धीरे—धीरे इस मामले की परतें खुल रही हैं। इनसे स्कूली बच्चों में बुलिंग की बढ़ती प्रवृत्ति का भी खुलासा हो रहा है। यह प्रवृत्ति देशभर के स्कूलों में कम—ज्यादा नजर आ रही है। जयपुर के स्कूल में हुए हादसे से अब तक नहीं उबरीं अमायरा की मां ने भी अभिभावकों से भरी आवाज में अपील की है कि वे अपने बच्चों को बुलिंग से दूर रहने की सीख दें।

अमायरा की मां का दावा है कि सीसीटीवी फुटेज में नजर आ रहा है कि क्लास के ही बच्चे अमायरा का मजाक उड़ा रहे थे। अमायरा ने 35 मिनट में 5 बार क्लास टीचर के पास शिकायत की लेकिन उसने ध्यान ही नहीं दिया। अमायरा की मां का कहना है कि बेटी अमायरा स्पष्ट तौर पर बुलिंग का शिकार हुई है। मामले की जांच विभिन्न स्तरों पर चल रही है। सच क्या है, यह तो जांच के बात ही पता चलेगा  लेकिन इस हादसे ने स्कूलों में बुलिंग की समस्या पर पहली बार गंभीरता से सभी का ध्यान आकर्षित किया है।

स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली बुलिंग एक गंभीर समस्या है। इससे उनके व्यक्तित्व विकास, मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बुलिंग का अर्थ है – बच्चों के बीच ऐसा जानबूझकर किया गया आक्रामक व्यवहार दोहराना जिसमें शक्ति या दबदबे का इस्तेमाल किया गया हो। इसमें शारीरिक हिंसा, मौखिक दुर्व्यवहार, साइबर बुलिंग, सामाजिक अलगाव या मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न शामिल है। भारत में यह समस्या व्यापक है। मारपीट, धक्का देना, सामान तोड़ना या छीनने से लेकर तानों – भद्दे चुटकुलों, गाली, अपमानजनक बातें करना भी इसमें शामिल हैं। किसी बच्चे को ग्रुप में अलग-थलग करना या उसकी छवि खराब करना भी बुलिंग का हथियार है। अब तो साइबर बुलिंग भी हो रही है, यानी सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग या मैसेजिंग के जरिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों को धमकाया या तंग किया जा रहा है।


  बुलिंग का मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। इससे बच्चों में अवसाद, चिंता, क्रोध, शर्म, अकेलापन, आत्मसम्मान की कमी और कभी-कभी आत्महत्या तक के मामले सामने आते हैं जैसा कि अमायरा के मामले में माना जा रहा है। बुलिंग से पीड़ित बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। पढ़ाई में मन न लगना, परीक्षा में खराब प्रदर्शन, स्कूल से अनुपस्थित रहना या स्कूल छोड़ देना जैसे मामले सामने आते हैं। व्यवहार में परिवर्तन होता है। अचानक डर, चिड़चिड़ाहट, नींद न आना, भूख न लगना जैसी समस्या, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने जैसी प्रवृत्ति सामने आती है।
 असल में भारत के स्कूलों में समय की पाबंदी या यूनिफॉर्म जैसे मामलों में तो कड़ाई बरती जाती है। निजी स्कूल तो फीस वसूली के मामले में बहुत कड़ाई बरतते हैं लेकिन  बच्चों की बात सुनने—समझने पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसलिए बच्चे दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करने में भी हिचकिचाते हैं। सीनियर या अधिक उम्र वाले बच्चों में प्रभुत्व की भावना के कारण भी ऐसे मामले सामने आते हैं।  स्कूली पाठ्यक्रम में सामाजिक और भावनात्मक शिक्षा समावेश भी न के बराबर है।


बुलिंग के मामले रोकने के लिए स्कूल प्रशासन और शिक्षकों  को बच्चों से नियमित संवाद करना चाहिए। लक्षणों को समय रहते पहचानना चाहिए और यदि ऐसा कोई मामला सामने आए तो तुरंत दोषी विद्यार्थियों की पहचान कर उनकी समझाइश करनी चाहिए। जरूरत होने पर बच्चों के माता—पिता से भी संपर्क करके सारी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि बच्चे इस तरह की प्रवृत्ति से दूर रहें और उनमें समझ पैदा हो। जरूरत पड़ने पर कड़ी कार्रवाई भी हो। विद्यार्थियों में करुणा, भाईचारे, सहिष्णुता और मित्रता जैसे भाव मजबूत करने पर खास ध्यान दिया जाए। इसे स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।


   माता-पिता की जिम्मेदारी है कि बच्चों पर निगाह रखें। व्यवहार में बदलाव हो तो सतर्क हो जाएं और उनसे संवाद बनाए रखें। बच्चों का आत्मविश्वास बनाए रखना सबसे जरूरी है। साइबर बुलिंग से बचने के लिए बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में बताना चाहिए। उसे समझाएं कि वह किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर निजी जानकारी साझा न करे। साइबर उत्पीड़न के बारे में तुरंत बताए।


 भारत में फिलहाल स्कूल बुलिंग के लिए विशिष्ट कानून नहीं है लेकिन किशोर न्याय अधिनियम, बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, और आईटी एक्ट के तहत साइबर बुलिंग जैसे मामलों में कार्रवाई संभव है। नई शिक्षा नीति में इस पर जरूर ध्यान दिया गया है। एनसीईआरटी और यूनेस्को ने मिलकर  स्कूल स्वास्थ्य और कल्याण कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए हैं। विद्यार्थियों को मानसिक स्वास्थ्य, ऑनलाइन सुरक्षा, लैंगिक समानता और पोषण जैसे 11 महत्वपूर्ण विषयों पर शिक्षित करने के लिए एक पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। इस पाठ्यक्रम को एनिमेटेड वीडियो, कॉमिक्स और गतिविधियों के माध्यम से तैयार किया गया है। इसे लागू करने के लिए शिक्षकों और स्कूल प्रमुखों को प्रशिक्षित करने के लिए कई कार्यशालाएं आयोजित करने का दावा भी किया गया है लेकिन जमीन पर इसका असर नदारद है।

 लगता है इस तरह के कार्यक्रमों के प्रति  स्कूल गंभीर नजर नहीं हैं और इसे केवल रस्म अदायगी माना जा रहा है। इसलिए अमायरा प्रकरण जैसे मामले सामने आ रहे हैं। शिक्षा जरूरी है लेकिन सबसे जरूरी है बच्चों की सुरक्षा। इसलिए बुलिंग से निपटने के लिए स्कूल, परिवार, प्रशासन और समाज को मिलकर काम करना होगा।

 
ज्ञान चंद पाटनी