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    अशरफ, अब्दुल्ला और अफगानिस्तान

    अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के लिए पूर्व वित्त मंत्री अशरफ गनी अहमदजई और उनके प्रतिपक्षी नेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच समझौता हो जाने से पिछले तीन महीने से देश में जारी राजनीतिक अनिश्चितता पर पूर्ण विराम लग गया है। गनी और अब्दुल्ला ने रविवार को राजधानी काबुल में राष्ट्रपति भवन में एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। इसके बाद देश के स्वतंत्र चुनाव आयोग के प्रमुख अहमद यूसफ नूरस्तानी ने 14 जून को हुये चुनाव में अहमदजई के विजयी होने की घोषणा कर दी। इस समझौते के बाद अब देश में चयनित सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया है। साथ ही अमेरिकी सेना के इस साल दिसंबर में अफगानिस्तान से जाने या रुकने पर स्पष्ट आधिकारिक फैसले की राह भी खुल गई है। नूरस्तानी ने स्वीकार किया कि मतदान में धांधली हुई थी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के निष्पक्ष निरीक्षक भी इन सबका पता नहीं लगा सके। माना जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र निरीक्षकों ने एक-एक मतपत्र की जांच की है। उन्होंने अंतिम चुनाव परिणाम या मत प्रतिशत की भी घोषणा नहीं की है।
    हाल ही में अफगानिस्तान चुनाव पर चर्चा के दौरान एक ब्रिटिश जनरल ने कहा था, ‘इसका हाल सरे जैसा नहीं होगा।’ चुनाव के दो दौर के बाद भी धांधली के तमाम आरोप लगे, अनियमितताओं की विस्तृत जांच हुई और दुखी होकर अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र को हस्तक्षेप करना पड़ा। साफ है, इसका हाल कमोबेश सरे जैसा ही रहा। अंतत: अफगानिस्तान ने अपनी नई सरकार चुन ली है। लेकिन इसमें सत्ता की साझेदारी होगी, जो असामान्य है। यह साझेदारी घोषित विजेता अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच होगी। जून में दूसरे दौर के चुनाव के बाद भी दोनों में से कोई भी अपने प्रतिद्वंद्वी को विजेता नहीं मान रहे थे। ऐसे में, राजनीतिक प्रक्रिया को पूरी तरह से धराशायी होने से रोकने के लिए एक ही रास्ता बचा था कि दोनों उम्मीदवारों के बीच समझौता कराकर उन्हें सत्ता में भागीदारी दी जाए और देश में ‘राष्ट्रीय एकता सरकार’ बने। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी इस समझौते का समर्थन कर रहे थे और उन्होंने धमकी दी कि अगर अफगानिस्तान में राजनीतिक गतिरोध खत्म नहीं होता है, तो उसे वह आर्थिक मदद नहीं मिलेगी, जिसकी उसे जरूरत है।
    इस गतिरोध के कारण तालिबान फिर से मजबूत हुआ। देश की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। नए समझौते को दो तरह से देखा जा सकता है। एक, नई सरकार नाकाम होने के लिए ही बनी है, क्योंकि प्रतिस्पर्द्धी धड़े अपने लाभ के लिए दूसरे का नुकसान पहुंचाएंगे और मंत्री पद का बेजा इस्तेमाल करेंगे। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। दुनिया में सत्ता-साझेदारी का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। कंबोडिया व जिंबॉब्वे का हाल हम देख चुके हैं। इराक में तो पूरे एक समुदाय को अलग-थलग कर दिया गया। दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि अफगानिस्तान की केंद्रीय व्यवस्था कमजोर है। इसमें जितने अधिक लोग शामिल होंगे, उतना अच्छा है। राष्ट्रपति गनी टेक्नोक्रैट हैं। वह सामाजिक-आर्थिक बदलाव पर काम कर सकते हैं। तालिबान के खिलाफ उनका रवैया सख्त है। अगर गनी और अब्दुल्ला अपने अहम को पीछे छोड़कर अफगानिस्तान के लिए काम करें, तो निश्चित रूप से यह देश आगे बढ़ेगा।
    चुनाव में धांधली के आरोपों से शुरु हुई राजनीतिक अस्थिरता के कारण देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था भी दांव पर लग गयी थी। अब तक देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से अफगानिस्तान की सरकार को नहीं सौंपी गयी है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई की सरकार अमेरिकी सेना के देश में रुकने के मसले पर कोई अंतिम फैसला नहीं ले पायी थी। यदि सरकार इस तरह का कोई समझौता नहीं करती है, तो अमेरिका को इस साल दिसंबर तक अपने सभी सैनिक वहां से हटाने होंगे, जबकि समझौता होने की स्थिति मे वह अफगानी सुरक्षाबलों को प्रशिक्षित करने के लिए वहां अपने कुछ सैनिकों को रख पायेगा। राजनीतिक कमजोरी का फायदा उठाकर तालिबानी आतंकवादियों ने भी अपने हमले तेज कर दिये थे। अब नई सरकार के सामने इन तालिबानी बलों से निपटने की एक बड़ी चुनौती होगी। यदि नई सरकार के गठन में और देर होती तो देश की सुरक्षा स्थिति ज्यादा बदतर हो सकती थी, जिसकी आड़ में अमेरिका नीत नाटो बल दिसंबर के बाद भी यहां रुकने का बहाना ढूंढ़ सकते थे। राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद पैदा हुये विवाद के कारण नाटो बलों के देश में रुकने पर समझौता करने के लिए चयनित सरकार तक नहीं बन पायी थी। हालांकि नये राष्ट्रपति के कार्यभार संभालने का निश्चित समय डेढ़ महीने पहले ही निकल चुका है, लेकिन देर से ही सही दोनों पक्षों के बीच यह समझौता देश के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया है।
    अहमदजई और अब्दुल्ला दोनों दावा कर रहे थे कि 14 जून को हुये चुनाव में उनकी जीत हुई है। दोनों पक्षों के अड़े रहने के कारण नये राष्ट्रपति की नियुक्ति की समय सीमा 2 अगस्त को बीत जाने के बावजूद मसले पर अनिश्चितता बनी हुई थी। अमेरिकी विदेश मंत्री जान केरी के हस्तक्षेप से अब्दुल्ला, अहमदजई को राष्ट्रपति बनाये जाने पर मान गये। अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास सभी कार्यकारी अधिकार होते हैं। नये राष्ट्रपति के पास अब मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने का भी अधिकार होगा। जानकारों का कहना है कि समझौते में इसके पद को दो साल बाद प्रधानमंत्री के पद में बदलने का प्रावधान है। माना जा रहा है कि यह पद अब्दुल्ला के किसी करीबी को या स्वयं अब्दुल्ला को दिया जा सकता है। इसी सप्ताह गनी को शपथ दिलाई जा सकती है। उनकी असली परीक्षा इसके बाद ही शुरू होगी। दोनों पक्षों में समझौता तो हो गया है, हस्ताक्षर के बाद दोनों नेता गले भी मिले, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उनके दिल भी मिल गये हैं। समझौते पर हस्ताक्षर के लिए आयोजित 10 मिनट के छोटे समारोह के दौरान उन्होंने आपस में कोई बात नहीं की और न ही कोई बयान दिया। इसलिए विवाद हल होने के बावजूद अफगानिस्तान के लोकतंत्र के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होंगे।
    अंकुर विजयवर्गीय
    अंकुर विजयवर्गीय
    टाइम्स ऑफ इंडिया से रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत। वहां से दूरदर्शन पहुंचे ओर उसके बाद जी न्यूज और जी नेटवर्क के क्षेत्रीय चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के भोपाल संवाददाता के तौर पर कार्य। इसी बीच होशंगाबाद के पास बांद्राभान में नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ कुछ समय तक काम किया। दिल्ली और अखबार का प्रेम एक बार फिर से दिल्ली ले आया। फिर पांच साल हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया। अपने जुदा अंदाज की रिपोर्टिंग के चलते भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खास पहचान। लिखने का शौक पत्रकारिता में ले आया और अब पत्रकारिता में इस लिखने के शौक को जिंदा रखे हुए है। साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन फिर भी साहित्य और खास तौर पर हिन्दी सहित्य को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की उत्कट इच्छा। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक “कुछ तो लोग कहेंगे” का संपादन। विभिन्न सामाजिक संगठनों से संबंद्वता। संप्रति – सहायक संपादक (डिजिटल), दिल्ली प्रेस समूह, ई-3, रानी झांसी मार्ग, झंडेवालान एस्टेट, नई दिल्ली-110055

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