समाज

जीवन में प्रमाणिकता: सफलता, विश्वास और सम्मान की आधारशिला

जीवन के हर क्षेत्र में प्रमाणिकता वह मूल तत्व है, जो व्यक्ति को साधारण से असाधारण बना देती है। चाहे हम किसी निजी व्यवसाय से जुड़े हों, सरकारी या निजी सेवा में कार्यरत हों, या सामाजिक-राजनीतिक जीवन में सक्रिय हों—हमारी पहचान और प्रतिष्ठा का आधार हमारी प्रमाणिकता ही होती है। बिना प्रमाणिकता के मिली सफलता क्षणिक होती है, जबकि प्रमाणिकता के साथ अर्जित उपलब्धियाँ स्थायी विश्वास और सम्मान का निर्माण करती हैं।

व्यापार के क्षेत्र को ही लें। आज बाजार में यह आम दृश्य बन गया है कि एक ही वस्तु अलग-अलग ग्राहकों को अलग-अलग कीमतों पर बेची जाती है। मोल-भाव के नाम पर मूल्य में भिन्नता लाना दुकानदार की चालाकी भले प्रतीत हो, पर इससे उसकी प्रमाणिकता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। ग्राहक मन में यह धारणा बना लेता है कि दुकानदार निष्पक्ष नहीं है। इसके विपरीत, जो व्यापारी निश्चित और समान मूल्य पर वस्तुएँ बेचता है, वह धीरे-धीरे ग्राहकों का विश्वास जीत लेता है। ऐसा दुकानदार शायद एक दिन में अधिक लाभ न कमा पाए, पर दीर्घकाल में उसकी साख बनती है, उसका व्यापार स्थिरता पाता है और ग्राहक उससे जुड़ाव महसूस करते हैं। यही प्रमाणिकता की वास्तविक शक्ति है—कम बोलकर भी अधिक प्रभाव छोड़ जाना।

सरकारी या निजी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति के लिए समयबद्धता और अनुशासन प्रमाणिकता की कसौटी हैं। समय पर कार्यालय पहुँचना, निर्धारित कार्य को ईमानदारी से पूरा करना और काम की चोरी से बचना—ये सभी बातें किसी भी कर्मचारी के चरित्र को उजागर करती हैं। अनुशासनहीनता केवल संगठन को ही नहीं, बल्कि स्वयं व्यक्ति के भविष्य को भी नुकसान पहुँचाती है। जो व्यक्ति अपने दायित्वों के प्रति गंभीर होता है, वही आगे चलकर नेतृत्व की भूमिका के लिए उपयुक्त बनता है। जीवन में सफलता तभी टिकाऊ होती है जब वह अनुशासन और ईमानदारी की नींव पर खड़ी हो।

वाणी और आचरण की प्रमाणिकता भी उतनी ही आवश्यक है। सत्य वचन व्यक्ति की विश्वसनीयता को बढ़ाते हैं, जबकि मिथ्या वचन अंततः उसकी छवि को धूमिल कर देते हैं। झूठ से तात्कालिक लाभ मिल सकता है, पर वह लाभ विश्वास की कीमत पर होता है। एक बार विश्वास टूट जाए, तो उसे पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसलिए कथनी और करनी में कोई अंतर न रहे—यही प्रमाणिकता का विशेष गुण है। जो व्यक्ति जो कहता है, वही करता है, वही समाज में सम्मान का पात्र बनता है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में चालाकी को अक्सर बुद्धिमानी समझ लिया जाता है। पर यह एक भ्रम है। व्यक्ति चाहे कितना भी चतुर क्यों न हो, यदि उसके आचरण में प्रमाणिकता नहीं है, तो वह सीधे-सादे परंतु ईमानदार व्यक्ति से कहीं पीछे रह जाता है। सादगी और सत्यनिष्ठा में वह शक्ति है, जो समय के साथ स्वयं को सिद्ध करती है। इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़े साम्राज्य और प्रतिष्ठान भी अंततः ईमानदारी और नैतिकता के बल पर ही टिके रहे हैं।

राजनीतिक क्षेत्र में प्रमाणिकता का महत्व और भी बढ़ जाता है। राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है। जो नेता अपने वचनों पर खरा उतरता है, जनता के सुख-दुख में सहभागी बनता है और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर निर्णय लेता है, वही वास्तव में लोगों के दिलों पर राज करता है। ऐसे व्यक्तित्व को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और पीढ़ियाँ उसे उदाहरण के रूप में याद रखती हैं। इसके विपरीत, जो नेता अवसरवादिता और छल का सहारा लेते हैं, वे कुछ समय के लिए भले चमक जाएँ, पर अंततः जनता के विश्वास से वंचित हो जाते हैं।

प्रमाणिकता केवल बाहरी व्यवहार तक सीमित नहीं है; यह आत्मानुशासन और आत्मसम्मान का भी प्रतीक है। जो व्यक्ति स्वयं से सच्चा होता है, वही दूसरों से भी सच्चा रह पाता है। वह अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों। यही आत्मबल उसे भीड़ से अलग पहचान दिलाता है।

अंततः कहा जा सकता है कि प्रमाणिकता जीवन की वह धुरी है, जिसके चारों ओर सफलता, विश्वास और सम्मान घूमते हैं। यह हमें सही और गलत के बीच भेद करना सिखाती है, तात्कालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की प्रेरणा देती है और समाज में एक स्वस्थ नैतिक वातावरण का निर्माण करती है। यदि हम अपने जीवन में अनुशासन, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता को अपनाएँ, तो न केवल हम स्वयं उन्नति करेंगे, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनेंगे।

जीवन की वास्तविक विजय वही है, जो प्रमाणिकता के पथ पर चलकर प्राप्त की जाए। क्योंकि अंततः वही व्यक्ति सफल कहलाता है, जो न केवल ऊँचाइयों तक पहुँचे, बल्कि वहाँ तक पहुँचने का मार्ग भी ईमानदार और अनुशासित रहा हो।

– सुरेश गोयल धूप वाला