मनोरंजन मीडिया दुनिया भर में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां May 2, 2026 / May 2, 2026 | Leave a Comment अगर सच बोलने वालों को हतोत्साहित किया जाता रहा तो सच भी धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाएगा। यह स्थिति न तो किसी समाज के लिए शुभ कही जा सकती है और न ही किसी देश या दुनिया के लिए। तय हमें ही करना है कि हम क्या चाहते हैं? Read more » 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस दुनिया भर में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां
समाज क्या प्यार की भी कोई उम्र होती है? March 29, 2026 / March 29, 2026 | Leave a Comment जब युवा प्रेम करते हैं तो उसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है, लेकिन वही प्रेम यदि ढलती उम्र में जन्म ले तो समाज असहज क्यों हो उठता है? इस मानसिकता पर गंभीर विचार की जरूरत है। Read more » The right of older people to love and marry उम्रदराज लोगों को प्रेम करने या विवाह करने का अधिकार
विधि-कानून शख्सियत समाज अदालत में सख्ती, समाज से संवाद: न्यायपालिका की बदलती छवि March 5, 2026 / March 5, 2026 | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा हमारे देश में न्यायपालिका की पहचान लंबे समय तक आम जन से एक निश्चित दूरी से निर्मित होती रही है। जब एक न्यायाधीश के जीवन की कल्पना करते हैं तो उनके अदालत तक सीमित होने, सामाजिक आयोजनों से लगभग अनुपस्थित और आम नागरिकों से औपचारिक दूरी बनाकर रहने की तस्वीर उभरती […] Read more » District Judge posted in Dholpur Rajasthan Sanjeev Mago राजस्थान के धौलपुर में पदस्थ जिला न्यायाधीश संजीव मागो
ज्योतिष धर्म-अध्यात्म ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति February 16, 2026 / February 16, 2026 | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा आने वाली 19 मार्च से विक्रम संवत 2083 शुरू हो रहा है। ज्योतिषियों ने बताया है कि इस बार वर्ष के राजा देवगुरु बृहस्पति होंगे। सब लोग न ज्योतिषी हैं और न खगोल के जानकार। ग्रहों की गणना समझ से बाहर हो सकती है लेकिन हरर साल यह बात पढक़र लोग ठहर जाते हैं। वर्ष के राजा के विचार में एक प्रतीक छिपा है, वह ध्यान खींचता है। इस विचार में सत्ता को लेकर एक ऐसी सोच छिपी है, जो हमारी रोजमर्रा की राजनीति से बिल्कुल अलग है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार हर नव संवत्सर के साथ सृष्टि की सत्ता बदलती है। एक ग्रह वर्ष का राजा बनता है, कोई मंत्री, कोई सेनापति, कोई वर्षा का अधिपति। यह पूरी व्यवस्था प्रतीकात्मक है। लेकिन कल्पना कीजिए कि ऊपर कहीं तो यह मान लिया गया है कि सत्ता स्थाई नहीं होती। वह हर साल बदलती है। उत्तदायित्व परिवर्तित होते रहते हंै। कोई एक हमेशा के लिए नहीं बैठा रहता। यह विचार अपने आप में सुंदर है। क्योंकि हमारी धरती पर सत्ता अक्सर स्थायित्व चाहती है। यहां कुर्सी को पकड़ कर रखने की प्रवृत्ति स्वाभाविक मानी जाती है। हमारी परंपराओं में बदलाव स्वाभाविक ही नहीं है बल्कि आवश्यक है। फिर भी बदलाव को जोखिम समझा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं कहती हैं कि अगर बृहस्पति वर्ष के राजा हों तो ज्ञान, संतुलन और नैतिकता के संकेत माने जाते हैं। अगर शनि हों तो अनुशासन और कठोर परिश्रम के संकेत। मंगल राजा हों तो ऊर्जा और संघर्ष होना तय है। इन मान्यताओं को कोई आस्था कहता है, कोई इन्हें सांस्कृतिक कल्पना के दायरे मं रखता है तो किसी की नजर में यह प्रतीकात्मक भाषा है। तमाम दृष्टियों के बावजूद एक बात तय है कि हर साल का स्वभाव अलग हो सकता है। हर समय एक जैसा नहीं होता। धरती पर सत्ता का लोभ इस कदर हावी है कि हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो व्यवस्था आज है, वही अंतिम है। जो सोच अभी प्रबल है, वही स्थाई है। लेकिन कैलेंडर हर साल बदलकर यह स्मरण करवा देता है कि समय स्थिर नहीं है। अगर ग्रहों की कल्पित सत्ता बदल सकती है तो मनुष्य की सत्ता क्यों नहीं? अगर ब्रह्मांड को हर साल नई दिशा दी जा सकती है तो समाज में नई सोच क्यों नहीं आ सकती? कई लोग तर्क-वितर्क करते हैं। ज्योतिष की सत्यता या असत्यता में उलझ जाते हैं लेकिन बात उस प्रतीक की है जो हमारी परंपराओं ने हमें दिए हैं। परंपराएं भूमिकाओं को अस्थाई करार देती हैं। यानी, आज जो राजा है, कल वह आम आदमी होगा। आज जो मंत्री बन उद्बोधन देता है, वह कल श्रोताओं की कतार में होगा। आज जो नीति नियंता है, निर्णय लेने में समक्ष है, कल उससे सवाल पूछे जाने अवश्यम्भावी हैं। दरअसल, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। बचपन में पिता सवाल पूछते हैं, बड़ा होकर बेटा पूछने लगता है। कभी शिक्षक मंच पर होता है तो कभी शिष्य मंचासीन हो जाते हैं। कभी हम निर्णय लेते हैं तो कभी निर्णय मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं। नव संवत्सर का विचार सकारात्मकता का भाव लेकर आता है। चाहे पिछले वर्ष में कितनी ही उलझनें रही हों, कितनी मुश्किलें आई हों, पर नव संवत्सर कहता है कि पुन: शुरुआत संभव है। विज्ञान कहते हैं कि अगर हर चक्र के उपरांत नया चक्र आने के प्रति कुदरत आश्वस्त रहती है तो हममें यह आश्वासन का भाव क्यों नहीं होना चाहिए? लोग अक्सर बड़े सिद्धांतों में उलझ जाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में यह सब अधिक हो गया है। हम तर्क-वितर्क में उलझते हैं, पर इस सीधे-सहज विचार पर ध्यान नहीं देते कि काम करो और आगे बढ़ जाओ। ब्रह्मांड चल रहा है। सूर्य नित्य उदय होता है, वह क्या कोई घोषणा करता है। ग्रह अपनी कक्षा में घूमते हैं, क्या वह कोई बहस करते हैं? इनमें किसी को खुद को अपरिहार्य प्रमाणित करने के लिए श्रम नहीं करना पड़ता मगर धरती पर सब इसी काम पर पसीना बहा रहे हैं। हम धरती के लोग मानने लगे हैं कि हमारे बिना व्यवस्था ठहर जाएगी लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कोई व्यक्ति, पद या शासन शाश्वत हुआ है? नव संवत्सर के दिन कामकाज संभालने वाली ब्रह्मांड की सरकार को चाहे कोई कल्पना माने, चाहे आस्था का हिस्सा बनाए अथवा सांस्कृतिक परंपरा की श्रेणी में रखे मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि यह परिवर्तन को अंगीकार करना सिखाती है। यह कुर्सी को पकड़ कर बैठने से परहेज करने की वकालत करती है। कोई चाहे खुद न समझे मगर ज्योतिषियों के सानिध्य में पहुंच कर वह ग्रहों की चाल समझने की जरूर करते हैं लेकिन ग्रहों के बहाने से कहा क्या जा रहा है, समझाया क्या जा रहा है, उसे समझने की कोशिश नहीं करते। अमरपाल सिंह वर्मा Read more » The government of the universe and the politics of the earth ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति
पर्यावरण लेख सेब से खेजड़ी तक: विकास बनाम पर्यावरण की एक जैसी लड़ाई February 5, 2026 / February 5, 2026 | Leave a Comment सेब से खेजड़ी तक: विकास बनाम पर्यावरण की एक जैसी लड़ाई Read more » विकास बनाम पर्यावरण सेब से खेजड़ी तक
शख्सियत समाज सेवा की मिसाल बना पंजाब के एक गांव से निकला संन्यासी January 29, 2026 / January 29, 2026 | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा पंजाब के एक छोटे से गांव से निकले एक साधारण युवक ने संन्यास का मार्ग चुना और राजस्थान में पहुंच कर भक्ति के साथ जन सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उसने अपने तप, त्याग व करुणा से हजारों-लाखों लोगों की जिंदगी में उजाला भर दिया। आज वही युवक संत […] Read more » संत स्वामी ब्रह्मदेव
खान-पान खेत-खलिहान लेख खेती का संकट और पारंपरिक देसी बीज January 23, 2026 / January 23, 2026 | Leave a Comment अमरपाल सिंह वर्मा निरंतर लागत बढ़ती चले जाने से हमारे देश में खेती संकट के दौर से गुजर रही है। एक ओर खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल, बिजली आदि का खर्च बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर किसान की आय सिमटती जा रही है। जलवायु संकट के दौर में अनिश्चित मौसम और कीटनाशकों के बढ़ते प्रकोप […] Read more » Farming crisis and traditional indigenous seeds
समाज आखिर कब रुकेंगे सडक़ हादसे? December 30, 2025 / December 30, 2025 | Leave a Comment हाल ही में केंद्रीय सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में सडक़ हादसों को लेकर जो कहा, वह केवल एक मंत्री का बयान नहीं था बल्कि भावुक, विचलित और एक बेचैन इंसान की स्वीकारोक्ति भी थी कि सडक़ हादसे ऐसी राष्ट्रीय त्रासदी है, जिसे हम ठीक से रोक नहीं पा रहे। Read more » When will road accidents stop कब रुकेंगे सडक़ हादसे
समाज भारत: जनसंहारों से चिंतित दुनिया को प्रेरणा देता एक उजला देश December 22, 2025 / December 22, 2025 | Leave a Comment कश्मीरी पंडितों का नरसंहार Read more » कश्मीरी पंडितों का नरसंहार भारत
खान-पान जहरीले होते बादल December 12, 2025 / December 17, 2025 | Leave a Comment हमारी धरती, वायु से लेकर खानपान की चीजों तक कीटनाशकों की मौजदूगी के प्रमाण पहले ही मिल चुके हैं। दुनिया में विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों ने कीटनाशकों को लेकर नई चिंता पैदा की है। Read more » जहरीले होते बादल
समाज टूटते रिश्तों के बीच अदालत की टिप्पणी और बदलता सामाजिक ताना-बाना December 11, 2025 / December 11, 2025 | Leave a Comment यह केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं है बल्कि इससे पता चलता है कि हमारे घरों के भीतर क्या बदल रहा है और रिश्तों में कैसी नकारात्मकता पैदा हो रही है। रिश्ते, खासकर ससुराल में, किस प्रकार दरक रहे हैं। एक जमाने में पति-पत्नी के बीच नोक- झोंक सामान्य बात हुआ करती थी Read more » टूटते रिश्तों के बीच अदालत की टिप्पणी
लेख धरोहर संरक्षण की राह दिखाती है राजस्थान में निकली एक यात्रा September 29, 2025 / September 29, 2025 | Leave a Comment ‘जांगल जात्रा’ के नाम से निकली इस यात्रा का मकसद केवल स्थानीय धरोहरों को पहचान दिलाना भर नहीं है बल्कि पूरे देश को यह प्रेरणा देना है कि हम सब अपने-अपने क्षेत्र की धरोहरों को मुख्यधारा के पर्यटन और विकास से जोड़ें। Read more » राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले से निकली एक अनोखी यात्रा