कमलेश पांडेय

कमलेश पांडेय

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वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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पर्यावरण राजनीति

उत्तरकाशी के धराली गांव में आई प्राकृतिक आपदा से धधकते सवाल?

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कमलेश पांडेय भारत वर्ष में विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बावजूद इसके ब्रेक के बाद यहां आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। एआई के अप्रत्याशित विकास के बावजूद शोधकर्ताओं की उदासीनता और  लापरवाही से विषयगत सफलता अभी तक हासिल नहीं की जा सकी है। इसलिए सरकार, निजी उद्यमियों और शोधार्थियों को इस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। खासकर मौसम विज्ञान और पर्यावरण ज्योतिष के अनुसंधान कर्ताओं को इस ओर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है। इससे समय रहते ही हमें सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी और ऐसी आपदाओं के बाद होने वाली भारी धन-जन की हानि भी रोकने में मदद मिलेगी और यदि ऐसा संभव हुआ तो यह भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि भी होगी। बताते चलें कि उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में आई अकस्मात बादल फटने जैसी आपदा प्रकृति और आये दिन बिगड़ते पारिस्थितिकी संतुलन की एक और गंभीर चेतावनी है।  पर्वतीय प्रदेशों में ऐसी चेतावनियों की एक लंबी श्रृंखला है जो हमें चीख चीख कर यह बताती है कि पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन साधने की कितनी जरूरत है? खासकर, देश के पहाड़ी राज्यों, यथा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि पर्वतीय प्रदेशों को लेकर ऐसी नीति बननी चाहिए जिससे पहाड़ और इंसानों के बीच चिरस्थायी संतुलन बना रहे। इसलिए यह सवाल उठता है कि आखिरकार कुदरत की चेतावनी को हमलोग कब समझेंगे? और सिर्फ समझेंगे ही नहीं बल्कि उनके अनुरूप ही अपना अग्रगामी व्यवहार भी बदलेंगे।  यह ठीक है कि तकनीकी क्रांति और सूचना क्रांति से विकास में अप्रत्याशित गति आई है लेकिन विकास के भौगोलिक मानदंडों की उपेक्षा की जो सार्वजनिक और व्यक्तिगत कीमत सम्बन्धित लोगों को चुकानी पड़ रही है, वह नीतिगत व प्रशासनिक लापरवाही नहीं तो क्या है? यह यक्ष प्रश्न बन चुका है। जानकारों का कहना है कि उत्तरकाशी के धराली गांव में खीरगंगा नदी के ऊपरी क्षेत्र में जो बादल फटा, उंससे आये फ्लैश फ्लड ने रास्ते में आने वाली हर चीज को अपनी चपेट में ले लिया। इससे प्रभावित इलाके से आ रहे विडियो दिल दहलाने वाले हैं। चूंकि अभी चारधाम यात्रा का सीजन चल रहा है और यह गांव गंगोत्री वाले रास्ते पर ही पड़ता है जो श्रद्धालुओं के रुकने का एक अहम पड़ाव भी है। ऐसे में जानमाल की बड़े पैमाने पर हानि होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। चूंकि उत्तरकाशी जैसे उत्तराखंड के जनपदों में ब्रेक के बाद प्राकृतिक आपदा आती रहती है। इसलिए यहाँ पर निरंतर/  लगातार आफत आते रहने से शोधकर्ताओं को और भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा इसलिए कि हाल के बरसों में उत्तराखंड इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के केंद्र में रहा है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2021 में चमोली जनपद में, नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के पास एक ग्लेशियर टूटकर गिर गया था। इसकी वजह से धौलीगंगा नदी में अचानक बाढ़ आ गई और तपोवन विष्णुगाड पनबिजली परियोजना में काम करने वाले कई श्रमिकों को जान गंवानी पड़ी।  इसी तरह, साल 2023 की शुरुआत में एक और धार्मिक पर्यटन स्थल जोशीमठ में भूस्खलन ने एक बड़ी आबादी को विस्थापित कर दिया। वहीं, साल 2013 में केदार घाटी में मची भयानक तबाही से लेकर अभी तक, छोटी-बड़ी ऐसी कई प्राकृतिक आपदाएं आ चुकी हैं। इसलिए पुनः सुलगता हुआ सवाल यहां आकर ही ठहर जाती है कि आखिर  पहाड़ से छेड़छाड़ कब रुकेगी क्योंकि आरोप है कि उत्तराखंड में चल रहे बेशुमार पावर प्रॉजेक्ट्स ने पहाड़ों को खोखला कर दिया है। वहीं, इस दौरान क्षेत्र में बढ़ती आबादी, लाखों पर्यटकों के बोझ, अनियंत्रित निर्माण और घटती हरियाली को मिला दीजिए तो स्थिति विस्फोटक बन जाती है। इसलिए पर्यावरण प्रेमी पहाड़ अनुकूल विकास करने की मांग हमेशा उठाते रहते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि बादल फटना एक प्राकृतिक घटना है जिस पर इंसानों का कोई जोर नहीं लेकिन, यह भी एक उद्वेलित करने वाला तथ्य है कि जब पानी के निकलने के रास्तों, नालों-गदेरों के मुहानों पर कंक्रीट के बड़े-बड़े स्ट्रक्चर खड़े हो चुके हैं तो फिर उन तमाम जगहों पर, जिन रास्तों से पानी को बहना था, आखिर वह कैसे निकलेगा क्योंकि उन रास्तों पर तो प्रकृति प्रेमी इंसान बस चुका है। स्पष्ट है कि यह जानबूझकर आफत बुलाने जैसा है। इसी के चक्कर में भारी धन-जन की हानि झेलनी पड़ती है और आपदा आने के बाद प्रशासन का जो सिर दर्द बढ़ता है, वह अलग बात है।  इसलिए समकालीन स्थिति-परिस्थितियों को बदलने की जरूरत है। इंसान को संभलने की जरूरत है। सच कहूं तो उत्तराखंड को लेकर यह जारी बहस तकरीबन 5 दशक पुरानी है कि विकास किस कीमत पर होना चाहिए? साल 1976 में, गढ़वाल के तत्कालीन कमिश्नर एमसी मिश्रा की अध्यक्षता में गठित एकं कमिटी ने जोशीमठ को बचाने के लिए फौरन कुछ कदम उठाने की सिफारिश की थी- इनमें संवेदनशील जोन में नए निर्माण पर रोक और हरियाली बढ़ाना प्रमुख था लेकिन 49 साल बाद आज वह रिपोर्ट पूरे पहाड़ के लिए प्रासंगिक हो चुकी है।  इसलिए केंद्रीय व राज्य सत्ता प्रतिष्ठान को चाहिए कि वे दूरदर्शिता भरा कदम उठाएं और पर्वतीय प्रदेशों की रमणीकता के दृष्टिगत उन पर फिदा होने वालों को बसने से रोके। भारतीय सनातन संस्कृति भी पहाड़ों को साधना स्थली बताती है जबकि मैदानी भूभाग जनजीवन के बसने हेतु श्रेष्ठ हैं। पर्वतीय घाटियों में भी रहा जा सकते है लेकिन मैदानों के सूखा या बाढ़ की तरह वहां भी ऐसा ही कुछ होते रहने की संभावना बनी रहती है।  कमलेश पांडेय

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राजनीति

मांसाहारी खाने पर जारी ‘सेक्युलर सियासी खेल’ के साइड इफेक्ट्स

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कमलेश पांडेय सनातनी हिंदुओं के पवित्र श्रावण यानी सावन के महीने में या आश्विन माह में पड़ने वाले शारदीय नवरात्र के दिनों में पिछले कुछ वर्षों से नॉन-वेज फूड को लेकर जो विवाद सामने आ रहे हैं, वह इस बार भी प्रकट हुए और पक्ष-विपक्ष की क्षुद्र राजनीति के बीच अपनी नीतिगत महत्ता खो बैठे। वहीं, तथाकथित एनडीए शासित राज्य की बिहार विधानसभा के सेंट्रल हॉल में गत सोमवार को खाने में जिस तरह से नॉन-वेज भी परोसा गया, उसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खिंच गई हैं।  इसी तरह, यूपी में कांवड़ यात्रा मार्ग स्थित ढाबों और भोजनालयों पर दुकान मालिकों की पहचान स्पष्ट करने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में उठा। स्पष्ट है कि यहां भी मूल में भोजन ही है। इसलिए पुनः यह सवाल अप्रासंगिक है कि कोई क्या खाता है, क्या नहीं, यह पूरी तरह व्यक्तिगत मामला है और इस पर ऐसे विवाद से बचा जा सकता था। लेकिन ऐसे सो कॉल्ड सेक्यूलर्स और वेस्टर्न लॉ एडवोकेट्स को पता होना चाहिए कि सदियों से भारतीय समाज एक संवेदनशील व सुसंस्कृत समाज रहा है, जहां स्पष्ट मान्यता है कि खान-पान से व्यक्ति के मन का सीधा सम्बन्ध होता है।  कहा भी गया है कि जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन। इसलिए राजा या शासक का कर्तव्य है कि वह आमलोगों को शुद्ध और सुरुचिपूर्ण भोजन ग्रहण करने योग्य कानून बनाए और उसकी सतत निगरानी रखे। चूंकि भारतीय समाज में शाकाहारी खानपान को प्रधानता दी गई है ताकि निरोगी जीवन का आनंद लिया जा सके। इसलिए ऐसे लोगों को अभक्ष्य पदार्थों यानी अंडे, मांस-मछली का दुर्गंध नहीं मिले, इसकी भी निगरानी रखना प्रशासन का काम है।  वहीं, खान-पान के व्यवसाय से जुड़ी कम्पनियां शाकाहारी लोगों को मांसाहारी उत्पाद डिलीवर न कर दें, मिलावटी शाकाहारी समान न डिलीवरी कर दें, यह देखना भी प्रशासन का ही धर्म है। यदि वह धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अपने नैतिक दायित्वों से मुंह मोडता है तो उसे भारत पर शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसलिए देश की भाजपा नीत एनडीए सरकार, या विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारें या एनडीए सरकारें इस बात की कोशिश कर रही हैं कि खास पर्व-त्यौहारों पर निरामिष लोगों के अनुकूल माहौल बनाए रखा जाए। आमतौर पर यह माना जाता है कि इस्लामिक शासनकाल में और ब्रिटिश शासनकाल में सनातन भूमि पर गुरुकुल, ब्रह्मचर्य व शाकाहार को हतोत्साहित किया गया और मांसाहार तथा मद्यपान को प्रोत्साहित किया गया। जिससे कई सामाजिक कुरूतियों जैसे कोठा संस्कृति वाली वैश्यावृत्ति और अनैतिक अपराध को बढ़ावा मिला। ऐसा इसलिए कि दूषित अन्न खाने व दूषित पेय-पदार्थ पीने से मानवीय मनोवृत्ति विकृत हुई।  इसलिए कहा जा सकता है कि उदार और सहनशील भारतीय समाज का जो नैतिक पतन हुआ है, कभी-कभी स्थिति पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के काबू से बाहर हो जाती है, उसका सीधा सम्बन्ध असामाजिक तत्वों के खानपान से भी है। इसलिए इस अहम मुद्दे के सभी पहलुओं पर निष्पक्षता पूर्वक विचार होना चाहिए। इस मामले में आधुनिक प्रशासन का ट्रैक रिकार्ड बेहद ही खराब रहा है, अन्यथा जानलेवा मिलावट खोरी इतनी ज्यादा नहीं पाई जाती। मीडिया रिपोर्ट्स भी इसी बात की चुगली करती आई हैं। जहां तक व्यक्तिगत चुनाव की बात है तो यह अपने घर पर ही लागू हो सकते हैं, सार्वजनिक जगहों पर बिल्कुल नही। इस बात में कोई दो राय नहीं कि खाने-पीने की पसंद किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी संस्कृति का हिस्सा होती है। इसलिए भारत में जैसी विविधता पूर्ण संस्कृति रहती आई है, वैसे ही यहां के खाने में भी विविधता सर्वस्वीकार्य है। इसलिए किसी को क्या खाना चाहिए, इसकी पुलिसिंग होनी चाहिए या नहीं, विवाद का विषय है।  कहना न होगा कि जैसे कानून किसी को भी जहर खाने की इजाजत नहीं देता है, वैसे ही मीठे जहर के रूप में प्रचलित बाजारू चीजों की भी जांच-पड़ताल की जानी चाहिए और यदि वे जनस्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल हों तो उनपे निर्विवाद रूप से रोक भी लगनी चाहिए। यही बात मांसाहार पर भी लागू होनी चाहिए, क्योंकि इससे मानवीय शरीर में विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोगाणुओं को भी बढ़ावा मिलता है। बर्ड फ्लू इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कुछ लोग बताते हैं कि लोगों के खानपान की पुलिसिया निगरानी या ऐसी कोई भी कोशिश संविधान के उस अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगी, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है। इसलिए भोजन और पहनावा भी इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन यह सिर्फ घर के चहारदीवारी के भीतर होनी चाहिए, वो भी तभी तक जब तक कि पड़ोसी को आपत्ति नहीं हो।  ऐसा इसलिए कि आधुनिक फ्लैट संस्कृति में एक घर के रसोई की सुगंध या दुर्गंध पड़ोसियों के बेडरूम तक पहुंच जाती हैं। इसलिए भोजन निजी पसंद की चीज है, लेकिन बगलगीर की भावनाओं का सम्मान करना भी मांसाहारियों की नैतिक जिम्मेदारी है, क्योंकि कुछ शाकाहारी लोग तो दुर्गंध मात्र से उल्टी कर बैठते हैं। इससे उनका जीवन भी खतरे में आ जाता है। इसलिए यह राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि सियासी सूझबूझ का परिचायक समझा जा सकता है। भारतीय राजनीति की एक सबसे बड़ी कमी यह महसूस की जाती है कि हमारी कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया को जनहितैषी बनाने में यह विगत सात-आठ दशकों में भी शत-प्रतिशत क्या, पचास प्रतिशत भी सफल नहीं हुई है। लोकतंत्र और पाश्चात्य लोकतांत्रिक मूल्यों, जिस खुद पश्चिमी देश अपनी सुविधा के अनुसार चलते हैं, भारत में आँखमूद कर लागू कर दिए जाते हैं। इसलिए व्यापक जनहित का सवाल व्यवहारिक रूप से काफी पीछे छूट जाता है। हालांकि इसके बाद भी सावन में पिछले कुछ वर्षों से नॉन-वेज फूड को लेकर विवाद खड़े होते रहे हैं। देखा जाए तो ज्यादातर के मूल में राजनीति होती है। बिहार में दो साल पहले भी सावन पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी के घर जाकर मटन पकाना एक सियासी मुद्दा बन गया था। कुछ दिनों पहले, जब प्रशांत किशोर की पार्टी में बिरयानी बंटी, तब भी हंगामा हुआ और सफाई देनी पड़ी कि यह तो वेज थी ! यही वजह है कि खानपान को लेकर नीतिगत संतुलन की जरूरत सबको है। इसलिए आस्था को भोजन के साथ मिलाने पर जो समस्या खड़ी होती है, वैसी ही समस्या इसकी अनदेखी के पश्चात भी खड़ी होती बताई जाती है। चूंकि दोनों ही निजी मामले हैं और दोनों में ही किसी को दखल देने का हक नहीं है। हां, यह जरूर है कि जब बात किसी खास आयोजन या धार्मिक अवसर पर किसी समुदाय की भावनाओं से जुड़ी हो, तो वहां सभी पक्षों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत पड़ती है। ऐसा ही होता भी आया है। वहीं, भोजन किसी व्यक्ति की गरिमा का सवाल भी है। असल में, भोजन केवल भूख से नहीं, व्यक्ति की गरिमा से भी जुड़ा होता है। यह सम्मान के साथ कमाने और खाने का हक इस देश के सभी नागरिकों को देता है। किसी भी वजह से इन हकों को छीनने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। फिर यह भी देखना चाहिए कि खाने का इस्तेमाल राजनीति की बिसात पर न हो। साथ ही, इस राजनीति से लोगों की रोजी-रोटी पर आंच भी नहीं आनी चाहिए।  आखिर हमें यह मानना पड़ेगा कि भजन की तरह भोजन भी स्वरूचि का विषय है लेकिन जिस तरह से भजन का नाता आतंकवाद और विघटन कारी तत्वों से जुड़ गया है, कुछ वैसी ही आशंका भोजन को लेकर भी जन्म ले रही हैं। इसलिए विधायी, प्रशासनिक, न्यायिक और मीडिया के स्वविवेक से जब इस जटिल मुद्दे का समाधान भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अनुरूप निकाला जाएगा तो मुझे उम्मीद है कि शाकाहारी लोगों की जनभावना आहत नहीं होंगी। कमलेश पांडेय

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राजनीति

हिन्दू परिवारों के धर्म परिवर्तन कराने के ठेकेदार जमालुद्दीन उर्फ छांगुर को पहचानने में आखिर 8 वर्षों तक कैसे चुकी यूपी सरकार?

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कमलेश पांडेय हिंदू परिवारों का धर्म परिवर्तन, लव जिहाद और देश विरोधी गतिविधियों के आरोप में एटीएस के शिकंजे में आए जमालुद्दीन उर्फ छांगुर के मंसूबे कहीं ज्यादा घातक थे, ऐसा उसकी अलग-अलग गतिविधियों से पता चलता है। इसलिए सवाल है कि उत्तरप्रदेश में पिछले 8 सालों से योगी सरकार होने के बावजूद जिस तरह से हिंदू परिवारों का धर्म परिवर्तन कराया गया, यह प्रशासन और खुफिया इकाई के मुंह पर किसी तमाचे से कम नहीं है। सच कहूं तो यह उनकी विफलता का द्योतक है। इसलिए आशंका तो यह है कि इस पूरे खेल में योगी सरकार के ही कुछ मंत्री और उनके भरोसेमंद अधिकारी भी शामिल रहे होंगे, अन्यथा इस बात के खुलासे में इतना विलंब नहीं होता।  दबी जुबान में लोगों के इशारे हैं कि यदि केंद्रीय गृह मंत्रालय इस एंगल से भी जांच करवाए तो योगी प्रशासन के दूरगामी हित के लिए बेहतर रहेगा। यहां के सियासी हल्के में जो लोग बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की मांग कर रहे थे, संभव है कि उनके तार भी ऐसे गिरोह से जुड़े हों। ऐसा इसलिए कि अमेरिका-चीन के इशारे पर और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से भारत के इस्लामीकरण की जो देशव्यापी साजिश कुछ भारतीय राजनीति दलों के परोक्ष समर्थन से जारी है, उसका बहुत छोटा सा इलाकाई प्यादा जमालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा है जो कि धर्मांतरण के आरोप में गिरफ्तार हुआ है।  इसलिए अब आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश में इस प्रकरण की गम्भीर जांच हो और कुछ बड़ी मछलियों के साथ साथ उन छोटी मछलियों को भी पकड़ा जाए, जो हिंदुओं के धर्मांतरण के खेल में शामिल हैं। यही नहीं, वहां के राज्य प्रशासन के कुछ अधिकारियों की चुप्पी को भी टटोला जाए ताकि बड़े-बड़े खुलासे हो सकें। खासकर महानगरों व बड़े नगरों पर भी इसी दृष्टि से नजर दौड़ाई जाए। विशेष तौर पर एक धर्मांतरण जांच प्रकोष्ठ बने, जो सतत निगाह रखे। ऐसा इसलिए कि जमालुद्दीन उर्फ छांगुर को लेकर जो नए नए खुलासे हो रहे हैं, उसमें गम्भीर खुलासा यह हुआ है कि छांगुर ने जमीनों में भी खूब पैसा लगाया था। तभी तो हर खरीद व बिक्री पर मुनाफे की रकम छांगुर तक पहुंचती थी जो धर्म परिवर्तन कराने में खर्च होता था। स्पष्ट है कि उत्तरप्रदेश के बलरामपुर जनपद में अवैध धर्मांतरण को आगे बढ़ाने के लिए छांगुर ने कई दांव-प्रतिदाँव चले थे। वह इतना शातिर है कि लोकल अधिकारियों को मैनेज करके व लोगों को अनुचित लाभ देकर खुद की टीम से जोड़ने के लिए प्रॉपर्टी का कार्य भी करा रहा था।  बताया गया है कि उसके इस काम को महबूब और नवीन रोहरा देखते थे जिससे अच्छी आमदनी होती थी और पूरा का पूरा मुनाफा धर्म परिवर्तन कराने में खर्च होता था। वहीं यह भी पता चला है कि पहले लोगों को प्रभावित करने के लिए छांगुर उन्हें रुपये बांटता था और फिर इस्लाम धर्म कबूल करने का दबाव बनाता-बनवाता था। उदाहरणतया, उत्तरौला में ही छांगुर ने छह स्थानों पर बेशकीमती जमीन खरीदी है। इसके अलावा, शहर में दो कॉम्प्लेक्स भी बनवाए हैं। इसके साथ ही साथ प्लॉटिंग भी कर रहा था।  इस बारे में छांगुर के राजदार रहे एक व्यक्ति ने एक मीडिया से बातचीत करते हुए बताया है कि छांगुर धर्म परिवर्तन कराने के लिए कई तरह से रुपये बांटता था। वह सुनियोजित योजना के तहत हिंदू श्रमिकों और गरीब परिवारों को पहले नियमित खर्च के लिए रुपये देता था। ततपश्चात वह ऐसे लोगों को अपने घर में साफ-सफाई या जानवरों की देखरेख का काम सौंपता था। फिर छांगुर उन्हें वेतन के साथ ही 100-200 रुपये रोज देता था। इसके बाद प्रभाव में लेकर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए कहता और बेहतर जिंदगी का ख्वाब दिखाता था।  वहीं, छांगुर के यहां सफाई करने वाले संचित ने एटीएस को बताया है कि उसे छांगुर ने धर्म परिवर्तन करने पर पांच लाख रुपये देने का लालच दिया था और इनकार करने पर दुष्कर्म के मामले में फंसा दिया। खबर है कि एटीएस ने भी संचित के बयान का जिक्र अपनी जांच में किया है। इन बातों से साफ है कि हिंदू परिवारों का धर्म परिवर्तन, लव जिहाद और देश विरोधी गतिविधियों के आरोप में एटीएस के शिकंजे में आए जमालुद्दीन उर्फ छांगुर के मंसूबे कहीं ज्यादा घातक थे।  खबर है कि अवैध धर्मांतरण के लिए उसने नेपाल से सटे संवेदनशील सात जिलों में सक्रिय कुछ ईसाई मिशनरियों से भी उसने सांठगांठ कर ली थी। वह उनके पास्टर और पादरी को पैसे देकर कमजोर वर्गों का ब्योरा लेता था और फिर चिह्नित परिवारों को आर्थिक रूप से मदद देकर उन्हें अपने प्रभाव में लेकर धर्म परिवर्तन कराता था। खबर है कि धर्मांतरण में होने वाले खर्च का पूरा हिसाब नसरीन रखती थी जबकि नवीन से जलालुद्दीन बना नीतू का पति पुलिस और स्थानीय प्रशासन को मैनेज करता था। वहीं, सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, नेपाल से सटे देवीपाटन मंडल में मिशनरियों ने हर वर्ग के अनुसार प्रचारक नियुक्त किया है जिससे परिवारों को समझाने और धर्मातरण के लिए राजी करने में आसानी होती है। इसकी एक पूरी चेन है, जिसमें प्रचार, पास्टर और पादरी अहम कड़ियां हैं। इनके पास चुनिंदा क्षेत्रों के दलित, वंचित, गंभीर रूप से बीमार व आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का पूरा ब्योरा होता है, जिसे छांगुर समय-समय पर पैसे और प्रभाव का उपयोग कर धर्मांतरण के लिए हासिल करता था। खबर है कि हिन्दू परिवारों को प्रभावित करने के लिए छांगुर नीतू उर्फ नसरीन और नवीन उर्फ जलालुद्दीन का उदाहरण देता था। वह बताता था कि दोनों पहले सिंधी थे लेकिन इस्लाम स्वीकार करने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई। आज इनके पास पैसे हैं, आलीशान कोठी है, महंगी गाड़ी है। लिहाजा इस्लाम स्वीकारते ही तुम्हारी भी जिंदगी बदल जाएगी। वहीं, भारत-नेपाल बॉर्डर पर काम कर चुके पूर्व आईबी अधिकारी संतोष सिंह बताते हैं कि छांगुर पीर मिशन आबाद की एक कड़ी है जिसके तहत हिंदू परिवारों के धर्म परिवर्तन के बदले उसे विदेश से फंडिंग भी होती थी। इसकी रिपोर्ट भी बनी और गृह मंत्रालय को भेजी भी गई। यह बात अलग है कि देर से ही सही लेकिन अब कार्रवाई पुख्ता हो रही है। बताते चलें कि मिशन आबाद भारत-नेपाल के बीच तराई व मधेश क्षेत्र में समुदाय विशेष की आबादी बढ़ाने की कोशिश है। इसके तहत शिक्षण संस्थानों की आड़ में असम व पश्चिम बंगाल तक के लोगों को बसाने का प्रयास भी इसी का हिस्सा है। यही वजह है कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में इस तरह की गतिविधियों की व्यापक जांच राष्ट्रहित में हो और यदि कोई राजनीतिक हस्तक्षेप करता है तो उसके खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जाए अन्यथा भारत का इस्लामीकरण कोई मुश्किल कार्य नहीं है जैसा कि अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है। इसी तरह से ईसाई मिशनरियों व बौद्ध संगठनों की भी जांच हो जो विदेशियों के इशारे पर भारतीय राजनीति को प्रभावित करने के उद्यम करते हैं। कमलेश पांडेय

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