कमलेश पांडेय

कमलेश पांडेय

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वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म

‘महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को ऐसे समझिए, जनकल्याणक है 

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 कमलेश पांडेय शिव पूजा का तातपर्य हमेशा लोककल्याणकारी-जनकल्याणकारी कार्यों से है। इसलिए ‘महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को अवश्य समझना चाहिए। यथासम्भव दूसरों को बतलाना चाहिए। शिवकथा का उद्देश्य यही है जो जन कल्याणक और लोकमंगलकारी है। शिवरात्रि अर्थात् भगवान शिवजी की रात्रि। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी तिथि की रात्रि को भगवान शिवजी का विवाह पार्वती जी से हुआ था।  लिहाजा, यह भगवान शिवजी की आराधना की रात्रि है जो फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (चौदस) को मनायी जाती है। क्या आपको पता है कि जब अन्य देवताओं का पूजन-यजन दिन में होता है तो फिर शिवजी का पूजन रात्रि में ही क्यों, अक्सर यह विचार आपके मन में उत्पन्न हो सकता है। इसलिए आपको बता दें कि भगवान शिव तमोगुण प्रधान संहार के देवता हैं। अत: तमोमयी रात्रि से उनका ज्यादा स्नेह है।  चूंकि रात्रि संहारकाल का प्रतिनिधित्व करती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में रात्रिकालीन प्रकाश का स्रोत चन्द्रमा भी पूर्ण रूप से क्षीण होता है। लिहाजा जीवों के अन्दर भी तामसी प्रवृत्तियाँ कृष्ण पक्ष की रात में बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि जैसे पानी आने से पहले पुल बाँधा जाता है, उसी प्रकार चन्द्र क्षय तीज आने से पहले उन तामसी प्रवृत्तियों के शमन (निवारण) हेतु भगवान आशुतोष (शिव) की आराधना का विधान शास्त्रकारों ने बनाया। यही रहस्य है जो लोककल्याणक है। मंगलकारी है। दरअसल, संहार के पश्चात् नई सृष्टि अनिवार्य है अर्थात् संहार के बाद पुन: सृष्टि होती है। इसलिए आप देखते हैं कि फाल्गुन मास में सभी पेड़-पौधों (लगभग सभी) के पत्ते झड़ जाते हैं उसके बाद ही नई पत्तियाँ निकलती हैं। इसे सृष्टि का नया स्वरूप जानो। समझो। महाशिवरात्रि इसके निखरने की पावन बेला है। सवाल है कि महाशिवरात्रि पर लोग उपवास और रात्रि जागरण क्यों करते हैं? इसकी धार्मिक विधि क्या है? से स्पष्ट करें? क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण है? यहां पर आपकी जिज्ञासा शांति के लिए बता दें कि जिस प्रकार शराब, भाँग, गाँजा, अफीम आदि पदार्थों में मादकता (नशा) होती है उसी प्रकार अन्न में भी मादकता होती है। शायद कुछ लोग इस बात को न जानते हों किन्तु यह सत्य है कि अन्न में मादकता होती है। आप भोजन करने के बाद शरीर में शिथिलता और आलस्य महसूस करते होंगे जबकि सिर्फ फलाहार या मात्र दूध का सेवन करने से आलस्य नहीं महसूस होता है। लिहाजा, अन्न की मादकता कम करने के लिए ही पूर्वकाल के मनीषियों ने उपवास/व्रत को प्राथमिकता दी। क्योंकि उपवास करने से शरीर की मादकता कम होती है जिससे शुद्धता आती है और मन धार्मिक कार्यों में लगता है।  वहीं, रात्रि जागरण का अर्थ निद्रा और आलस्य को त्यागने से है। प्राचीनकाल के ऋषि-महर्षियों ने अपनी कठिन तपस्याओं के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला कि निद्राकाल को ‘काल’ का स्वरूप जानो, क्योंकि इन्सान की आयु श्वाँसों पर निर्धारित है। प्रत्येक इन्सान को परमात्मा की ओर से एक निश्चित श्वाँसें ही मिली हैं और जागृत (जागते हुए) अवस्था से ज्यादा श्वाँसें सुप्तावस्था (सोये हुए) में नष्ट होती हैं। अतएव जितनी श्वाँसें आप बचायेंगे, आपकी आयु उसी हिसाब में बढ़ती चली जायेगी। मसलन, आपने प्रमाण भी देखा होगा कि कुछ ऋषि-मुनि एक सौ पचास वर्षों तक या उससे ज्यादा जीवित रहे। क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया कि ऐसा क्यों? आखिर हम और आप क्यों नहीं जीवित रह सकते? इसका एक मात्र कारण है योगासन! इस प्रकार उनकी आयु बढ़ती चली जाती थी। आप भी योगासन करके लम्बी आयु प्राप्त कर सकते हैं। आजकल वैज्ञानिक और डॉक्टर भी योगासन को महत्व देते हैं। कभी-कभी उपवास भी करने को कहते हैं। जिससे शरीर की पाचन प्रक्रिया सही बनी रहे।  वहीं, एक सवाल यह भी है कि शिवलिंग की पूजा क्यों करते हैं? क्या इसमें कोई वैज्ञानिक रहस्य भी छिपा हुआ है? तो यह जान लीजिए कि शिव और शिवलिंग की पूजा किसी-न-किसी रूप में सम्पूर्ण विश्व में अनादि काल से होती चली आ रही है। इस समाज के कुछ आलोचक ऐसे हैं जो ‘लिंग’ शब्द का अर्थ अश्लीलता से जोड़कर सभ्य और धार्मिक विचार वाले व्यक्तियों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। यह मूर्खतापूर्ण प्रयास है क्योंकि शिवलिंग का स्वरूप आकार विशेष से रहित है अर्थात् निराकार ब्रह्म के उपासक जिस प्रकार हाथ-पैर, शरीर रहित, रूप-रंग रहित ब्रह्म की उपासना करते हैं। ऐसा ही शिवलिंग का स्वरूप है।  आपको पता होना चाहिए कि जब संसार में कुछ नहीं था, सर्वत्र शून्य (०) या अण्डे के आकार का, जिसे वेदों पुराणों की भाषा में ‘अण्ड’ कहा जाता है, वैसा ही स्वरूप शिवलिंग का है जिससे सिद्ध होता है कि शिव और शिवलिंग अनादि काल से हैं। जिस प्रकार से यह ० (शून्य) किसी अंक के दाहिनी ओर होने पर उस अंक के महत्व को दस गुणा बढ़ा देता है, उसी प्रकार से शिव भी दाहिने होकर अर्थात् अनुकूल होकर मनुष्य को सुख-समृद्धि और मान-सम्मान प्रदान करते हैं। इसलिए जनकल्याणक, लोककल्याण कारी बने रहिए। चूंकि ग्यारह रुद्रों में भगवान शिव की गणना होती है और एकादश (ग्यारह) संख्यात्मक होने के कारण भी यह पर्व हिन्दी (वर्ष) के ग्यारहवें महीने में ही सम्पन्न होता है। इसलिए श्रद्धा एवं उत्साह पूर्वक शिवरात्रि मनाइए। कमलेश पांडेय

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राजनीति

भारत को मजबूत बनाने के लिए नरेंद्र मोदी की कीप एंड बैलेंस थ्योरी को ऐसे समझिए

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कमलेश पांडेय 21वीं सदी के एशियाई बिस्मार्क समझे जाने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘कीप एंड बैलेंस’ थ्योरी से जहां विकसित देश अमेरिका, रूस, चीन हैरान-परेशान हैं, वहीं भारत ग्लोबल साउथ यानी तीसरी दुनिया के देशों के दूरगामी हितों की हिफाजत करते हुए तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है। यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा वक्त-वक्त पर की हुई बयानबाजियां इस बात की चुगली करती हैं। इसके अलावा भी बहुतेरे राष्ट्राध्यक्ष हैं जो कुछ ऐसी ही बातें छेड़ चुके हैं, जो गलत भी नहीं है। समझा जाता है कि जैसे भारतीय सियासत में उन्होंने अटलबिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर नेताओं को साधते हुए नरेंद्र मोदी ने खुद को एक आदमकद चेहरे के रूप में स्थापित करते हुए पहले मुख्यमंत्री, फिर प्रधानमंत्री बने। ठीक वैसे ही अब अमेरिका, रूस और चीन को साधते हुए वो भारत के नेतृत्वकर्ता के तौर पर अपने राष्ट्र को एक अग्रणी विकसित देश की कतार में खड़ा करके ही दम लेंगे। उनके द्वारा पिछले 10-11 साल में जो युगान्तकारी निर्णय लिए गए हैं, वह भी इसी ओर इशारा करते हैं। इसे मोदी भारत का अमृतकाल भी करार देते आए हैं। अपनी हालिया अमेरिकी यात्रा (12-13 फरवरी 2025) के दौरान एक बार फिर से उन्होंने जिस द्विपक्षीय सूझबूझ कूटनीतिक चतुराई का परिचय दिया है, यह उसी का नतीजा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ को भी यहां तक कहना पड़ा कि “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक टफ निगोशिएटर हैं। वह मुझसे कहीं ज्यादा सख्त वार्ताकार हैं और मुझसे कहीं अच्छे वार्ताकार भी हैं। इसमें उनका कोई मुकाबला ही नहीं है।”  जाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दोस्त के रूप में दिलेर होने के साथ-साथ बेहद प्रोफेशनल भी हैं। यही वजह है कि पिछले एक दशक में वैश्विक दुनियादारी में भारत का कद और पद बहुत ऊंचा उठा है। कई मामलों में वो देश के पहले प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी कर चुके हैं या फिर उसे तोड़ चुके हैं, जो साधारण बात नहीं है। उनके नेतृत्व में भाजपा और उनके संरक्षक के रूप में आरएसएस की भी देशव्यापी साख बढ़ी है। अंतर्राष्ट्रीय कुटनीतिज्ञ बताते हैं कि जिस तरह से उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘नाटो’ और रूसी (सोवियत संघ) नेतृत्व वाले ‘सीटो’ से जुड़े देशों को एक साथ साधा है, कुछ को अपने पाले में कर लिया है, वह काबिलेतारीफ है। वहीं, चीनी नेतृत्व वाले ब्रिक्स में रूसी सलाह पर बने रहने के साथ-साथ अमेरिकी नेतृत्व वाले क्वाड में भी सम्मान जनक रूप से जमे रहना कोई साधारण कूटनीतिक गेम नहीं है।  वहीं, खास बात यह कि अमेरिका के मुकाबले रूस-चीन-भारत गठजोड़ खड़ा करने का वैश्विक भय पैदा करने वाले चीन को, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी के मुकाबले अमेरिका-रूस-भारत गठजोड़ का नया वैश्विक भय एहसास करवाना चाहते हैं। क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ भी कुछ ऐसा ही करना चाहते हैं, ताकि दुनियादारी के मामले में अतिशय महत्वाकांक्षी देश चीन को काबू में रखा जा सके। बता दें कि ट्रंफ के पुतिन और मोदी से मित्रवत और व्यक्तिगत सम्बन्ध भी हैं। आपको यह जानकार हैरत होगी कि पीएम मोदी सबकुछ कर-करवा रहे हैं, लेकिन अमेरिका, रूस, चीन यानी तीनों के खिलाफ कहीं भी खुलेआम सामने नजर नहीं आ रहे हैं। क्योंकि तीनों बड़े देशों की राष्ट्रीय/व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को संतुलित रखना कोई साधारण बात नहीं है, जबकि इसी में भारत का दूरगामी हित निहित है। यह सब कुछ करते हुए भी मोदी, पुतिन के प्रति सॉफ्ट हैं, क्योंकि रूस भारत का भरोसेमंद अंतर्राष्ट्रीय पार्टनर समझा जाता है।  वहीं कभी पाकिस्तान-चीन परस्त रहे अमेरिका, भारत विरोधी चीन और भारत-चीन के सवाल पर तटस्थ रुख रखने वाले रूस को इस करीने से साध रहे हैं कि तीनों भारत के हितबर्धक बने रहें, जबकि भारत उनके किसी भी अंतर्राष्ट्रीय या द्विपक्षीय ‘पाप’ से दूर रहे। मतलब कि गुटनिरपेक्ष बना रहे। भारत के पड़ोसी देश चीन को नियंत्रित रखने के लिए मोदी की यह नीति अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के बीच शोध का विषय है और इसलिए उन्हें 21वीं सदी का एशियाई बिस्मार्क करार दिया जाता है। लोग परस्पर यही सवाल पूछते हैं कि आखिर यह सबकुछ करते हुए मोदी क्या चाहते हैं? भारत को इन सबकी जरूरत क्या है? तो यह जान लीजिए कि कभी सोने की चिड़ियां और विश्व गुरु रहे भारत को मोदी पुनः वही दर्जा दिलाना चाहते हैं। वह भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के साथ-साथ पूरी दुनिया में हिंदुत्व के प्रति एक नया आकर्षण पैदा करना चाहते हैं। वह अखण्ड भारत के सपने को पूरा करके उन क्षेत्रीय विडंबनाओं को समाप्त करना चाहते हैं जिनको लेकर अबतक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठता आया है।  महत्वपूर्ण बात यह कि यह सबकुछ करते हुए मोदी इन विषयों पर बोलते कम हैं, जबकि उनके काम दहाड़ते हैं। वह दुनियावी देशों के निरंतर यात्रा पर रहते हैं या फिर अपने प्रतिनिधियों को भेजते रहते हैं तो इसका मतलब भी यही है कि वह सबसे व्यक्तिगत और भरोसेमंद सम्बंध चाहते हैं। चाहे फ्रांस हो या जापान, ऑस्ट्रेलिया हो या दक्षिण कोरिया, ब्राजील हो या दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब हो या ईरान, इंग्लैंड हो या जर्मनी, प्रधानमंत्री दुनिया के दूसरी पंक्ति वाले देशों को भी भारत के हित में साधते जा रहे हैं।  वहीं, ग्लोबल साउथ यानी तीसरी दुनिया के देशों की जब वे बात करते हैं तो इससे भारत को मिलने वाले एक बड़े बाजार का भी।पता चलता है। स्वाभाविक है कि यह सबकुछ प्रधानमंत्री मोदी की जैसे को तैसा वाली नीतियों से ही संभव हो पा रहा है। भारत का दूरगामी हित इसी में निहित है। वहीं, यह भी समझा जा रहा है कि दुनियावी कूटनीति के लिए एक अबूझ पहेली बन चुके भारत के पीएम नरेंद्र मोदी को समझना सबके बूते की बात भी नहीं है। क्योंकि यह भारतीयों के पुनर्जागरण का काल है।इसलिए इंतजार कीजिए और अमृतकाल के दौर को समझिए। कमलेश पांडेय

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