लेख स्वास्थ्य-योग असंतुलित जीवनशैली दे रही स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म ! December 13, 2024 / December 13, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला आज मनुष्य की जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। विज्ञान और तकनीक के साथ निश्चित रूप से आज स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति हुई है, जन्म-दर बढ़ी है और मृत्यु दर घटी है। मनुष्य की औसत आयु में भी निश्चित रूप से बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन बावजूद इन सबके भारत में बहुत से […] Read more » Unbalanced lifestyle is giving rise to serious diseases like stroke!
लेख इलैक्ट्रिक व्हीकल के ई-कचरे का निपटान एक बड़ी चुनौती December 13, 2024 / December 13, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला पर्यावरण प्रदूषण आज के समय में एक बहुत ही गंभीर और बड़ी समस्या है। इस समस्या से निजात पाने के लिए या यूं कहें कि पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से सरकार पिछले कुछ समय से देश में इलेक्ट्रोनिक वाहन (ईवी) को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसी क्रम में हाल के वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन और बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कई प्रमुख ऑटोमोबाइल निर्माताओं ने ‘ईवी तकनीक’ में भारी निवेश किया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज इलेक्ट्रिक वाहन (ई.वी.) उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, और इसका बहुत बड़ा कारण पेट्रोल की कीमतों की स्थिति, तथा वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चिंताएं हैं। आज आम व खास दोनों का ही रूझान भी इलेक्ट्रिक वाहन की खरीद की ओर लगातार बढ़ा है क्यों कि एक तो इन वाहनों पर सब्सिडी मिल जाती है, दूसरे छोटे वाहनों का आरटीओ में रजिस्ट्रेशन कराने की जरूरत भी नहीं पड़ती है या इनका रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य नहीं है। आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2022 में भारत के आधे से अधिक तिपहिया पंजीकरण इलेक्ट्रिक वाहन थे जो ईवी अपनाने की दिशा में एक उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाता है। वर्तमान में हमारी सरकारें देश में बड़े शहरों में ई-चार्जिंग स्टेशनों को भी बढ़ावा देने की ध्यान दे रही है और अनेक शहरों में तो इनकी शुरूआत भी हो चुकी है। बहरहाल, यह ठीक है कि इलैक्ट्रिक वाहनों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाने और जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबला कर सकने की अभूतपूर्व क्षमताएं है और ये तेल आयात को भी कम करने में मदद करते हैं और ऊर्जा विविधता लाने में भी योगदान करते हैं, कांपैक्ट डिजाइन के कारण शहरों में भीड़भाड़ कम करने में भी मदद करते हैं, लेकिन बावजूद इसके इलैक्ट्रिक वाहनों से हमारे पर्यावरण,हमारे पारिस्थितिकी तंत्र पर कहीं न कहीं विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। वास्तव में आज इतनी अधिक संख्या में देश की मांग के अनुरूप ईवी बैटरी उत्पादन से हमारे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।इससे धरती पर जैव-विविधता की हानि, वायु प्रदूषण और मीठे पानी की आपूर्ति में कमी जैसे प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक नई कारों की बिक्री का 52% हिस्सा पूरी तरह से इलेक्ट्रिक होगा। इलैक्ट्रिक वाहन बड़ी बैटरियों से चलते हैं, और मुख्य चिन्ता यह है कि चार्जिंग के अलावा, इलैक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) उत्पादन से भी कार्बन उत्सर्जन होता है। आंकड़े बताते हैं कि 43 किलोवाट-घंटे की औसत क्षमता के साथ, केवल एक ईवी बैटरी का उत्पादन करने से लगभग उतना ही कार्बन उत्सर्जन होता है जितना कि एक गैसोलीन कार को लगभग 50,000 मील चलाने से होता है। बैटरियों में पाये जाने वाले लिथियम और निकल भी कार्बन पदचिह्न में योगदान करते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि बैटरी निर्माण प्रक्रियाओं का पर्यावरण पर काफी प्रभाव पड़ता है। दरअसल, ईवी की लिथियम-आयन बैटरी के घटकों को खनन करना पड़ता है और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की बैटरियों को आसानी से रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है, जो दुनिया भर में बढ़ती ई-कचरे की समस्या को बढ़ाता है। अतः कहना ग़लत नहीं होगा कि इलैक्ट्रिक वाहनों में भी अपशिष्ट की समस्या एक बड़ी समस्या है जो मनुष्य के लिए एक चुनौती है। यह ठीक है कि लिथियम-आयन बैटरियां हमारी अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनका अपशिष्ट इतना होता है कि जीवाश्म ईंधन पर उनका कोई विशेष फायदा नजर नहीं आता है। एक आंकड़े के अनुसार लिथियम-आयन अपशिष्ट की यह संख्या वर्ष 2030 तक लगभग 3.2 मिलियन टन तक पहुँच जाने की संभावनाएं हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2020 के अनुसार, भारत, जो पहले से ही एक बड़ी ई-कचरे की समस्या से जूझ रहा है, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कचरा उत्पादक है। सरकार की इलैक्ट्रिक वाहनों की पहल पर्यावरण के लिहाज से ठीक है लेकिन इलैक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों का अनुचित तरीके से निपटान भारत में ई-कचरे की बढ़ती समस्या में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है, जिससे ईवी(इलैक्ट्रिक व्हीकल) क्रांति के साथ-साथ पर्यावरणीय चिंताएँ भी बढ़ सकती हैं। हमें जरूरत इस बात की है कि हम ई-कचरे के निपटान की दिशा में भी उचित एवं सकारात्मक कदम उठायें। सुनील कुमार महला Read more » Disposal of e-waste from electric vehicles Disposal of e-waste from electric vehicles is a big challenge
महिला-जगत लेख आत्मनिर्भर और सशक्त बन रहीं हैं देश की महिलाएं। December 12, 2024 / December 12, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला प्राचीन काल से ही महिलाओं का स्थान भारत में बहुत ही महत्वपूर्ण व अहम रहा है। महिला को ही सृष्टि रचना का मूल आधार कहा गया है। महिलाएं, हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अंग है क्योंकि विश्व की आधी जनसंख्या तकरीबन महिलाओं की ही है। डॉ. अंबेडकर ने एक बार यह बात कही थी कि यदि किसी समाज की प्रगति के बारे में सही-सही जानना है तो उस समाज की स्त्रियों की स्थिति के बारे में जानो। कोई समाज कितना मजबूत हो सकता है, इसका अंदाजा इस बात से इसलिए लगाया जा सकता है क्योंकि स्त्रियाँ किसी भी समाज की आधी आबादी हैं। बिना इन्हें साथ लिए कोई भी समाज अपनी संपूर्णता में बेहतर नहीं कर सकता है। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय समाज में आज महिलाओं को लगातार सशक्त बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाए जा रहे हैं क्योंकि यह बात हम सभी जानते हैं कि जब भारत की नारी सशक्त होगी तभी परिवार सशक्त होगा, परिवार के बाद समाज और समाज के बाद देश सशक्त होगा। इस संबंध में हाल ही में(11 दिसंबर को) हरियाणा के पानीपत के कम्युनिटी सेंट्रल हाल में महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीमा सखी योजना का आगाज किया है। उल्लेखनीय है कि एलआईसी बीमा सखी योजना 18 से 70 साल की महिलाओं(दसवीं पास) के लिए है। इसमें महिलाओं को पहले तीन साल की ट्रेनिंग दी जाएगी और इस ट्रेनिंग पीरियड के दौरान महिलाओं को कुछ पैसे( दो लाख रुपए से अधिक) भी मिलेंगे। उल्लेखनीय है कि इसमें पहले साल 7 हजार, दूसरे साल 6 हजार और तीसरे साल 5 हजार रुपये महीना मिलेंगे। इसमें बोनस कमीशन शामिल नहीं है। इसके लिए शर्त रहेगी कि महिलाएं जो भी पॉलिसी बेचेंगी, उनमें से 65 फीसदी अगले साल के आखिर तक सक्रिय (इन-फोर्स) रहनी चाहिए। इस योजना के तहत दसवीं पास महिलाएं पहले साल हर महीने कम से कम दो और साल में 24 पालिसी बेचेंगी। उन्हें बोनस के अलावा कमिशन के तौर पर 48 हजार रुपये वार्षिक मिलेंगे यानी एक पालिसी के लिए 4 हजार रुपये। सबसे अच्छी बात यह है कि ट्रेनिंग के बाद महिलाएं एलआईसी बीमा एजेंट के रूप में काम कर सकेंगी। इतना ही नहीं इस योजना के तहत, बीए पास बीमा सखियों को विकास अधिकारी यानी डेवलेपमेंट ऑफिसर बनने का मौका भी मिल सकता है। वास्तव में, इस योजना के तहत महिलाएं अपने इलाके की महिलाओं को बीमा कराने के लिए प्रोत्साहित करेंगी। इस योजना का मुख्य और अहम् मकसद देश की महिलाओं को आत्मनिर्भर व आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि महाराष्ट्र में ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिण योजना’ 1 जुलाई 2024 से चल रही है। इसके तहत पात्र महिलाओं को 1500 रुपये प्रति माह दिए जा रहे है। इधर मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना के बारे में कौन नहीं जानता। कहना ग़लत नहीं होगा कि इस योजना के वृहद स्वरूप ने प्रदेश की महिलाओं के समग्र सशक्तिकरण में महती भूमिका निभाई है। इस योजना से न केवल महिलाओं ने अपनी छोटी-छोटी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा किया है बल्कि योजना का लाभ प्राप्त करने के लिये महिलाएं बैंकिंग प्रणाली से सीधे परिचित हुई हैं। इससे परिवार के निर्णयों में भी उनकी भूमिका बड़ी है और सामाजिक रूप से महिलाओं के सम्मान में वृद्धि हुई है। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत भी वर्ष 22 जनवरी 2015 में हरियाणा के पानीपत से ही हुई थी। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी विकसित भारत के चार स्तम्भ(गरीब , युवा, किसान और महिला) मानते हैं, और महिला सशक्तिकरण उनमें से एक है। आज देश में नारी समानता पर लगातार काम हो रहा है और देश की महिलाएं लगातार सशक्त हो रहीं हैं। आज राजनीति में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने के मकसद से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ लाया गया है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए हरियाणा में पांच लाख लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य दिया है। एक अन्य अभियान नमो ड्रोन दीदी का है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन पायलटों का मुफ्त प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आज महिला शिक्षा, महिला रोजगार पर लगातार जोर दिया जा रहा है। महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री उज्जवला योजना है।इस योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर गृहणियों को रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराया जा रहा है। इतना ही नहीं ,महिला सशक्तिकरण की दिशा में ही देश में 10 अक्टूबर 2019 से सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना भी चलाई जा रही है जिसके तहत 100 फीसदी तक अस्पतालों या प्रशिक्षित नर्सों की निगरानी में महिलाओं के प्रसव को किया जाता है. ताकि प्रसव के दौरान मां और उसके बच्चे के स्वास्थ्य की उचित देखभाल की जा सके। सुकन्या समृद्धि योजना, फ्री सिलाई मशीन योजना और महिला शक्ति केंद्र योजना अन्य योजनाएं हैं जो लगातार महिलाओं को आर्थिक रूप आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। सुनील कुमार महला Read more » The women of the country are becoming self-reliant and empowered. आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाएं
समाज साक्षात्कार सार्थक पहल बोझ नहीं; समाज और देश के लिए अमूल्य निधि और धरोहर हैं बुजुर्ग December 10, 2024 / December 10, 2024 | Leave a Comment पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय सामाजिक परिवेश में अनेक आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। आज हमारे सामाजिक, नैतिक मूल्य बदल गये हैं। हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार आज शनै:शनै: पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के रंग में रंग रहे हैं। आधुनिकता का रंग हम सभी पर आज हावी हो गया है। समय,काल और परिस्थितियों के अनुसार आज […] Read more » अमूल्य निधि और धरोहर हैं बुजुर्ग
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम और यज्ञ: महाकुंभ मेला December 10, 2024 / December 10, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला सनातन भारतीय संस्कृति, भारत के प्राचीन गौरव, इतिहास और परंपरा का प्रतीक महाकुंभ मेला इस साल प्रयागराज(इलाहाबाद) में 13 जनवरी 2025 से शुरू होने जा रहा है। यह भारत का सबसे बड़ा धार्मिक समागम व सांस्कृतिक आयोजन है, जो 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि के पर्व तक चलेगा। जानकारों का कहना है […] Read more » World's largest religious gathering and yagya: Mahakumbh Mela महाकुंभ मेला
लेख जटिल विषय है जनसंख्या, संतुलन जरूरी। December 5, 2024 / December 5, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला आजकल जनसंख्या के गणित पर देश में बड़ी चर्चा छिड़ी हुई है। कोई आबादी बढ़ाने की बात करते नजर आते हैं तो कोई आबादी घटाने की। हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में देश की घटती आबादी को लेकर चिंता जता दी। उन्होंने यह कहा है कि प्रजनन दर […] Read more » Population is a complex subject जटिल विषय है जनसंख्या जनसंख्या
राजनीति विश्ववार्ता बातचीत और आपसी संवाद ही एकमात्र विकल्प: भारत-बांग्लादेश वर्तमान संबंध December 5, 2024 / December 5, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला पिछले कुछ दिनों से भारत और बांग्लादेश में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच हाल के दिनों में विवाद देखा जा रहा है और इस आशय की खबरें लगातार मीडिया की सुर्खियों में आ रहीं हैं। पाठक जानते होंगे कि बांग्लादेश में शेख़ हसीना सरकार के […] Read more » India-Bangladesh current relations भारत-बांग्लादेश वर्तमान संबंध
मनोरंजन युवा पीढ़ी हो रही ब्रेन रॉट का शिकार December 4, 2024 / December 4, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला आज का सूचना क्रांति और तकनीक का युग है। आज का युग इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स व्हाट्स एप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब, ट्विटर का युग है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि आज का युग घंटों-घंटों तक लगातार स्क्रीन को स्क्रॉल करने का युग है। आज हमारी युवा पीढ़ी […] Read more » ब्रेन रॉट
पर्यावरण लेख क्या मंडरा रहा है हम पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ़्लड का खतरा? December 3, 2024 / December 3, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला ग्लोबल वार्मिंग आज भारत ही नहीं , संपूर्ण विश्व की एक बड़ी समस्या है। आज धरती पर ग्रीन हाउस गैसों में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। प्रदूषण में भी बढ़ोत्तरी का क्रम लगातार जारी है। ग्रीन हाउस गैसों की अधिकता, बढ़ते प्रदूषण से धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सीएफसी की मात्रा […] Read more » glacial lake outburst flood ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ़्लड
लेख स्वास्थ्य-योग क्या टायलेट्स शर्मकथा हो गये हैं ? December 2, 2024 / December 2, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला भारतीय सनातन संस्कृति में महिलाओं को युगों-युगों से बहुत ही सम्माननीय स्थान दिया जाता रहा है और आज भी नारी हम सभी के लिए सम्माननीय और गौरवमयी है। हमारे वेदों में प्रथम शिक्षा ‘मातृ देवोभाव:’ से प्रारंभ किया जाता है अर्थात माता देवताओं के समान होती है लेकिन बावजूद इसके आज कुछ […] Read more »
लेख वास्तविक दुनिया से जुड़े और हरदम रहें खुश ! December 2, 2024 / December 2, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला युवाओं में आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बहुत ज्यादा क्रेज है। वर्चुअल वर्ल्ड में युवा पीढ़ी इतनी अधिक रम-बस चुकी है कि युवा पीढ़ी को आज वास्तविक दुनिया का बिल्कुल भी अहसास ही नहीं है। कुल मिलाकर यह बात कही जा सकती है कि युवा पीढ़ी आज सोशल मीडिया का संयमित उपयोग, […] Read more » वास्तविक दुनिया से जुड़े और हरदम रहें खुश !
लेख समाज साइलेंट किलर ‘ध्वनि प्रदूषण’ के आगोश में मानवजाति December 2, 2024 / December 2, 2024 | Leave a Comment सुनील कुमार महला ध्वनि प्रदूषण की समस्या भारत में आज एक बड़ी शहरी समस्या है, जो एक अदृश्य प्रदूषण है। सच तो यह है कि ध्वनि प्रदूषण एक साइलेंट किलर है। बढ़ती जनसंख्या, लगातार बढ़ते शहरीकरण, अंधाधुंध औधोगिकीकरण, लगातार बढ़ते ट्रैफिक, विकास के आयामों के कारण आज ध्वनि प्रदूषण की समस्या ने बहुत ही विकराल रूप धारण कर लिया है। औधोगिक घरानों में मशीनों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण,वाहनों के हॉर्न बजाने से होने वाला प्रदूषण, सड़क पर काम करने वाले लोगों द्वारा ड्रिलिंग करने से होना वाला प्रदूषण, डीजे, बैंड व लाउडस्पीकरों से होने वाला प्रदूषण तथा अन्य चीजों से पैदा होने वाला शोर हमारे शांत वातावरण में जहां एक ओर व्यवधान पैदा करता है वहीं दूसरी ओर जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं, ध्वनि प्रदूषण प्रजनन चक्र बाधित होने के साथ ही साथ प्रजातियों के विलुप्त होने को भी तेज करता है। आज प्लंबिंग, बॉयलर, जनरेटर, एयर कंडीशनर और पंखे, कूलर शोर का कारण बनते हैं।बायलर, टरबाइन, क्रशर तो बड़े कारक हैं ही, परिवहन के लगभग सभी साधन तेज ध्वनि पैदा कर, कोलाहल के साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ाते हैं। विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों के पैदा होने वाला शोर भी बड़ा कारण है। इतना ही नहीं,बिना इन्सुलेशन वाली दीवारें और छतें पड़ोसी इकाइयों से आने वाले संगीत, आवाज़ें, कदमों और अन्य गतिविधियों को प्रकट करतीं हैं। विमान, ड्रिलिंग , विभिन्न आपातकालीन वाहन यथा एंबुलेंस, अग्निशमन यंत्र व गाड़ियां, पटाखों का फोड़ना भी शोर के कारण बनते हैं। मनोरंजन के साधन टीवी, रेडियो भी ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं। जेट विमान तो शोर के कारण हैं ही। विभिन्न धार्मिक, वैवाहिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक कार्यक्रमों में भी ध्वनि विस्तारकों का प्रयोग शोर को बढ़ावा देता है। इतना ही नहीं बिजली कड़कने, ज्वालामुखी, भूकंप , विस्फोट अन्य कारण हैं। यहां तक कि वैक्यूम क्लीनर और विभिन्न रसोई उपकरण शोर पैदा करते हैं। आज के समय में विवाह शादियों में खानपान, डीजे डांस और नाइटलाइफ़, आउटडोर बार, रेस्तरां और छतों पर 100 डीबी से ज़्यादा शोर सुनने को मिलता है। सच तो यह है कि पब और क्लब शोर करते हैं। यहां तक कि मस्जिदों, मंदिरों, चर्चों और अन्य संस्थानों में भी आज निश्चत डेसिबल स्तरों से ऊपर शोर सुनने को मिलता है। इतना ही नहीं,पशु-पक्षियों तक की भूमिका भी बहुत बार शोर में होती है।उल्लेखनीय है कि ध्वनि प्रदूषण एक अवांछित ध्वनि है जो पशु (वन्य जीवों ) और मानव व्यवहार को प्रभावित कर सकती है, हालांकि यह भी एक तथ्य है कि सभी शोर प्रदूषण नहीं होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 65 डेसिबल से ऊपर के शोर को प्रदूषण के रूप में वर्गीकृत करता है। 75 डेसिबल पर शोर हानिकारक है और 120 डेसिबल पर कष्टदायक है। शोर का उच्च स्तर मनुष्य और प्राणियों दोनों के ही स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।शोर का उच्च स्तर बच्चों और बुजुर्गों में टिनिटस या बहरापन पैदा कर सकता है। चिकित्सकों का मानना है कि 80 डीबी(डेसिबल) वाली ध्वनि कानों पर अपना प्रतिकूल असर डालती है। 120 डीबी की ध्वनि कान के पर्दों पर भीषण दर्द उत्पन्न कर देती है और यदि ध्वनि की तीव्रता 150 डीबी अथवा इससे अधिक हो जाए तो कान के पर्दे फट सकते हैं, जिससे व्यक्ति बहरा हो सकता है। गौरतलब है कि मानव कान अनुश्रव्य (20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति) और पराश्रव्य (20 हजार हर्ट्ज से अधिक आवृत्ति) ध्वनि को सुनने में अक्षम होता है। आज लगातार शोर के संपर्क में रहने से मानव कान कमजोर होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनियाभर में लगभग डेढ़ अरब लोग इस समय कम सुनाई देने की अवस्था के साथ जीवन गुजार रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट दर्शाती है कि 2050 तक दुनिया में हर चार में से एक व्यक्ति यानी लगभग 25 प्रतिशत आबादी किसी न किसी हद तक श्रवण क्षमता में कमी की अवस्था के साथ जी रही होगी। अत्यधिक तेज, लगातार शोर के कारण श्वसन संबंधी उत्तेजना, नाड़ी का तेज चलना, उच्च रक्तचाप, माइग्रेन, गैस्ट्राइटिस, कोलाइटिस और दिल का दौरा पड़ना आदि हो सकता है। शोर परेशानी, थकान, अवसाद, चिंता, आक्रामकता और उन्माद पैदा कर सकता है। यह हमारी एकाग्रता में कमी लाता है। अध्ययन में विशेष व्यवधान पैदा करता है। 45 डेसिबल से अधिक शोर नींद में खलल(अनिद्रा की शिकायत) डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 30 डेसिबल की सिफारिश करता है। बहरहाल, आंकड़े बताते हैं कि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि हर वर्ष योरोपीय संघ में ध्वनि प्रदूषण के कारण 12 हजार लोगों की असामयिक मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वायु प्रदूषण के बाद शोर स्वास्थ्य समस्याओं का दूसरा सबसे बड़ा पर्यावरणीय कारक है। शोर हमारे हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के साथ ही हमारी जीवनशैली को भी प्रभावित करता है। अवांछित और अप्रिय शोर मनुष्य में तनाव, अवसाद लाता है और चिड़चिड़ापन पैदा करता है। यहां यह गौरतलब है कि वर्ष 2018 में जारी अपने दिशा-निर्देशों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिन के समय ध्वनि प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों के लिए पृथक मापदंड जारी किये थे, जिसके अनुसार सड़क यातायात में दिन के समय शोर का स्तर 53 डेसिबल, रेल परिवहन में 54, हवाई जहाज और पवन चक्की चलने के दौरान 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। आज लोग भले ही ध्वनि विस्तारकों को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानने लगें हों लेकिन ये प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। वर्ष 2005 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने लाउडस्पीकरों पर आदेश देते हुए यह कहा था कि ऊंची आवाज़ सुनने के लिए मजबूर करना मौलिक अधिकारों का हनन है। आज सार्वजनिक स्थलों पर रात दस बजे से सुबह छह बजे तक शोर मचाने वाले उपकरणों पर पाबंदी है लेकिन बावजूद इसके लोग ऐसा करते हैं। आज आबादी, अस्पताल और स्कूली क्षेत्र में प्रेशर हार्न बजाने,तेज पटाखों को छोड़ने पर रोक है।ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 के अनुसार व्यावसायिक, शांत और आवासीय क्षेत्रों के लिए ध्वनि तीव्रता की सीमा तय है।औद्योगिक क्षेत्रों में दिन में 75 और रात न 70 डेसिबल की सीमा सुनिश्चित है। व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए दिन में 65 और रात में 55, आवासीय क्षेत्रों में दिन में 55 और रात में 45 तो शांत क्षेत्रों में दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल तीव्रता की सीमा तय है। यह ठीक है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) एक मौलिक अधिकार है, जो किसी को भी बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांति से इकट्ठा होने, भारत के किसी भी हिस्से में रहने आदि की स्वतंत्रता की गारंटी देता है लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि कोई भी अपने मौलिक अधिकारों का दुरूपयोग करे। जीवन को शांति और संयम के साथ जीने का अधिकार धरती के प्रत्येक प्राणी को है, इसलिए इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होते हुए हमें यह चाहिए कि हम ऐसा कोई भी व्यवहार न करें जिससे दूसरों की ज़िंदगी में खलल, व्यवधान अथवा कोई परेशानियां पैदा हों। सुनील कुमार महला Read more » Mankind in the throes of 'noise pollution' the silent killer ध्वनि प्रदूषण