प्रह्लाद सबनानी

प्रह्लाद सबनानी

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सेवा निवृत उप-महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
ग्वालियर
मोबाइल नम्बर 9987949940

लेखक - प्रह्लाद सबनानी - के पोस्ट :

आर्थिकी राजनीति

भारतीय अर्थजगत में स्वत्व बोध के परिणाम दिखाई देने लगे हैं

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भारतीय अर्थव्यवस्था आज न केवल विश्व में सबसे अधिक तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गई है बल्कि विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन गई है। वर्ष 1980 में चीन द्वारा लागू किए गए आर्थिक सुधारों के चलते चीन की अर्थव्यवस्था भी सबसे तेज गति से दौड़ी थी और चीन के आर्थिक विकास में बाहरी कारकों (विदेशी व्यापार) का अधिक योगदान था परंतु आज भारत की आर्थिक प्रगति में घरेलू कारकों का प्रमुख योगदान है। भारत का घरेलू बाजार ही इतना विशाल है कि भारत को विदेशी व्यापार पर बहुत अधिक निर्भरता नहीं करनी पड़ रही है। वैसे भी, वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों, विकसित देशों सहित, की आर्थिक स्थिति आज ठीक नहीं है एवं इन देशों के विदेशी व्यापार सहित इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर भी कम हो रही है। भारत के आर्थिक विकास की वृद्धि दर तेज करने के सम्बंध में घरेलू कारकों में भारत के नागरिकों द्वारा स्वदेशी के विचार को अपनाया जाना भी शामिल है। आज भारतीय नागरिकों में स्वत्व का बोध स्पष्टत: दिखाई दे रहा है। अभी हाल ही में अमेरिका के निवेश के सम्बंध में सलाह देने वाले एक प्रतिष्ठित संस्थान मोर्गन स्टैनली ने अपने एक अनुसंधान प्रतिवेदन में यह बताया है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक विकास की दृष्टि से अगला दशक भारत का होने जा रहा है। अभी तक चीन पूरे विश्व के लिए एक विनिर्माण केंद्र बन गया था। परंतु, आगे आने वाले 10 वर्षों के दौरान स्थिति बदलने वाली है। भारत चीन से भी आगे निकलकर विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है, जिससे भारत में उत्पादों का उपभोग तेजी से बढ़ रहा है। अतः भारत न केवल उत्पादों के उपभोग का प्रमुख केंद्र बन बन रहा है बल्कि विश्व के लिए एक विनिर्माण केंद्र के रूप में भी उभर रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत पूर्व में ही वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार वर्तमान स्तर 3.50 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2031 तक 7.5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच जाएगा और इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। आगे आने वाले 10 वर्षों के दौरान आर्थिक क्षेत्र में भारत पूरी दुनिया का नेतृत्व करने जा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्विक स्तर पर सुपर पावर बनने के पीछे भारत के विशाल आंतरिक बाजार को मुख्य कारण बताया जा रहा है।    वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने भारत में गरीब वर्ग के नागरिकों को बैकों से जोड़ने के लिए जनधन योजना प्रारम्भ की थी। भारतीय नागरिकों में यह स्व का भाव ही था, जिसके चलते बहुत कम समय में इस योजना के अंतर्गत अभी तक लगभग 50 करोड़ बचत खाते विभिन्न बैकों में खोले जा चुके हैं एवं छोटी छोटी बचतों को जोड़कर आज लगभग 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि इन खातों में जमा की जा चुकी है। भारत ने इस संदर्भ में पूरे विश्व को ही राह दिखाई है। यह बचत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे नागरिकों को कल का मध्यम वर्ग बनाएगी, इससे देश में विभिन्न उत्पादों का उपभोग बढ़ेगा तथा देश की आर्थिक उन्नति की गति भी तेज होगी। यह भारतीय सनातन संस्कारों के चलते ही सम्भव हो पाया है। भारत में परिवार अपने खर्चों को संतुलित करते हुए भविष्य के लिए बचत आवश्यक समझते हैं, यह भी स्वत्व का भाव ही दर्शाता है। हमारी भारतीय सनातन संस्कृति हमें सिखाती है कि हमें प्रकृति का दोहन करना चाहिए, शोषण नहीं। प्रकृति से जितना आवश्यकता है केवल उतना ही लें। साथ ही, आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करना भी हमें सिखाया जाता है। स्वदेशी अपनाने से विभिन्न उत्पादों के आयात में कमी लाई जा सकती है।  इसके लिए, भारतीय नागरिकों की सोच में गुणात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा है एवं अब वे निम्न गुणवत्ता वाले सस्ते विदेशी उत्पादों का कम उपयोग करने लगे हैं। भारत में ही निर्मित उत्पादों का उपयोग, चाहे वह थोड़े महंगे ही क्यों न हो, बढ़ रहा है। इसी कारण से हाल ही के समय में चीन से कई सस्ते उत्पादों का आयात कम हुआ है। उत्पाद की जितनी आवश्यकता है उतना ही खरीदा जा रहा है एवं भारत में वैश्विक बाजारीकरण की मान्यताओं को बढ़ावा नहीं दिए जाने के भरपूर प्रयास हो रहे हैं। यह समस्त परिवर्तन नागरिकों में स्वत्व की भावना के चलते ही सम्भव हो पा रहा है। हमारी भारतीय सनातन संस्कृति महान रही है और आगे भी रहेगी। हमारी संस्कृति के अनुसार धर्म, कर्म एवं अर्थ, सम्बंधी कार्य मोक्ष प्राप्त करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। अतः अर्थ के क्षेत्र में भी धर्म का पालन करने के प्रयास हो रहे हैं। भारत में 60, 70 एवं 80 के दशकों में हम लगभग समस्त नागरिक हमारे बचपन काल से ही सुनते आए हैं कि भारत एक गरीब देश है एवं भारतीय नागरिक अति गरीब हैं। हालांकि भारत का प्राचीनकाल बहुत उज्जवल रहा है, परंतु आक्रांताओं एवं ब्रिटेन ने अपने शासन काल में भारत को लूटकर एक गरीब देश बना दिया था। अब समय का चक्र पूर्णतः घूमते हुए आज के खंडकाल पर आकर खड़ा हो गया है एवं भारत पूरे विश्व को कई मामलों में अपना नेतृत्व प्रदान करता दिखाई दे रहा है। साथ ही, भारत में विशेष रूप से कोरोना महामारी के बीच एवं इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा भारतीय सनातन संस्कारों का पालन करते हुए गरीब वर्ग के लाभार्थ चलाए गए विभिन्न कार्यक्रमों के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। विशेष रूप से प्रधानमंत्री गरीब अन्न कल्याण योजना के अंतर्गत देश के 80 करोड़ नागरिकों को मुफ्त अनाज की जो सुविधा प्रदान की गई है एवं इसे कोरोना महामारी के बाद भी जारी रखा गया है, इसके परिणामस्वरूप देश में गरीब वर्ग को बहुत लाभ हुआ है। वर्ष 2022 में विश्व बैंक द्वारा जारी किए गए एक प्रतिवेदन के अनुसार, वर्ष 2011 में भारत में 22.5 प्रतिशत नागरिक गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर थे परंतु वर्ष 2019 में यह प्रतिशत घटकर 10.2 रह गया है।  पिछले दो दशकों के दौरान भारत में 40 करोड़ से अधिक नागरिक गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं। दरअसल पिछले लगभग 9 वर्षों के दौरान भारत के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। जिसके चलते भारत में गरीबी तेजी से कम हुई है और भारत को गरीबी उन्मूलन के मामले में बहुत बड़ी सफलता प्राप्त हुई है। भारत में अतिगरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले करोड़ों नागरिकों का इतने कम समय में गरीबी रेखा के ऊपर आना विश्व के अन्य देशों के लिए एक सबक है। इतने कम समय में किसी भी देश में इतनी तादाद में लोग अपनी आर्थिक स्थिति सुधार पाए हैं ऐसा कहीं नहीं हुआ है। भारत में गरीबी का जो बदलाव आया है वह धरातल पर दिखाई देता है। इससे पूरे विश्व में भारत की छवि बदल गई है।  एक और क्षेत्र जिसमें भारतीय आर्थिक दर्शन ने पूरे विश्व को राह दिखाई है, वह है मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण स्थापित करना। दरअसल, मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के लिए विकसित देशों द्वारा ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करते जाना, अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को विपरीत रूप से प्रभावित करता नजर आ रहा है, जबकि इससे मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण होता दिखाई नहीं दे रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में अब पुराने सिद्धांत बोथरे साबित हो रहे हैं। और फिर, केवल मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करते जाना ताकि बाजार में वस्तुओं की मांग कम हो, एक नकारात्मक निर्णय है। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। उत्पादों की मांग कम होने से, कम्पनियों का उत्पादन कम होता है, देश में मंदी फैलने की सम्भावना बढ़ने लगती है, इससे बेरोजगारी बढ़ने का खतरा पैदा होने लगता है, सामान्य नागरिकों की ईएमआई में वृद्धि होने लगती है, आदि। अमेरिका में कई कम्पनियों ने इस माहौल में अपनी लाभप्रदता बनाए रखने के लिए 2 लाख से अधिक कर्मचारियों की छंटनी करने की घोषणा की थी। किसी नागरिक को बेरोजगार कर देना एक अमानवीय कृत्य ही कहा जाएगा। और फिर, अमेरिका में ही इसी माहौल के बीच तीन बड़े बैंक फैल हो गए हैं। यदि इस प्रकार की परिस्थितियां अन्य देशों में भी फैलती हैं तो पूरे विश्व में ही मंदी की स्थिति छा सकती है। पश्चिम की उक्त व्यवस्था के ठीक विपरीत, भारतीय आर्थिक चिंतन में विपुलता की अर्थव्यवस्था के बारे में सोचा गया है, अर्थात अधिक से अधिक उत्पादन करो – “शतहस्त समाहर, सहस्त्रहस्त संकिर” (सौ हाथों से संग्रह करके हजार हाथों से बांट दो) – यह हमारे शास्त्रों में भी बताया गया है। विपुलता की अर्थव्यवस्था में अधिक से अधिक नागरिकों को उपभोग्य वस्तुएं आसानी से उचित मूल्य पर प्राप्त होती रहती हैं, इससे उत्पादों के बाजार भाव बढ़ने के स्थान पर घटते रहते हैं। भारतीय वैदिक अर्थव्यवस्था में उत्पादों के बाजार भाव लगातार कम होने की व्यवस्था है एवं मुद्रा स्फीति के बारे में तो भारतीय शास्त्रों में शायद कहीं कोई उल्लेख भी नहीं मिलता है। भारतीय आर्थिक चिंतन व्यक्तिगत लाभ केंद्रित अर्थव्यवस्था के स्थान पर मानवमात्र के लाभ को केंद्र में रखकर चलने वाली अर्थव्यवस्था को तरजीह देता है।  नागरिकों में स्व का भाव जगा कर, उनमें राष्ट्र प्रेम की भावना विकसित करना भी आवश्यक है। इससे आर्थिक गतिविधियों को देशहित में करने की इच्छा शक्ति  नागरिकों में जागृत होती है और देश के विकास में प्रबल तेजी दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार का कार्य जापान, ब्रिटेन, इजराईल एवं जर्मनी ने द्वितीय विश्व युद्ध (1945) के पश्चात सफलतापूर्वक सम्पन्न किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी वर्ष 1925 में, अपनी स्थापना के बाद से, भारतीय नागरिकों में स्व का भाव जगाने का लगातार प्रयास कर रहा है। संघ के परम पूज्य सर संघचालक माननीय डॉक्टर मोहन भागवत जी ने अपने एक उदबोधन में बताया है कि दुनिया विभिन्न क्षेत्रों में आ रही समस्याओं के हल हेतु कई कारणों से आज भारत की ओर बहुत उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। यह सब भारतीय नागरिकों में स्व के भाव के जगने के कारण सम्भव हो रहा है और अब समय आ गया है कि भारत के नागरिकों में स्व के भाव का बड़े स्तर पर अवलंबन किया जाय क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भारतीयतता के स्व के कारण है।  

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आर्थिकी राजनीति

तेज गति से बढ़ रहा है भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार

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भारतीय अर्थव्यवस्था आज लगभग 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से विकास की राह पर आगे बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था के आकार में विस्तार से उस देश के नागरिकों की आय में वृद्धि दर्ज होती है इससे गरीब वर्ग के हाथों में भी पैसा पहुंचता है इससे, विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़ती है एवं रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं और अंततः गरीब वर्ग की संख्या में कमी होकर देश में मध्यम वर्ग की संख्या बढ़ती है। नीति आयोग के एक प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2015-16 में भारत के शहरी क्षेत्रों में गरीब वर्ग की संख्या 24.85 प्रतिशत थी जो वर्ष 2020-21 में घटकर 14.90 प्रतिशत रह गई है। इसमें 9.95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीब वर्ग की संख्या 32.59 प्रतिशत थी जो वर्ष 2020-21 में घटकर 19.28 प्रतिशत रह गई है। अतः भारत में गरीब वर्ग की संख्या कम हुई है। इसी कारण से वैश्विक रेटिंग संस्थान भारत की रेटिंग को बढ़ाते जा रहे हैं। स्टैंडर्ड एंड पुअर रेटिंग संस्थान ने भारत की विकास दर को वर्ष 2023-24 के लिए 6 प्रतिशत रखा है तो वर्ष 2024-25 के लिए 6.9 प्रतिशत की बात की है। साथ ही इसी संस्थान का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2030 तक 7 लाख 30 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाने वाला है। वर्ष 2023 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था 26 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के साथ प्रथम स्थान पर है। दूसरे नम्बर पर चीन आता है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार 18 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। तीसरे स्थान पर जापान है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार 4 लाख 20 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर है। चौथे स्थान पर जर्मनी है जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार भी लगभग 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इस प्रकार भारत अपनी बढ़ी हुई लगभग 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की विकास दर के साथ शीघ्र ही जापान एवं जर्मनी को पछाड़ कर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। फिच नामक रेटिंग संस्थान ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अपने पूर्व के अनुमान में सुधार करते हुए इसे वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 6.2 प्रतिशत कर दिया है, पहिले इस वृद्धि दर के 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। मूडीज नामक रेटिंग संस्थान ने भी भारत की विकास दर को वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान 6.7 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की है। भारत तेजी से विकास कर रहा है यह त्यौहारों के दौरान बाजारों में उत्पादों की खरीद के लिए उमड़ रही भीड़ से भी साफ दिखाई दे रहा है। भारत24 चैनल पर प्रस्तुत एक कार्यक्रम में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद (अर्थात कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में कुल उत्पादन) वर्ष 2022-23 में 282.83 लाख करोड़ रुपए के स्तर पर आ गया है। अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद पूरे विश्व में पहिले नम्बर पर है जो 2121.19 लाख करोड़ रुपए का है। इसीलिए अमेरिका पूरी दुनिया का सबसे अमीर एवं ताकतवर देश कहा जाता है। दूसरे नम्बर पर चीन का सकल घरेलू उत्पाद 1497.31 लाख करोड़ रुपए का है। जापान का सकल घरेलू उत्पाद 407.60 लाख करोड़ रुपए का है। जर्मनी का सकल घरेलू उत्पाद 341.05 लाख करोड़ रुपए का है। इस दृष्टि से भारत दुनिया का 5वां सबसे बड़ा अमीर देश है। वर्ष 2013-14 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 113.55 लाख करोड़ रुपए का था और वर्ष 2013-14 में भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरे विश्व में 10वां नम्बर था। वर्ष 2013-14 में अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद 1459.88 लाख करोड़ रुपए का था। चीन का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2013-14 में 871.77 करोड़ का था। जापान का सकल घरेलू उत्पाद 2013-14 में 349.37 लाख करोड़ रुपए का था। जर्मनी का सकल घरेलू उत्पाद 323.59 लाख करोड़ रुपए का था। अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद इस दौरान 50 प्रतिशत, चीन का 80 प्रतिशत, जापान का 30 प्रतिशत, जर्मनी का 5 प्रतिशत बढ़ा है जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 150 प्रतिशत बढ़ा है। इसी गति से भारत आर्थिक प्रगति करता रहा तो निश्चित ही वर्ष 2030 के पूर्व ही भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।  मेक इन इंडिया योजना के अंतर्गत भी बहुत काम होता दिखाई दे रहा है और भारत में निर्मित वस्तुओं का निर्यात लगतार बढ़ रहा है। वर्ष 2022-23 में भारत ने 36 लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया है। जबकि वर्ष 2014 में 19.05 लाख करोड़ रुपए का निर्यात हुआ था। यह लगभग दोगुना हो गया है। वर्ष 2023-24 में भारत सरकार ने पूंजीगत व्यय को 10 लाख करोड़ रुपए पर पहुंचा दिया है। इससे रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित हो रहे हैं। वर्ष 2014-15 में भारत में 97,000 किलो मीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग थे, जो 9 वर्ष बाद वर्ष 2023-24 में बढ़कर 145,155 किलोमीटर हो गए हैं। इस दौरान लगभग 50,000 किलोमीटर के नए राष्ट्रीय राजमार्ग निर्मित हुए हैं। अब तो गुणवत्ता के मामले में भारत के राजमार्ग  अमेरिका के राजमार्गों से टक्कर लेते हुए दिखाई दे रहे हैं। बेहतरीन राजमार्ग विकसित देश के लिए जरूरी हैं। अच्छे राजमार्गों से बाजार और रोजगार दोनों बढ़ते हैं।  आज भारत अपने घर में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को भी लगातार बढ़ा रहा है। “वोकल फोर लोकल” का नारा अब बुलंद हो रहा है एवं भारतीय नागरिक अब चीन में निर्मित उत्पादों का उपयोग कम करते हुए भारत में ही निर्मित वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी भी भारतीय नागरिकों को लगातार अपील कर रहे हैं कि भारत में ही उत्पादित वस्तुओं का उपयोग करें। इसका असर होता दिख भी रहा है। चीन से विभिन्न उत्पादों के आयात में इस त्यौहारी मौसम में कमी आई है और एक अनुमान के अनुसार इस वर्ष लगभग एक लाख करोड़ रुपए के उत्पादों का आयात चीन से कम हुआ है। चीनी दिवाली लाइट्स के आयात में 32 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है। वहीं दूसरी ओर भारत में बनी लाइट्स की बिक्री में 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। इसका सबसे अधिक फायदा गरीब वर्ग को हो रहा है। हम समस्त भारतीय नागरिकों को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि सड़क के एक किनारे बैठकर कुछ वस्तुएं बेचने वाले गरीब व्यक्ति से अधिक मोलभाव ना करते हुए उनसे वस्तुएं खरीदें ताकि यह वर्ग भी अपनी आय को बढ़ा सके। वैसे भी, जब हम लोग माल से वस्तुएं खरीदते हैं तो कोई माल भाव थोड़ी करते हैं। सकल घरेलू उत्पाद जब बढ़ता है तो लोगों की आय भी बढ़ती है। जब लोगों की आय बढ़ती है तो लोग बाजार में सामान खरीदते हैं। इससे बाजार में उत्पादों की मांग बढ़ती है। उत्पादों की मांग एवं आपूर्ति से उत्पादों की बाजार कीमतें तय होती है। जब किसी भी उत्पाद की मांग तुलनात्मक रूप से अधिक तेजी से बढ़ती है और उस उत्पाद की आपूर्ति बाजार में समय पर नहीं हो पाती है तो उस उत्पाद की बाजार में कीमतें बढ़ने लगती है। जब खर्च करने की क्षमता बढ़ती है तो आप सामान के दाम अधिक देने को भी तैयार रहते हैं। भारत में न केवल आर्थिक विकास में गति आ रही है बल्कि मुद्रा स्थिति भी नियंत्रण में है। यह केंद्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व  बैंक द्वारा संयुक्त रूप से किए जा रहे उपायों के चलते सम्भव हो पा रहा है। भारत की वित्तीय नीतियां महंगाई को रोकने के साथ साथ विकास को भी बढ़ावा दे रही हैं। खाने पीने की वस्तुओं की बाजार कीमतों में कमी होने से अक्टोबर 2023 माह में खुदरा महंगाई की दर में गिरावट आई है और यह चार महीने के निचले स्तर 4.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति की दर सितंबर 2023 माह में पिछले तीन माह के निचले स्तर 5.02 प्रतिशत पर थी। भारत में आम आदमी का सबसे अधिक खर्च खाने पीने और स्वास्थ्य सेवाओं पर हो रहा है। केंद्र सरकार द्वारा बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर 89 000 करोड़ रुपए के व्यय का प्रावधान किया गया है। डॉक्टरों की संख्या में 4 लाख से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत में आज 13 लाख से अधिक एलोपेथिक डॉक्टर हैं। इसके अतिरिक्त, 5.65 लाख आयुर्वेदिक डॉक्टर भी उपलब्ध हैं। इस प्रकार भारत में प्रत्येक 834 नागरिकों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। गरीब नागरिकों को  मुफ्त  इलाज प्रदान करने के लिए आयुषमान स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किए गए हैं। इसी प्रकार किसानों के लिए मोदी सरकार ने प्रति क्विंटल गेहूं पर 775 रुपए से, चावल पर 730 रुपए से न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है। वर्ष 2012-13 में भारत के किसानों की औसत मासिक आय 6,426 रुपए पाई गई थी जो वर्ष 2018-19 में बढ़कर 10,248 रुपए हो गई है। यूएनडीपी के एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारत में मिडल क्लास अर्थात मध्यम वर्ग की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वैश्विक स्तर पर मिडल क्लास की बढ़ रही संख्या में भारत का योगदान 24 प्रतिशत का है। विश्व के कई वित्तीय संस्थानों का मत है कि वर्ष 2027 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसका मतलब यह भी है कि देश में प्रति व्यक्ति आय में और अधिक तेज गति से वृद्धि की सम्भावना है। साथ ही, भारत आज प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर भी बन रहा है। प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति

नोटा के उपयोग के कुछ नुक्सान भी हैं – 100 प्रतिशत मतदान से चुने गए प्रतिनिधियों की गुणवत्ता उच्चस्तर की होगी

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भारत आज वैश्विक पटल पर एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है एवं भारत विश्व को कई क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान करने की स्थिति में भी आ गया है। कुछ देश (चीन एवं पाकिस्तान सहित) भारत की इस उपलब्धि को सहन नहीं कर पा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर समस्त विघटनकारी शक्तियां मिलकर भारत को तोड़ना चाहती हैं। इन विघटनकारी शक्तियों द्वारा भारत में जातीय संघर्ष खड़ा करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। जबकि भारत के कई सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक संगठन समस्त भारतीय समाज में एकजुटता बनाए रखना चाहते हैं ताकि भारत को एक बार पुनः विश्व गुरु बनाया जा सके। परंतु, आज  विघटनकारी शक्तियों के निशाने पर मुखर रूप से हिंदुत्व, भारत एवं संघ आ गया है।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने स्वयंसेवकों में राष्ट्रीयता का भाव विकसित किया है। संघ के स्वयंसेवक समाज की सज्जन शक्ति के साथ मिलकर समाज में जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे है कि किस प्रकार इन विघटनकारी शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। भारत में शीघ्र ही निर्वाचन काल प्रारम्भ होने जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाने के लिए आज राष्ट्र को भारत माता के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले नागरिकों की बहुत अधिक आवश्यकता है। अतः भारतीय समाज द्वारा निर्वाचन में 100 प्रतिशत मतदान किया जाय एवं राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत प्रत्याशी ही चुनाव जीत सकें, इसके लिए समाज को साथ लेकर भारतीय नागरिकों द्वारा विशेष प्रयास किये जाने चाहिए। इस संदर्भ में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा भी कई तरह के प्रयास समय समय पर किए जाते हैं ताकि देश के नागरिकों द्वारा 100 प्रतिशत मतदान किया जा सके। निश्चित ही 50 प्रतिशत नागरिकों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि की तुलना में 90 अथवा 100 प्रतिशत नागरिकों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बेहतर प्रतिनिधि ही साबित होंगे। अतः अधिक से अधिक मतदान किया जाना आज समय की आवश्यकता है। इससे चुने गए प्रतिनिधियों की गुणवत्ता में तो सुधार होगा ही साथ ही, वर्तमान समय में भारत की आर्थिक प्रगति भी जारी रह सकेगी एवं भारत को विश्व गुरु के रूप में स्थापित होते हुए भी हम लोग देख सकेंगे।  कई बार विभिन्न दलों के समस्त प्रत्याशी कुछ मतदाताओं को पसंद नहीं आते हैं, इन परिस्थितियों में ऐसे मतदाताओं को नोटा का बटन दबाने का अधिकार रहता है। परंतु, कोई प्रत्याशी मतदाता की नजर में 100 प्रतिशत खरा प्रत्याशी होगा, ऐसा सम्भव भी तो नहीं है। इन परिस्थितियों में कम से कम बुरे प्रत्याशी को चुना जा सकता है। नोटा का बटन दबाकर तो कम बुरे प्रत्याशी के स्थान अधिक बुरा प्रत्याशी ही चुना जा सकता है। संघ के परम पूज्य सर संघचालक भी कहते हैं कि “नोटा में हम लोग सर्वोत्तम को भी किनारे कर देते हैं और इसका फायदा सबसे बुरा उम्मीदवार ले जाता है। होना यह चाहिए कि हमारे पास जो सर्वोत्तम उपलब्ध है, उसे चुन लें। प्रजातंत्र में सौ फीसदी लोग सही मिलेंगे, ऐसा बहुत मुश्किल है।” यह आकलन पूर्णत: सही ही कहा जा सकता है क्योंकि मतदाता भले ही नोटा दबा कर यह समझे कि उसने सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दिया है लेकिन शायद उसे यह नहीं पता होता कि इस से किसी ऐसे उम्मीदवार की कम अंतर से हार हो सकती है जो उन सबमे सबसे बेहतर हो। ऐसे में नोटा को गए वोट अगर उस हारे उम्मीदवार को जाते तो वह जीत सकता था। अगर इस कारण किसी बुरे उम्मीदवार की जीत हो जाती है तो फिर नोटा दबाने के कोई मायने ही नहीं रह जाते।  भारत में चुनावों पर हजारों करोड़ रुपए की राशि खर्च होती है। अतः केंद्र एवं राज्यों में मजबूत सरकारों का चुना जाना अति आवश्यक है, ताकि वे अपने 5 वर्ष के कार्यकाल को सफलता पूर्वक सम्पन्न कर सकें। यदि 100 प्रतिशत मतदान के साथ किसी भी सरकार को चुना जाता है तो निश्चित ही मजबूत सरकार होगी एवं वह अपना कार्यकाल पूर्ण कर सकने में सफल भी होगी और इस प्रकार मध्यावधि चुनावों की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। इस प्रकार, देश के करोड़ों रुपयों के खर्च को बचाया जा सकेगा। इसलिए भारत में आज पढ़े लिखे एवं समझदार वर्ग को भी आगे आकर 100 प्रतिशत मतदान के लिए प्रयास करने चाहिएं, क्योंकि जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में भारत आज आगे बढ़ रहा है, यह कार्य लम्बे समय तक जारी रहना चाहिए। इजराईल के नागरिकों में देश प्रेम की भावना के चलते ही 3 लाख से अधिक नागरिकों ने आगे आकर सेना में भर्ती होने के वहां की सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार किया है। भारत में भी देश के प्रतिनिधि राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले ही होने चाहिए। भारतीय समाज की एकजुटता के कारण ही आज भारत में रामसेतु का विध्वंस रुक सका है, जम्मू एवं कश्मीर में लागू धारा 370 एवं धारा 35ए हटाई जा सकी है, 500 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद श्री राम का भव्य मंदिर अयोध्या में निर्मित हो रहा है, जिसका उद्घाटन 22 जनवरी 2024 में पूज्य संत महात्माओं के साथ भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद मोदी जी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न होने जा रहा है। जी-20 देशों के समूह की अध्यक्षता आज भारत के पास है और भारत इस समूह के समस्त देशों को एकजुट बनाए रखने में सफल रहा है। भारत ने चन्द्रयान को चन्द्रमा के दक्षिणी भाग पर सफलता पूर्वक उतारने में सफलता हासिल की है एवं चन्द्रमा की सतह पर “शिवशक्ति” को अंकित करने में भी सफलता पाई है। भारत आज अपनी सीमाओं की मजबूती के साथ सुरक्षा करने में सफल हो रहा है। खेलों के क्षेत्र में भी नित नए झंडे गाड़े जा रहे हैं, हाल ही में चीन में सम्पन्न हुई एशियाई खेल प्रतियोगिताओं में भारत ने 107 पदकों को हासिल कर एक रिकार्ड बनाया है।  इसी प्रकार नागरिकों को आज अच्छी सड़कें मिली हैं, पानी-बिजली की उपलब्धता बढ़ी है, राज्यों में विकास की यात्रा तेजी से आगे बढ़ रही है। राज्यों के चुनाव भी बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि राज्य सभा सदस्य राज्य के विधायकों द्वारा ही चुने जाते हैं। इस दृष्टि से विभिन्न राज्यों के चुनाव में भी 100 प्रतिशत मतदान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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आर्थिकी कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार लेख

दीपावली त्यौहार ने दी है भारत को आर्थिक ताकत

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इस वर्ष दीपावली त्यौहार के धनतेरस के दिन भारतीयों ने विभिन्न उत्पादों की जमकर खरीद की है। भारतीय अर्थव्यवस्था को तो जैसे पंख लग गए हैं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था अब बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी कारण से वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में भारत की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर वित्तीय वर्ष 2023-24 के वृद्धिगत सकल घरेलू उत्पाद में भारत की भागीदारी  15 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। भारत ने अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। भारत में आज आम आदमी की आमदमी बढ़ रही है, आम आदमी की तरक्की जारी हैं एवं इसे और अधिक बेहतर बनाने के प्रयास लगातार हो रहे हैं। इसी के चलते भारतीय बाजारों में दीपावली के पावन पर्व पर भारी भीड़ एवं रौनक दिखाई दे रही है। भगवान धन्वन्तरि भारतीय नागरिकों पर जैसे धन की वर्षा करते नजर आ रहे हैं। भारत में धनतेरस के दिन किसी भी प्रकार के उत्पाद की खरीददारी को शुभ माना जाता है। विशेष रूप से बर्तन, गहने, वाहन एवं मकान आदि भारी मात्रा में खरीदे जाते हैं। इस वर्ष भारतीय बाजारों में एक और शुभ संकेत दिखाई दे रहा है कि भारतीय नागरिक “वोकल फोर लोकल” एवं “आत्म निर्भर भारत” जैसे विचार से सहमत होते हुए केवल भारत में निर्मित वस्तुओं की जमकर खरीद कर रहे हैं। रीयल एस्टेट सेक्टर, कार डीलर्स, जौहरियों एवं किराना व्यवसायीयों की तो जैसे लॉटरी ही लग गई है। इस वर्ष दीपावली त्यौहार में बाजारों में उमड़ रही भीड़ अपने आप में भारत की आर्थिक शक्ति बनने की कहानी कह रही है। भारतीय ग्राहकों में उत्साह दिख रहा है। ग्राहकों का उत्साह देखकर कारोबारी एवं व्यापारी भी खुश नजर आ रहे हैं। कन्फेडरेशन आफ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज एसोसीएशन के अनुसार, इस वर्ष दीपावली के त्यौहारी मौसम में देश में 3.75 लाख करोड़ रुपए का व्यापार हुआ है। इस खरीद की विशेष  बात यह रही है कि उपभोक्ताओं में चीन में निर्मित माल के स्थान पर भारत में ही निर्मित स्वदेशी सामान की जबरदस्त मांग देखने को मिली है। जबकि षठ पूजा एवं भैया दूज समेत अभी कई त्यौहार आना शेष है, इस प्रकार आगे आने वाले अन्य त्यौहारों के शुभ अवसर पर 50,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यापार होने की सम्भावना भी व्यक्त की गई है। उक्त संस्थान ने “भारतीय उत्पाद – सबका उस्ताद” नामक एक कैम्पेन भी भारत में, हाल ही में प्रारम्भ हुए त्यौहारी मौसम के दौरान, चलाया था, जिसका भारतीय नागरिकों पर जबरदस्त प्रभाव दिखाई दिया है। साथ ही इस वर्ष के त्यौहारी मौसम में चीन को लगभग एक लाख करोड़ रुपए के व्यापार का नुक्सान हुआ है। क्योंकि, इसके पहिले चीन में बनी वस्तुओं की भारतीय बाजारों में 70 प्रतिशत तक बिक्री होती थी परंतु इस वर्ष भारतीय बाजारों में स्वदेशी वस्तुओं की मांग इतनी अधिक थी कि चीन में निर्मित वस्तुओं की बिक्री बहुत ही कम हो गई है। इस वर्ष भारत में दीपावली से सम्बंधित सामान का चीन से आयात नहीं के बराबर हुआ है। एक अनुमान के अनुसार, इस 3.50 लाख करोड़ रुपए के व्यापार में 13 प्रतिशत खाद्य सामग्री एवं किराना की, 9 प्रतिशत ज्वेलरी की, 12 प्रतिशत टेक्स्टायल एवं गारमेंट की, 4 प्रतिशत ड्राई फ़्रूट, मिठाई एवं नमकीन की, 3 प्रतिशत होम डेकोर की, 6 प्रतिशत कास्मेटिक्स की, 8 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मोबाइल की, 3 प्रतिशत भोजन सामग्री एवं पूजा वस्तुओं की, 3 प्रतिशत रसोई एवं बर्तन उपकरण की, 8 प्रतिशत गिफ्ट सामान की, 4 प्रतिशत फर्निशिंग एवं फर्निचर सामान की एवं 25 प्रतिशत ऑटोमोबील, हार्डवेयर सामान, खिलौने सहित अन्य अनेकों वस्तुओं एवं सेवाओं की भागीदारी रही है।  भारत में मकानों की बिक्री सम्बंधी आंकड़ों से भी आभास होता है कि भारत में मिडल एवं अपर मिडल क्लास वर्ग की संख्या बढ़ी है। रीयल एस्टेट से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि इस वर्ष 1.5 लाख से अधिक लक्जरी और एफोर्डेबल घरों की बिक्री का रिकार्ड बन गया है। वर्ष 2023 की दीपावली के ठीक पूर्व के समय में 1.50 लाख घरों की बिक्री प्रदर्शित करती है कि भारत के नागरिकों की आय में तेज गति से वृद्धि हो रही है। वर्ष 2022 की दीपावली के पूर्व 1.47 लाख घरों की बिक्री हुई थी और वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 1.14 लाख रहा था। जनवरी 2023 से सितम्बर 2023 तक की अवधि में भी भारत में 2.30 लाख लक्जरी और एफोर्डेबल  घरों की बिक्री हुई थी, जो पिछले साल के मुकाबले 5 प्रतिशत अधिक है। रीयल एस्टेट में बूम का मतलब है कि भारत तेज गति से तरक्की कर रहा है। भारत में आम लोगों की जेब तक पैसा पहुंच रहा है। त्यौहारी सीजन में उछाल सिर्फ रीयल एस्टेट सेक्टर में ही नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी लगभग इसी प्रकार का त्यौहारी वातावरण दिखाई दिया है। माह अकटोबर 2023 में भारत में 3.90 लाख चार पहिया वाहनों की बिक्री हुई है। जबकि 19 लाख के करीब दोपहिया वाहन भी बिके हैं। नवम्बर 2023 के त्यौहारी मौसम में 4.25 लाख चार पहिया वाहन एवं 20 लाख दो पहिया वाहन बिकने का अनुमान लगाया गया है। इसी प्रकार, एक अन्य अनुमान के अनुसार धनतेरस 2023 के दिन भारत में 50,000 करोड़ रुपए के सोने के आभूषणों की बिक्री हुई है। पिछले वर्ष धनतेरस के दिन 45,000 करोड़ रुपए के सोने के आभूषणों की बिक्री हुई थी। इस प्रकार इस वर्ष सोने के आभूषणों की बिक्री में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। भारत में  प्रत्येक क्षेत्र में विकास स्पष्टत: दिखाई दे रहा है। नागरिकों की जेब में पैसा पहुंचा है तभी तो भारत में उक्त वर्णित समस्त क्षेत्रों में भारी तादाद में बिक्री सम्भव हो पा रही है।  शादी के मौसम की शुरुआत एवं नवरात्रि त्यौहार के शुरू होने के साथ ही भारत में त्यौहारी मौसम की शुरुआत हो जाती है। दिनांक 8 अकटोबर से ऑनलाइन खुदरा बिक्री के साइट, फ्लिपकार्ट एवं अमेजोन, पर उत्पादों की बिक्री का विशेष त्यौहारी अभियान प्रारम्भ किया गया था और केवल चार दिन में ही केवल उक्त दो कम्पनियों की साइट पर 40,000 करोड़ रुपए का व्यापार कर लिया गया है।  भारत के विकास की कहानी की यह तो शुरुआत भर है, आगे आने वाले समय में विकास की इस कहानी को और अधिक गति मिलने की सम्भावना है क्योंकि अभी तक तो केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे पूंजीगत खर्चों का प्रभाव ही इस विकास की कहानी पर दिखाई दे रहा है (केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में 7.50 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय किया था और वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 10 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय करने का लक्ष्य निर्धारित किया है) जबकि निजी क्षेत्र भी अब अपने पूंजीगत खर्चों में वृद्धि करने जा रहा है क्योंकि विभिन्न कम्पनियां अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग कर रही है, अतः उन्हें विनिर्माण के क्षेत्र में नई इकाईयों की स्थापना निकट भविष्य में करना ही होगी। साथ ही, विदेशी कम्पनियों के भी भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना किये जाने के सम्बंध में सहमति पत्र लगातार प्राप्त हो रहे हैं। इस प्रकार, आगे आने वाले समय में भारत में रोजगार के करोड़ों नए अवसर निर्मित होने जा रहे हैं जिससे मिडल क्लास की संख्या में और अधिक तेज गति से विस्तार होगा और भारत में ही निर्मित उत्पादों की मांग और अधिक तेज होने जा रही है।  प्रहलाद सबनानी 

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लेख समाज साक्षात्‍कार सार्थक पहल

भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने के लिए प्रयासरत है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के बीच चल रही रस्साकच्छी, रूस यूक्रेन के बीच पिछले लम्बे समय से लगातार चल रहे युद्ध एवं पिछले एक माह से भी अधिक समय से पूर्व प्रारम्भ हुए हम्मास इजराईल युद्ध के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक दिनांक 5 नवम्बर 2023, रविवार, को प्रातः 9 बजे भुज, गुजरात में प्रारम्भ हुई। बैठक का शुभारम्भ परम पूज्य सर संघचालक डॉक्टर मोहन जी भागवत और सर कार्यवाह श्री दत्तात्रेय जी होसबाले ने भारत माता के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित करके किया। बैठक में देश भर से संघ की दृष्टि से 45 प्रांतो एवं 11 क्षेत्रों के माननीय संघचालक, कार्यवाह, प्रचारक, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य तथा कुछ विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्रियों सहित लगभग 382 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।  उक्त बैठक में संघ शताब्दी की दृष्टि से कार्य विस्तार के लिए बनी योजना की समीक्षा एवं संघ प्रशिक्षण अभ्यास क्रम विषयों पर विस्तार से चर्चा सम्पन्न हुई। साथ ही, परम पूज्य सर संघचालक डॉक्टर मोहन जी  भागवत के विजया दशमी उदबोधन में चर्चा में आए कुछ मुख्य विषयों जैसे प्रकृति विरुद्ध जीवन शैली, जलवायु परिवर्तन का विश्व पर प्रभाव, सुरक्षा, स्व आधारित युगानुकुल नीति आदि विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, गौ सेवा, ग्राम विकास व अन्य गतिविधियों में चल रहे प्रयासों के बारे में भी प्रतिनिधियों से जानकारी ली गई। यह बैठक 7 नवम्बर 2023 को सायंकाल 6 बजे सम्पन्न हुई।    विश्व के कई देशों, विकसित देशों सहित, में सामाजिक तानाबाना ध्वस्त हो चुका है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में आज “सिंगल पेरेंट”  की अवधारणा जोर पकड़ती जा रही है। लगभग 50 प्रतिशत बच्चों को अपने पिता के बारे में जानकारी ही नहीं हैं। कुटुंब अथवा परिवार में रहकर माता एवं पिता द्वारा मिलकर ही बच्चे का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास सही तरीके से किया जा सकता है। इन देशों में केवल माता अथवा पिता द्वारा बच्चे का लालन पालन करने से बच्चे का मानसिक एवं बौद्धिक विकास सही तरीके से नहीं हो पा रहा है एवं यह बच्चे उच्च स्तर की पढ़ाई के मामले में पिछड़ रहे हैं। आज अमेरिका में बहुत कम बच्चे विज्ञान एवं गणित की उच्च स्तर पर पढ़ाई कर पा रहे हैं, जिसके चलते यह बच्चे सेवा क्षेत्र में कुछ छोटे मोटे काम करते नजर आते हैं। दूसरे, भारत सहित कई देशों में विभिन्न जातियों, मत एवं पंथ के आधार पर नागरिकों को आपस में लड़ाया जा रहा है एवं समाज में आज नागरिकों के बीच आपसी भाईचारा एवं विश्वास का नितांत अभाव दिखाई दे रहा है, जिससे आज सामाजिक समरसता का अभाव स्पष्टत: दिखाई देने लगा है। साथ ही, लगभग पूरे विश्व में ही पर्यावरण को लेकर भी गम्भीर स्थिति बन गई है। विशेष रूप से विकसित देशों में नागरिकों की जीवन शैली ही इस प्रकार की बन गई है कि प्रकृति का दोहन करने के स्थान पर प्रकृति का शोषण किया जा रहा है। जंगल खत्म हो रहे हैं, प्रकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसके कारण पर्यावरण पर दबाव बन रहा है। कुछ स्थानों पर तो एक ही दिन में पूरे वर्ष भर की बारिश हो रही है तो कहीं कहीं बारिश ही नहीं हो रही है। इस प्रकार का असंतुलन वैश्विक स्तर नागरिकों के लिए गम्भीर समस्याएं उत्पन्न कर रहा है।  जहां तक भारत का सम्बंध है, भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सांस्कृतिक संगठन उक्त विषयों पर गम्भीरता से विचार विमर्श करते हुए इन समस्याओं के हल हेतु प्रयास भी करते दिखाई दे रहे हैं।       राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष 2025 में मनाने की तैयरियों में जुटा है। अपने शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने समाज के लिए आज की परिस्थितियों के संदर्भ में अति महत्वपूर्ण पांच आयामों को आग्रह पूर्वक समाज के सामने रखा है। इन आयामों को संघ के स्वयंसेवक अपने स्तर एवं शाखा के स्तर पर क्रियान्वित करेंगे, इसके बाद समाज से भी अपेक्षा की गई है कि इन आयामों को अपने स्तर पर क्रियान्वित करने में सहयोग करें। प्रथम आयाम है, समाज में सामाजिक समरसता स्थापित करना। समाज में छूआछूत, जातिभेद बिलकुल नहीं होना चाहिए। भारत में रहने वाला प्रत्येक नागरिक एक भारतीय है, फिर विभिन्न जातियों में बंटवारा क्यों? अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन स्थापित करने के लिए भारतीय नागरिकों को विभिन्न जातियों में बांटों और राज करने की नीति अपनाई थी। आज के परिप्रेक्ष्य में जब भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है, तब समस्त भारतीय नागरिक आपस में विश्वास बनाए रखते हुए देश की प्रगति में अपने योगदान को बढ़ाएं ऐसी अपेक्षा भारत के प्रत्येक नागरिक से हैं। अतः जन्म आधारित किसी भी प्रकार के भेदभाव को हम समस्त भारतीयों को नहीं मानना चाहिए। इस दृष्टि से सामाजिक समरसता का आज बहुत महत्व है एवं अपने जीवन में इसे व्यवहार में लाने का गम्भीर प्रयास हमें करना चाहिए।  द्वितीय आयाम है, परिवार प्रबोधन। भारत के प्रत्येक कुटुंब में भारतीय जीवन मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों को हमें अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को सौंपने का गम्भीर प्रयास करना चाहिए। प्रत्येक भारतीय परिवार को अपने जीवन में दो कार्य आवश्यक रूप से करने चाहिए। एक तो समाज के प्रति हम कुछ सेवा के कार्य निरंतर करते रहें, और दूसरे सनातन संस्कृति और अपने धर्म की रक्षा के लिए भी हम जागरूक रहें। विशेष रूप से सौराष्ट्र और गुजरात में यह कार्य व्यापक रूप से नागरिकों द्वारा किए जा रहे हैं। परंतु, इन्हें पूरे देश में फैलाया जाना चाहिए। साथ ही यह कार्य सभी वर्गों में समस्त स्तरों पर होना चाहिए। तीसरा आयाम है, पर्यावरण की रक्षा करना। आज की विपरीत परिस्थितियों के बीच समाज के नागरिकों को बड़ी संख्या में पेड़ लगाने का कार्य हाथ में लेने की जरूरत है। साथ ही, पोलिथिन के उपयोग को बंद करने एवं  पानी बचाने के लिए भी गम्भीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। यह कार्य समाज ही कर सकता है। हाल ही में राजस्थान के जोधपुर प्रांत में (भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान का लगभग एक तिहाई भाग) संघ के कार्यकर्ताओं ने 45 दिन पर्यावरण के प्रति समर्पित यात्रा सम्पन्न की है। इस यात्रा के दौरान 15 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए हैं। यह यात्रा 14000 किलोमीटर की रही है। इसी प्रकार, कर्नाटक में भी एक करोड़ पेड़ लगाने की योजना बनाई गई है। इसी प्रकार के कार्य समाज में नागरिकों को साथ लेकर पर्यावरण की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों द्वारा अन्य स्थानों पर भी किए जाने चाहिए।  चौथा आयाम है, स्वदेशी जीवन शैली। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नागरिकों द्वारा स्व-आधारित जीवन शैली अपनाया जाना अब आवश्यक हो गया है। अपनी मातृभाषा पर गर्व करने के साथ साथ भारत में निर्मित उत्पादों के अधिकतम उपयोग को बढ़ावा दिया ही जाना चाहिए। स्वदेशी जीवन शैली में केवल स्थानीय वस्तुओं का उपयोग ही शामिल नहीं है बल्कि भारत की सनातन संस्कृति का पालन भी इस जीवन  शैली में शामिल है। अतः आज प्रत्येक भारतीय नागरिक में स्व का भाव विकसित किया जाना चाहिए ताकि राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव विकसित हो सके।  पांचवा आयाम है, नागरिक कर्तव्य। भारत आज पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है एवं विश्व में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन चुका है। इन परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सतर्कता बरतना आवश्यक हो गया है। नागरिकों को प्रत्येक क्षेत्र में  अनुशासन का पालन करना चाहिए। भारतीय नागरिक होने के नाते हमारे संविधान के अनुसार भी कुछ कर्तव्य निर्धारित हैं। इन कर्तव्यों का निर्वहन गम्भीरता के साथ किया जाना चाहिए। इसके लिए स्वयंसेवकों को अपने स्तर पर, अपने कुटुंब के स्तर पर, अपनी शाखा के स्तर पर एवं व्यापक समाज के स्तर पर अपने अपने कर्तव्यों के अनुपालन के लिए जागृति लाना आवश्यक है।  इसी प्रकार समाज में कई संस्थाएं हैं, मठ मंदिर हैं, व्यापारिक संस्थान हैं, विद्यालय हैं, अस्पताल हैं, इन समस्त संस्थाओं में भी जागृति लानी होगी ताकि समाज का प्रत्येक अंग अपने कर्तव्यों के पालन के प्रति सजग हो सके। साथ ही, विभिन्न विद्यालयों को किस प्रकार पर्यावरण गतिविधि से सम्बंधित कार्यों के लिए अपने साथ लिया जा सकता है, मठ मंदिर को किस प्रकार समाज में सामाजिक समरसता स्थापित करने के उड्डेस्य से अपने साथ लिया जा सकता है, व्यापारिक संस्थान किस प्रकार स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। इन विषयों पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाकर पूरे समाज को ही उक्त पांचों आयामों पर सफलतापूर्वक कार्य करने के लिए साथ लिया जाना चाहिए।  प्रहलाद सबनानी 

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खेत-खलिहान राजनीति

मध्यप्रदेश को बीमारु राज्य की श्रेणी से बाहर निकाला है प्रदेश के किसानों ने

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भारत में लगभग 60 प्रतिशत आबादी आज भी ग्रामीण इलाकों में निवास करती है एवं इसमें से बहुत बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। यदि ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे नागरिकों की आय में वृद्धि होने लगे तो भारत के आर्थिक विकास की दर को चार चांद लगाते हुए इसे प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत से भी अधिक किया जा सकता है। इसी दृष्टि से केंद्र सरकार लगातार यह प्रयास करती रही है कि किसानों की आय को किस प्रकार दुगुना किया जाय। इस संदर्भ में कई नीतियों एवं सुधार कार्यक्रमों को लागू करते हुए किसानों की आय को दुगुना किये जाने के भरसक प्रयास किए गए हैं। अप्रेल 2016 में इस सम्बंध में एक मंत्रालय समिति का गठन भी केंद्र सरकार द्वारा किया गया था एवं किसानों की आय बढ़ाने के लिए सात स्त्रोतों की पहचान की गई थी, इनमे शामिल हैं, फसलों की उत्पादकता में वृद्धि करना, पशुधन की उत्पादकता में वृद्धि करना, संसाधन के उपयोग में दक्षता हासिल करते हुए कृषि गतिविधियों की उत्पादन लागत में कमी करना, फसल की सघनता में वृद्धि करना, किसान को उच्च मूल्य वाली खेती के लिए प्रोत्साहित करना (खेती का विविधीकरण), किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना एवं अधिशेष श्रमबल को कृषि क्षेत्र से हटाकर गैर कृषि क्षेत्र के पेशों में लगाना। उक्त सभी क्षेत्रों में केंद्र सरकार द्वारा किए गए कई उपायों के अब सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे हैं एवं कई प्रदेशों में किसानों के जीवन स्तर में सुधार दिखाई दे रहा है, किसानों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है एवं कुल मिलाकर अब देश के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ा है। इस संदर्भ में मध्यप्रदेश में किसानों ने भी आगे बढ़कर प्रदेश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने का भरपूर प्रयास किया है।  आज से कुछ वर्ष पूर्व तक मध्यप्रदेश की गिनती देश के बीमारु राज्यों की श्रेणी में की जाती थी। बीमारु राज्यों की श्रेणी में मध्यप्रदेश के अलावा तीन अन्य राज्य भी शामिल थे, यथा, बिहार, राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश। इन राज्यों को बीमारु राज्य इसलिए कहा गया था क्योंकि इन राज्यों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर बहुत कम थी एवं औसत प्रति व्यक्ति आय बहुत कम होने के चलते गरीबी से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या भी बहुत अधिक थी। इसके कारण, इन प्रदेशों में अशिक्षा की दर अधिक थी, ग्रामों में चिकित्सा सहित अन्य सुविधाओं का नितांत अभाव था तथा इन प्रदेशों में जनसंख्या वृद्धि दर भी तुलनात्मक रूप से अधिक थी। कुल मिलाकर, ये प्रदेश कुछ ऐसी विपरीत परिस्थितियों में फसें हुए थे कि इन प्रदेशों में विकास की दर को बढ़ाना बहुत ही मुश्किलों भरा कार्य था, इसलिए इन्हें बीमारु राज्य बोला जाता था। मध्यप्रदेश की आर्थिक व्यवस्था भी मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर आधारित है। प्रदेश में लगभग दो तिहाई आबादी ग्रामों में निवास करती है एवं यहां लगभग 54 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। वर्ष 2005-06 से 2014-15 के दौरान मध्य प्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में औसतन 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की है। इसके बाद के 5 वर्षों के दौरान तो कृषि क्षेत्र में औसत विकास दर बढ़कर 14.2 प्रतिशत प्रतिवर्ष की रही है। यह पूरे देश में सभी राज्यों के बीच कृषि क्षेत्र में अर्जित की गई सबसे अधिक विकास दर है।  आज मध्य प्रदेश कई उत्पादों की पैदावार में देश में प्रथम स्थान पर आ गया है। उदाहरण के तौर पर, संतरा (देश के कुल उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है), चना (लगभग 45 प्रतिशत), सोयाबीन (लगभग 57 प्रतिशत), लहसुन (लगभग 32 प्रतिशत) एवं टमाटर (लगभग 16 प्रतिशत) के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में, प्रथम स्थान पर आ गया है। दलहन और तिलहन उत्पादन में भी क्रमशः 24 प्रतिशत एवं 25 प्रतिशत के योगदान के साथ मध्यप्रदेश देश में प्रथम स्थान पर है। इसी प्रकार, गेहूं (लगभग 19 प्रतिशत), प्याज (लगभग 15 प्रतिशत), हरा मटर (लगभग 20 प्रतिशत), अमरूद (लगभग 14 प्रतिशत) एवं मक्का (लगभग 12 प्रतिशत) के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में द्वितीय, स्थान पर आ गया है। साथ ही, धनिया (लगभग 19 प्रतिशत), लाल मिर्ची (लगभग 7 प्रतिशत), सरसों एवं दूध के उत्पादन में मध्य प्रदेश, पूरे देश में, तीसरे स्थान पर आ गया है।  कुल मिलाकर भारत के कुल खाद्यान उत्पादन में मध्यप्रदेश लगभग 7.7 प्रतिशत का योगदान देता है। खाद्य पदार्थों के उत्पादन के मामले में उत्तरप्रदेश के बाद आज मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे नम्बर पर है।  मध्यप्रदेश सरकार ने दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रकार की सुविधाएं किसानों को उपलब्ध करायीं हैं जिसके कारण कृषि के क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने चहुंमुखी विकास किया है। सबसे पहिले तो सिंचाई की सुविधाओं को वृहद्द स्तर पर गावों में उपलब्ध कराया गया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2000-01 में सिंचाई सुविधाओं का औसत 24 प्रतिशत था, जो कि राष्ट्रीय स्तर के औसत 41.2 प्रतिशत से बहुत ही कम था। परंतु मध्यप्रदेश की सरकार के इस क्षेत्र में मिशन मोड में काम करने के कारण सिंचाई सुविधाओं का औसत स्तर वर्ष 2014-15 में बढ़कर 42.8 प्रतिशत हो गया जो राष्ट्रीय औसत के 47.8 प्रतिशत के काफी करीब पहुंच गया। आज तो यह औसत और भी अधिक आगे आ गया है और प्रदेश में सिंचाई क्षमता 47 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गई है। साथ ही, किसानों के फसल की बुआई एवं कटाई करते समय जब जब बिजली की आवश्यकता होती है, उसे प्राथमिकता के आधार पर सही समय पर उपलब्ध कराई जाती है। आज तो मध्यप्रदेश के अधिकतर गावों में लगभग 24 घंटे बिजली उपलब्ध है। इन सबके ऊपर, प्रदेश के सारे गावों को सभी मौसमों में 24 घंटे उपलब्ध रोड के साथ जोड़ दिया गया है। मध्यप्रदेश में आज सड़कों की लम्बाई 5 लाख किलोमीटर से अधिक हो गई है।  साथ ही साथ, गेहूं की खरीद पर प्रदेश सरकार की ओर से विशेष बोनस किसानों को उपलब्ध कराया गया है, जिसके चलते किसान गेहूं की फसल को बोने की ओर प्रेरित हुए हैं एवं गेहूं के उत्पादन में मध्यप्रदेश पूरे देश में द्वितीय स्थान पर आ गया है। कृषि उत्पादों की भंडारण क्षमता में भी मध्यप्रदेश ने अभूतपूर्व प्रगति की है, जिसके चलते इन उत्पादों के नुकसान में काफी कमी देखने में आई है।  मध्यप्रदेश में विभिन्न कृषि उत्पादों की फसल बढ़ाने के उद्देश्य से जिला स्तर पर उत्पाद विशेष के समूह विकसित किये गए हैं, जिसके चलते उस उत्पाद विशेष का उत्पादन इन जिलों में बहुत तेजी से बढ़ने लगा है। जैसे, मंदसौर, नीमच, राजगढ़, शाजापुर, देवास, सिहोर आदि जिलों में संतरे की खेती को प्रोत्साहन दिया गया है। अमरूद की खेती बढ़ाने के उद्देश्य से मुरेना, श्योपुर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, सिहोर, सागर, विदिशा, आदि जिलों में समूह विकसित किए गए हैं। इसी प्रकार, केला के उत्पादन के लिए, बुरहानपुर, खरगोन, बड़वाह, खंडवा, हरदा, धार, आदि जिले विकसित किए गए हैं। आलू के उत्पादन हेतु मुरेना, ग्वालियर, शिवपुरी, राजगढ़, शाजापुर, उज्जैन, इंदौर, देवास आदि जिलों में समूह बनाए गए हैं। हरे मटर का उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से ग्वालियर, दतिया, सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा आदि जिलों में समूहों का गठन किया गया है। इसी प्रकार, लाल मिर्ची, धनिया, लहसुन, आम, अनार, प्याज, टमाटर, आदि उत्पादों हेतु भी प्रदेश के विभिन्न जिलों को उस फसल के समूह के तौर पर विकसित किया गया है। इस पद्धति के चलते भी प्रदेश में इन फलों, सब्जियों आदि का उत्पादन बहुत तेज गति से आगे बढ़ा है।       मध्यप्रदेश न केवल उत्पादन के मामले में बल्कि कृषि उत्पादों के निर्यात के मामले में भी चहुमुखी तरक्की की है। मध्यप्रदेश में उत्पादित शरबती गेहूं तो आज पूरे विश्व में अपनी धाक जमा चुका है। इसी प्रकार, मध्यप्रदेश में उत्पादित फलों एवं सब्जियों यथा, संतरे, आम, अमरूद, केला, अनार, प्याज, टमाटर, आलू, मटर, लहसुन, लाल मिर्ची, धनिया, सोयाबीन, चना, आदि की मांग अब वैश्विक स्तर पर होने लगी है। मध्यप्रदेश से समस्त उत्पादों का निर्यात 65,000 करोड़ रुपए के स्तर को पार कर गया है।  विश्व में मुख्यतः पश्चिमी राष्ट्रों ने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर तेज करने के लिए औद्योगिक विकास का सहारा लिया है। अर्थशास्त्र में ऐसा कहा भी जाता है कि कृषि क्षेत्र के विकसित अवस्था में आने के बाद औद्योगिक विकास एवं सेवा क्षेत्र के सहारे ही सकल घरेलू उत्पाद में तेज वृद्धि दर्ज की जा सकती है। परंतु, मध्यप्रदेश राज्य ने एक अलग ही राह दिखाई है एवं कोरोना महामारी के पूर्व के खंडकाल में लगातार 5 वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र में 14 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर अर्जित कर अपने सकल घरेलू उत्पाद में तेज गति से वृद्धि दर्ज करने में सफलता पाई है। मुख्यतः कृषि क्षेत्र में की गई प्रगति के सहारे ही मध्यप्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2019-20 में बढ़कर 9.37 लाख करोड़ रुपए का हो गया है। प्रति व्यक्ति आय भी अब बढ़कर 140,000 प्रति वर्ष हो गई है। मध्यप्रदेश की सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर विगत 10 वर्षों के दौरान राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर से अधिक ही रही है।  कुल मिलाकर मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में अतुलनीय विकास के लिए आधारभूत ढांचा खड़ा किया है, जिससे किसानों को अपनी फसल को उगाने से लेकर बाजार में बिक्री करने तक, बहुत आसानी हो रही है। मध्यप्रदेश राज्य का पूंजीगत खर्च वर्ष 2007 में केवल 6,832 करोड़ रुपए का रहा था जो इस वर्ष बढ़कर 56,000 करोड़ रुपए का होने जा रहा है।    प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति लेख

वैश्विक स्तर पर भारतीय सनातन संस्कृति के पालन से ही शांति सम्भव

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आज पूरे विश्व में अशांति एवं अराजकता का माहौल है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल ही रहा था कि हमास और इजराईल के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया है एवं इस युद्ध में लेबनान एवं सीरिया भी कूद पड़े हैं। इधर चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते उसके अपने लगभग सभी पड़ौसी देशों के साथ सम्बंध अच्छे नहीं चल रहे हैं। ताईवान, मंगोलिया, जापान, इंडोनेशिया, फिलिपीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार, भारत आदि जैसे शांतिप्रिय देश भी आज चीन की नीतियों से बहुत परेशान हैं। एक तरफ तो विकसित देश अपनी आर्थिक नीतियों के असफल होने के कारण कई प्रकार की आर्थिक एवं सामाजिक परेशानियों से जूझ रहे हैं, तो दूसरी ओर अफ्रीकी महाद्वीप क्षेत्र में कई देश अभी भी आर्थिक विकास को तरस रहे हैं और इन देशों के नागरिक गरीबी का जीवन जीने को मजबूर हैं। कुल मिलाकर पूरे विश्व में ही त्राहि त्राहि मची हुई है। इन समस्त विपरीत परिस्थितियों के बीच आज भारत की आर्थिक विकास दर विश्व की समस्त बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच लगातार सबसे तेज बनी हुई है, क्योंकि भारत आज अपनी सनातन संस्कृति का पालन करते हुए ही आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आदि क्षेत्रों में कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है एवं इसके चलते भारत आज कई क्षेत्रों में पूरे विश्व को राह दिखा रहा है।       वैसे भी किसी भी राष्ट्र के मूल में कुछ तत्व निहित होते हैं, जिनके बल पर वह देश आगे बढ़ता है और समाज के विभिन्न वर्गों को एकता के सूत्र में पिरोए रखता है। भारत के एक राष्ट्र के रूप  में, इसके मूल में, सनातन हिंदू संस्कृति का आधार है जो हजारों वर्षों से भारत को आज भी भारत के मूल रूप में ही जीवित रखे हुए है। अन्यथा, पिछले लगभग 1000 वर्षों में भारत को तोड़ने के लिए अरब के आक्रांताओं और अंग्रेजों के द्वारा अनेकानेक प्रयास किए गए हैं। अरब के आक्रांताओं एवं अंग्रेजों ने बहुत अधिक प्रयास किए कि किसी तरह भारतीय मूल संस्कृति को तहस नहस किया जाय, शिक्षा पद्धति को ध्वस्त किया जाय, बलात हिंदुओं का धर्म परिवर्तन किया जाय, आदि आदि। इन प्रयासों में उन्हें कुछ सफलता तो अवश्य मिली परंतु पूर्ण रूप से भारतीय संस्कृति को समाप्त नहीं कर पाए। जबकि कई अन्य देशों (ईरान, लेबनान, इंडोनेशिया, मिस्त्र, ग्रीक आदि) में इनके यही प्रयास पूर्ण रूप से सफल रहे एवं वहां के लगभग सम्पूर्ण नागरिकों को इस्लाम में परिवर्तित करने में वे सफल रहे। भारत में चूंकि सनातन हिंदू धर्म का बोलबाला है अतः यहां इन तत्वों को आज तक सफलता नहीं मिली है हालांकि इनके प्रयास अभी भी जारी हैं।  अंग्रेजों ने जब भारत पर शासन करना प्रारम्भ किया तो उनका अज्ञानतावश यह सोच था कि यहां के नागरिक कुछ जानते ही नहीं है और इनकी विज्ञान के प्रति कोई समझ ही नहीं है।उनका यह भी सोच था कि भारत कई राज्यों का एक समूह है और यह एक राष्ट्र नहीं है। अंग्रेज तो यह भी सोचते थे कि भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा है, ना ही अभी यह एक राष्ट्र है और न ही कभी भविष्य में यह एक राष्ट्र रह पाएगा। क्योंकि यहां तो विभिन्न राजा राज्य करते हैं और उनके राज्यों की अलग अलग भौगोलिक सीमाएं हैं इसलिए भारत का एक राष्ट्र्र के रूप में कभी अस्तित्व ही नहीं रहा है। अंग्रेज यह भी मानते थे कि पूरे भारत के लोग एक हो जाएंगे यह कभी सम्भव ही नहीं है। अंग्रेज अहंकारवश भारतीयों को अनपढ़, असभ्य एवं रूढ़िवादी तक कहते थे। उनकी नजरों में भारतीयों की कोई एतिहासिक उपलब्धि नहीं है एवं भारत के बर्बर, जंगली लोगों को सभ्यता सिखाने का दायित्व हमारा (अंग्रेजों का) है। भारत के लोग प्रशासन करने के अयोग्य है। किसी कारण से यदि भारत को स्वतंत्र राष्ट्र्र का दर्जा दे दिया तो इस देश की बर्बादी सुनिश्चित है और फिर इसकी जवाबदारी हमारी (अंग्रेजों की) होगी। उनको विशेष रूप से हिंदुओं से बहुत डर लगता था और वे हिंदुओं से सावधान रहने की आवश्यकता पर बल दिया करते थे। उनका सोच था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत बहुत जल्दी बर्बाद हो जाएगा। भारत में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता, यह बहुत ही अस्वाभाविक राज्य है। भारत आजाद होते ही कई टुकड़ों में बिखर जाएगा क्योंकि यहां 52 करोड़ लोग हैं एवं इनकी अलग अलग भाषाएं हैं ये आपस में लड़ते रहते हैं और कभी भी एक नहीं रह पाएंगे। भारत आजादी के बाद  पूरी दुनिया के लिए एक भार बन जाएगा एवं यहां के नागरिक भूख से ही मर जाएगे। उक्त सोच ब्रिटेन, अमेरिका, लगभग समस्त यूरोपीय देशों सहित कई देशों की भी थी। आज भी आतंकवादी संगठन एवं विदेशी ताकतें जो भारत को अस्थिर करना चाहते हैं वे इसी परिकल्पना पर अपना कार्य प्रारम्भ करते हैं एवं समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में लड़ाने का प्रयास करते नजर आते हैं। उक्त वर्णित देशों की यह सोच इसलिए थी क्योंकि उनके पास हिंदू सनातन संस्कृति का कोई ज्ञान नहीं था बल्कि उनकी अपनी पश्चिम रंग में रची बसी सोच थी जो केवल “मैं” में विश्वास करती थी उनके लिए देश मतलब केवल भौगोलिक सीमाओं वाला जमीन का टुकड़ा और उस जमीन के टुकड़े पर रहने वाले लोग ही विशेष हैं। उनके सोच में अहम का भाव कूट कूट कर भरा है। केवल मैं ही श्रेष्ठ हूं। इस दुनिया में रहने वाले बाकी सभी लोग हमसे हीन  हैं। जर्मन लोगों ने अपना एक विशेष दर्शन शास्त्र दुनिया के सामने रखा जिसमें उन्होंने किसी और दर्शन को स्वीकार न करते हुए केवल अपने दर्शन को ही श्रेयस्कर माना एवं अहंकार का भाव जाहिर किया। जर्मन, फ्रेंच से भिन्न हैं। यूरोप में प्रत्येक देश ने अपने आप को दूसरे देश से बिलकुल अलग रखा हुआ है। पश्चिम का राष्ट्रवाद एकांतिक है इसमें समावेशिता का नितांत अभाव है। इसीलिए आज रूस, यूक्रेन के साथ लड़ रहा है तो जर्मनी की फ्रांन्स के साथ नहीं बनती है। इसी प्रकार यूरोप के लगभग सभी देशों के आपसी विचारों में किसी न किसी प्रकार की भिन्नता दृष्टिगोचर होती रहती है। जबकि यह लगभग सभी देश ईसाई धर्म को मानने वाले देश हैं। आज कई इस्लामी देश भी पश्चिमी सोच की राह पर चलते हुए दिखाई दे रहे हैं कि केवल हमारा धर्म ही श्रेष्ठ है। इस धरा पर जो भी इस्लाम को नहीं मानता हैं वह काफिर है और उसे जीने का हक नहीं हैं। काफिर या तो इस्लाम को कबूल करे अथवा वह मार दिया जाएगा। और तो और इस्लामी देशों में भी अलग अलग किस्म के कई फिर्के आपस में ही लड़ते झगड़ते रहते हैं एवं एक दूसरे को अपने से श्रेष्ठ सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहते हैं।  जबकि भारतीय विचारधारा इसके ठीक विपरीत आचरण करना सिखाती है विशेष रूप से सनातन संस्कृति में जो व्यक्ति जितना विशेष होगा वह उतना ही विनयपूर्ण होगा और इस नाते भारतीय सनातन संस्कृति अविभाजनकारी दर्शन पर चलकर सर्वसमावेशी है। इसमें ईश्वरीय भाव जाहिर होता है। जो मेरे अंदर है वही आपके अंदर भी है अर्थात मुझमें भी ईश्वर है और आपमें भी ईश्वर का वास है। इस प्रकार प्रत्येक भारतीय, चाहे वह किसी भी जाति का हो, किसी भी मत, पंथ को मानने वाला हो, अपने आप को भारत माता का सपूत कहने में गर्व का अनुभव करता है। और, इसलिए भारतीय सनातन संस्कृति अन्य संस्कृतियों को भी अपने आप में आत्मसात करने की क्षमता रखती है। इतिहास में इस प्रकार के कई उदाहरण दिखाई देते हैं। जैसे पारसी आज अपने मूल देश में नहीं बच पाए हैं लेकिन भारत में वे रच बस गए हैं। इसी प्रकार इस्लाम धर्म को मानने वाले लगभग सभी फिर्के भारत में निवास करते हैं जबकि विश्व के कई इस्लामी देशों में केवल एक विशेष प्रकार के फिर्के पाए जाते हैं।  भारतीय चिंतन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार स्तंभों पर स्थापित है। इस दृष्टि से चाहे व्यक्ति हो, परिवार हो, देश यो अथवा विश्व हो, किसी के भी विषय में चिंतन का आधार एकांगी न मानकर एकात्म माना जाता है। भारत के उपनिषदों, वेदों, ग्रंथों में भी यह बताया गया है कि मनुष्य का जीवन अच्छे कर्मों को करने के लिए मिलता है एवं देवता भी मनुष्य के जीवन को प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। अच्छे कर्म कर मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है इसीलिए भारतीय धरा को कर्मभूमि माना गया है जबकि अन्य देशों की धराओं को भोगभूमि कहा गया है। अन्य धर्म, भोग को बढ़ावा देते हैं जबकि हिंदू सनातन संस्कृति योग को बढ़ावा देती है। इस प्रकार हिंदू धर्म के शास्त्रों, पुराणों एवं वेदों में किसी भी जीव के दिल को दुखाने अथवा उसकी हत्या को निषिद्ध बताया गया है जबकि अन्य धर्म के शास्त्रों में इस प्रकार की बातों का वर्णन नहीं मिलता है। इसी कारण के चलते हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायी बहुत कोमल स्वभाव एवं पूरे विश्व में निवास कर रहे प्राणियों को अपने कुटुंब का सदस्य मानने वाले होते हैं। बचपन में ही इस प्रकार की शिक्षाएं हमारे बुजुर्गों द्वारा प्रदान की जाती हैं।  भारतीय संस्कृति में एकात्मता का सोच है। भारत पूरे विश्व की मंगल कामना करता है एवं “वसुधैव कुटुम्बकम”, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय”, जैसे सिद्धांतो पर विश्वास करता है। चाहे किसी भी व्यक्ति की कोई भी पूजा पद्धति क्यों न हो, पूरे भारत में एक जैसा हिंदू दर्शन है। हिंदू दर्शन ही भारत में राष्ट्र तत्व है जो पश्चिम की सोच से अलग है। हिंदू दर्शन एक मौलिक दर्शन है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, अंग्रेजों एवं अन्य कई देशों की सोच के ठीक विपरीत, विभिन्न मत, पंथों को मानने वाले भारतीय 26 विभिन्न राष्ट्रीय भाषाओं के साथ न केवल सफलतापूर्वक एक दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर आनंद में रह रहे हैं बल्कि आज भारतीय लोकतंत्र पूरे विश्व में सबसे बड़े मजबूत लोकतंत्र के रूप में अपना स्थान बना चुका है। यह केवल सनातन हिंदू संस्कृति के कारण ही सम्भव हो सका है। सनातन हिंदू संस्कृति में एकात्मता का भाव मुख्य रूप से झलकता है। अतः वर्तमान में आतंकवादियों एवं अन्य कई देशों द्वारा पूरे विश्व में अस्थिरता फैलाने के जो प्रयास किए जा रहे हैं उन्हें भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति के दर्शन को अपनाकर ही पूर्णतः दबाया जा सकता है। वैसे हाल ही के समय में कई देशों यथा, जापान, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंडोनेशिया आदि आदि में भारतीय संस्कृति के प्रति रूझान बढ़ता जा रहा है। अब तो विश्व के कई विकसित देशों को भी यह आभास होने लगा है कि भारतीय सनातन  संस्कृति इस धरा पर सबसे पुरानी संस्कृतियों में एक है और भारतीय वेदों, पुराणों एवं पुरातन ग्रंथों में लिखी गई बातें कई मायनों में सही पाई जा रही हैं। इन पर विश्व के कई बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में शोध किए जाने के बाद ही यह तथ्य सामने आ रहे है। अतः कई देशों को अब यह आभास होने लगा है कि भारतीय सनातन संस्कृति को अपनाकर ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है। 

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आर्थिकी लेख

भारत में बैंक ऋण का उपयोग उत्पादक कार्यों हेतु दक्षता के साथ हो रहा है

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भारत में तेज गति से हो रही आर्थिक प्रगति के चलते व्यवसाईयों, कृषकों, उद्यमियों, उद्योगों, सेवाकर्मियों एवं नागरिकों की, उनकी आर्थिक एवं अन्य गतिविधियों के लिए, पूंजी की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुए विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र की बैंकों को तैयार किया है कि वे देश के समस्त नागरिकों को ऋण के रूप में धन अथवा पूंजी आसान शर्तों पर उपलब्ध कराएं ताकि देश के आर्थिक विकास को बल मिल सके। ऋण का उपयोग यदि उत्पादक कार्यों के लिए किया जाता है एवं इससे यदि धन अर्जित किया जाता है तो बैकों से ऋण लेना कोई बुरी बात नहीं है। बल्कि, इससे तो व्यापार को विस्तार देने में आसानी होती है और पूंजी की कमी महसूस नहीं होती है। भारतीय नागरिक तो वैसे भी सनातन संस्कृति के अनुपालन को सुनिश्चित करते हुए अपने ऋण की किश्तों का भुगतान समय पर करते नजर आते हैं इससे बैकों की अनुत्पादक आस्तियों में कमी दृष्टिगोचर हो रही है, जून 2023 को समाप्त तिमाही में भारतीय बैंकों में सकल अनुत्पादक आस्तियों का प्रतिशत केवल 3.7 प्रतिशत था। इससे अंततः बैकों की लाभप्रदता में वृद्धि होती है और इन बैकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात में सुधार होता है। जून 2023 को समाप्त तिमाही में भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17.1 प्रतिशत था जो अमेरिकी बैंकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात से भी अधिक है। साथ ही, वर्तमान ऋण की, समय पर अदायगी से बैकों की ऋण प्रदान करने की क्षमता में भी वृद्धि होती है। अभी हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि भारत में वित्तीय वर्ष 2014 से वित्तीय वर्ष 2023 के बीच बैंकों की कुल सम्पति/देयताओं में वृद्धि, वित्तीय वर्ष 1951 से वित्तीय वर्ष 2014 के बीच की तुलना में 1.3 गुणा अधिक रही है। वित्तीय वर्ष 2051 से 2014 के बीच के 63 वर्षों के दौरान भारत की समस्त अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों की सम्पति एवं देयताओं में 142 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गई थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2014 से 2023 के बीच के 9 वर्षों के खंडकाल में यह वृद्धि 187 लाख करोड़ रुपए की रही है। बैकों द्वारा अधिक मात्रा में प्रदान की जा रही ऋणराशि के चलते ही बैकों की आस्तियों में अतुलनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 22 सितम्बर 2023 को समाप्त पखवाड़े के दौरान बैकों द्वारा प्रदान की गई ऋण राशि में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, इससे बैकों का ऋण जमा अनुपात 78.58 हो गया है। भारत के बैकों की ऋण राशि में हो रही अतुलनीय वृद्धि के बावजूद, भारत में ऋण:सकल घरेलू उत्पाद अनुपात अन्य देशों की तुलना में अभी भी बहुत कम है। हालांकि हाल ही के समय में विनिर्माण इकाईयों की उत्पादन क्षमता का उपयोग बहुत तेजी से बढ़ा है, वित्तीय वर्ष 2022-23 के चौथी तिमाही में विनिर्माण इकाईयों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 76.3 प्रतिशत उपयोग किया जा रहा था,  जिसके कारण उद्योग जगत को ऋण की अधिक आवश्यकता महसूस हो रही है। बढ़े हुए ऋण की आवश्यकता की पूर्ति भारतीय बैंकें आसानी से करने में सफल रही हैं। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विकसित देशों में भी प्रायः यह देखा गया है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त ऋण में वृद्धि के साथ उस देश के सकल घरेलू उत्पाद में भी तेज गति से वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है। भारत में भी अब यह तथ्य परिलक्षित होता दिखाई दे रहा है। भारत में आर्थिक गतिविधियों में आ रही तेजी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में भी  ऋण की मांग लगातार बढ़ रही है। फिर भी, भारत में कोरपोरेट को प्रदत ऋण का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत वर्ष 2015 के 65 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2023 में 50 प्रतिशत हो गया है। इसका आशय यह है कि इस दौरान कोरपोरेट ने अपने ऋण का भुगतान किया है एवं उन्होंने सम्भवत: अपनी लाभप्रदता में वृद्धि दर्ज करते हुए अपने लाभ का पूंजी के रूप में पुनर्निवेश किया है। साथ ही, कुछ कोरपोरेट का आकार इतना अधिक बढ़ा हो गया है कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्त बाजार से कम ब्याज की दर पर डॉलर में ऋण प्राप्त करने में सफलता पाई है। हालांकि इस बीच भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी बढ़ा है जो वर्ष 2013 में 2200 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 4600 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। विभिन्न बैंकों द्वारा प्रदत्त लम्बी अवधि के ऋण सामान्यतः आस्तियां उत्पन्न करने में सफल रहे हैं, जैसे गृह निर्माण हेतु ऋण अथवा वाहन हेतु ऋण, आदि। इस प्रकार के ऋणों के भविष्य में डूबने की सम्भावना बहुत कम रहती है। बैकों द्वारा खुदरा क्षेत्र में प्रदत्त ऋणों में से 10 प्रतिशत से भी कम ऋण ही प्रतिभूति रहित दिए गए हैं जैसे सरकारी कर्मचारियों को पर्सनल (व्यक्तिगत) ऋण, आदि। पर्सनल ऋण प्रतिभूति रहित जरूर दिए गए हैं परंतु चूंकि यह सरकारी कर्मचारियों सहित नौकरी पेशा नागरिकों को दिए गए हैं, जिनकी मासिक किश्तें समय पर अदा की जाती हैं, अतः इनके भी डूबने की सम्भावना बहुत ही कम रहती है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि भारत में अब बैकों द्वारा ऋण सम्बंधी व्यवसाय बहुत सुरक्षित तरीके से किया जा रहा है। इसी कारण से हाल ही के समय में यह पाया गया है कि भारतीय बैंकों की अनुत्पादक आस्तियों की वृद्धि पर अंकुश लगा है। यह भी संतोष का विषय है कि हाल ही के समय में भारतीय बैकों से प्रथम बार ऋण लेने वाले नागरिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। इसका आशय यह है कि भारतीय नागरिक जो अक्सर बैकों से ऋण लेने से बचते रहे हैं वे अब बैकों से ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं क्योंकि इस बीच बैंकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋण सम्बंधी शर्तों को आसान बनाया गया है। सिबिल द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार, भारत में वित्तीय वर्ष 2023 को समाप्त अवधि के दौरान प्रदान किए गए कुल पर्सनल ऋणों में 98 प्रतिशत ऋण 50,000 रुपए से अधिक की राशि के थे और केवल 2 प्रतिशत ऋण ही 50,000 रुपए की कम राशि के थे। यह भारत के नागरिकों की आय में लगातार हो रही वृद्धि को दर्शा रहा है। क्योंकि, पर्सनल ऋण सामान्यतः व्यक्ति की किश्त अदा करने की क्षमता के आधार पर प्रदान किया जाता है। इसी प्रकार, भारत में नागरिकों द्वारा क्रेडिट कार्ड के उपयोग में भी वृद्धि दर्ज की गई है और कई नागरिकों द्वारा क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध भी ऋण राशि का उपयोग किया जा रहा है। परंतु, इस दृष्टि से भी यह संतोष का विषय है कि भारत में प्रति क्रेडिट कार्ड औसत ऋण की राशि में लगातार कमी दर्ज हो रही है। इसका आशय यह है कि क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वाले नागरिकों द्वारा ऋण की राशि का भुगतान समय पर हो रहा है एवं इस क्षेत्र में चूक की दर अन्य देशों की तुलना में भारत में बहुत कम है। अमेरिका में तो क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध लिए गए ऋणों में चूक की दर बहुत अधिक है एवं बैंकों की एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि इस मद पर बकाया है। कुल मिलाकर भारत के संदर्भ में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि भारतीय नागरिकों में सनातन संस्कृति के संस्कार होने के कारण बैकों से ऋण के रूप में उधार ली गई राशि का समय पर भुगतान  किया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह माना जाता है, जिसके कारण भारतीय बैंकों के अनुत्पादक आस्तियों की राशि अन्य देशों की बैंकों की तुलना में कम हो रही है। प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति

वर्तमान विपरीत परिस्थितियों के बीच विश्व को केवल भारत ही शांति की राह दिखाएगा

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प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी दिनांक 24 अक्टूबर 2023 को श्री विजयादशमी के पावन उत्सव पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डा मोहन भागवत जी ने नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में अपना सारगर्भित उदबोधन दिया है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देश के प्रसिद्ध गायक एवं संगीतकार श्री शंकर महादेवन जी थे।  आज वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों के बीच अविश्वास की भावना जागृत हो रही है। स्पष्ट रूप विश्व एक बार पुनः दो खेमों के बीच बंटता दिखाई दे रहा है। अविश्वास की भावना इस हद्द तक बढ़ चुकी है कि रूस-यूक्रेन तथा आतंकवादी संगठन हमास एवं इजराईल के बीच तो जंग भी छिड़ चुकी है एवं इस जंग में लेबनान, सीरिया एवं अप्रत्यक्ष रूप से ईरान भी कूद गए हैं। इस तरह की विपरीत परिस्थितियों के बीच भारत पूरे विश्व में “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के साथ शांति स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। विभिन्न देशों के बीच “मैं” का भाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते अहं की भावना विकसित होने के कारण इन देशों की आपस में टकराहट भी बढ़ रही है। विभिन्न देशों के बीच बढ़ रही वैमनस्यता के साथ ही पर्यावरण में आ रहे बदलाव पर चिंता जाहिर करते हुए उक्त उदबोधन में यह भी बताया गया है कि भारत किस प्रकार भारतीय सनातन संस्कृति के बल पर विश्व में शांति स्थापित कर सकता है एवं इस संदर्भ में संघ के स्वयंसेवकों की क्या भूमिका रहने वाली है।  डा भागवत जी अपने उदबोधन में कहते हैं कि अपने स्व को, अपनी पहचान को सुरक्षित रखना, यह मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा व सहज प्रयास है। द्रुतगति से परस्पर निकट आने वाले विश्व में आजकल सभी राष्ट्रों में यह चिंता करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। संपूर्ण विश्व को एक ही रंग में रंगने का, एकरूपता का कोई भी प्रयास अब तक सफल नहीं रहा है, और ऐसी उम्मीद भी दिखाई नहीं देती है कि निकट भविष्य में यह सफल हो सकेगा। भारत की पहचान को, हिंदू समाज की अस्मिता को बनाए रखने का विचार स्वाभाविक तो है ही। आज के विश्व की वर्तमानकालीन समय की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए, अपने स्वयं के मूल्यों पर आधारित, काल सुसंगत, नया रूपरंग लेकर भारत खड़ा हो, यह विश्व की भी अपेक्षा है। मत संप्रदायों को लेकर उत्पन्न हुए कट्टरपन, अहंकार व उन्माद को विश्व झेल रहा है। स्वार्थों के टकराव तथा अतिवादिता के कारण उत्पन्न होने वाले यूक्रेन के अथवा गाझा पट्टी के युद्ध जैसे कलहों का कोई निदान दिख नहीं रहा है। विश्व के कई देशों में प्रकृति विरुद्ध जीवनशैली, स्वैरता तथा अनिर्बंध उपभोगों के कारण नई-नई शारीरिक व मानसिक बीमारीयां उत्पन्न हो रही हैं। विकृतियां व अपराध बढ़ रहे हैं। आत्यंतिक व्यक्तिवाद के कारण परिवार टूट रहे है। प्रकृति के अमर्याद शोषण से प्रदूषण, वैश्विक तापमानवृद्धि, ऋतुक्रम में असंतुलन व तज्जन्य प्राकृतिक हादसे प्रतिवर्ष बढ रहे हैं। आतंकवाद, शोषण और अधिसत्तावाद को खुला मैदान मिल रहा है। अपनी अधूरी दृष्टि को लेकर विश्व इन समस्याओं का सामना नहीं कर सकता यह स्पष्ट हुआ है। इसलिए अपने सनातन मूल्यों व संस्कारों के आधार पर, भारत अपने उदाहरण से वास्तविक सुख शांति का नवपथ विश्व को दिखाए यह अपेक्षा जगी है। पर्यावरण के संदर्भ में उक्त वर्णित परिस्थितियों की एक छोटी आवृत्ति भारत वर्ष में भी हमारे सम्मुख विद्यमान है। उदाहरणार्थ, हाल ही में हिमालय के क्षेत्र में हिमाचल और उत्तराखंड से लेकर सिक्किम तक लगातार प्राकृतिक आपदाओं का प्राणांतिक खेल हम देख रहे हैं। भविष्य में किसी गंभीर व व्यापक संकट का पूर्वाभास इन घटनाओं के द्वारा हो रहा हो ऐसी शंकाओं की चर्चा भी है। यद्यपि उक्त प्रकार की घटनाएं हिमालय क्षेत्र में अधिक घट रही हैं, परंतु पूरे देश के लिए इन घटनाओं का एक स्पष्ट संकेत ध्यान में आता है। अधूरी, निपट जड़वादी तथा पराकोटि की उपभोगवादी दृष्टि पर आधारित विकास पथों के कारण, मानवता व प्रकृति धीरे-धीरे परंतु निश्चित रूप से विनाश की ओर अग्रसर हो रही हैं। संपूर्ण विश्व में यह चिंता बढी है। उन असफल पथों को त्याग कर अथवा धीरे-धीरे वापिस मोड़कर भारतीय मूल्यों पर तथा भारत की समग्र एकात्म दृष्टि पर आधारित, काल सुसंगत व अद्यतन, अपना अलग विकास पथ भारत को बनाना ही पड़ेगा। यह भारत के लिए सर्वथा उपयुक्त तथा विश्व के लिए भी अनुकरणीय प्रतिमानक बन सकेगा। घिसीपिटी असफल राह पर बने रहने की, अंधानुकरण, जड़ता व पोथी निष्ठता की प्रवृत्ति छोड़नी पड़ेगी। उपनिवेशी मानसिकता से मुक्त होकर, विश्व से जो देशानुकूल है वही लेना पड़ेगा। अपने देश में जो है उसको युगानुकूल बनाते हुए, हम अपना स्व आधारित स्वदेशी विकासपथ अपनाएं, यह समय की आवश्यकता है। इस दृष्टि से कुछ नीतिगत परिवर्तन पिछले दिनों हुए है यह ध्यान में आता है। समाज में भी कृषि, उद्योग और व्यापार के, तत्संबंधित सेवाओं के क्षेत्र में, सहकारिता व स्वरोजगार के क्षेत्रों में, नए सफल प्रयोगों की संख्या वृद्धि भी निरंतर हो रही है। परंतु प्रशासन के क्षेत्र में, सभी क्षेत्रों में चिंतन करनेवाले व दिशा देने वाले बुद्धिधर्मियों में, इस प्रकार की जागृति की और अधिक आवश्यकता है। शासन की ‘स्व’ आधारित युगानुकूल नीति, प्रशासन की तत्पर, सुसंगत व लोकाभिमुख कृति तथा समाज का मन, वचन, कर्म से सहयोग व समर्थन ही देश को परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ाएगा। आज भारत में भी समाज की सामूहिकता छिन्न-भिन्न हो कर अलगाव व टकराव बढ़े, इस प्रकार के प्रयास कुछ विघनसंतोषी जीवों द्वारा किया जा रहे हैं। अपने अज्ञान, अविवेक, परस्पर अविश्वास अथवा असावधानी के कारण समाज में कहीं-कहीं ऐसे अप्रत्याशित उपद्रव व फूट बढ़ती ही जाती दिखाई दे भी रही है। भारत के उत्थान का प्रयोजन विश्व-कल्याण ही रहा है। परन्तु इस उत्थान के स्वाभाविक परिणाम के नाते स्वार्थी, विभेदकारी तथा छल कपट के आधार पर अपने स्वार्थ का साधन करने वाली शक्तियां मर्यादित व नियंत्रित होती हैं, इसलिए उनके द्वारा निरंतर विरोध भी चलता है। यद्यपि यह शक्तियां किसी न किसी विचारधारा का आवरण ओढ़ लिया करती हैं, किसी मनलुभावन घोषणा अथवा लक्ष्य के लिए कार्यरत होने का छद्म रचती हैं, उनके वास्तविक उद्देश्य कुछ और ही होते हैं। प्रामाणिकता व निःस्वार्थ बुद्धि से काम करने वाले लोग किसी भी विचारधारा के हों, किसी भी तरह का कार्य करते हों, उनके लिए बाधा ही होते हैं। आजकल इन सर्वभक्षी ताकतों के लोग अपने आपको सांस्कृतिक मार्क्सवादी या वोक (Woke) यानी जगे हुए कहते हैं। परंतु मार्क्स को भी उन्होंने 1920 के दशक से ही भुला रखा है। विश्व की सभी सुव्यवस्था, मांगल्य, संस्कार, तथा संयम से उनका विरोध है। मुठ्ठी भर लोगों का नियंत्रण सम्पूर्ण मानवजाति पर हो इसलिए अराजकता व स्वैराचरण का पुरस्कार, प्रचार व प्रसार वे करते हैं। माध्यमों तथा अकादमियों को हाथ में लेकर देशों की शिक्षा, संस्कार, राजनीति व सामाजिक वातावरण को भ्रम व भ्रष्टता का शिकार बनाना उनकी कार्यशैली है। ऐसे वातावरण में असत्य, विपर्यस्त तथा अतिरंजित वृत्त के द्वारा भय, भ्रम तथा द्वेष आसानी से फैलता है। आपसी झगड़ों में उलझकर असमंजस व दुर्बलता मे फंसा व टूटा हुआ समाज, अनायास ही इन सर्वत्र अपनी ही अधिसत्ता चाहने वाली विध्वंसकारी ताकतों का भक्ष्य बनता है। अपनी परम्परा में इस प्रकार किसी राष्ट्र की जनता में अनास्था, दिग्भ्रम व परस्पर द्वेष उत्पन्न करनेवाली कार्यप्रणाली को मंत्र विप्लव कहा जाता है । देश में राजनीतिक स्वार्थों के कारण राजनीतिक प्रतिस्पर्धी को पराजित करने के लिए ऐसी अवांछित शक्तियों के साथ गठबंधन करने का अविवेक है। समाज पहले से ही आत्मविस्मृत होकर अनेक प्रकार के भेदों से जर्जर होकर, स्वार्थों की घातक प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या व द्वेष में उलझा है। इसलिये इन आसुरी शक्तियों को समाज या राष्ट्र को तोड़ना चाहनेवाली अंदरूनी या बाहरी ताकतों का साथ भी मिलता है। भारत किस प्रकार विश्व में शांति स्थापित करने के लिए नेतृत्व प्रदान कर सकता है इसे समझाते हुए डा भागवत जी कहते हैं कि भारत के बाहर के लोगों की बुद्धि चकित हो जाए, परंतु मन आकर्षित हो जाए ऐसी एकता की परंपरा हमारी विरासत में हमको मिली है। उसका रहस्य क्या है? नि:संशय वह हमारी सर्व समावेशक संस्कृति है। पूजा, परंपरा, भाषा, प्रान्त, जातिपाती इत्यादि भेदों से ऊपर उठकर, अपने कुटुंब से संपूर्ण विश्वकुटुंब तक आत्मीयता को विस्तार देनेवाली हमारी आचरण की व जीवन जीने की रीति है। हमारे पूर्वजों ने अस्तित्व की एकता के सत्य का साक्षात्कार किया। उसके फलस्वरूप शरीर, मन, बुद्धि की एक साथ उन्नति करते हुए तीनों को सुख देनेवाला, अर्थ, काम को साथ चलाकर मोक्ष की तरफ अग्रेसर करनेवाला धर्मतत्व उनको अवगत हुआ। उस प्रतीति के आधार पर उन्होंने धर्मतत्व के चार शाश्वत मूल्यों (सत्य, करुणा, शुचिता व तपस ) को आचरण में उतारनेवाली संस्कृति का विकास किया। चारों ओर से सुरक्षित तथा समृद्ध हमारी मातृभूमि के अन्न, जल, वायु के कारण ही यह संभव हुआ। इसलिए हमारी भारतभूमि को हमारे संस्कारों की अधिष्ठात्री माता मानकर उसकी हम भक्ति करते हैं। हाल ही में स्वतन्त्रता संग्राम के महापुरुषों का स्मरण अपनी स्वतंत्रता के 75 वे वर्ष के निमित्त हमने किया। हमारे धर्म, संस्कृति, समाज व देश की रक्षा, समय समय पर उनमें आवश्यक सुधार तथा उनके वैभव का संवर्धन जिन महापुरुषों के कारण हुआ, वे हमारे कर्तृत्व सम्पन्न पूर्वज हम सभी के गौरवनिधान हैं तथा अनुकरणीय हैं। हमारे देश में विद्यमान सभी भाषा, प्रान्त, पंथ, संप्रदाय, जाति, उपजाति इत्यादि विविधताओं को एक सूत्र में बांधकर एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाले यही तीन तत्व (मातृभूमि की भक्ति, पूर्वज गौरव, व सबकी समान संस्कृति) हमारी एकता का अक्षुण्ण सूत्र है। समाज की स्थाई एकता अपनेपन से निकलती है, स्वार्थ के सौदों से नहीं। हमारा समाज बहुत बड़ा है। बहुत विविधताओं से भरा है। कालक्रम में कुछ विदेश की कुछ आक्रामक परंपराएं भी हमारे देश में प्रवेश कर गईं, फिर भी हमारा समाज इन्हीं तीन बातों के आधार पर एक समाज बनकर रहा। इसलिए हम जब एकता की चर्चा करते हैं, तब हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह एकता किसी लेन-देन के कारण नहीं बनेगी। जबरदस्ती बनाई तो बार बार बिगड़ेगी। आज के वातावरण में समाज में कलह फैलाने के चले हुए प्रयासों को देखकर बहुत लोग स्वाभाविक रूप से चिंतित हैं, मिलते रहते हैं। अपने आपको हिंदू कहलाने वाले सज्जन भी मिलते हैं, जिनको उनकी पूजा के कारण मुसलमान, ईसाई कहा जाता है, ऐसे भी लोग मिलते हैं। उनकी मान्यता है कि फितना, फसाद व कितान को छोड़कर सुलह, सलामती व अमन पर चलना ही श्रेष्ठता है। इन चर्चाओं में ध्यान रखने की पहली बात यही है कि, संयोग से एक भूमि में एकत्र आए विभिन्न समुदायों के एक होने की बात नहीं है। हम समान पूर्वजों के वंशज, एक मातृभूमि की संताने, एक संस्कृति के विरासतदार, परस्पर एकता को भूल गए। हमारे उस मूल एकत्व को समझकर उसी के आधार पर हमें फिर जुड़ जाना है। आने वाले वर्ष 2024 के प्रारंभिक दिनों में लोकसभा के चुनाव हैं । चुनावी दांव पेचों में भावनाओं को भड़काकर मतों की फसल काटने के प्रयास अपेक्षित नहीं हैं, परंतु होते रहते हैं। समाज को विभाजित करनेवाली इन बातों से हम बचें। मतदान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। उसका अवश्य पालन करें। देश की एकात्मता, अखंडता, अस्मिता तथा विकास के मुद्दों पर विचार करते हुए अपना मत दें । वर्ष 2025 से 2026 का वर्ष संघ के 100 वर्ष पूरे होने के बाद का वर्ष है। ऊपर निर्दिष्ट सभी बातों में संघ के स्वयंसेवक तब अपना कदम बढ़ायेंगे, इसकी सिद्धता कर रहे हैं। समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो। मंदिर, पानी, श्मशान में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह समाप्त हो। परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे। सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आंगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो। स्वदेशी के आचरण से स्व-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़े। फिजूलखर्ची बंद हो। देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए। इसीलिए स्वदेशी का भी आचरण घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। कानून व्यवस्था व नागरिकता के नियमों का पालन हो तथा समाज में परस्पर सद्भाव और सहयोग की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त हो। इन पांचों आचरणात्मक बातों का होना सभी चाहते हैं। परंतु छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ कर उनके अभ्यास के द्वारा इस आचरण को अपने स्वभाव में लाने का सतत प्रयास आवश्यक है। संघ के स्वयंसेवक आनेवाले दिनों में समाज के अभावग्रस्त बंधुओं की सेवा करने के साथ-साथ, इन पांच प्रकार की सामाजिक पहलों का आचरण स्वयं करते हुए समाज को भी उसमें सहभागी व सहयोगी बनाने का प्रयास करेंगे। समाजहित में शासन, प्रशासन तथा समाज की सज्जनशक्ति जो कुछ कर रही है, अथवा करना चाहेगी, उसमें संघ के स्वयंसेवकों का योगदान नित्यानुसार चलता रहेगा ही। आज संघ के स्वयंसेवक समाज के स्तर पर निरंतर सबकी सेवा व राहतकार्य करते हुए समाज की सज्जनशक्ति का शांति के लिए आह्वान कर रहे हैं। सबको अपना मानकर, सब प्रकार की कीमत देते हुए समझाकर, सुरक्षित, व्यवस्थित, सद्भाव से परिपूर्ण और शान्त रखने के लिए ही संघ का प्रयास रहता है। इस भयंकर व उद्विग्न करनेवाली परिस्थितियों के बीच भी ठंडे दिमाग से हमारे कार्यकर्ताओं द्वारा जिस प्रकार सबकी संभाल के प्रयास किए जा रहे हैं उन स्वयंसेवकों पर हमें गर्व है। प्रहलाद सबनानी 

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धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार राजनीति लेख

भारतीय सनातन संस्कृति का विस्तार भारतीय समाज ही कर सकता है

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प्राचीनकाल में भारत का इतिहास गौरवशाली रहा है। इस खंडकाल में समस्त प्रकार की गतिविधियां चाहे वह सामाजिक क्षेत्र में हों, सांस्कृतिक क्षेत्र में हों, आर्थिक क्षेत्र में हों अथवा किसी भी अन्य क्षेत्र में हों वह भारतीय सनातन संस्कृति का पालन करते हुए ही सम्पन्न की जाती थीं। समाज में किसी भी प्रकार के कर्म को धर्म से जोड़कर ही किया जाता था एवं अर्थ को भी धर्म से जोड़ दिया गया था। कर्म, अर्थ एवं धर्म मिलकर मानव को मोक्ष प्राप्त करने की ओर प्रेरित करते थे। सामान्यतः राष्ट्र के नागरिकों में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं के बराबर ही रहती थी और समस्त नागरिक आपस में मिलकर हंसी खुशी अपना जीवन यापन करते थे।  भारत के वेद एवं पुराणों में विभिन्न प्रकार की समस्याओं को हल करने के उपाय बताए गए हैं। विभिन्न युगों में अलग अलग शक्तियों को प्रधानता दी गई है, इन शक्तियों के माध्यम से ही विभिन्न समस्याओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है।  “त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च, ज्ञान शक्ति: कृत्ते-युगे। द्वापरे युद्ध शक्तिश्च, संघेशक्ति कलौयुगे।। सतयुग में ज्ञान शक्ति, त्रेता युग में मंत्र शक्ति, द्वापर युग में युद्ध शक्ति एवं कलयुग में संगठन शक्ति को प्रधानता दी गई है। परंतु, त्रेता युग में भी भगवान राम ने वानर सेना सहित समाज को संगठित करते हुए असुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने में सफलता हासिल की थी एवं रावण का संहार किया था। द्वापर युग में भी महाभारत का युद्ध पांडवों ने संगठन भाव के कारण एक उद्देश्य को सामने रखकर जीता था। जबकि, कौरवों की सेना के महारथी अपने व्यक्तिगत संकल्पों, प्रतिज्ञा एवं प्रतिशोधों के लिए लड़े और युद्ध हारे थे।  इसी प्रकार कलयुग में कालांतर में जब छोटे छोटे राज्य स्थापित होने लगे तब इन राज्यों के बीच आपस में संगठन का स्पष्ट तौर पर अभाव दृष्टिगोचर होने लगा और वे आपस में ही लड़ने लगे थे। संगठन का अभाव एवं सनातन संस्कृति के छूटने के कारण ही आक्रांता के रूप में मुगलों एवं अंग्रेजों को भारत के छोटे छोटे राज्यों पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में कोई बहुत अधिक कठिनाई नहीं हुई थी।  कलियुग में हिंदू समाज में संगठन शक्ति के जागरण के उद्देश्य से वर्ष 1925 में विजय दशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार ने की थी। जो आज अपने 98 वर्ष पूर्ण कर एक विशाल वट वृक्ष के रूप में हमारे सामने खड़ा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज पूरे विश्व में सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। संघ का मुख्य कार्य स्वयंसेवकों में राष्ट्र भाव जागृत करना एवं समाज में सामाजिक समरसता स्थापित करना है। संघ द्वारा शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों का शारीरिक, बौद्धिक एवं व्यक्तित्व विकास किया जाता है। इन शाखाओं में स्वयंसेवक तैयार किए जाते हैं जो समाज में जाकर सामाजिक समरसता का भाव विकसित करने का प्रयास करते हैं एवं देश के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करते हैं। इस प्रकार भारतीय समाज को संगठित करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा शाखाओं एवं स्वयंसेवकों के माध्यम से किया जा रहा है। भारतीय समाज की एकजुटता के कारण ही आज भारत में रामसेतु का विध्वंस रुक सका है, जम्मू एवं कश्मीर में लागू धारा 370 एवं धारा 35ए हटाई जा सकी है, 500 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद श्री राम का भव्य मंदिर अयोध्या में निर्मित हो रहा है, जिसका उद्घाटन जनवरी 2024 में पूज्य संत महात्माओं के साथ भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद मोदी जी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न होना प्रस्तावित है। जी-20 देशों के समूह की अध्यक्षता आज भारत के पास है और भारत इस समूह के समस्त देशों को एकजुट बनाए रखने में सफल रहा है। भारत ने चन्द्रयान को चन्द्रमा के दक्षिणी भाग पर सफलता पूर्वक उतारने में सफलता हासिल की है एवं चन्द्रमा की सतह पर “शिवशक्ति” को अंकित करने में भी सफलता पाई है। भारत आज अपनी सीमाओं की मजबूती के साथ सुरक्षा करने में सफल हो रहा है। खेलों के क्षेत्र में भी नित नए झंडे गाड़े जा रहे हैं, हाल ही में चीन में सम्पन्न हुई एशियाई खेल प्रतियोगिताओं में भारत ने 106 पदकों को हासिल कर एक रिकार्ड बनाया है।  इस प्रकार वर्तमान में वैश्विक स्तर पर भारत एक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। विभिन्न क्षेत्रों में भारत आज पूरे विश्व को राह दिखा रहा है। एक ओर तो रूस-यूक्रेन युद्ध एवं इजराईल-हमास युद्ध अपने चरम पर है एवं विश्व के विकसित देश कई प्रकार की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं एवं इन देशों में सामाजिक तानाबाना छिन्न भिन्न हो चुका है वहीं दूसरी ओर भारत आर्थिक क्षेत्र में चंहुमुखी प्रगति कर रहा है एवं आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गई है। भारत की यह प्रगति कई देशों को नहीं सुहा रही हैं एवं कुछ देश भारत के नागरिकों में आपसी फूट पैदा करने एवं भारत की कुटुंब व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि न केवल भारत की आर्थिक प्रगति विपरीत रूप से प्रभावित हो सके बल्कि भारत का सामाजिक ताना बाना भी छिन्न भिन्न किया जा सके। यह देश भारतीय सनातन संस्कृति, हिंदुत्व, भारत एवं संघ पर प्रहार कर रहे हैं। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों पर आज महत्ती जिम्मेदारी आ जाती है कि कुछ देशों के भारतीय समाज को बांटने के कुत्सित प्रयासों को विफल करें। भारतीय समाज आपस में सामाजिक समरसता का भाव विकसित करें एवं कोई भी कार्य करने के पहिले राष्ट्र हित को सर्वोपरि रखें। आज की विपरीत परिस्थितियों के बीच भारतीय समाज को आपस में एकता बनाए रखना भी अति आवश्यक है। सामाजिक बराईयों को दूर करने के प्रयास भी आज हम सभी को मिलकर करने चाहिए। भारतीय समाज को आज की विपरीत परिस्थितियों के बीच जागृत होना ही होगा। लगभग 10 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने कहा था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नए मतदाताओं का शत प्रतिशत पंजीयन होना चाहिए, शत प्रतिशत मतदान होना चाहिए एवं समाज द्वारा राष्ट्रहित के मुद्दों पर मतदान करना चाहिए। आज इन समस्त बातों का ध्यान भारतीय समाज को रखना होगा।  श्री यदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक “शिवाजी एंड हिज टाइम” में उल्लेख किया है कि प्रयाग में मुगलों ने एक अक्षय वट वृक्ष को काट कर उस पर एक बड़ा तवा इस उद्देश्य से रख दिया था कि अब वृक्ष चूंकि कट चुका है अतः स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। किंतु, कुछ समय पश्चात उस अक्षय वट वृक्ष में फिर से कपोलें फूट आईं, उसी प्रकार से भारतीय समाज की सनातन शक्ति को रोकने का सामर्थ्य दुनिया में किसी का नहीं है। 

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भारत में निर्मित होने लगे हैं रोजगार के करोड़ों अवसर

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भारतीय सनातन संस्कृति के बारे में विवेचन करते हुए, भारत में रचित वेद, पुराण एवं परम्पराओं के अनुसार, राजा का यह कर्तव्य माना गया है कि उसके राज्य में निवास कर रही प्रजा में प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध हो, राजा ऐसी व्यवस्था करे। जब तक भारतीय सनातन संस्कृति का भारत में पालन होता रहा, तब तक लगभग समस्त नागरिकों को रोजगार उपलब्ध होता रहा। प्राचीन भारत में  विशेष रूप से गावों में ही रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध रहते थे एवं शहरों की ओर पलायन भी बहुत कम होता था। बेरोजगारी की समस्या के बारे में तो भारत के प्राचीन शास्त्रों में वर्णन ही नहीं मिलता है। समस्त नागरिकों को रोजगार उपलब्ध रहता था एवं वे अपने परिवार के समस्त सदस्यों का भरण पोषण करने में सक्षम रहते थे एवं परिवार के समस्त सदस्यों के साथ प्रसन्नत्ता एवं उत्साह के साथ रहते थे। जब कि आज की परिस्थितियों के बीच, वैश्विक स्तर पर, बेरोजगारी की समस्या एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर रही है। भारतीय सनातन संस्कृति का पालन करते हुए भारत आज आर्थिक प्रगति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेज गति से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है। वर्ष 2014 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में 10वें स्थान पर थी जो आज 5वें स्थान पर पहुंच गई है एवं भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति को देखते हुए अब उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2027-28 के पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगी एवं यह अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगी। भारत में केंद्र सरकार द्वारा लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि न केवल देश की अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़े बल्कि भारत में युवाओं के लिए अधिक से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हों। इस दृष्टि से भारत में अब अच्छी खबर आई है। भारत में अगस्त 2023 माह में 46.21 करोड़ नागरिकों को रोजगार मिला हुआ था जबकि अगस्त 2022 में 43.02 करोड़ नागरिकों को ही रोजगार प्राप्त था, इस प्रकार एक वर्ष के दौरान 3.19 करोड़ नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा वर्ष 2017 के बाद से प्रतिवर्ष देश में (जुलाई-जून वार्षिक अवधि के बीच) श्रम शक्ति सर्वेक्षण, यह जानने के लिए किया जाता है कि भारत के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी एवं रोजगार की कैसी स्थिति है। हाल ही में जुलाई 2022 से जून 2023 की अवधि के बीच यह सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न हुआ है। इस सम्बंध में जारी किए गए प्रतिवेदन में भारत में रोजगार की स्थिति के बारे में कई अच्छे तथ्य उभरकर सामने आए हैं।  भारत में 15 वर्ष एवं इससे अधिक की आयु वाले नागरिकों के बीच श्रम शक्ति भागीदारी की दर (Labour Force Participation Rate) में लगातार अतुलनीय रूप से सुधार हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम शक्ति भागीदारी की दर वर्ष 2017-18 में 50.7 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 60.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह वर्ष 2017-18 में 47.6 प्रतिशत से बढ़कर 50.4 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार, पुरुषों में यह दर वर्ष 2017-18 में 75.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 78.5 प्रतिशत एवं महिलाओं में यह दर वर्ष 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 37 प्रतिशत हो गई है। इसी प्रकार, भारत में 15 वर्ष एवं अधिक की आयु के नागरिकों के बीच कर्मचारी जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio) में भी अतुलनीय सुधार दृष्टिगोचर है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कर्मचारी जनसंख्या अनुपात वर्ष 2017-18 के 48.1 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 59.4 प्रतिशत हो गया है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 43.9 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 47.7 प्रतिशत हो गया है। पुरुषों के बीच यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 71.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 76 प्रतिशत हो गया है और महिलाओं में यह अनुपात वर्ष 2017-18 के 22 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 35.9 प्रतिशत हो गया है।  जब देश में श्रम शक्ति भागीदारी की दर एवं कर्मचारी जनसंख्या अनुपात में लगातार सुधार दिखाई दे रहा है तो स्वाभाविक रूप से भारत में बेरोजगारी की दर में भी कमी दृष्टिगोचर हो रही है। उक्त सर्वेक्षण के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 में 5.3 प्रतिशत थी जो वर्ष 2022-23 में घटकर 2.4 प्रतिशत रह गई है। वहीं शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 7.7 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 5.4 प्रतिशत पर आ गई है। पुरुषों के बीच बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 6.1 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 3.3 प्रतिशत हो गई है तो वहीं महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 5.6 प्रतिशत से वर्ष 2022-23 में घटकर 2.9 प्रतिशत हो गई है।  भारत में आज भी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में यदि रोजगार के नए अवसर अधिक मात्रा में निर्मित हो रहे हैं तो यह एक बहुत अच्छा सुधार है। इसी प्रकार, भारत में पुरुषों के बीच यदि बेरोजगारी की दर काफी कम हो रही है तो भारतीय महिलाओं को श्रम बाजार में उतरना ही होगा, और ऐसा होता दिखाई भी दे रहा है, अतः यह भी एक उत्तम सुधार है। भारत में महिला शक्ति यदि श्रम बाजार में उतरती है तो भारत में मजदूरी की दरों को भी संतुलित रखा जा सकता है जिससे उत्पादों की लागत में तेज वृद्धि को रोका जा सकेगा और भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लम्बे समत तक प्रतिस्पर्धी बने रह सकेंगे।  प्रहलाद सबनानी

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