राजनीति विधि-कानून राजनीतिक याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रवैया February 23, 2026 / February 23, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी इस देश का विपक्ष जनता की अदालत में मोदी सरकार से नहीं लड़ पा रहा है, इसलिए वो कानून की अदालत में उसे घसीटना चाहता है। अभी तक कई मौकों पर विपक्ष अपनी चाल में कामयाब रहा है लेकिन लगता है कि नए सीजेआई इस चाल को समझ चुके हैं। उन्होंने पिछले […] Read more » Supreme Court takes a tough stand on political petitions राजनीतिक याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
राजनीति सरकार विरोध से देश विरोध तक पहुंच गयी कांग्रेस February 22, 2026 / February 22, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी कहा जाता है कि संकट के समय मन को शांत रखना चाहिए और संकट के गुजरने का इंतजार करना चाहिए। जल्दबाजी और घबराहट में गलत फैसले हो जाते हैं। कांग्रेस का संकटकाल चल रहा है। कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बाहर हुए 12 साल बीत चुके हैं और अभी न जाने […] Read more » Congress has moved from opposing the government to opposing the country. shirtless protest at ai summit कांग्रेस देश विरोध तक पहुंच गयी कांग्रेस
राजनीति मोहन भागवत के बयान पर इतना बवाल क्यों February 20, 2026 / February 20, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी मोहन भागवत के एक बयान पर बवाल मचा हुआ है जबकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसको लेकर इतना बवाल किया जा रहा है । मंगलवार को मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में कई मुद्दों पर अपनी राय रखी थी । उन्होंने कहा कि मुसलमानों की जड़े भी इसी […] Read more » Mohan Bhagwat's statement Why is there so much uproar over Mohan Bhagwat's statement? मोहन भागवत
राजनीति अपनों के निशाने पर राहुल गांधी February 18, 2026 / February 18, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे कांग्रेस के नेताओं का धैर्य जवाब दे रहा है। इसकी वजह यह हो सकती है कि कांग्रेसियों को धीरे-धीरे अहसास होने लगा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आने वाली नहीं है। पूरा देश कांग्रेस के पतन को देख रहा है. ऐसा कैसे […] Read more » राहुल गांधी
विश्ववार्ता बंगलादेश से रिश्ते सुधरने की जल्दी उम्मीद नहीं February 17, 2026 / February 17, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी जब से बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार बनने की खबर आई है, भारत में बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीद कुछ ज्यादा ही पैदा हो गई है। इसमें कोई शक नहीं है कि बांग्लादेश की नई सरकार यूनुस सरकार से बेहतर साबित होने वाली है क्योंकि वो बाहरी शक्तियों के इशारे […] Read more » There is no hope of any improvement in relations with Bangladesh soon. बंगलादेश से रिश्ते बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार
राजनीति संसदीय हंगामा-सबके लिए आत्मचिंतन का विषय February 16, 2026 / February 16, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी 4 और 5 फरवरी को संसद में जो कुछ हुआ है, वो बहुत शर्मनाक है । ऐसा लगता है कि लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार के बाद विपक्ष बौखला गया है, इसलिए संसद में अराजकता पैदा करके सरकार को परेशान करना चाहता है । संसदीय लोकतंत्र में संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी मानी जाती है, लेकिन विपक्ष के सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। विपक्ष पूरी जिम्मेदारी सरकार पर डालकर, संसद में अराजकता फैला रहा है। विपक्ष के हंगामे के कारण प्रधानमंत्री मोदी दूसरे दिन भी राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब नहीं दे सके, जिसके कारण यह प्रस्ताव उनके जवाब के बिना ही पास कर दिया गया । 2004 के बाद भारत के संसदीय इतिहास में यह दूसरी बार हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री को संसद में बोलने ही नहीं दिया गया । यह संसदीय परंपरा है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के जवाब के बाद ही यह प्रस्ताव पारित किया जाता है । परंपरा का टूटना संसदीय गरिमा का गिरना है और इसके बाद सत्तापक्ष और विपक्ष में कटुता पैदा होने वाली है । इस घटना के बाद विपक्ष पर इसका कोई असर होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है । राज्यसभा में जब प्रधानमंत्री मोदी धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब दे रहे थे, तो विपक्षी दलों द्वारा हंगामा किया गया और इसके बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री के भाषण का बहिष्कार करते हुए संसद छोड़ दी । सवाल यह है कि इससे विपक्ष को क्या हासिल हुआ । जो बात प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहनी थी, वो बात उन्होंने राज्यसभा में कह दी । प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लोकसभा में जवाब न देने पर विपक्ष ने कहा कि मोदी डरकर भाग गए हैं, लेकिन राज्यसभा में उनके भाषण के दौरान विपक्ष ही सदन छोड़कर भाग गया । विपक्ष को सदन में बैठकर प्रधानमंत्री के जवाब को सुनना चाहिए । इसके बाद ही विपक्ष का हक बनता है कि वो कहे कि मोदी ने उनके सवालों का जवाब नहीं दिया । इस बार सत्र की शुरूआत से ही संसद में जैसे दृश्य देखने को मिले हैं, उससे संसद की गरिमा के गिरते स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है । संसदीय इतिहास में पहली बार है कि लोकसभा स्पीकर द्वारा संसद में प्रधानमंत्री पर विपक्षी सांसदों के हमले की आशंका जताई गई है । स्पीकर ओम बिरला का यह कहना कि उन्हें सूचना मिली थी कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती है, बहुत गंभीर बात है। विपक्ष की महिलाओं का प्रधानमंत्री मोदी की सीट को घेर लेना बता रहा है कि लोकसभा अध्यक्ष की आशंका पूरी तरह गलत नहीं थी। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उनकी बात से पीएम मोदी सहमत हो गए और संसद में नहीं आये। सवाल यह है कि ये प्रत्याशित घटना क्या हो सकती थी और इससे भारतीय संसद पर कितना बड़ा कलंक लग सकता था। जो हो नहीं हो पाया, लेकिन करने की कोशिश की गई, उसे ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। अगर किसी दुर्घटना को होने से रोक दिया जाए तो भी अपराधी को ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। लोकसभा में सबसे बड़ा नेता स्पीकर होता है और लोकसभा का पूरा प्रशासन उसके अधीन आता है । सवाल यह है कि स्पीकर महोदय ने प्रधानमंत्री को संसद में आने से क्यों रोक दिया । क्या वो इस हमले को रोकने का इंतजाम नहीं कर सकते थे । इस काम के लिए उनके पास कर्मचारी हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री की सुरक्षा में तैनात किया जा सकता था । दूसरी बात यह है कि जिन सांसदों द्वारा पीएम मोदी पर हमले की आशंका थी, उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की गई । कुछ सांसदों के हमले की आशंका के कारण प्रधानमंत्री का सदन में नहीं आना, बेहर गंभीर घटना है । पीएम मोदी को रोककर लोकसभा अध्यक्ष ने अपनी कमजोरी जाहिर की है, उन्हें पीएम को रोकने की जगह, आक्रमणकारी सांसदों का इंतजाम करना चाहिए था । संसद में इतनी बड़ी साजिश करने वाले सांसद खुलेआम घूम रहे हैं, ये लोकतंत्र और संविधान के लिए सही नहीं है । प्रधानमंत्री पर हमले के लिए महिला सांसदों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझ कर किया गया है । विशेष रूप से दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश बताती है कि साजिश बहुत गहरी थी । यह साजिश देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के खिलाफ है । ऐसा लगता है कि विपक्ष इस देश की संवैधानिक व्यवस्था से तंग आ गया है, क्योंकि वो अब अपने लिए बेहद सीमित अवसर देख रहा है । लगातार हार के बाद कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में आने की उम्मीद खो चुकी है । राहुल गांधी के नेतृत्व में तो वो कभी पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता में आ भी नहीं सकती, इसलिए बौखलाहट में वो कुछ भी करने को तैयार दिखाई दे रही है । ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी पर हमले के बाद भाजपा सांसदों की प्रतिक्रिया को देखते हुए साजिश रची गई है । साजिशकर्ता जानते थे कि अगर विपक्षी सांसदों ने मोदी पर हमला किया तो भाजपा सांसद चुपचाप तमाशा नहीं देखेंगे, बल्कि बिना देर किए जवाबी हमला कर देंगे । इस हमले के बाद दोनों पक्षों के सांसदों में भंयकर हाथापाई हो सकती थी । सदन में भाजपा सांसदों की संख्या और प्रधानमंत्री की सीट से नजदीकी होने के कारण जवाबी हमला बहुत जल्दी और बड़ा हो सकता था । साजिशकर्ताओं द्वारा इस हमले के लिए दलित और पिछड़े वर्ग की महिला सांसदों का इस्तेमाल करने के पीछे की मंशा विक्टिम कार्ड खेलना हो सकता है । अगर महिला सांसदों को चोट लगती तो विपक्ष यह विमर्श चलाता कि भाजपा दलित और पिछड़ा विरोधी है, जो सांसदों तक को पीट देती है, आम लोगों का क्या होगा । कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री महिलाओं से डर गए और संसद में नहीं आए । उनके पास जेड प्लस सुरक्षा है, लेकिन वो महिला सांसदों से डर गए । ऐसा लगता है कि विपक्ष इस घटना की गंभीरता को समझ नहीं रहा है, लेकिन परेशानी यह है कि एनडीए सरकार भी इसे हल्के में ले रही है । यह बहुत गंभीर घटना है, लेकिन मीडिया ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया है । जिस साजिश के कारण प्रधानमंत्री मोदी सदन में नहीं आए, उस साजिश की गंभीरता कम कैसे हो सकती है । स्पीकर साजिश को जानते हुए भी साजिश को रोक नहीं पाए, बल्कि प्रधानमंत्री को ही रोक दिया, ये प्रशासन की नाकामी है । प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में उनकी सीट को घेरने वाली महिला सांसदों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई, जबकि वो साजिश का अहम हिस्सा थीं । सवाल यह है कि क्या इन्हीं महिला सांसदों का इस्तेमाल मोदी पर हमले के लिए किया जाना था । संसद में दोनों पक्षों के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था है, अपनी जगह से उठकर सत्ताधारी दल के हिस्से में पहुंचकर प्रधानमंत्री की सीट को घेरना क्या सामान्य घटना है । सवाल यह है कि अगर प्रधानमंत्री के आने के बाद यह घेराव किया जाता तो क्या होता । दूसरा सवाल यह है कि उनकी अनुपस्थिति में सीट घेरने की क्या जरूरत थी, ऐसा लगता है कि यह एक रिहर्सल थी । प्रियंका गांधी ने कहा कि अगर महिला सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गई तो क्या हो गया, इसमें डरने वाली क्या बात है । इसका मतलब है कि वो साजिश को जानती थी । इसके अलावा कौन-कौन जानता था कि ऐसी घटना होने वाली है। ये देश विधानसभाओं में ऐसे दृश्य देख चुका है, जिसमें विधायकों ने एक दूसरे पर हमले किये थे। इन घटनाओं में विधायकों की आपसी हाथापाई देखी गई है, इसके अलावा एक दूसरे पर कुर्सी, माइक, जूता-चप्पल और दूसरे सामान फेंकने की भी घटनाएं सामने आई हैं। हमने लहूलुहान विधायकों की तस्वीरें देखी हैं । प्रधानमंत्री पर विपक्षी सांसदों के हमले के बाद संसद से भी ऐसी शर्मनाक तस्वीरें सामने आ सकती थी। दुनिया की तीसरी आर्थिक और सैन्य शक्ति बनने की ओर अग्रसर लोकतांत्रिक भारत की ऐसी तस्वीरों की पूरी दुनिया में चर्चा होती । लोकतांत्रिक व्यवस्था का बड़ा सच यह है कि कोई भी दल हमेशा सत्ता में नहीं रहता, देर-सवेर विपक्ष को भी सरकार में आने का मौका मिल जाता है। जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई तो भाजपा भी एक दिन सत्ता से बाहर हो जाएगी। पीएम ने सदन में न आकर संभावित झगड़े से सदन को बचा लिया और देश शर्मिंदा होने से बच गया । अगर पीएम सदन में सुरक्षित नहीं है तो बेहद गंभीर बात है । सदन की सुरक्षा व्यवस्था स्पीकर के अधीन है, वो ही इसके लिए जिम्मेदार हैं । सांसद बेहद सम्मानित पद होता है, जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी सांसद को दलगत हित के साथ-साथ देशहित भी देखना चाहिए। संसद में हंगामा करना ही सांसदों का काम नहीं है, बल्कि अपने लोगों की समस्याओं को देश के सामने रखना है, ताकि सरकार उनका समाधान कर सके । संसद को युद्ध का मैदान नहीं बनाया जाना चाहिए । सांसद एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। आज जिस घटना को रोक दिया गया है, उसके दोबारा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि अगली बार ऐसी साजिश नाकाम न की जा सके और ये महान देश पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा हो जाये। इस घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि साजिश दोबारा हो सकती है। इस साजिश को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इस घटना में शामिल सांसदों के खिलाफ कार्यवाही की जाए। पिछले कुछ सालों से हमारी संसद हंगामा करने की जगह बन गई है, जिसे सिर्फ स्थगित करने की खबर आती है। अब संसद में बिना चर्चा के कानून बन रहे हैं, क्योंकि सांसदों को चर्चा करने की जगह हंगामा करने में मजा आता है। विपक्ष को यह अहसास ही नहीं है कि संसद का चलना सरकार से ज्यादा उसके लिए जरूरी है। यही वो जगह है, जहां सरकार उसको जवाब देने के लिए मजबूर है। वर्तमान राजनीति की हकीकत यह है कि विपक्ष मीडिया में सरकार से सवाल करता है और सरकार मीडिया में ही उसको जवाब दे देती है। दोनों पक्षों को आत्मचिंतन की जरूरत है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा, क्योंकि ये देश के लिए अच्छा नहीं है। संविधान और लोकतंत्र का शोर मचाने की जगह दिल से उसे मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए । राजेश कुमार पासी Read more » संसदीय हंगामा
राजनीति ट्रेड डील-जीत को हार बताने की कोशिश February 5, 2026 / February 5, 2026 | Leave a Comment भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता Read more » भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता
विश्ववार्ता अमेरिका की नई रक्षा नीति हथियारों की होड़ बढ़ाएगी January 27, 2026 / January 27, 2026 | Leave a Comment डोनाल्ड ट्रंप जब से अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, वो लगातार अमेरिकी नीतियों में बड़े बदलाव करते जा रहे हैं। ये बदलाव इतने बड़े हैं कि उनके जाने Read more » अमेरिका की नई रक्षा नीति
आर्थिकी मनरेगा में सुधार का विरोध अनावश्यक है January 23, 2026 / January 23, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी मोदी सरकार ने जब से मनरेगा का नाम बदलकर जी रामजी किया है, तब से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विरोध में कांग्रेस ने 45 दिन का विरोध आंदोलन शुरू किया था जो कि अभी भी चल रहा है। तेलंगाना, पंजाब और कर्नाटक की विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पास किया गया है। केरल, बंगाल और तमिलनाडु में भी इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। विपक्षी दलों का सबसे पहला विरोध तो मनरेगा का नाम बदलने को लेकर ही है। उनका कहना है कि इस योजना से गाँधीजी का नाम क्यों हटाया गया है। इसके अलावा योजना के स्वरूप में बदलाव का भी विरोध किया जा रहा है जिसमें मोदी सरकार ने योजना को मांग आधारित से बदलकर आपूर्ति आधारित बना दिया है। अब इस योजना पर केंद्र सरकार का नियंत्रण ज्यादा हो गया है. इसके अलावा राज्यों पर भी वित्तीय बोझ डाला गया है। विपक्षी दल इसे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं और उनका कहना है कि सरकार ने राज्यों पर वित्तीय बोझ लाद दिया है। कुछ राज्यों द्वारा इस योजना को अदालत में भी चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि उसने रोजगार गारंटी को 100 से 125 दिन कर दिया है। पहले इस योजना का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था, लेकिन अब राज्यों को भी 10-40 फीसदी बोझ सहन करना होगा। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वो राज्यों की जवाबदेही तय करना चाहती है। केंद्र द्वारा सारा पैसा देने के कारण राज्य योजना पर ध्यान नहीं देते थे। सरकार ने बुवाई/कटाई के 60 दिनों के दौरान रोजगार पर रोक लगा दी है ताकि खेती के लिए मजदूर कम न पड़े। अब इस योजना में हर ग्रामीण परिवार को 125 दिन की वेतन आधारित गारंटी दी गयी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना को समग्र ग्रामीण विकास के साथ जोड़ा गया है। अब ये योजना सिर्फ पैसा बांटने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इससे ग्रामीण इलाकों के विकास कार्यों को जोड़ा गया है। इस योजना के बारे में यह आम धारणा है कि इस योजना में सारे काम कागजों में किए जाते हैं, केंद्र सरकार इस धारणा को तोड़ना चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि इस योजना के अंतर्गत किये गए कार्य धरातल पर दिखने चाहिए। सच तो यह है कि कागजों में काम होने की धारणा इसलिए बनी है क्योंकि इस योजना में किये गए काम धरातल पर दिखाई नहीं देते हैं । जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसकी हर योजना और कार्यो का विरोध करना विपक्षी दलों की आदत हो गई है। अगर मोदी सरकार ने सिर्फ योजना का नाम बदला होता तो कांग्रेस का विरोध जायज ठहराया जा सकता था लेकिन सरकार ने इस योजना में बड़े बदलाव किए हैं । ऐसा लगता है कि सरकार ने जानबूझकर कर योजना के नाम में बदलाव किया है, ताकि योजना की पहचान उसके साथ जुड़ जाए। कांग्रेस यह तो देख रही है कि केंद्र सरकार ने योजना से गांधी जी का नाम हटा दिया है लेकिन वो यह नहीं देख पा रही है कि अब योजना के साथ भगवान राम का नाम जोड़ दिया गया है। सच तो यह है कि भगवान राम ग्रामीण भारत के रग-रग में बसे हुए हैं, इसलिए मोदी सरकार ने इस योजना में राम का नाम जोड़ा है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को बताना चाहिए कि मोदी सरकार ने जो बदलाव किए हैं, क्या वो नहीं किये जाने चाहिए थे । ये योजना यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई थी, क्या आज कांग्रेस इस योजना में हुए भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी ले सकती है। क्या कांग्रेस बता सकती है कि हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद इस योजना में किये गए विकास कार्य धरातल पर क्यों दिखाई नहीं देते। यूपीए सरकार के दौरान इस योजना के कार्यान्वयन में इतनी खामियां थी कि इसमें सुधार जरूरी हो गए थे। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस योजना में बड़े बदलाव किए थे, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण जनता के पैसे की बर्बादी हो रही थी। इस योजना के बारे में कहा जाता था कि पहले गड्ढे किये जाते हैं और फिर उन्हें भरा जाता है। कुछ समय पहले 55 जिलों में की जांच में 300 करोड़ के घोटाले इस योजना में सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि इस योजना का पैसा अनावश्यक कार्यो पर खर्च किया जा रहा था। ग्रामीण विकास मंत्रालय का कहना है कि इस योजना का संचालन ही ऐसा है कि इसमें भ्रष्टाचार होता है। यही कारण है कि इस योजना में किये जाने वाले काम किसी को दिखाई नहीं देते। इस योजना के अंतर्गत किये जाने वाले कामों के निरीक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण पैसों की बंदरबांट होती है। मोदी सरकार का तो कहना है कि इस योजना में सुधार बहुत पहले किया जाना चाहिए था। इससे सवाल तो मोदी सरकार पर भी उठता है कि उसने इस सुधार के लिए इतना वक्त क्यों लिया । कांग्रेस को बताना चाहिए कि उसने इस योजना में निरीक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की थी जिसके कारण जनता के लाखों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद किसी की कोई जवाबदेही नहीं है। ये योजना गरीबों के साथ जुड़ी हुई है, क्योंकि इससे उन्हें रोजगार दिया जाता है जिससे उनका घर चलता है। इस योजना का विरोध करने वालों को गरीब विरोधी करार दिया जाता है, शायद इसलिए इसमें सुधार करने में इतनी देर लगाई गई है। कांग्रेस भी यही विमर्श चला रही है कि मोदी सरकार गरीब विरोधी है, इसलिए योजना में बदलाव किया गया है। इस योजना में फर्जीवाड़े की एक खबर सामने आई है कि इस योजना में पंजीकृत पांच लाख मजदूरों की उम्र 80 साल से ज्यादा थी । मनरेगा में इन श्रमिकों से कठिन परिश्रम वाले काम कराए गए थे, जिसमें गड्ढे खोदना, तालाबों, पोखरों और कच्ची सड़कों का निर्माण करना शामिल हैं। 80 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों के लिए फावड़ा उठाकर ये काम करना असम्भव है । इससे साबित होता है कि इन श्रमिकों के नाम पर सरकारी पैसे की लूट की गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि इनमें से कई लोगों की कार्य क्षमता खत्म हो चुकी थी और कुछ लोगों की तो मृत्यु भी हो चुकी है। देशभर में मनरेगा योजना के अंतर्गत 6.5 करोड़ लोग पंजीकृत है जिसमें से एक करोड़ लोगों की उम्र 61 साल से ज्यादा है। इसका मतलब है कि लगभग 15 प्रतिशत लोग इस लायक नहीं हैं कि उनसे कठिन परिश्रम का काम कराया जा सके । आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, गोआ, पुडुचेरी, लद्धाख,मणिपुर जैसे राज्यों में 61 से 80 साल वाले श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है। जहां तक 80 साल से ज्यादा उम्र वाले श्रमिकों की बात है तो इसमें आंध्रप्रदेश में 1,22,902, तेलंगाना में 1,22,121, तमिलनाडु में 58,976 और राजस्थान में 36,119 श्रमिक पंजीकृत हैं। वैसे इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिये क्योंकि जब इस योजना में मरे हुए लोग काम कर सकते हैं तो 80 साल वाले क्यों नहीं कर सकते। ये हालत तब है, जब मोदी सरकार ने भुगतान को बैंक खातों और आधार से जोड़ दिया है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, जब सारा भुगतान नकद में किया जा रहा था, तब इस योजना की क्या हालत होगी । सच तो यह है कि इस योजना में काम करने के लिए युवा अपनी बारी का इंतजार करते थे तो योजना का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के नाम पर हजम कर लिया जाता था। गरीबों के नाम पर देश के पैसे की बर्बादी का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। देखा जाए तो कांग्रेस का दूसरा नाम ही भ्रष्टाचार है, जिसकी हर योजना देश का पैसा लूटने का साधन थी । इस योजना में जबरदस्त लूट मचाई गयी है । कांग्रेस को योजना में बदलाव का विरोध करने की जगह ये बताना चाहिए कि इस लूट में उसकी जेब में कितना पैसा गया है । जब योजना का कार्यान्यवन करने की क्षमता कांग्रेस सरकार के पास नहीं थी तो उसने ऐसी योजना लागू ही क्यों की थी। क्या यह माना जाए कि ये योजना सरकारी धन को लूटने के लिए ही लायी गयी थी। मोदी सरकार ने योजना का नाम बदलने के साथ-साथ जो बदलाव किए हैं, वो बहुत जरूरी हैं। हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बाद जमीन पर कोई काम न दिखना ही भ्रष्टाचार का सबूत है। जनता ने देश चलाने की जिम्मेदारी मोदी सरकार को दी हुई है और ये सरकार पिछले 11 सालों से लगातार काम कर रही है। 11 सालों के शासन के बावजूद मोदी की लोकप्रियता घटने की जगह बढ़ रही है, इसका मतलब है कि जनता मोदी पर विश्वास करती है और उनके काम से खुश है। जनता यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामियों को अभी तक नहीं भूली है, इसलिए कांग्रेस केंद्र के साथ-साथ राज्यों की सत्ता से भी बाहर हो गई है। विपक्ष होने के नाते कांग्रेस द्वारा सरकार का विरोध करना सही है लेकिन विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए। मनरेगा में बदलाव के विरोध के कारण इसकी खामियां उजागर हो रही हैं। जहां कांग्रेस इस योजना में बदलाव के विरोध से सरकार को घेरना चाहती है तो दूसरी तरफ इस योजना की खामियां सामने आने से कांग्रेस खुद कठघरे में खड़ी हो गई है। जनता को रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ-साथ सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि पैसे का इस्तेमाल सही तरीके से हो। कांग्रेस को विरोध करने के लिए सही मुद्दे चुनने चाहिए ताकि जनता में उसकी विश्वसनीयता बढ़े । राजेश कुमार पासी Read more » Opposition to reforms in MNREGA is unnecessary
राजनीति महाराष्ट्र चुनाव ने क्या संदेश दिया है January 21, 2026 / January 21, 2026 | Leave a Comment राजेश कुमार पासी 2014 के बाद से मोदी की राजनीति देश के सिर पर चढ़कर बोल रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में जब भाजपा बहुमत से दूर रह गई तो राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि अब मोदी की राजनीति का उतराव शुरू हो गया है । विपक्षी दल भी काफी खुश थे कि अब जनता […] Read more » महाराष्ट्र चुनाव
विश्ववार्ता ट्रम्प की लाठी, ट्रम्प की भैंस January 12, 2026 / January 12, 2026 | Leave a Comment ट्रम्प की लाठी, ट्रम्प की भैंस Read more » ट्रम्प की भैंस ट्रम्प की लाठी
समाज आरक्षण का वास्तविक लक्ष्य क्या है December 27, 2025 / December 27, 2025 | Leave a Comment अगर आप आज के दलित संगठनों की गतिविधियों का आकलन करेंगे तो पाएंगे कि वो किसी एक लक्ष्य को लेकर चल रहे है और हर संगठन किसी विशेष जाति या वर्ग से जुड़ा होता है । सम्पूर्ण समाज की लड़ाई कोई नहीं लड़ रहा है, सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं । आजकल सभी राजनीतिक दल सबसे गरीब आदमी की बात करके अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकते है । Read more » What is the real aim of reservation आरक्षण का वास्तविक लक्ष्य