खान-पान खेत-खलिहान ‘मखाना खेती’ को केंद्र की सौगात April 1, 2025 / April 1, 2025 | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर ‘मखाना उत्पादक’ देशों में हिंदुस्तान का स्थान विश्व में अव्वल पायदान पर पहले से है ही, केंद्र की नई पहल ने अब और पंख लगा दिए हैं। दशकों से वैश्विक पटल पर भारतीय मखानो का समूचे संसार में निर्यात होता आया है। डिमांग में अब और बढ़ोतरी हुई है। ताल, तालाबों व जलाशयों में की जाने वाली मखाने की खेती बिहार में सर्वाधित होती है। ये खेती पूरे बिहार में नहीं, बल्कि मात्र 10 जिलों तक ही सीमित हैं जिनमें दरभंगा, सहरसा, मधुबनी, सुपौल, कटिहार, अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, किशनगंज, और खगड़िया जिले प्रमुख हैं। एक वक्त था जब मात्र दो जिले अररिया और मधुबनी में ही मखाना उगाया जाता था। पर, बढ़ती आमदनी को देखते हुए अब 10 जिलों में मखाने की खेती होने लगी है। मखाने की खेती में बूस्टर डोज के लिए अब केंद्र सरकार ने भी अपने दरवाजे खोले हैं। ‘मखाना बोर्ड’ स्थापित करने का निर्णय हुआ है। बीते महीने आम बजट-2025-26 में केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने बकायदा संसद में ‘मखाना बोर्ड’ स्थापित करने की घोषणा की। मखाने की खेती में वृद्धि हो, बीज-खाद में सरकारी सब्सिडी मिले और फसल में भरपूर आमदनी हो, जैसी तमाम मांगों को लेकर किसान लंबे समय से सरकार से डिमांड कर रहे थे, जिसे अब पूरा किया गया। पहले क्या था? जब मखाने की फसल पककर तैयार होती थी, तो बिचौलिए और ठेकेदार औने-पौने दामों में मखाना खरीदकर विदेशी बाजारों में उच्च भाव में बेचते थे। ऐसी हरकतों पर निगरानी की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं थी? किसानों की मेहनत को बिचौलिए खुलेआम लूटते थे। इन सभी से छुटकारा पाने के लिए केंद्र व राज्य सरकार से किसान ‘मखाना बोर्ड’ बनाने की मांग लंबे समय से कर रहे थे, जिसे केंद्रीय स्तर पर अब जाकर स्वीकार किया गया है। बिहार के अलावा मखाने की खेती हल्की-फुल्की उत्तर प्रदेश, झारखंड व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी की जाती है। पर, वहां किसान ज्यादा रूचि नहीं लेते। विदेशों में भारतीय मखाने की ब़ढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने अपने मौजूदा बजट में मखाना बोर्ड बनाने का निर्णय लिया। भारत में अमूमन एक किलो मखाने की कीमत 25 सौ से लेकर 4 हजार रुपए तक है। जबकि, विदेशों में पहुंचते-पहुंचते मखाना की कीमत दोगुनी हो जाती है। किसानों के अलावा केंद्र सरकार को भी परस्तर फायदा होने लगा है। मखाने का तकरीबन उत्पादन भारत में होती है, यूं कहें इस खेती पर एकछत्र राज्य है। यूरोप के कुछ निचले भागों में मखाना उगाया जाने लगा है। लेकिन वो स्वादिष्ट नहीं होता, स्वाद वाला मखाना सिर्फ भारत का होता है। बिहार में अब करीब 4000 गांवों, जिनमें 870 ग्राम पंचायतों और 70 प्रखंड़ों में मखाने की खेती होने लगी है। मखाने की खेती से करीब 10 हजार से ज्यादा किसान अब जुड़ चुके हैं। मखाने के लिए ‘उत्तम तालाब प्रणाली’ की आवश्यकता होती है, जो सिर्फ बिहार के तराई इलाकों में ही मिलती है। केंद्र सरकार मखाने की खेती पर इसलिए भी ज्यादा फोकस करके चल रही है क्योंकि इससे देश को सालाना 25 से 30 करोड़ की विदेशी मुद्रा जो प्राप्त होने लगी है। विदेशों से मांग में बेहताशा बढ़ोतरी हुई है। चिकित्सा रिपोर्ट के मुताबिक मखाना सेहत के लिए बेहद लाभदायक बताया गया है जिसमें प्रोटीन की 9.7 फीसदी, कार्बोहाइड्रेट 76 फीसदी, नमी 12.8 प्रतिशत, वसा 0.1 फीसदी, खनिज लवण 0.5 फीसदी, फॉस्फोरस 0.9 और लौह के मात्रा 1.4 मिली ग्राम तक होती है। मखाने के इस्तेमाल से हार्ट-अटैक जैसे गंभीर बीमारी से भी बच जा सकता है। मखाने की उन्नती के लिए केंद्र सरकार द्वारा ‘बोर्ड’ बनाने का निर्णय निश्चित रूप से बूस्टर डोज जैसा है इससे मखाना किसानों की आमदनी में न सिर्फ इजाफा होगा, बल्कि उनके उधोग से जुड़े हिताकारों और उपभोक्ता कानून के संरक्षण में उत्साहवर्धक सुखद परिणाम भी देखने को मिलेंगे। मौजूदा आंकड़ों पर नजर डाले तो भारत मखाना की वैश्विक मांग का तकरीबन 90 से 95 फीसदी भरपाई करता है। बजकि, मखाने का उत्पादन सिंगापुर, यूएसए,कनाडा,जर्मनी, मलेशिया और एशियाई देशों में भी होता है। लेकिन डिमांड भारतीय मखानो की सर्वाधिक होती है। अकेला अमेरिका ही भारत से करीब 25 फीसदी मखानस खरीदता है। ग्लोबल स्तरीय स्वास्थ्य की एक सर्वे रिपोर्ट की माने तो अमेरिकी नागरिक सब्जियों में भी मखाने का इस्तेमाल करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मखाना सर्वाधिक अमेरिकी लोग खाते हैं। उन्हें सिर्फ भारतीय मखाने चाहिए होते हैं। यही कारण है कि भारत में पिछले एक दशक में मखाने का उत्पादन 180 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। खेती में लगातार किसान विस्तार कर रहे हैं। निश्चित रूप से ‘मखाना बोर्ड’ बनने के बाद और इस फसल में और पंख लगेंगे। नई पहल के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की टीमें भी लगातार मखाना खेती का दौरा कर रही हैं। मखाना को वह वैज्ञानिक ढंग से कराने लगे हैं। किसानों के लिए मखाने का उत्पादन अब अन्य फसलों के मुकाबले फायदे का सौदा बन गया है। एक एकड़ मखाने की खेती में किसान कम से कम 3 से 4 लाख रूपए प्रत्येक फसल में कमा लेते हैं। मखाने की नर्सरी नवंबर माह में लगती है। बिहार में मखाने की खेती को ‘पानी की फसल’ भी कहते हैं। क्योंकि ये शुरू से अंत तक जलमग्न रहती है। मखाने की करीब 4 महीने बाद, फ़रवरी-मार्च में रोपाई होती है। रोपाई के बाद पौधों में फूल लगने लगते हैं। अक्टूबर-नवंबर में फसल पक जाती है और उसकी कटाई शुरू होती है। मखाने की खेती में तीन से चार फ़ीट पानी हमेशा भरा रहता है। मखाने के फल कांटेदार होते हैं। उन्हें कीटनाशकों से बचाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। अच्छी बात ये है कुदरती आपदाएं जैसे औले पड़ना, बेमौसम बारिश का होना, मखाने की फसल का कुछ नहीं बिगाड़ पाती। कुलमिलाकर मखाना बोर्ड बनने के बाद भारतीय किसानों का ध्यान इस मुनाफे की खेती की ओर तेजी से आर्कर्षित जरूर हुआ है। डॉ. रमेश ठाकुर Read more » Centre's gift to 'Makhana farming' Makhana farming मखाना खेती
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