खान-पान सर्दियों में सेहत की सुरक्षा November 26, 2025 / November 26, 2025 | Leave a Comment सर्दियों की ठंडक मन को सुकून देती है लेकिन यह मौसम शरीर से गर्माहट भी छीन लेता है। वायरल इंफेक्शन, खांसी-जुकाम, स्किन ड्राइनेस और मौसमजनित आलस। Read more » सर्दियों में सेहत की सुरक्षा
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म वर्त-त्यौहार धरती के माथे का तिलक गोवर्धन, जहाँ ईश्वर ने विनम्रता सिखाई October 21, 2025 / October 21, 2025 | Leave a Comment भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथियों के अनुसार मनाए जाने वाले उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के संतुलन को समझाने वाले अध्याय हैं। ऐसा ही एक दिव्य पर्व है – गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है। यह दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, जब सम्पूर्ण व्रज भूमि में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाई देता है। परंतु इस पर्व का रहस्य केवल पूजा या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन के अहंकार, विनम्रता, प्रकृति और भगवान के साथ सामंजस्य का गूढ़ संदेश देता है। अहंकार के गर्व को तोड़ने वाली लीला प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब इंद्र के मन में अपनी देवत्व-शक्ति का अहंकार अत्यधिक बढ़ गया, तो उन्होंने वर्षा के नियंत्रण को अपनी व्यक्तिगत सत्ता समझ लिया। वे भूल गए कि वर्षा भी उसी परम ब्रह्म की व्यवस्था का एक अंश है। उसी समय बालरूप श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को समझाया कि “हम सबका पोषण इंद्र नहीं, प्रकृति करती है – यह गोवर्धन पर्वत, यह गायें, यह वन-भूमि।” इंद्र-यज्ञ को रोककर उन्होंने व्रजवासियों से कहा कि वे इस पर्वत का पूजन करें, क्योंकि यह हमारी अन्नदात्री धरती का प्रतीक है। जब इंद्र को यह बात अहंकारजन्य लगी, तो उन्होंने प्रलयकारी वर्षा से गोकुल को डुबाने का प्रयास किया। परंतु वही बालक श्रीकृष्ण सात दिनों तक अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे, और समस्त व्रज की रक्षा की। यह केवल चमत्कार नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक शिक्षा थी – जिसके भीतर श्रद्धा और करुणा का बल हो, उसके लिए प्रकृति भी सहायक बन जाती है। गोवर्धन की दिव्यता और प्रतीकात्मकता गोवर्धन केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि जीवित चेतना का प्रतीक माना गया है। यह पर्वत धरती, जल, वायु और जीवन के संरक्षण का साक्षात् प्रतीक है। पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को गोवर्धन के रूप में प्रकट कर यह दर्शाया कि ईश्वर प्रकृति में ही बसते हैं। गोवर्धन पूजा का अर्थ केवल पहाड़ की आराधना नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण से ही संभव है। जब हम गोवर्धन की पूजा करते हैं, तो वस्तुतः हम अपने अन्न, जल, पशु, वनस्पति और पर्यावरण का सम्मान करते हैं। अन्नकूट का दार्शनिक अर्थ गोवर्धन पूजा के दिन व्रजवासी तरह-तरह के अन्न और पकवान बनाकर उन्हें पर्वत के प्रतीक रूप में सजाते हैं, इसे अन्नकूट कहा जाता है। यह केवल भोग नहीं, बल्कि “अन्न ही ब्रह्म है” की वेदवाणी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है। इस दिन मनुष्य अपने श्रम और प्रकृति की देन के प्रति आभार प्रकट करता है। अन्नकूट यह सिखाता है कि समृद्धि तब तक अर्थहीन है जब तक उसमें बाँटने की भावना न हो। श्रीकृष्ण ने जब सबके साथ बैठकर अन्न का सेवन किया, तो यह सामाजिक समरसता और समानता का अद्भुत उदाहरण बना। विनम्रता का पाठ इंद्र का अहंकार तब शांत हुआ जब उन्होंने देखा कि जिस ‘बालक’ को वे साधारण मानव समझते थे, वही परमात्मा स्वयं हैं। वे पश्चाताप से भर उठे और श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। इस क्षण में देवता से भी बड़ा दर्शन छिपा है – जिस क्षण अहंकार मिटता है, वहीं सच्चा देवत्व प्रकट होता है। आज जब मानव अपने विज्ञान, सत्ता और संपत्ति के बल पर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा है, तब गोवर्धन लीला यह याद दिलाती है कि अहंकार चाहे देवों में भी क्यों न हो, उसका पतन निश्चित है। गोवर्धन और आधुनिक संदर्भ यदि हम इस पर्व को आधुनिक दृष्टि से देखें, तो यह पर्यावरण चेतना का सबसे प्राचीन संदेश देता है। गोवर्धन पूजा बताती है कि मानव को केवल उपभोग नहीं, बल्कि संरक्षण का भाव रखना चाहिए। आज जब धरती जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अंधाधुंध उपभोग से कराह रही है, तब श्रीकृष्ण की यह लीला हमें पुनः सिखाती है कि — “धरती की पूजा करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।” गोवर्धन पूजा में गायों की सेवा, अन्न का दान, वृक्षों का पूजन और पशुधन की रक्षा, ये सब प्रतीक हैं संतुलित जीवन के। गोप और गोकुल की आत्मा गोवर्धन पूजा केवल धर्म का पालन नहीं, बल्कि प्रेम और समुदाय की अभिव्यक्ति भी है। जिस प्रकार सभी व्रजवासी बच्चे, वृद्ध, नारी, पुरुष एक साथ खड़े होकर संकट का सामना करते हैं, वही समाज की एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। आज जब समाज में विभाजन और स्वार्थ की दीवारें ऊँची हो रही हैं, तब गोवर्धन पर्व यह संदेश देता है कि “एकता और सहयोग से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।” गिरिराज की पावन स्मृति व्रजभूमि में आज भी गोवर्धन पर्वत के परिक्रमा-पथ पर लाखों श्रद्धालु जाते हैं। कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण का चरण पड़ा, वहाँ की मिट्टी भी तिलक बन जाती है। गिरिराज के चरणों में झुकना, वास्तव में स्वयं के अहंकार को मिटाना है। गोवर्धन का प्रत्येक कंकड़ हमें यह सिखाता है कि जो झुकता है, वही ऊँचा उठता है। गोवर्धन का शाश्वत संदेश गोवर्धन पूजा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह हमें सिखाता है – · अहंकार का अंत ही दिव्यता की शुरुआत है। · प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है। · समरसता और सहयोग ही जीवन का आधार हैं। जब-जब मानव अपने सीमित अस्तित्व को ईश्वर से बड़ा समझने लगेगा, तब-तब कोई न कोई श्रीकृष्ण उसे उसकी मर्यादा का स्मरण कराएगा। गोवर्धन पर्व इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर की विनम्रता और प्रेम में निवास करते हैं। और शायद यही कारण है कि यह पर्व दीपोत्सव के अगले दिन आता है, क्योंकि अहंकार के अंधकार के बाद ही भक्ति का प्रकाश फैलता है। उमेश कुमार साहू Read more » गोवर्धन पूजा
धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार दीपावली : सभ्यता की स्मृति में जलता हुआ ज्ञानदीप October 19, 2025 / October 19, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू भारत की संस्कृति में पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे जीवन के सूत्र हैं, जो समय की धारा में मनुष्य की चेतना को प्रकाशित करते हैं। इन्हीं में दीपावली, वह अनोखा पर्व है जो प्रकाश से अधिक ‘अर्थ’ का उत्सव है। यह केवल दीप जलाने का नहीं, ‘अंधकार से संवाद’ करने का […] Read more » दीपावली
धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार वर्त-त्यौहार रूप चतुर्दशी : आंतरिक सुंदरता और सकारात्मक ऊर्जा का महापर्व October 17, 2025 / October 17, 2025 | Leave a Comment दीपोत्सव विशेष : रूप चतुर्दशी 2025 ( दीपावली से एक दिन पहले ) उमेश कुमार साहू दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाला रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का उत्सव भी है। इस दिन को छोटी दिवाली और काली चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ दीपावली धन और समृद्धि का […] Read more » दीपावली से एक दिन पहले दीपोत्सव विशेष : रूप चतुर्दशी 2025
राजनीति सत्याग्रह से स्टार्टअप तक : नई पीढ़ी के लिए गांधी जी का अमर मंत्र September 29, 2025 / September 29, 2025 | Leave a Comment भारत का इतिहास तब तक अधूरा है जब तक उसमें महात्मा गांधी का नाम न लिया जाए। 2 अक्टूबर 1869 को जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि सत्य, अहिंसा और नैतिकता की मूर्त प्रतिमा थे। उन्होंने न केवल भारत को आज़ादी दिलाने का मार्ग दिखाया बल्कि पूरी दुनिया को यह सिखाया कि असली शक्ति हिंसा या हथियारों में नहीं, बल्कि सत्य और नैतिकता में निहित है। Read more » : नई पीढ़ी के लिए गांधी जी का अमर मंत्र सत्याग्रह से स्टार्टअप तक
कला-संस्कृति दशहरा का संदेश : हर हृदय में होना चाहिए रावण-वध September 26, 2025 / September 26, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू भारत की सांस्कृतिक धारा में दशहरा का पर्व केवल परंपरा या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सतत स्मरण है कि असत्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य की विजय निश्चित है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने रावण जैसे महाबली राक्षस का वध कर संसार को यह संदेश दिया कि अधर्म का अंत और धर्म का उत्थान ही जीवन का ध्येय है। आज जबकि हम 21वीं सदी के आधुनिक समाज में जी रहे हैं, रावण के दस सिर हमें बाहरी युद्ध से अधिक आंतरिक और सामाजिक बुराइयों से लड़ने की प्रेरणा देते हैं। आइए देखें कि आज का समाज किन-किन “रावणों” से ग्रसित है। 1. भ्रष्टाचार : आधुनिक रावण का सबसे बड़ा सिर रावण विद्वान था, लेकिन अहंकार ने उसे भ्रष्ट बना दिया। आज हमारा समाज भी इसी रावण से जूझ रहा है। रिश्वतखोरी, सत्ता का दुरुपयोग और लालच ने व्यवस्था को खोखला कर दिया है। भ्रष्टाचार केवल पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि यह जनता के विश्वास का सबसे बड़ा हरण है। 2. महिला असुरक्षा : सीता हरण की पुनरावृत्ति रावण का सबसे बड़ा अपराध था – माता सीता का अपहरण। आज भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़, शोषण, बलात्कार और दहेज हत्या जैसी घटनाएँ रावण के इस सिर की जीवित गवाही देती हैं। जब तक नारी सुरक्षित नहीं, समाज में रामराज्य संभव नहीं। 3. नशाखोरी : युवाओं का भविष्य निगलता रावण दारू, ड्रग्स और तंबाकू जैसे नशे समाज को खोखला कर रहे हैं। युवा जो देश का भविष्य हैं, वही इस दलदल में फँस रहे हैं। यह नशे का रावण घर-परिवार ही नहीं, पूरे समाज का विनाशक है। 4. डिजिटल लत और फर्जी प्रचार : तकनीक का अति प्रयोग आज का युग सूचना का है, लेकिन यही तकनीक जब व्यसनों और अफवाहों का माध्यम बन जाती है, तो यह रावण का नया रूप धारण कर लेती है। फेक न्यूज़, ऑनलाइन ठगी, और सोशल मीडिया पर समय की बर्बादी युवाओं को वास्तविक लक्ष्यों से भटका रही है। 5. जातिवाद और भेदभाव : समाज को बाँटता सिर रावण ने विभाजन की नीति से राम की सेना को कमजोर करने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहा। आज जातिवाद, ऊँच-नीच, रंगभेद और धार्मिक कट्टरता का रावण हमारी एकता को चुनौती देता है। जब तक समाज में यह दीवारें कायम रहेंगी, हम सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते। 6. पर्यावरण विनाश : प्रकृति का अपमान रावण ने स्वार्थ के लिए धरती और आकाश को चुनौती दी। आज मानव अपने स्वार्थ में पेड़ काट रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है और वायु को जहरीला बना रहा है। जलवायु परिवर्तन और आपदाएँ इसी पर्यावरण-विनाश के रावण की मार हैं। 7. अहंकार और लालच : शक्ति का दुरुपयोग रावण स्वयं महान शिवभक्त और विद्वान था, लेकिन उसका अहंकार और लालच ही उसके पतन का कारण बना। आज सत्ता, धन और पद का नशा इंसान को विनम्रता से दूर ले जा रहा है। यही अहंकार रिश्तों को तोड़ता है और समाज में विष घोलता है। 8. हिंसा और आतंकवाद : निर्दोषों का संहार रावण ने निर्दोष ऋषियों और वानरों को सताया। आज दुनिया आतंकवाद और हिंसा के जाल में फँसी है। निर्दोषों की हत्या, युद्ध और सामूहिक हिंसा हमें उस रावण की याद दिलाती है जिसे राम ने परास्त किया था। 9. बेरोजगारी और आर्थिक असमानता : समाज का असंतुलन रावण के राज्य में स्वर्ण लंका थी, लेकिन जनता उसके आतंक से त्रस्त थी। आज भी अमीरी-गरीबी की खाई, बेरोजगारी और अवसरों की असमानता समाज को कमजोर कर रही है। यह आर्थिक असमानता ही कई अपराधों और सामाजिक तनावों की जड़ है। 10. नैतिक पतन : मूल्यहीनता का रावण राम और रावण के युद्ध का मूल अंतर था – मर्यादा और अमर्यादा। राम ने आदर्श और धर्म का पालन किया, जबकि रावण ने नैतिकता को तिलांजलि दी। आज झूठ, छल-कपट, बेईमानी और स्वार्थ समाज में नैतिक पतन का रावण खड़ा कर चुके हैं। दशहरे का सच्चा अर्थ : बाहरी नहीं, भीतरी रावण का दहन जब हम दशहरा मनाते हैं और रावण का पुतला जलाते हैं, तो वह केवल प्रतीक है। असली विजय तब होगी जब हम अपने भीतर और समाज में छिपे इन दस सिरों को पहचानकर उन्हें खत्म करेंगे। त्योहार केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर है। रामराज्य की ओर बढ़ते कदम आज आवश्यकता है कि हम केवल रामलीला देखने तक न रुकें, बल्कि अपने जीवन को भी “रामकथा” बनाएं। सत्य, साहस, करुणा और न्याय को जीवन का हिस्सा बनाकर ही हम रावण के इन दस सिरों का दहन कर सकते हैं। दशहरा हमें यह प्रेरणा देता है कि सत्य की विजय और अधर्म का अंत केवल मंच पर नहीं, बल्कि समाज की हर गली, हर घर और हर हृदय में होना चाहिए। उमेश कुमार साहू Read more » Message of Dussehra Ravana-killing should be in every heart
कला-संस्कृति नवरात्रि का गूढ़ संदेश : आध्यात्मिक जागरण की नौ रातें September 22, 2025 / September 22, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू नवरात्रि केवल उत्सव, व्रत या आराधना का नाम नहीं है. यह जीवन की वह तपोभूमि है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर छिपी दिव्यता से साक्षात्कार करता है। नौ रातों का यह पर्व हमें बाहरी शोरगुल और सांसारिक मोहजाल से उठाकर आत्मा की यात्रा पर ले जाता है, जहाँ शांति, संतुलन और अनंत शक्ति का प्रकाश […] Read more » The Deep Message of Navratri: Nine Nights of Spiritual Awakening नवरात्रि का गूढ़ संदेश
कला-संस्कृति पितर : हमारे जीवन के अदृश्य सहायक September 9, 2025 / September 9, 2025 | Leave a Comment पितृपक्ष 2025 उमेश कुमार साहू भारतीय संस्कृति की सबसे अद्वितीय परंपरा है – पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता। पितृपक्ष वह पावन काल है जब हम अपने पितरों को नमन करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन की दिशा को सार्थक बनाने का संकल्प लेते हैं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर, पारिवारिक एकता और […] Read more » पितर
लेख स्वास्थ्य-योग भीगे मौसम का कड़वा सच : सावधानी नहीं तो संक्रमण तय July 3, 2025 / July 3, 2025 | Leave a Comment जब पहली बारिश की बूंदें ज़मीन से टकराती हैं, तो मिट्टी की सौंधी खुशबू के साथ एक उम्मीद जन्म लेती है। लगता है जैसे तपती गर्मी के बाद प्रकृति ने हमें अपने आँचल में ले लिया हो। पर क्या आपने कभी गौर किया है? इसी आँचल में छिपा है बीमारियों का एक अदृश्य जाल, जो […] Read more » wet weather If you are not careful then infection is certain
बच्चों का पन्ना मनोरंजन बर्बादी के बटन पर उंगलियां : सोशल मीडिया की गहराई में डूबता बचपन May 27, 2025 / May 27, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू “जब एक बच्चा अपने खिलौनों से नहीं, कैमरे के एंगल से खेलना शुरू कर दे, तो समझ लीजिए… बचपन अब मासूम नहीं रहा।” आज की पीढ़ी के बच्चे किताबों में नहीं, की-बोर्ड में खो गए हैं। वे रिश्तों में नहीं, रील्स में जी रहे हैं। और यह सब हो रहा है एक […] Read more » Fingers on the button of destruction: Childhood sinking in the depths of social media बर्बादी के बटन पर उंगलियां सोशल मीडिया की गहराई में डूबता बचपन
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष: एक नई शुरुआत का संकल्प March 25, 2025 / March 25, 2025 | Leave a Comment उमेश कुमार साहू साल की हर शुरुआत अपने भीतर नई आशाओं, नए संकल्पों और नई ऊर्जा को समेटे होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष का आरंभ होता है जिसे हम विक्रम संवत् के रूप में जानते हैं। यह वही समय है जब प्रकृति नवजीवन का उत्सव मनाती है, वसंत अपने यौवन पर […] Read more » Chaitra Navratri and Hindu New Year चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष