शख्सियत समाज

बाबा साहेब : भारतीय संविधान के शिल्पकार, दलितों के मसीहा

प्रदीप कुमार वर्मा

भारतीय संविधान के कुशल शिल्पकार, वंचित एवं दलितों के मसीहा, कुशल राजनीतिक एवं प्रखर समाजशास्त्री, एक समर्पित शिक्षक और श्रमजीवी पत्रकार और तत्कालीन भारतीय समाज के एक महान समाज सुधारक। एक जमाना था जब भारतीय समाज जाति एवं कुरीतियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था और समाज के दलित और वंचित तबके को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। यही नहीं, इस “तबके” की समाज में भागीदारी न के बराबर थी। और तब बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने ऐसे ही पिछड़े समाज में जन्म लिया और तत्कालीन भारतीय समाज को अपने कार्य एवं सिद्धांतों से एक नई दिशा दी। बाबा साहेब द्वारा किए गए संवैधानिक एवं सामाजिक सुधारो की मदद से आज वंचित और दलितों की आवाज न केवल सुनी जाती है,बल्कि इस तबके को समाज की मुख्य धारा में आने का अवसर भी मिला है। आज दलितों के मसीहा कहे जाने वाले उन्ही बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर की जन्म जयंती है।

          भारतीय संविधान निर्माता के तौर पर देश और दुनिया में चर्चित बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। बाबा साहेब अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल तथा उनकी माता का नाम भीम बाई था। डा. अंबेडकर जब लगभग दो वर्ष के थे,जब उनके पिता नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए थे। जब वह केवल छह वर्ष के थे तब उसकी मां का निधन हो गया था। बाबासाहेब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में प्राप्त की। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान वह अस्पृश्यता के अभिशाप से पीड़ित हुए तथा उन्हें अछूत होने का अहसास भी हो गया। डा. अंबेडकर अपनी स्कूली शिक्षा सतारा में ही पूरी की तथा बाद में वह मुंबई चले गए। डा. अंबेडकर ने अपनी स्नातक की पढ़ाई एल्फिंस्टन कॉलेज आज के मुंबई तथा तत्कालीन बॉम्‍बे से की,जिसके लिए उन्हें बड़ौदा के महामहिम सयाजीराव गायकवाड़ से छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी।

         इसी क्रम में वर्ष 1913 में डा. अंबेडकर को उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका जाने वाले एक विद्वान के रूप में चुना गया। यह उनके शैक्षिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1915 और 1916 में  एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए लंदन गए। बाद में उन्होंने बार-एट-लॉ और डीएससी की डिग्री भी प्राप्त की। वर्ष 1924 में इंग्लैंड से वापस लौटने के बाद उन्होंने दलित लोगों के कल्याण के लिए एक एसोसिएशन की शुरुआत की, जिसमें सर चिमनलाल सीतलवाड़ अध्यक्ष और डा. अम्बेडकर चेयरमैन थे। एसोसिएशन का तत्काल उद्देश्य शिक्षा का प्रसार करना, आर्थिक स्थितियों में सुधार करना और दलित वर्गों की शिकायतों का प्रतिनिधित्व करना था। उन्होंने नए सुधार को ध्यान में रखते हुए दलित वर्गों की समस्याओं को संबोधित करने के लिए 03 अप्रैल, 1927 को ‘बहिष्कृत भारत’ समाचारपत्र की भी शुरुआत की।

      इसी दौरान 13 अक्टूबर 1935 को दलित वर्गों का एक प्रांतीय सम्मेलन नासिक जिले में येवला में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में उनकी घोषणा से हिंदुओं को गहरा सदमा लगा। तब उन्होंने कहा, “मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। उनके हजारों अनुयायियों ने उनके इस फैसले का समर्थन किया। वर्ष 1936 में उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी महार सम्मेलन को संबोधित किया और हिंदू धर्म का त्याग करने की वकालत की। इसके बाद 15 अगस्त 1936 को उन्होंने दलित वर्गों के हितों की रक्षा करने के लिए “स्वतंत्र लेबर पार्टी” का गठन किया, जिसमें ज्यादातर श्रमिक वर्ग के लोग शामिल थे। वर्ष 1938 में जब कांग्रेस ने अछूतों के नाम में बदलाव करने वाला एक विधेयक प्रस्तुत किया। तब डा. अंबेडकर ने इसकी आलोचना की। उनका दृष्टिकोण था कि महज नाम बदलने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। वर्ष1942 में वह भारत के गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में एक श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त हुए।

        इसके बाद 1946 में उन्हें बंगाल से संविधान सभा के लिए चुना गया। उसी समय उन्होंने अपनी पुस्तक प्रकाशित की, “शूद्र कौन थे”?आजादी के बाद वर्ष 1947 में उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में कानून एवं न्याय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया लेकिन 1951 में उन्होंने कश्मीर मुद्दे, भारत की विदेश नीति और हिंदू कोड बिल के प्रति प्रधानमंत्री नेहरू की नीति पर अपना मतभेद प्रकट करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। डा.  अंबेडकर को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने 12 जनवरी 1953 को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।आखिरकार 21 वर्षों के बाद, उन्होंने सच साबित कर दिया, जो उन्होंने 1935 में येओला में कहा था कि “मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। 14 अक्टूबर 1956 को, उन्होंने नागपुर में एक ऐतिहासिक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया और 06 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई।

           भारतीय संविधान के जनक के रूप में संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक समावेशी संविधान तैयार किया जो सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देता है। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई और संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसे समाप्त किया। उन्होंने अनुसूचित जातियों, जनजातियों  और पिछड़ों के लिए आरक्षण के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की। यही नहीं, उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति, तलाक और गोद लेने का अधिकार दिलाने का प्रयास किया, जिससे महिलाओं को समानता मिले। देश के प्रथम श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने कामकाज को 8 घंटे तक सीमित किया। इसके साथ ही समान काम के लिए समान वेतन, महिला श्रम कल्याण और कर्मचारी राज्य बीमा जैसे सुधार लागू किए। बाबा साहेब ने दलितों को शिक्षित, संगठित और संघर्ष करने का भी संदेश दिया। यही वजह है कि बाबा साहब आज तक वंचित और पिछड़ों से लेकर आमजन की स्मृतियों में जीवंत हैं।