प्रदीप कुमार वर्मा

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शख्सियत समाज साक्षात्‍कार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय : शुरू किया वैकल्पिक राजनीति का दौर, देश को दिया अंत्योदय का मूल मंत्र

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प्रदीप कुमार वर्मा एक जाने-माने अर्थशास्त्री, एक राष्ट्रवादी लेखक एवं संपादक, एक प्रबुद्ध समाजशास्त्री एवं इतिहासकार। एक विचारक, नियोक्ता और दार्शनिक। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मात्र राजनेता नहीं थे, वे उच्च कोटि के चिंतक, विचारक और लेखक भी थे। उन्होंने शक्तिशाली और संतुलित रूप में विकसित राष्ट्र की कल्पना की थी। एकात्म मानववाद जैसी विचारधारा और अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की आज जयंती है। जनसंघ से भाजपा के उदय तक पार्टी ने विपक्ष से राजनीति के मजबूत विकल्प का सफर तय किया है तो उसकी नींव डालने वाले व्यक्तित्व थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय। उन्होंने संगठन आधारित राजनीतिक दल का एक पर्याय देश में खड़ा किया। उसी का परिणाम है कि भारतीय जनसंघ से लेकर के भारतीय जनता पार्टी तक संगठन आधारित राजनीतिक दल देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है। यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के ही पार्टी के प्रति संस्कार और समर्पण का नतीजा है कि आज भारतीय जनता पार्टी विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में शुमार है।              पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को धनकिया नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता भगवती प्रसाद उपाध्याय नगला चंद्रभान फरह, मथुरा उप्र के निवासी थे। उनकी माता का नाम रामप्यारी था, जो धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। दीनदयाल अभी 3 वर्ष के भी नहीं हुये थे, कि उनके पिता का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी भी अत्यधिक बीमार रहने लगीं तथा 8 अगस्त 1924 को उनका भी देहावसान हो गया। उस समय दीनदयाल महज 7 वर्ष के थे।  8वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उपाध्याय ने कल्याण हाईस्कूल सीकर राजस्थान से दसवीं की परीक्षा में बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद वर्ष 1937 में पिलानी से इंटरमीडिएट की परीक्षा में पुनः बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। वर्ष 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कालेज से बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए और कॉलेज छोड़ने के तुरंत बाद ही संघ के प्रचारक बन गए। अपने जीवनकाल के दौरान इन्होंने राजनीतिक क्षेत्र, दार्शनिक क्षेत्र, पत्रकारिता एवं लेखन क्षेत्र इत्यादि में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किये।        दीनदयाल जी के राजनीतिक चिंतन पर गौर करें तो वे शासन और राजनीति के वैकल्पिक प्रारूपों के प्रस्तावक थे। उनका मानना था कि भारत के लिए न तो साम्यवाद और न ही पूंजीवाद उपयुक्त है। उनके प्रारूप को एकात्म मानव दर्शन का सिद्धांत कहा जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार, भारत में प्राथमिक चिंता एक स्वदेशी विकास मॉडल विकसित करना होना चाहिए जिसका मुख्य केंद्र मानव हो। यह पश्चिमी पूंजीवादी व्यक्तिवाद और मार्क्सवादी समाजवाद दोनों का विरोधी है। हालाँकि पश्चिमी विज्ञान का स्वागत करता है । यह पूंजीवाद और समाजवाद के बीच एक मध्य मार्ग तलाशता है, दोनों प्रणालियों का उनके संबंधित गुणों के आधार पर मूल्यांकन करता है, जबकि उनकी ज्यादतियों और अलगाव की आलोचना करता है। इसे भारतीय जन संघ में एक वैचारिक दिशा निर्देश के रूप में अपनाया गया। उनका मानना था कि धर्म किसी राज्य पर शासन करने का सबसे सही मार्गदर्शक सिद्धांत है।        एक वक़्त था जब पंडित जवाहरलाल नेहरु के दौर यह माना जाता था कि देश में कांग्रेस का ही शासन रहेगा। लेकिन नेहरू के बाद कौन? पंचायत से पार्लियामेंट तक एक ही पार्टी का राज था। लेकिन अचानक 1962 से 1967 के बीच एक ऐसा राजनीतिक खालीपन आया कि देश को लगा कि इस रिक्तता को कौन भरेगा?  पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि की वजह से ही वैकल्पिक राजनीति का दौर आया।दीनदयाल उपाध्याय ने कांग्रेस के विकल्प के तौर कार्यकर्ता के निर्माण पर जोर दिया। उनका उद्देश्य ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक नई श्रेणी तैयार करना था जिसका एक स्वतंत्र चिंतन हो, राष्ट्रभक्ति से प्रेरित हो और राष्ट्र-समाज को समर्पित हो। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति संगठन को वैचारिक अधिष्ठान देने, कार्यकर्ता के निर्माण और संगठन के विस्तार में लगा दी। आज संघ और भाजपा जिस मुकाम पर है,उस विचार की नींव पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ही डाली थी।         पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का एक बड़ा हिस्सा उनके विचारक, लेखक और पत्रकार रूप में भी जाना जाता है। वर्ष 1940 के दशक में उन्होंने लखनऊ से मासिक “राष्ट्रधर्म”, साप्ताहिक पांचजन्य और दैनिक “स्वदेश” की शुरुआत की। उन्होंने हिंदी में “चंद्रगुप्त मौर्य” नाटक और “शंकराचार्य” की जीवनी भी लिखी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कुछ पत्रिकाओं में भी कार्य किया। उन्होंने वर्ष 1940 में लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म में काम किया। वहीं, बाद में पांचजन्य और स्वेदश की भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने शुरुआत की। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केबी  हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। इसके अलावा उनकी कृतियों में ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं” ‘जगतगुरू शंकराचार्य’, ‘अखंड भारत क्यों हैं’, ‘राष्ट्र चिंतन’ और ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ आदि भी शामिल हैं।      पंडित दीनदयाल का विचार संगठन तक सीमित नहीं था, उनका आर्थिक दर्शन भाजपा की राजनीति का केंद्र है. दीनदयाल जी कहते थे- “आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीढ़ी पर पहुंचे हुए व्यक्ति नहीं, बल्कि सबसे नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होगा। ”केंद्र सरकार की वित्तीय समावेशन की योजना आज समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही है तो वह पंडित जी के अंत्योदय का ही उदाहरण है।  दीनदयाल जी के विचारों का ही प्रभाव है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना’ की शुरुआत की जो आज ग्रामीण भारत की एक नई क्रांति बन चुकी है। उनका कहना था- “समाज की अंतिम सीढ़ी पर जो बैठा हुआ है; दलित हो, पीड़ित हो, शोषित हो, वंचित हो, गांव हो, गरीब हो, किसान हो… सबसे पहले उसका उदय होना चाहिए. राष्ट्र को सशक्त और स्वावलंबी बनाने के लिए समाज को अंतिम सीढ़ी पर ये जो लोग हैं उनका सामाजिक, आर्थिक विकास करना होगा.”         यह भी एक सर्वमान्य ने सत्य है कि कोविड काल में देश के 80 करोड़ लोगों के फ़्री अनाज देना, किसान सम्मान निधि में अभी तक पौने दो लाख करोड़ की राशि सीधे बैंक खाते में पहुंचाना, 45 करोड़ से अधिक गरीबों का जनधन खाते खुलवाना, उज्ज्वला के तहत 9 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन, घर-घर शौचालय का निर्माण, स्वनिधि योजना, आयुष्मान भारत, नल जल योजना आदि के जरिए कदम बढ़ा रही केंद्र सरकार की सभी गरीबोन्मुख पहल पंडित जी के अंत्योदय के दर्शन से ही निकली हैं। एकात्म मानववाद और अंत्योदय के जिस रास्ते पर चलकर आज केंद्र सरकार देश के हर वर्ग के सपने का साकार कर आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम बढ़ा रही है, उसके प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ही हैं। एकात्म मानववाद का उद्देश्य व्यक्ति एवं समाज की आवश्यकता को संतुलित करते हुए प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है। यह प्राकृतिक संसाधनों के संधारणीय उपभोग का समर्थन करता है जिससे कि उन संसाधनों की पुनः पूर्ति की जा सके।      आज वैश्विक स्तर पर एक बड़ी जनसंख्या गरीबी में जीवन यापन कर रही है। विश्वभर में विकास के कई मॉडल लाए गए लेकिन आशानुरूप परिणाम नहीं मिला। अतः दुनिया को एक ऐसे विकास मॉडल की तलाश है जो एकीकृत और संधारणीय हो। एकात्म मानववाद ऐसा ही एक दर्शन है जो अपनी प्रकृति में एकीकृत एवं संधारणीय है। एकात्म मानववाद न केवल राजनीतिक बल्कि आर्थिक एवं सामाजिक लोकतंत्र एवं स्वतंत्रता को भी बढ़ाता है। यह सिद्धांत विविधता को प्रोत्साहन देता है अतः भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त है। “एकात्म मानववाद” का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं “अंत्योदय” अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है अतः यह दर्शन न केवल भारत अपितु सभी विकासशील देशों में सदैव प्रासंगिक रहेगा। भारत के संदर्भ में यह भी सुखद है की वर्तमान में देश की बागडोर एनडीए सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी के हाथ में है, जो एकात्म मानववाद औऱ अंत्योदय के संकल्प को साकार करने में जुटे हैं। प्रदीप कुमार वर्मा

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राजनीति

गुजरा वोटर यात्रा का “कारवां”, अब सिर्फ नफरत का “गुबार” 

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प्रदीप कुमार वर्मा पीएम नरेंद्र मोदी के विरुद्ध “तू-तड़ाक” की भाषा का इस्तेमाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां के विरुद्ध भद्दी गालियों का चलन, कांग्रेस नेता राहुल गांधी का भावी पीएम के रूप में ऐलान, राजद नेता तेजस्वी यादव द्वारा खुद को सीएम घोषित करने की कशमकश और ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारों का प्रयोग। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अगुवाई में बिहार में वोटर अधिकार यात्रा का यही फलसफा देखने को मिला। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मतदाताओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता के लिए निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा एक प्रकार से अपने उद्देश्य से कोसों दूर रही। विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने की नाकाम कोशिश भी वोटर अधिकार यात्रा में दिखी। वहीं, प्रधानमंत्री समेत भाजपा तथा अन्य के विरुद्ध राजनीतिक घृणा का एक नया चेहरा भी सामने आया। कांग्रेस और राजद जहां वोटरों के अधिकार से इस यात्रा को जोड़ रही है। वहीं, भाजपा सहित समूचे एनडीए के नेताओं का आरोप है यह घुसपैठियों को बचाने की यात्रा है। कुल मिलाकर बिहार चुनाव में वोटर अधिकार यात्रा का कारवां गुजर चुका है और अपने पीछे राजनीतिक नफरत का गुबार छोड़ गया है।            कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की बिहार में करीब एक पखवाड़े की वोटर अधिकार यात्रा सोमवार को समाप्त हो गई। यह यात्रा राज्य के 25 जिलों और 110 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरी। राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ सासाराम से शुरू हुई थी और पटना में समाप्त हुई। करीब एक हजार 300 किलोमीटर लंबी इस यात्रा का मकसद उन लाखों मतदाताओं के लिए आवाज उठाना था, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। इस यात्रा से बिहार का मतदाता कितना जागरूक हुआ है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कई विवाद हुए और राजनीति के कई स्याह चेहरे यात्रा के दौरान देखने को मिले। वोटर अधिकार यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए “तू-तड़ाक” की भाषा का इस्तेमाल किया। हद तो तब हो गई जब कांग्रेस और राजद के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां को भी गाली दी गई जिसके चलते राहुल गांधी की इस वोटर अधिकार यात्रा के ” निहितार्थ” को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।            बिहार में पिछले करीब चार दशकों में कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई है। बिहार की राजनीति में वर्तमान में कांग्रेस राजद की अगुवाई वाले महा गठबंधन का हिस्सा है। बिहार में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन की तलाश लेकर कांग्रेस ने वोटर अधिकार यात्रा शुरू की।  इस यात्रा ने राहुल गांधी को विपक्ष के मुख्य चेहरे के तौर पर स्थापित किया, इसमें कोई दो राय नहीं है। यह भी सत्य है कि वोटर अधिकार यात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी उत्साहित किया है। यात्रा के जरिए देश के मुख्य विपक्षी दलों ने भी अपनी एक जुटता दिखाने की कोशिश की और यात्रा के दौरान इन दलों के नेताओं ने अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई। वोटर अधिकार यात्रा में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, रेवंत रेड्डी, अशोक गहलोत, केसी वेणुगोपाल, सिद्धारमैया शामिल हुए। आरजेडी से तेजस्वी यादव पूरे समय यात्रा में रहे और लालू प्रसाद यादव भी इसमें बीच में शामिल हुए।       वोटर अधिकार यात्रा में समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव, डीएमके के एमके स्टालिन और कनिमोझी, झारखंड मुक्ति मोर्चा से हेमंत सोरेन, तृणमूल कांग्रेस से यूसुफ पठान और ललितेश त्रिपाठी, एनसीपी (शरद पवार) से सुप्रिया सुले और जितेंद्र आव्हाड, शिवसेना (यूबीटी) से संजय राउत, वामपंथी पार्टियों से दीपांकर भट्टाचार्य (सीपीआई-एमएल), डी राजा (सीपीआई), एमए बेबी (सीपीआई-एम) और वीआईपी से मुकेश सहनी भी शामिल हुए। लेकिन वोटर अधिकार यात्रा के दौरान समय-समय पर हुए विवादों के चलते इस यात्रा के उद्देश्य और औचित्य पर भी सवाल उठने लगे। वोटर अधिकार यात्रा के दौरान राहुल गांधी द्वारा ऐलान किया गया था कि इस यात्रा के माध्यम से जिन लोगों के वोट काटे गए हैं, उनकी पहचान कर उनको सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के सामने पेश किया जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक विवाद उस समय भी आया जब दक्षिण भारत के नेताओं ने वोटर अधिकार यात्रा में शिरकत की जिसको लेकर भाजपा और जनता दल यूनाइटेड ने उन पर निशाना साधा। यात्रा से पूर्व दक्षिण भारत के नेताओं ने बिहारी लोगों पर कथित अपमानजनक टिप्पणी की थी जिसको लेकर भी यात्रा के दौरान काफी “तनाव” देखने को मिला। इस यात्रा के दौरान कुछ विवाद भी हुए। राहुल गांधी के काफिले में एक पुलिस कांस्टेबल घायल हो गया। बीजेपी ने इस मुद्दे पर हमला किया। दरभंगा में एक रैली के दौरान पीएम मोदी के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध उपयोग की गई तू-तडाक की भाषा को लेकर लोगों में काफी रोष देखने को मिला तथा राहुल के इस तेवर की खूब आलोचना भी हुई। बीजेपी को इससे विपक्ष पर हमला करने का मौका मिल गया और उसने इसकी कड़ी आलोचना की। पटना में पक्ष-विपक्ष के पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच झड़प भी हुई, जिससे तनाव बढ़ गया। कई राजनीतिक प्रेक्षकों ने राहुल गांधी की इस भाषा को सभ्य और शुचिता की राजनीति से परे बताया। कांग्रेस और राजद की वोटर अधिकार यात्रा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत मां के अपमान के रूप में भी याद किया जाएगा। कांग्रेस और राजद के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत मां के लिए भद्दी गलियों का इस्तेमाल वर्तमान की घृणित राजनीतिक सोच को बताता है। भाजपा अब इस अपमान के लिए कांग्रेस तथा आरजेडी पर हमलावर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम में भावुक होते हुए कहा कि उनकी मां का राजनीति से कोई लेना देना नहीं, वह  सशरीर मौजूद नहीं है। इसके बाद भी उसे गाली दी गई। बिहार की मां-बहन और बेटियां इस अपमान को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। अपनी मां के अपमान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस भावुक अपील ने बिहार चुनाव के पहले नजर एक नया राजनीतिक विमर्श सेट कर दिया है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि जब-जब कांग्रेस सहित विपक्ष ने नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया है, तब तब विपक्ष को इसका नुकसान उठाना पड़ा है।           वोटर अधिकार यात्रा के दौरान वोट चोरी के जो भी सबूत दिखाए गए, वह या तो पड़ताल के बाद में गलत निकले या फिर चुनाव आयोग से लेकर लोगों द्वारा इन्हें नकार दिया गया। वोटर अधिकार यात्रा में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच में अच्छी केमिस्ट्री देखने को मिली। जिससे बिहार चुनाव के दौरान महा गठबंधन में सीटों के बंटवारे तथा वोट ट्रांसफर को लेकर एक सुखद संकेत माना जा रहा है लेकिन इसके उलट कई कोशिशों के बावजूद भी राहुल गांधी और कांग्रेस द्वारा तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित नहीं किए जाने को लेकर भी महा गठबंधन में चल रही खींचतान भी सामने आई। वोटर अधिकार यात्रा से उत्साहित कांग्रेस का कहना है कि हमने बिहार की धरती से “चुनावी क्रांति” का आगाज किया है और यह मैसेज पूरे देश में जाएगा। उधर भाजपा का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना यह कांग्रेस की पुरानी परिपाटी रही है जिसे लोकतंत्र के लिए सही नहीं माना जा सकता। बिहार की सत्ता पर काबिज जनता दल यूनाइटेड का कहना है कि यह एक चुनावी नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। प्रदीप कुमार वर्मा

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