बाज़ारवाद का आतंक

चंद्र मौलेश्वर प्रसाद

देश की स्वतंत्रता के बाद भारत ने पहली पंचवर्षीय योजना लागू की थी, जिसमें खेती को प्राथमिकता दी गई। दूसरी पंचवर्षीय योजना एक ऐसी महत्त्वकांक्षी योजना थी जिसे साकार करने के लिए देश के प्रधानमंत्री ने पेट और कमर कसने की बात कही थी। देश ऐसे दौर से भी गुज़रा जब लोगों को रोज़मर्रा सुविधाओं के लिए दिन भर कतारों में खड़ा रहना पड़ता था। स्कूटर और कार तो विलास की श्रेणी में आते थे। स्कूटर खरीदने के लिए सालों की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। कारों के नाम पर केवल हिंदुस्तान और फ़िएट ही सड़कों पर दिखाई देती थीं। जनता का यह त्याग उस समय रंग लाया जब वैश्विक बाज़ारवाद का दौर नब्बे के दशक में शुरू हुआ। ‘कंज़्यूमर इज़ द किंग’ का दौर चल पड़ा और उपभोक्ता को अपनी मर्ज़ी के सामान का चयन करने की सुविधा मिली। अब उसे लम्बी कतारों में खड़े होकर पानी या लाइट का बिल नहीं बांधना पड़ता था, ई-सेवा के एयर-कंडीशन्ड हॉल की सुविधा उपलब्ध थी।

उपभोक्ता को राजा का दर्जा देकर व्यवसायी और उद्योगपति लूट मचा रहे हैं। ग्राहक को अपनी ओर खींचने के लिए हर तरह का लालच दिया जा रहा है! उपभोक्ता की बाल-मानसिकता का लाभ उठाकर व्यापारी अपनी चीज़ों की ओर उसे आकर्षित कर रहे हैं। उपभोक्ता भी विज्ञापन के आकर्षण में आकर ऐसी वस्तुएं खरीद रहा है जो कल तक ऐश का सामान समझा जाता था। तकनीक का ऐसा जाल फैलाया जा रहा है कि घर की उपयोगी वस्तुएं भी बेकार लगने लगी हैं। सुराही और मटकों का स्थान रेफ़्रिजेटर ने ले लिया है। ताज़ा फ़लों के स्थान पर जूस के शीशे जमा हो रहे हैं।

देश प्रगति के पथ पर चल पड़ा था। मध्यम वर्ग सम्पन्न हो चला था। अब घर में सभी आवश्यक वस्तुएं आ गई थी। बाज़ार में वस्तुओं की मांग घटने लगी थी। मांग बढ़ाने के नित नये हथियार चलने लगे। अब लोगों में जेब से अधिक खरीदने की आदत पड़ गई।

बाज़ार ने एक और दाँव फेंका। ‘अभी पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं, बैंक है ना!’ लोगों को उधार की आदत पड़ गई। कर्ज़ लेने के नियम सरल बनाए गए, ब्याज़ की दरें आकर्षक कर दी गईं और ग्राहक को आधुनिकता के मोह जाल में फंसाया गया। इंस्टालमेंट और बैंक लोन के चक्कर में अब मध्यम वर्ग पिसता जा रहा है। रही सही कसर क्रेडिट कार्ड ने कर दी। बस, कार्ड फेंको और सामान उठाओ!

बाज़ार का आतंक इस कदर छा रहा है कि हर व्यक्ति अपनी कमीज़ को दूसरे की कमीज़ से उजली देखना चाहता है, भले ही इसके लिए उसे कुछ हानि ही क्यों न उठानी पड़े। विज्ञापन का ऐसा आतंक छाया हुआ है कि हर प्रकार की झिझक या शर्म को ताक पर रख दिया गया है। बाल निखारने से लेकर बाल निकालने तक के विज्ञापन के बड़े-बड़े होर्डिंग दिखाई देने लगे। रही-सही कसर टीवी ने पूरी कर दी। महिलाओं के सभी दिन एक समान हो गए हैं; हर समय अब उछल-कूद रहे है। पुरुष अपनी यौन-तृप्ति के लिए अब खुशबूदार कंडोम का प्रयोग कर सकते हैं तो महिलाएँ यौन संबंध के ७२ घंटों में गर्भ के खतरे को दूर कर सकते हैं। ऐसे निर्लज्ज विज्ञापन भले ही बच्चों की समझ के बाहर हों पर उन्हें देख कर छोटी आयु में ही वे जवान हो रहे हैं। इसी का परिणाम है कि युवा पीढ़ी में अब हर प्रकार के अपराध देखे जा सकते हैं जिन में यौन अपराध सब से अधिक हैं।

यह सही है कि राष्ट्र की समृद्धि ने बाज़ारवाद के आतंक को जन्म दिया है। आंध्र प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने जब प्रदेश की समृद्धि के लिए इंफ़र्मेशन टेक्नालोजी की संस्थाओं को अपने संस्थान इस प्रदेश में खोलने का आह्वान किया था तो इस निर्णय के बाद पुलिस अधिकारियों को यह भी जता दिया था कि उन्हें और अधिक सतर्क रहना है। उन्होंने कहा था कि राज्य के विकास के साथ अपराध भी बढ़ता जाएगा और पुलिस पर अधिक ज़िम्मेदारी पड़ेगी जिसके लिए उन्हें तैयार रहना होगा।

आज हालत यह है कि घर कचरे से भरा पड़ा है। घर सिकुड़ कर फ़्लैट हो गए हैं पर लोगों की पिपासा तृप्त नहीं हुई। तब उद्योगजगत ने नई चाल चली। बाज़ार ने अलादीन के चिराग की नीति अपनाई- ‘पुरानी चीज़ के बदले नई चीज़ ले लो’। लोगों को अपने घर की अच्छी वस्तुएं भी पुरानी लगने लगी थी। मांग बढ़ने लगी और फिर बाज़ार का बाज़ार गर्म हो गया।

बाज़ारवाद के इस दौर में जब किसी को अपने अभाव का अहसास होता है और वह इस अभाव को दूर नहीं कर पाता तो उसमें लूटने-खसोटने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। धन के अभाव में अपराध की प्रवृत्ति जाग उठती है और वह किसी भी हाल में अपनी सुविधाओं को हासिल करना चाहता है। दूसरी ओर समृद्ध समाज अपने को कानून के ऊपर समझने लगता है। धन, राजनीतिक शक्ति और शराब के नशे में वे गैरकानूनी कृत्य करने लगते हैं। कार से कुचले जाने के कितने ही उदाहरण हैं जो इस बात का जीवित प्रमाण है।

बाज़ारवाद का आतंक उन छोटे व्यापारियों को भी कुचल रहा है जो स्वतंत्र रूप से अपनी आजीविका कमा रहे थे। बडे-बड़े मॉल और बड़े-बड़े संस्थानों के आगे छोटे व्यापारी टिक नहीं पाते। परिणाम यह हो रहा है कि कल तक जो अपनी दुकान का मालिक था, आज वह उसी जगह एक बड़े मॉल या संस्थान का नौकर बन गया है। ग्राहक भी आरामतलब हो गया है। एयरकंडीशन्ड मॉल में जाकर उसके अहम की तुष्टि भी हो जाती है भले ही दो रुपये अधिक देने पड़े!

आज का अतिथि भी बाज़ारवाद की ज़द से नहीं बच सका है। एक समय था जब अतिथि का स्वागत ठंडे पानी और निंबू पानी से होता था। आज ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ हो गया है। फ्रिज में से कोला खोला या आइसक्रीम निकाली और हो गया अतिथि का स्वागत! खिलाना हो तो पिज़ाडेन है ना- आधे घंटे में पिज़ा हाज़िर। यही रह गई है हमारे आतिथ्य के स्वागत संस्कार। बाज़ारवाद के इस आतंक से हमारा संस्कार भी नहीं बच पाया है।

जब तक मध्यम वर्ग की आय और आयु बढ़ती रहेगी, तब तक बाज़ारवाद का यह आतंक बरकरार रहेगा और ऐसा लगता है कि इस विशाल मध्य वर्ग का न तो अंत होगा और ना ही बाज़ारवाद के इस आतंक का….. बस, यही कहा जा सकता है- बाज़ आए हम ऐसे बाज़ारवाद से॥

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