राजेश श्रीवास्तव
एक तरफ जहां हम उत्तर प्रदेश में रहने के चलते अपने आप को सर्वोपरि महसूस करते हैं लेकिन जब पड़ोसी देश बांग्लादेश में अपने हिंदू समाज के लोगों की हत्या और उन पर हो रहे अत्याचार की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बनते देखते हैं तो कलेजा मुंह को आने लगता है कि आखिर बांग्लादेश में हिंदू, ईसाई और बौद्ध समुदाय के लिए लगातार हिंसा गंभीर चिंता का विषय है तो भारत ने खुलकर प्रतिक्रिया क्यों नहीं व्यक्त की। हालांकि भारत ने इन घटनाओं पर खुलकर चिता जरूर जताई है लेकिन क्या हम लाचार हैं वहां के हिंदू युवकों की हत्या होते देखने के लिए । आखिर क्या कारण है कि वहां अल्पसंख्यक समाज खासकर हिंदू एक से बढ़कर एक वीभत्स अत्याचार और दुर्दांत मौत का शिकार हो रहा है। बांग्लादेश में हिदू आबादी करीब 7 प्रतिशत है। हाल के महीनों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिसा, आगजनी, जमीन कब्जे और हत्याओं की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंतरिम सरकार के दौरान 2,900 से ज्यादा हिसक घटनाएं दर्ज की गई हैं।
आखिर सच क्या है और आगे क्या हो सकता है? लगातार हो रही हत्याएं और हिसा यह संकेत दे रही हैं कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन चुकी है। जांच के नतीजे क्या होंगे, यह तो समय बताएगा लेकिन फिलहाल डर और असुरक्षा का माहौल साफ नजर आ रहा है। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने टी-20 विश्व कप के लिए अपनी टीम भारत भेजने से मना तो किया ही, आइपीएल प्रसारण पर भी रोक लगा दी। इसे कुल मिलाकर बात बिगाड़ने वाला रवैया ही कहा जाएगा। उसके ऐसे रवैये के कारण ही उन तत्वों का दुस्साहस बेलगाम है जो हिदुओं को निशाना बनाने के साथ भारत के खिलाफ आग उगलने में लगे हुए हैं।
बांग्लादेश में हिदुओं की हत्या से यही स्पष्ट हो रहा है कि वहां चुन-चुनकर हिदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। हिदुओं की हत्याओं का सिलसिला कायम रहने के बाद भी वहां की अंतरिम सरकार न्यूनतम गंभीरता का परिचय देने से इन्कार कर रही है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार हिदुओं की हत्याओं को या तो सांप्रदायिक हिसा मानने से इन्कार कर दे रही है या फिर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की खोखली बातें करके कर्तव्य की इतिश्री कर ले रही है। वह कुछ घटनाओं को आपसी रंजिश या दुर्घटना भी बता दे रही है। उसे यह आभास होना चाहिए कि अराजक माहौल आपसी रंजिश भुनाने का जरिया बनता है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि हिदुओं की हत्याओं के मामले तो सामने आ जाते हैं, लेकिन उनके घर जलाने, जमीन कब्जाने और उनकी महिलाओं से छेड़छाड़ करने की घटनाएं दबी ही रह जाती हैं।
बांग्लादेश में हिदुओं के खिलाफ माहौल कितना विषाक्त हो गया है, इसे इससे समझा जा सकता है कि वहां हिदू अधिकारियों-कर्मचारियों को लांछित किया जा रहा है और हिदू नेताओं को चुनाव में भाग लेने से रोकने की भी कोशिश की जा रही है। यह सब इसीलिए हो रहा है, क्योंकि वे कट्टरपंथी ताकतें अंतरिम सरकार के संरक्षण में हैं, जो भारत विरोध के लिए जानी जाती हैं। हिदुओं को प्रताड़ित करने के लिए वहां उनके और भारत के खिलाफ सुनियोजित अफवाहें भी फैलाई जा रही हैं। यह एक अफवाह ही थी कि छात्र नेता उस्मान हादी को गोली मारने वाला भारत भाग गया है। बांग्लादेश सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी इस झूठ पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की। उसकी पोल तब खुली जब उस्मान हादी के हत्यारोपित के दुबई में होने की सूचना आई।
बांग्लादेश सरकार यह अच्छी तरह जान रही है कि हिदुओं को लगातार निशाना बनाए जाने से भारत में लोग उद्वेलित हो रहे हैं लेकिन वह हालात सामान्य करने के लिए कोई कदम उठाने के बजाय संबंधों को बिगाड़ने वाले काम कर रही है। बांग्लादेश के हालात बिगड़ने के साथ यह भी दिख रहा है कि वहां की अंतरिम सरकार भारत से संबंध सुधारने के बजाय बिगाड़ने पर आमादा है। उसे न तो अपने यहां के हिदुओं की हत्याओं की कोई परवाह है और न ही भारत विरोधी तत्वों के बेलगाम होते जाने की। वह इन तत्वों पर लगाम लगाने के बजाय उन्हें शह ही अधिक दे रही है। बांग्लादेश में जो हालात हैं, वे हमारी भूलों की भी देन हैं। ऐसी ही भूल हमने कश्मीर को हड़पने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान के मामले में भी की थी। कश्मीर को महज एक राजनीतिक समस्या मानकर हम वहां राजनीतिक समाधान तलाशते रहे। इसके परिणाम क्या रहे, उससे सभी परिचित हैं। हमने कोई सबक नहीं सीखा और 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिदू अल्पसंख्यकों का पाकिस्तानी फौज द्बारा किए जा रहे नरसंहार को रोकने और बांग्लादेश को मुक्त कराने के लिए भारत ने पाकिस्तानी सेना से युद्ध लड़ा। जिस समय भारत बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध में कूदा, उस समय तक पाकिस्तान की फौज 25 लाख बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिदुओं का नरसंहार कर चुकी थी और लाखों महिलाओं के साथ दुष्कर्म हो चुका था।
आज बांग्लादेश में जो हालात हैं, उससे यह स्पष्ट है कि इस्लामिक कट्टरपंथ और भारत के प्रति घृणा वहां के समाज पर अब उसी तरह हावी है, जैसे पाकिस्तान पर हावी है। वह भारत के एहसान और बलिदान, दोनों को ही भूल चुका है। इसलिए भारत में नीति-निर्माताओं को आज के बांग्लादेश संकट को पूर्व में शेख मुजीब और जियाउर रहमान की हत्याओं से उपजे राजनीतिक संकटों की तरह समझना बंद कर देना चाहिए। वे हिंसा के बावजूद राजनीतिक संकट थे परंतु इस बार ऐसा नहीं है। बांग्लादेश के समाज का बड़े पैमाने पर जिहादीकरण हुआ है और यदि हमने इस तथ्य की अनदेखी कर उसे राजनीतिक समस्या समझकर उससे निपटने की कोशिश की तो हम वैसे ही पछताएंगे, जैसे कश्मीर के मामले में पछताते आए हैं। हम बांग्लादेश में चाहे जिस पार्टी का समर्थन करें, वहां के गली-मोहल्लों में कट्टरपंथी जमाती हावी रहने वाले हैं और चाहे किसी भी पार्टी की सरकार वहां आए, वह उनके सामने मजबूर रहने वाली है। इसके चलते भविष्य में बांग्लादेश के हिदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के समक्ष खतरा बढ़ जाए तो हैरानी नहीं। इस खतरे को देखते हुए हमें वहां अपनी सीमा के निकट और अपनी पहुंच के अंदर के हिदू और बौद्ध परिक्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। हमें इजरायल से सीखना चाहिए जो हर सैन्य जीत या संकट के बाद अपने भूभाग का विस्तार करता है ताकि वह यहूदियों के लिए नए परिक्षेत्र बसा सके और अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सके।
राजेश श्रीवास्तव