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    महिलाओं पर सवाल उठाने से पहले स्वयं में झांकने की ज़रूरत

    एक तरफ हम चांद और मंगल पर जीवन बसाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। तो वही दूसरी तरफ हमारे समाज का एक बड़ा तबका महिलाओं के ‘ड्रेसकोड’ में ही उलझा हुआ है। अब हम इक्कीसवीं सदी में भले पहुँच गए हो, लेकिन महिलाओं के कपड़ो को लेकर राजनीति आम हो चली है और हो भी क्यों न? आधुनिकता की दौड़ में हमारे संस्कारों की परिभाषा जो बदल गई है। ऐसे में सोचने वाली बात तो यह है कि क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है जिसे अब कपडों से परिभाषित करना पड़ रहा है? क्या अब वस्त्र ही हमारे सभ्य और असभ्य होने की परिधि तय करेंगे? मान लीजिए किसी के पति या पिता की मौत हुई है। तो क्या पहले वह ड्रेस पर ध्यान केंद्रित करें या उससे भी कोई ज़रूरी बात होती है। यह तो समाज को स्वयं तय करना चाहिए। ऐसा कहने के पीछे कारण है। बीते दिनों मंदिरा बेदी के पति का असमय निधन हो गया। जिसके बाद उन्हें ट्रोल किया जाने लगा कि उन्होंने ऐसे कपड़े क्यों पहने फलाँ-फलां बातें हुईं।

    अब सवाल यहीं क्या कोई महिला जिसके पति का निधन हुआ। वह पहले उस कपड़ें पर ध्यान केंद्रित करें या फ़िर पति के जाने का गम मनाएं? यह काफ़ी साधारण सी बात है कि कोई भी व्यक्ति पहले से तो ऐसे दुःखद समय के लिए तैयार नहीं रहता। फ़िर ऐसे अजीबोगरीब सवाल से किसी की आत्मा और हमारे संस्कारों को औछा आख़िर क्यों साबित करना। जिसपर आज के दौर में हमारे समाज को बोलना चाहिए। उन विषयों पर तो हम येन-केन प्रकारेण चुप्पी साध लेते हैं और जिन विषयों पर नहीं बोलना। उस पर बेवज़ह बोलकर हम बात का बतंगड़ बनाते। यह हमारे समाज में बड़ी ही अचरज़ वाली स्थिति निर्मित होती जा रही है। मंदिरा बेदी को पति के निधन के बाद कैसे कपड़े पहनने चाहिए या नहीं। क्या उन्हें उत्तरप्रदेश में हुई वह घटना याद नहीं आई। जब योगीराज में एक महिला प्रस्तावक के दामन को तार-तार करने वाली घटना घटित हुई? मतलब नज़रिए की भी हद्द होती है। अब हमारा समाज सलेक्टिव होते जा रहा है। उसे कब, क्या और कहां कितना बोलना है। वह उतना ही करता है। फ़िर वह ग़लत, सही को भूला देता है। जो कहीं न कहीं हमारे समाज को ग़लत दिशा की और लेकर जा रहा है।

    एक तरफ़ हमारे समाज में महिलाओं का संस्कारी होना उनके कपडों के आधार पर तय किया जाता है। वहीं दूसरी ओर समाज के एक वर्ग विशेष के द्वारा महिला का ही सरेआम पल्लू खींचा जाता है। वह भी उस समय जब वह महिला अपने ब्लाक प्रमुख की उम्मीदवारी का पर्चा भरने के लिए जा रही होती है। ऐसे में सवाल कई उठते हैं। लेकिन उनपर गहन मंथन करने वाला कोई नहीं। हमारे देश में हाल ही में प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में 11 महिलाओं को शामिल किया गया है। उत्तरप्रदेश सूबे की ही बात करे। तो यहां से 4 महिलाएं मोदी मंत्रिमंडल में शामिल है और 11 महिला सांसद है। इसके अलावा सूबे में 40 महिला विधायक हैं। इन सबके बावजूद एक महिला का सूबे में सरेआम पल्लू खींचा जाता है। वह भी तमाम मीडिया कैमरों के सामने, लेकिन सामान्य जनमानस तो सामान्य कोई भी महिला मंत्री इस मुद्दे पर अपनी आवाज तक नही उठा पाती है। कोई महिला आयोग इस मुद्दे पर खुलकर सामने नही आता है। फ़िर आख़िर हम किस संस्कार और संस्कृति की ढपली पीटते हैं और किस हैसियत से मंदिरा बेदी को कौन सा कपड़ा पहनना चाहिए था या नहीं उस बात के लिए सलाह देते हैं।

    मतलब लोकतांत्रिक निर्लज्जता की भी हद्द होती है। एक तरफ़ तो जो महिला कपड़ें पहने हुए है। उसके बदन से कपड़े खींचे जाते हैं और दूसरी तरफ़ एक अन्य महिला जिसके ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जिसने असमय अपने पति को खो दिया। उसे कैसे कपडे पहनने चाहिए और कैसे नहीं उसकी सीख दी जा रही। वैसे कई बार जिन महिलाओं को हम अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनते है वे भी मौन धारण कर लेती है। फ़िर काफ़ी खीझ छूटती है, कि अगर वो ही अपने जैसी महिलाओं की बात नहीं रख सकती। फ़िर बाक़ी से क्या उम्मीद लगाई जाएं। आज के समय का एक कड़वा सच तो यह भी है कि हम जिन महिलाओं को अपने प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनते है वह भी हमें इंसाफ नही दिला पाती है।

    समाज का कोई भी वर्ग हो महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हर परिस्थिति में होता रहा है। महाभारत काल की ही बात करे तो द्रोपदी का चीरहरण भरी सभा मे किया गया और सारा हस्तिनापुर मौन रहा। ऐसे में आज की परिस्थितियों को देखकर यही प्रतीत होता है। मानो एक बार फिर देश महिलाओं पर होते अत्याचार के खिलाफ आंखे बंद करके तमाशबीन बन गया है।
    समाज मे महिलाओं को बराबरी के हक दिए जाने की बात का ढिंढोरा बड़े जोरो शोरों से गूंजता है लेकिन जब वही महिला अपनी रूढ़िवादी परम्पराओं से बाहर निकलने का प्रयास करती है। तो बड़ी आसानी से उन पर लांछन लगा दिया जाता है। अभी हाल ही में मंदिरा वेदी के पति की मौत पर कंधा देना और जीन्स पहनकर उनके पति का अंतिम संस्कार करने की ही घटना को देखे तो साफ दिखाई देता है कि कैसे जब कोई महिला समाज के नियमों से बाहर जाती है। तो पितृसत्तात्मक मानसिकता उन पर सवाल खड़े कर देती है। यहां सोचने वाली बात यह है कि क्या महिला के दर्द को उनके कपड़ों के आधार पर देखा जाएगा? क्या मंदिरा बेदी साड़ी पहनकर अपने पति का अंतिम संस्कार करती तो उनका दर्द बेहतर ठंग से दिखाई देता है? या फ़िर क्या साड़ी पहनने से मंदिरा बेदी के पति वापस लौट आते?

    क्या इन सवालों के जवाब आम लोगों के आप हैं, नहीं न! फ़िर उस समाज के लिए एक ही बात कि वह इतना भी असंवेदनशील न हो जाएं, कि महिला को अपने महिला होने से ही दिक़्क़त हो जाएं। वैसे भी वह महिला ही है। जो मां के रूप में ममता बरसाती है। वरना वह दुर्गा और काली भी बन जाती है। कुल-मिलाकर देखें तो समाज को सलेक्टिव अप्रोच से बाहर निकलना होगा। ख़ासकर महिलाओं को लेकर। इसके अलावा हर महिला को एक दृष्टिकोण से देखना होगा। महिला कोई भी हो, अमीर या ग़रीब घर की। हर महिला का सम्मान होना चाहिए। कपड़ें हमारी पहचान नहीं बन सकते, पहचान हमारा अपना व्यक्तित्व ही होता है। भले ही वह अच्छा हो या बुरा। ऐसे में व्यक्ति को चाहें वह महिला हो या पुरुष उसे अपने व्यक्तित्व पर ध्यान देना चाहिए और ग़लत को ग़लत और सही को सही कहने की क्षमता हर किसी में होना चाहिए, न कि चुप्पी साधने का गुण। जैसा कि उत्तर प्रदेश में महिला के पल्लू खींचें जाने पर देखने को मिला।
    आख़िर में एक बात यही कि हमारे देश की तो सदियों से नारी को पूजने की परंपरा रही है। फिर क्यों आज नारी की अस्मिता पर चोट करने से समाज पीछे नही हटता? देखा जाए तो धर्म के ठेकेदारों ने ही धर्म को अपनी सुविधानुसार व्याख्या करना शुरू कर दिया है। जिसकी वज़ह से ये जड़तामूल्क समस्याएं उत्पन्न हो रही। जिसका निदान बहुत आवश्यक है।

    सोनम लववंशी
    सोनम लववंशी
    स्वतंत्र लेखिका

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