कविता

पक्ष के पार

इन दिनों

तुम्हारा हाथ थामना

सबसे मुश्किल काम है।

हाथ थामने से पहले

लोग पूछते हैं—

तुम किस ओर हो?

मैं कहती हूँ—

तुम्हारी ओर।

इतना सुनते ही

कुछ चेहरे

अपने हाथ पीछे कर लेते हैं।

इन दिनों

रोटी के भी

दो हिस्से नहीं होते,

दो पक्ष होते हैं।

नमक

पहले स्वाद में घुलता था,

अब बातों में

चुभने लगा है।

नाम

अब केवल पुकारने के काम नहीं आते।

उन्हें सुनकर

चेहरे पढ़े जाते हैं,

घर खोजे जाते हैं,

और कभी-कभी

इरादे भी तय कर लिए जाते हैं।

इन दिनों

शब्दों की जेबें भी

टटोली जाती हैं।

‘करुणा’ बोलो

तो पूछा जाता है—

किसके लिए?

‘न्याय’ कहो

तो—

किसके पक्ष में?

और प्रेम—

प्रेम कहते ही

बहुत-से लोग

तुम्हारा परिचय

दोबारा पढ़ने लगते हैं।

फिर भी—

स्कूल की एक बेंच पर

दो टिफ़िन

एक साथ खुलते हैं।

एक रोटी

अपनी गोलाई भूलकर

दो भूखों में बँट जाती है।

अचार

डिब्बा बदल लेता है,

और नमक—

उसे याद ही नहीं रहता

कि वह

किसके घर से आया था।

मैं तुम्हारी ओर देखती हूँ।

तुम

अपना हाथ बढ़ाते हो।

मैं थाम लेती हूँ।

और लगता है—

तुम्हारी ओर आते-आते

सारे पक्ष

पीछे छूट जाते हैं।

— डॉ. नेहा गौड़